महाराजा सगर की दोनों रानियों ने तप किया और वरदान मांगने के अवसर पर एक ने हजार पुत्र माँगे और दूसरी रानी ने एक पुत्र माँगा l समुचित भावनात्मक पोषण के अभाव में हजारों पुत्र झगड़ालू , उपद्रवी और अनाचारी निकले l अंतत: अपने दर्प एवं दुर्बुद्धि के कारण महर्षि कपिल के साथ अन्याय कर बैठे और मारे गए l दूसरी रानी का जो एकमात्र अकेला पुत्र था उसने समुचित भावनात्मक पोषण , मार्गदर्शन प्राप्त कर महर्षि कपिल को भी प्रसन्न कर लिया तथा राज्य का समुचित सञ्चालन भी किया तथा कीर्ति का भागीदार बना l नीतिशास्त्र में इसलिए कहा भी गया है ----- 'सैकड़ों मुर्ख बेटों की अपेक्षा एक ही गुणी पुत्र श्रेष्ठ है l जैसे अकेला चाँद अंधकार को दूर करता है , हजारों तारे नहीं l उसी प्रकार एक गुणी पुत्र समाज में अंधकार को दूर करता और प्रकाश फैलाता है l '
7 September 2022
6 September 2022
WISDOM ----
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- ' आसुरी प्रवृति वाले व्यक्तियों की मूल रूचि अपने अहंकार की पूर्ति में ही होती है , इसलिए उनको लगता है कि वे ही श्रेष्ठतम हैं l उनसे बढ़कर और उनसे ऊपर कोई और नहीं हो सकता l वे यदि शुभ कर्म भी करते हैं तो इसलिए ताकि उनके स्वयं के अहंकार की पूर्ति हो सके l उनके दान , उनके यज्ञ इसलिए होते हैं , ताकि उनको वाहवाही मिले , लोग उनका नाम लें और कहें कि वे श्रेष्ठ हैं l " श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --- ऐसी प्रवृति वाले मनुष्य अपने आप को ही श्रेष्ठ मानने वाले धन और मान के मद से युक्त होते हैं तथा दिखावे के लिए यज्ञ आदि कर्मों को करते हैं l उनका उद्देश्य इन कर्मों को कर के धर्म की रक्षा करना नहीं होता , बल्कि अपने अहंकार की पुष्टि करना होता है l " ------- इस सन्दर्भ में एक कथा है ----- एक राजा ने अपने अहंकार की पूर्ति के लिए एक बार बड़े -बड़े यज्ञ कराए l बहुत सा दान दिया l लोगों ने उसकी बहुत प्रशंसा की , इससे उसका अहंकार और बढ़ गया l वह सोचने लगा कि उसके समान धार्मिक और परोपकारी और कोई नहीं है l एक दिन एक संत उसके महल में पधारे l उसने संत को अपना सब खजाना , वैभव दिखाया और सोचा कि संत उसकी प्रशंसा करेंगे , पर संत बोले --- " राजन ! क्षण भंगुर में सुख कैसा ? जो शाश्वत नहीं है , उसमें सुख या धर्म ढूँढना मूर्खता है l इससे राजा के अहंकार को बहुत चोट लगी और उसने संत को सूली पर चढ़ाने का आदेश दे दिया l उसे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि संत सूली चढ़ते समय भी मस्ती से मुस्करा रहे थे , मानों कुछ हुआ ही न हो l कुछ वर्षों बाद राजा एक युद्ध में पराजित हुआ l विजेता राजा ने उसको उसी के महल के खम्भे से बांधकर फाँसी चढ़ाने का आदेश दिया तब उस राजा को उन संत की बातें याद आईं l आसुरी प्रवृति वाले ऐसे अहंकारी के द्वारा किए गए धर्मार्थ कार्य भी पाखंड के समान प्रतीत होते हैं l अहंकार का अंत होता ही है l
5 September 2022
WISDOM ---
