एक व्यक्ति एक संत के पास अपनी जिज्ञासा लेकर पहुंचा और बोला ---- " महाराज ! मैं विवाह करना चाहता हूँ l मैंने अनेक युवतियों को देख भी लिया है , परन्तु अभी तक मुझे कोई सबसे योग्य युवती नहीं मिली l " संत बोले ---- " बेटा ! तुम पहले फूलों के बगीचे में सबसे सुन्दर गुलाब का फूल तोड़कर लाओ , लेकिन शर्त यह है कि एक बार आगे बढ़ने के बाद पीछे नहीं मुड़ना l " थोड़ी देर बाद व्यक्ति खाली हाथ लौटा l संत ने पूछा --- " बेटा ! तुम्हे कोई सुन्दर फूल नहीं मिला ? " वह व्यक्ति बोला --- " महाराज ! मैं अच्छे -से -अच्छे फूल की चाहत में आगे बढ़ता गया l मार्ग में अनेक सुन्दर फूल दिखे , परन्तु मैं इस चाहत में आगे बढ़ता गया कि आगे और भी सुन्दर फूल होंगे l दुर्भाग्यवश अंत में फिर मुरझाये फूल मिले l " संत बोले ---- " बेटा ! जीवन भी इसी प्रकार है l सबसे योग्य की तलाश में भटकते रहोगे तो जो संभव है , उससे भी हाथ धो बैठोगे l इसलिए जो प्राप्त हो सकता है , उसी में संतोष करने की वृत्ति पैदा करो --- यही संभव समाधान है l "
29 September 2022
28 September 2022
WISDOM -----
लघु -कथा ---- राजा अग्निमित्र और श्रेष्ठी सोमपाल मित्र थे l उनमे बहस हो गई l सोमपाल ने कहा राज्य का संरक्षण उपयोगी तो है , पर अनिवार्य नहीं l ईश्वर प्रदत्त विभूतियों और साधनों से मनुष्य बहुत मजे में रह सकता है l राजा को क्रोध आ गया और उन्होंने चुनौती दी --" अच्छा एक वर्ष नगर में मत घुसना , जंगल की सीमा में रहना l अन्दर आए तो जेल में डाल दूंगा l हार मान लो तो प्रतिबन्ध हटा दूंगा और यदि एक वर्ष में कुछ उल्लेखनीय कर के दिखा दोगे तो मैं हार मान लूँगा l " सोमपाल सिमित साधन लेकर जंगल में प्रवेश कर गए l वहां एक निराश लकड़हारा मिला l श्रम बहुत करने पर भी परिवार का पोषण ठीक से न कर पाने के कारण दुखी था l सोमपाल ने उसे उत्साहित किया और कहा , मित्र , मैं तुम्हारी मदद करूँगा , दोनों मिलकर बड़ा काम करेंगे l लकड़हारा राजी हो गया l सोमपाल ने उससे कुल्हाड़ी ले ली और स्वयं लकड़ी काटने लगे और उसे नगर के समाचार लेने भेज दिया l प्राप्त सूचनाओं के आधार पर वे उसके द्वारा जलाऊ और इमारती लकड़ी बेचने लगे l धीरे -धीरे काम बढ़ निकला , अधिक मजदूर लगाकर अधिक काम होने लगा l नगर वासी भी उससे लाभान्वित होने लगे l तभी पता चला नगर में विशाल यज्ञ होने वाला है l सोमपाल ने यज्ञ के लिए समिधाओं तथा सुगन्धित वनौषधियों का संग्रह कर लिया l यज्ञ संयोजकों को सूचना मिली तो अच्छे मूल्य पर तैयार वस्तुएं खरीद ली गईं l इस प्रकार नगर की ढेरों आवश्यकताएं सोमपाल के तंत्र से पूरी होने लगी l जब राजा को सुचना मिली तो खोजा गया कि इस तंत्र के पीछे कौन है l तब राजा स्वयं अपने मित्र सोमपाल से मिलने गए , प्रेम से मिले और पूछा --' तुम तो शहर में घुसे नहीं , यह सब कैसे विकसित किया ? ' सोमपाल बोले --- " मित्र , यह मेरी विचार शक्ति और लकड़हारे की शरीर शक्ति का संयोग है l इसी के संयोग से वन सम्पदा नगर वासियों के काम आई और एक वर्ष का समय हम सब के लिए बहुमूल्य बन गया l इस कथा से हमें यही शिक्षा मिलती है कि ईश्वर ने , प्रकृति ने मनुष्य को असीमित अनुदान दिए हैं , अपने जीवन यापन के लिए राज्य या किसी की ओर मुंह ताकने के बजाय मनुष्य अपनी बुद्धि और श्रम का पूर्ण मनोयोग से इस्तेमाल कर के बहुत कुछ हासिल कर सकता है l
