3 October 2021

WISDOM-----

 चार्ल्स  डार्विन  विकासवाद  के  आधुनिक  सिद्धांत  के  जन्मदाता  कहे  जाते  हैं  l   उनके  घरवालों  ने   उनकी  मरणासन्न  स्थिति  में   पादरी  को  बुलाया   और  कहा ---- " उनकी  आत्मा  को  शांति  देने  वाला  धर्म- संस्कार   आप  संपन्न  करा  दें   l  "  पादरी  बोले ---- "यह  महोदय  जीवन  भर  नास्तिक   रहे  l   नास्तिक  को  स्वर्ग  नहीं  मिल  सकता   l   पहले  ये   आस्तिक  होने  की  आस्था  प्रकट  करें   l  "  डार्विन  की  छोटी  पुत्री   मार्या   ने  कहा  ---- " मेरे  पापा  को ,  जो  आजीवन  एक  संत  की  तरह  रहे  हैं  , क्या  संस्कार  के  अभाव  में   नरक  जाना  ही  पड़ेगा   l  क्या  इन्हे  बिना  धर्म  - संस्कार  के   स्वर्ग  में स्थान   नहीं  मिल  पायेगा   l  "  पादरी  ने  व्यंग्य  के  साथ  कहा   ---- " स्वर्ग  तो  ईश्वर  का  घर  है  l   वे   अपने  विरोधियों  को  क्यों   प्रवेश  करने  देंगे   l "  डार्विन  जो  अभी  कुछ  बोल  सकने  की  स्थिति  में  थे  ,  उन्होंने  पुत्री  को  बुलाया  और  कहा --- " पादरियों  के  ऐसे  स्वर्ग  से  नरक  जाना  बेहतर  है  l   तुम  क्यों  ऐसे  व्यक्ति  से  बात  कर  रही  हो  ,  जिसे  भगवान  का  सही  पता  भी  नहीं  मालूम  l  "       

2 October 2021

WISDOM-----

 स्वराज्य  आंदोलन  का  जब  शंख  बजा   तब  लाल बहादुर  शास्त्री जी  भी  गाँधी जी  के  संपर्क  में  आये   l  गाँधी जी  शास्त्री जी  की   सिद्धांतनिष्ठा , आदर्शवादिता   और  लोकसेवा  की  भावना  से  बहुत  प्रभावित  हुए  l  एक  दिन  उन्होंने  शास्त्री जी  को  बुलाकर  कहा  ---- " देखो  लालबहादुर , तुम में  लोकसेवा  की  उद्दाम  भावना  है  l  परन्तु  इस  मार्ग  पर   धन  सम्पति  एक  ऐसी  बाधा  है   जिसकी  चमक  से  चौंधिया  कर   आदमी  लोकसेवा  की  बात  भूल  जाता  है   और  उसे  परिग्रह  ही   सूझता   है   l  इसलिए  लोकसेवकों  को  अपरिग्रह  का  व्रत  लेना  चाहिए   l "  शास्त्री जी  ने  तत्काल  प्रतिज्ञा  की   कि ---- " मैं  गृह  व  सम्पति  अर्जित  नहीं  करूँगा   तथा  ईश्वर  पर  दृढ़   आस्था  रखते  हुए  जीवन  बीमा   भी  नहीं  कराऊंगा   l "  इस  व्रत  का  शास्त्री जी  ने  जीवन  भर  पालन  किया   l एक  बार  जब  शास्त्री जी  इलाहबाद  से  बाहर न गए  थे  तब  उनके  लिए  उनके  एक  मित्र  ने   कमिश्नर  से  विशेष  छूट  मांग  ली  और   दो  प्लाट  खरीद  लिए , एक  उनके  लिए  व  एक  अपने  लिए  l  शास्त्री जी  जब  वापस  आये   और  उन्हें  इस  बात  का  पता  चला  तो  उन्हें  बहुत  दुःख  हुआ     और      उन्होंने  अपने  प्लाट  के  साथ  उन  मित्र  का  प्लाट  भी  वापस  करा  कर  ही  चैन  लिया  l     इस  बात   की   ट्रस्टियों  ने  बहुत  प्रशंसा  की   तो  उन्होंने  कहा ---- "  मैंने  कोई  ऐसा  आदर्श  का  काम  नहीं  किया  l   मैंने  तो  बापू  को  जो  वचन  दिया  था   उसे  ही  पूरा  किया   l 