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'सारे झगड़े कटु वचन से होते हैं l मीठी वाणी सबको वश में कर लेती है l वाणी का संयम आवश्यक है l ' ----एक औरत ने अपनी सहेली से कहा ---- ' मेरे पति बहुत गुस्सा करते हैं , घर में रोज लड़ाई होती है l " उसने कहा --- " अरे , इसकी तो बहुत अच्छी दवा है मेरे पास , तुम एक काम करना l जब वे कुछ कहें तो मुंह में गोली रख लेना l पर कुछ बोलना मत , नहीं तो दवा का असर ख़त्म हो जायेगा l उसने ऐसा ही किया , दो दिन बाद बोली ---" बहन ! तुम्हारी दवा ने बहुत काम किया l क्या नाम है इस दवा का , मैं भी मंगवा लुंगी l उसने कहा --- " प्यारी बहन ! वह तो मिश्री की डली थी l काम उस गोली ने नहीं , तुम्हारे चुप रहने ने किया l एक चुप सौ को हराए l "
स्व. राष्ट्रपति डा. राधाकृष्णन जब रूस में भारतीय राजदूत थे और मास्को में रहते थे , तब एक बार उन्होंने स्टालिन से कहा था --- " भारत के महान सम्राट युद्ध में विजय पाकर भिक्षु बन गए l कौन जाने शायद आप भी उसी प्रशस्त मार्ग पर चल पड़ें l " स्टालिन ने उत्तर दिया --- " हाँ , कई बार चमत्कारी घटनाएँ भी हो जाती हैं l ऐसा चमत्कार संभव तो है ही l " रूस से विदा लेते हुए डा. राधाकृष्णन जब स्टालिन से मिलने गए , तो विदा लेते हुए स्टालिन के सिर पर हाथ रखा , तो भीगी आँखों से विदा देते हुए स्टालिन ने कहा ---- " आप प्रथम व्यक्ति हैं , जो मुझसे मानव सा व्यवहार करते हैं , शेष सब राजदूत तो मुझे दैत्य मानकर दूर रहते हैं l मुझे अब अधिक दिन नहीं जीना , ईश्वर आपको चिरायु करे l " इस संवाद के छह महीने बाद स्टालिन ने शरीर छोड़ दिया l
4 September 2022
WISDOM ----
ईश्वर के नाम में , ईश्वर विश्वास में वह शक्ति है जो हमें सभी समस्याओं से पार लगा देती है l कर्मयोगी बनकर हमें प्रयास तो निरंतर करना ही पड़ता है , अटल विश्वास के कारण ईश्वर हमें सद्बुद्धि देते हैं जिसके सहारे बड़ी से बड़ी कठिनाइयों पर हम विजय प्राप्त कर लेते हैं l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने हमें जीवन जीने की कला का यही सबसे सरल मार्ग बताया है कि सत्कर्म करते हुए निरंतर ईश्वर से सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करें , अंधकार दूर होता जायेगा l एक कथा है ------ एक अत्याचारी राजा था , जो किसी से रुष्ट होने पर उसे बंदी बनाकर और अँधा कर के एक चौरासी कोस के जंगल में छोड़ देता था l उस जंगल के चारों ओर एक बड़ी व मजबूत दीवार बनी हुई थी l ज्यदातर लोग उस दीवार से सिर टकराकर मर जाते थे , पर उन्ही में से एक ऐसा ईश्वर भक्त भी था , जिसे विश्वास था कि जिस ईश्वर ने स्रष्टि की माया रची है , क्या उसके पास एक छोटे जंगल से निकलने का मार्ग नहीं होगा l इसी विश्वास के आधार पर वह रोज दीवार का सहारा लेकर गोल -गोल घूमा करता था और ऐसे ही एक दिन उसे दीवार के मध्य एक ऐसा छिद्र मिल गया जिससे बाहर निकला जा सकता था l उसे जीवन जीने की राह मिल गई l ------ आज के इस वैज्ञानिक युग में मनुष्य ने स्वयं को भगवान समझ लिया है l विभिन्न तरह की दवाइयां , रासायनिक खादें , कीटनाशक , भोजन सामग्री आदि सबके प्राकृतिक गुणों को नष्ट कर के उन पर अपना दिमाग थोप दिया है , स्वयं को प्रकृति से बड़ा समझ लिया है इसीलिए संसार में इतनी बीमारियाँ , आपदाएं , तनाव है l कुछ लोगों के अहंकार ने सारे संसार को मुसीबत में डाल दिया l आज सबसे बड़ी जरुरत सद्बुद्धि की है , सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करें l
3 September 2022
WISDOM -----
संत तुकाराम जन्मजात शूद्र थे l उनका ईश्वर भक्ति करना तथा भक्ति गीत लिखना तात्कालिक सवर्ण पंडितों की द्रष्टि में अनुचित था और एक अपराध था l एक निकटवर्ती पंडित श्री रामेश्वर भट्ट ने उन्हें बुलाया और कहा कि तुम्हे शूद्र होने के नाते यह सब कुछ नहीं करना चाहिए l न ईश्वर भक्ति , न भजन -कीर्तन और न अभंगों की रचना l " तुकाराम अत्यंत ही सरल स्वाभाव के , बहुत ही सीधे - सरल स्वभाव के व्यक्ति थे l उन्होंने रामेश्वर भट्ट की बात स्वीकार कर ली और पूछा --- " किन्तु जो अभंग रचे जा चुके हैं , उनका क्या होगा ? " तब उस ह्रदयहीन पंडित ने कहा --- " उन्हें नदी में बहा दो l " संत तुकाराम तो अनासक्त योगी थे , उनके दबाव में उन्होंने अपने अभंगों की पोथी नदी में प्रवाहित कर दी लेकिन इससे उनका मन इतना दुःखी हो गया कि वे बिटठल मंदिर के सामने तेरह दिन तक बिना अन्न -जल ग्रहण किए पड़े रहे और सोचते रहे कि " मेरी भक्ति में कोई त्रुटि ' है , जो भगवान मुझसे प्रतिकूल हो गए हैं l दुःखी मन की पुकार निष्फल नहीं जाती l तेरहवें दिन तुकाराम को स्वप्न हुआ कि " पोथियाँ नदी किनारे पड़ी हैं , जाकर उठा ले l " तब उनके भक्तगण स्वप्न का हाल सुनकर जयघोष करते हुए गए और पोथियाँ किनारे पर से उठा लाये l
WISDOM----
बलख के बादशाह के पास अपार धन -सम्पदा थी लेकिन उन्हें आत्मिक म संतोष नहीं था l धीरे -धीरे उन्हें संसार से विरक्ति होने लगी l उन्होंने अपने वजीर से कहा --- " मुझे किसी पहुंचे हुए संत के दर्शन कराने ले चलो l " बादशाह को साथ लेकर वजीर लाहौर की ओर रवाना हो गए l लाहौर के समीप जंगल में मियां मीर झोंपड़ी में रहा करते थे l उन्हें जब पता चला कि बादशाह उनके दर्शनों के लिए आ रहे हैं तो उन्होंने अपने शिष्यों को हिदायत दी कि बादशाही ठाठ -बाट वाले किसी व्यक्ति को उनके पास न आने दें l बादशाह को जब यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने अपना सारा समान गरीबों में बंटवा दिया और साधारण वस्त्र पहनकर संत की कुटिया के बाहर पहुंचे l मियाँ मीर ने कहलवाया कि जंगल में एक और फ़क़ीर रहते हैं , कुछ दिन उनकी सेवा करो न , उनके जैसा जीवन जियो , तब तुम्हे दर्शन का मौका दिया जायेगा l बादशाह ने जंगल में रहकर फ़क़ीर की सेवा की और फकीर की इबादत में अपने जीवन को लगाने का निश्चय किया l मियाँ मीर ने खुश होकर बादशाह को अपना शिष्य बनाया और उन्हें आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया l मियाँ मीर के आशीर्वाद से बादशाह आगे चलकर संत बुल्लेशाह के नाम से प्रसिद्ध हुए l