WISDOM------

    पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ------ " विश्व -मानव  को  समृद्ध   और  सुखी  बनाने  के  लिए   नूतन   आदर्श   व   सिद्धांतों   का  प्रतिपादन  करने  वालों  को  काल  की  परिधि  में  नहीं  बाँधा  जा  सकता  l  भविष्य  के  ये   दृष्टा   अपने  गहन  चिंतन  के  परिणामस्वरूप   ऐसे  सिद्धांत  प्रतिपादित  कर  जाते  हैं   जो  उनके  समय  में  सर्वथा  काल्पनिक   व  अव्यवहारिक   लगते  हैं  ,  किन्तु   आगे  जाकर  वे  ही  व्यवस्था  में  आते  हैं   l  "                सद विचार  ही  संसार  में  सर्वश्रेष्ठ  हैं  l   सफल  व्यक्ति   अपने  विचार  तथा  बाह्य  कार्य  में   पर्याप्त  समन्वय  करने  की  अपूर्व  क्षमता  रखते  हैं  ,  अपने  विचारों  को  जीवन  देते  हैं  ,  उन्हें  अपने  जीवन  में  उतारते  हैं   l   एक  बार  काका  कालेलकर  से  किसी  विदेशी  ने  पूछा  --- " गांधीजी  का  देश  के  हर  वर्ग  पर   इतना  प्रभाव   किन  कारणों  से  पड़ा  ? "  काका  ने  कहा  ---- " जो  उनके  मन  में  है ,  वही  वाणी  से  कहते  हैं   और  अपने  क्रिया कलापों  को  सार्वजनिक  हित    में  लगाते  हैं  l   वे  वही  कहते  हैं  , जो  करते  हैं   इसलिए  वे  विश्व  भर  में  अनुकरणीय  हैं   l  "  कभी - कभी  संसार  में  ऐसा  वक्त  आता  है  ,  लोगों  पर  दुर्बुद्धि  का  प्रकोप  होता  है   तब  वे  अपनी  सारी  ऊर्जा   श्रेष्ठता  को  मिटाने   और  सद  विचारों  को  नष्ट  करने  में  लगा  देते  हैं   l     स्वामी  विवेकानंद  ने   विचारों  की   शक्ति  का  उल्लेख   करते  हुए  लिखा  है ---- "  विचार  जब  किसी  के  व्यक्तित्व  और  आचरण  में   ठोस  रूप  लेते  हैं  ,  तब  उनसे   विराट  शक्ति   व  महत  परिणाम   उत्पन्न  होते  हैं   l   कोई  व्यक्ति  भले  ही  किसी  गुफा  में   जाकर  विचार  करे   और  विचार  करते -करते   ही  वह  मर  जाये  ,  तो  भी  वे  विचार    कुछ  समय  उपरांत   गुफा  की  दीवारों  का  विच्छेद  कर   बाहर  निकल  पड़ेंगे   और  सर्वत्र  फैल   जायेंगे  , तब  सबको  प्रभावित  करेंगे   l  "

30 September 2021

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   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----- ' विश्व  के  शक्ति  भंडार  में  आत्मबल  सर्वोपरि  है   l   अध्यात्मबल  से  आत्मबल   उभरता  है   l  अध्यात्मबल  का  संपादन  कठिन  नहीं ,   वरन  सरल  है   l   उसके  लिए   आत्मशोधन   एवं  लोकमंगल  के  कार्यों   को  जीवनचर्या  का   अंग  बना  लेने  भर  से   काम  चलता  है  l   व्यक्तित्व  में  पैनापन  और  प्रखरता  का  समावेश  इन्ही  दो  आधारों  पर   होता  है   और  इतना  होने  पर   दैवी  अनुग्रह  अनायास  बरसता  है   और  आत्मबल   भीतर  से  उभरता  है   l  '  आचार्य श्री  लिखते  हैं ---- ' केवट , शबरी ,  अंगद , नल - नील ,  रीछ - वानर , सुग्रीव  की  निज  की  भौतिक  सामर्थ्य  बहुत  कम  थी  ,  पर  वे   ईश्वरीय  शक्ति  से  जुड़  गए   और  अपने  में  देवत्व  की  मात्रा   बढ़ा  लेने  पर  ही   इतने  मनस्वी  बन  सके   l  "      चन्द्रगुप्त  जब  विश्व विजय   की  योजना  सुनकर  सकपकाने  लगे     तो  चाणक्य  ने  कहा ---- " तुम्हारी  दासी -पुत्र  वाली  मनोदशा  को  मैं  जानता   हूँ  l   उससे  ऊपर  उठो   और   चाणक्य  के   वरद  पुत्र   जैसी  भूमिका  निभाओ   l  "  छत्रपति  शिवजी   जब  अपने  सैन्यबल   को  देखते  हुए   असमंजस  में  थे  कि   इतनी  बड़ी  लड़ाई  कैसे  लड़ी  जाएगी  ,  तो  समर्थ  रामदास  ने  उन्हें   भवानी  के  हाथों   अक्षय  तलवार  दिलाई  थी   और  कहा  था ---- "  तुम  छत्रपति  हो  गए  ,  पराजय  की  बात  ही  मत  सोचो   l  "    बड़े - बी अड़े  कार्य  देवत्व  की  शक्ति  के  बिना  असंभव  हैं   l 

29 September 2021

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   भक्ति  में   जाति   का  नहीं   ,  हृदय  का स्थान  होता  है  ,  यही  वजह   है    कि   मजहब  की  दृष्टि  से  मुसलमान   होते  हुए  भी   अब्दुल  रहीम  खानखाना   कृष्ण  के  परम  भक्त  थे   l    बादशाह  अकबर   रहीम दास   जी  को  बहुत  सम्मान  देते  थे   l   अकबर  के  पुत्र  जहांगीर  ने    रहीम  को   बादशाह  के  विरुद्ध    विश्वासघात  करने  में   साथ  देने  का  प्रलोभन    दिया  कि  बादशाह  बनने  के  बाद   वह  उन्हें  मंत्री पद  सौंपेगा  l   रहीम  ने  यह  बात  नहीं  मानी   और  जब  जहांगीर  बादशाह  बना   तो  उसने    रहीम दास  जी  से  भारी  बदला  लिया   l   उसने  रहीम  के  दोनों  पुत्रों  की  हत्या  कर   के  दरवाजे  के  पास  फिंकवा  दिया   l   रहीम  के  सारे   अधिकार  छीन  लिए   और  उन्हें  दर -दर   की  ठोकरें  खाने  को    छोड़  दिया   लेकिन  रहीम  तो  भगवान  के  भक्त  थे  ,  सुख - दुःख  से  परे  !   वे  तब  भी  भक्त  थे  जब   अपरिमित  संपदाओं   के  स्वामी  थे   और  बादशाह  के  दरबार  में  श्रेष्ठ  लोगों  को   बेशकीमती   रत्नों  का  उपहार   दिया  करते  थे  ,  और  अब  इस  स्थिति  में  भी  मस्ती  में  डूबे   रहते  थे  ,  जब  उनके  पास  कुछ  नहीं  था   l     एक  दिन  रहीम  अपने  जीवकोपार्जन  हेतु  बैठे  थे   और  सामने  बेचने  के  लिए  चीजें   पड़ी  हुई  थीं  l   उसी  समय  जहांगीर  अपनी  सेनाओं  के  साथ  वहां  से  गुजरा   और  उन  पर  कटाक्ष  किया   ----- "  देखा  रहीम  !   मेरे  साथ  न  होने  का  परिणाम    l  "    रहीम  को  तनिक  भी  दुःख  नहीं  था   अपनी  करनी  पर    और  कोई  शिकवा  भी  नहीं  था  बादशाह  के   इस    कटाक्ष   व  अपमान   पर   l   इकहत्तर  वर्ष  की  उम्र  में    बड़े  ही  फक्र  के  साथ   इस  नश्वर  देह  को  छोड़ने  से  पूर्व   उन्होंने  अनेक  उल्लेखनीय  कार्य  किए  ,    उन्होंने  ज्योतिष  शास्त्र  में   खेत खोतुकम   एवं  द्वाविशद   योगावली   की  रचना  की   ,  इसके  अतिरिक्त  उन्होंने  अनेक  महान  कार्य  किये   l   ऐसी  मान्यता  है  की  अंतिम  समय  में   उन्होंने   अपने  इष्ट    भगवान  कृष्ण  के  सामने      ही  देह  का  त्याग  किया   और  उन्ही  में  विलीन  हो  गए   l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      

28 September 2021

WISDOM -----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं ----  ' गुरु  तीन  तरह  के  होते  हैं   l   इनमे  पहली  श्रेणी  है   शिक्षक  की ,  जो    बौद्धिक  ज्ञान  देता  है  , इसके  पास  तर्कों  का , शब्दों  का  मायाजाल  होता  है   l   बोलने  में  प्रवीण   ऐसे  लोग  कई  बार  अपने   आप  को  गुरु  के  रूप  में  प्रस्तुत  करते  हैं   l  उनके  कथा -प्रवचन , लच्छेदार   वाणी   अनेकों  को  अपनी   ओर   आकर्षित  करती  है   l   ऐसों  का  मंतव्य   एक  ही  होता  है   कि   लोग  उनकी  सुने , उनकी  पूजा  करें   l  "  ऐसे  ही  एक  गुरु  की  कथा  आचार्य श्री    सुनाते   हैं  ------- एक  उच्च  शिक्षित  गुरु  ,  किसी  ख्यातिप्राप्त   संस्था  के  संचालक  थे   l  देश - विदेश  में  उन्हें    प्रवचन  के  लिए  आमंत्रित  किया  जाता  था  l   एक  बार  वे  विदेश   में  किसी  पागलखाने  में  गए   l   वहां  उन्हें  सुनने  वालों  में   कर्मचारियों  और  चिकित्सकों  के  साथ  पागलखाने  के  पागल  भी  थे   l   प्रवचन  करते  समय  इन  गुरु  महोदय  को   उस  समय   भारी  अचरज   हुआ  ,  जब  उन्होंने  देखा  कि   पागलखाने  के  सारे  पागल  उन्हें  बड़े  ध्यान  से  सुन  रहे  हैं   l   उन्होंने  इस  संबंध   में   अधीक्षक  से  कहा   कि   वे  जरा  इन  पागलों  से   पूछकर  बताएं  कि   उन्हें  मेरी  कौन  सी  बात    पसंद  आई   l  उनके  निर्देशानुसार  उन्होंने  पागलों  से  बात  की  और   उनके  पास  आए  l   गुरु  महोदय  में  भारी  उत्सुकता  थी  , बोले  बताइये  न   क्या  बातें  हुईं  l  " अधीक्षक  थोड़ा  हिचकिचाते  हुए  बोले  ----- " महोदय  !  आप  मुझे  क्षमा  करें  ,  ये  सभी  पागल  कह  रहे  थे   कि   ये  प्रवचन  करने  वाले   तो  बिलकुल  हम  लोगों  जैसे  हैं  ,  फरक  सिर्फ  इतना  है   कि   हम  लोग   यहाँ  भीतर  हैं   और  ये  बाहर  घूम  रहे  हैं   l  "   आचार्य श्री  कहते  हैं  दूसरे  प्रकार  के  गुरु   वे  होते  हैं  जिन्हे  भगवान   अपने  प्रतिनिधि  के  रूप  में  नियुक्त  करते  हैं   जैसे  रामकृष्ण  परमहंस ,  रमण  महर्षि ,  महर्षि  अरविन्द   l   और  तीसरी  श्रेणी  में  ईश्वर  स्वयं  हमारे  गुरु  होते  हैं   l 

WISDOM ------

  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ------ "  '  दक्ष '   को  देवाधिदेव  महादेव  ने   उसकी  कुमार्गगामिता  का  दंड   उसका  मानवीय  सिर  काटकर  ,  बकरे  का  सिर   लगाकर  दिया  था   l   दक्ष  की  चतुरता  का  वास्तविक  स्वरुप  यही  था   l   आज  भी  ' दक्षों  '  ने  ---- चतुरों  ने  यही  कर  रखा  है   l   ये  तथाकथित  चतुर  लोग  समाज  के    मूर्द्धन्य    बने  बैठे    तिकड़म  को  ही   अपना  आधार  बनाये   हुए  हैं   l   दूसरों  के  सहारे  वे  छल - बल  से   आगे  बढ़ते   हैं  ,  ऊँचा  उठते  हैं   l   तप  और  त्याग  का  नाम  भी  नहीं  है   l   ऐसे  मूर्द्धन्य   लोगों  का  बाहुल्य   व्यक्ति  और  समाज  की   आत्मा  को  कुचल - मसल  रहा  है   l   यह  स्थिति  महाकाल  को  असह्य  है   l   आज  का  मानवीय  चातुर्य  ,  जो  सुविधा  - साधनों  के   अहंकार  में   अपनी  वास्तविक  राह   छोड़  बैठा  है  ,  वैसी  ही  दुर्गति  का  अधिकारी  बनेगा  ,  जैसा  की  दक्ष  का  सारा  परिवार  बना  था   l  "                                                 आचार्य  श्री  लिखते  हैं  ---- " कभी - कभी  ऐसा  समय  आता  है   कि   छूत   की  बीमारी  की  तरह  अनाचार  भी  गति  पकड़  लेता  है   और  अपने  आप  अमर  बेल  की  तरह  बढ़ने  लगता  है    l   गलतियां  दोनों  ओर   से  होती  हैं  -- अनाचारी  अपनी  दुष्टता  से  बाज  नहीं  आता  है   और  सताए  जाने  वाले   कायरता , भीरुता   अपनाकर   टकराने  की  नीति   नहीं  अपनाते   l   तब  स्रष्टा  को  भी  क्रोध  आता  है     और  जो  मनुष्य  नहीं  कर  पाता ,  उसे  स्वयं  करने  के  लिए  तैयार  होता  है   l  "      मनुष्य  सन्मार्ग  पर  चले  अन्यथा  शिवजी   का  तृतीय  नेत्र  खुलने  और  भगवान  कृष्ण   के  हाथ  में  सुदर्शन चक्र  आने  में  देर  नहीं  लगती   l