27 September 2022
WISDOM
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- " ईर्ष्यालु व्यक्ति की जीवन यात्रा अधूरी सी होती है , जिसमे जो मिलता है , उसकी कद्र नहीं होती और जो नहीं मिल पाता , उसका विलाप चलता रहता है l ऐसे व्यक्ति को लगता है कि दूसरों का जीवन आसान है , उन्हें कोई कष्ट नहीं l ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी भी अपने जीवन से संतुष्ट नहीं होता , असंतोष उसे हर पल घेरे रहता है l उसे लगता हैहै कि सबसे ज्यादा तकलीफ उसी के जीवन में है और दूसरे बिना किसी कठिनाई के ही आगे बढ़ते जा रहे हैं l " एक कथा है ------ एक व्यक्ति के मरने का समय आया तो देवदूत उसे लेने पहुंचे l उस व्यक्ति ने जीवन में कई पुण्य किए थे और पाप भी l देवदूत उसके हाथ में एक पुस्तक देते हुए बोले --- 'तुम्हारे पुण्य कर्मों के बदले यह पुस्तक तुम्हे देते हैं l यह नियति की पुस्तक है , इसमें सारे प्राणियों के भाग्य लिखे हैं , तुम चाहो तो इसमें कोई एक परिवर्तन अपने पुण्य कर्मों के बदले कर सकते हो l " उस व्यक्ति ने पुस्तक के पन्ने पलटने आरंभ किए , अपना पन्ना देखने से पूर्व वह दूसरों के भाग्य के पन्ने पढ़ने लगा l जब उसने अपने पड़ोसियों म के भाग्य के पन्ने देखे तो उनका भाग्य देखकर वह जल भुन गया और मन ही मन बोला --मैं कभी इन लोगों को इतना सुखी नहीं होने दूंगा और क्रोध में भरकर वह उनके पन्नों में फेर -बदल करने लगा l देवदूतों द्वारा दिए गए निर्देश के अनुसार परिवर्तन केवल एक बार ही किया जा सकता था l अत -: जैसे ही उसने एक बदलाव किया , देवदूत ने वह पुस्तक उसके हाथ से ले ली l अब वह व्यक्ति बहुत पछताया , क्योंकि यदि वह चाहता तो अपनी नियति में सुधार कर सकता था , पर ईर्ष्या के वशीभूत होकर वह दूसरों की नियति बिगाड़ने में लग गया और अवसर गँवा बैठा l मनुष्य ऐसे ही जीवन में आए बहुमूल्य अवसरों को गँवा देता है l
26 September 2022
WISDOM ----
प्राचीन काल में हमारे ऋषियों ने समाज में संतुलन बनाये रखने के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया था , वह था ----- आश्रम व्यवस्था l इसके पीछे उद्देश्य यही था कि 65 -70 वर्ष की आयु तक व्यक्ति सांसारिक जीवन जी लेता है , इसके बाद स्थान खाली करो और नई पीढ़ी को खिलने का मौका दो l इसी विचार को ध्यान में रखकर निश्चित आयु पूर्ण कर लेने पर रिटायर करने की व्यवस्था की गई है l इसके मूल में एक कारण और भी था कि सांसारिक प्राणी होने के कारण लोभ , लालच , कामना , वासना , तृष्णा , महत्वाकांक्षा , अहंकार आदि सभी में कम या ज्यादा होते हैं l अब यदि व्यक्ति की सन्मार्ग पर चलने की प्रवृत्ति नहीं है , नैतिक मूल्यों का ज्ञान नहीं है तो यही भावनाएं आयु बढ़ने के साथ -साथ विकृत रूप ले लेती हैं जिसके दुष्परिणाम सारे समाज को भोगने पड़ते हैं l युद्ध , दंगे , बड़े अपराध , अनैतिक , गैर क़ानूनी कार्य आदि के प्रमुख परिपक्व आयु के ही लोग होते हैं l संसार की आसुरी तत्वों से रक्षा के लिए ही ऋषियों ने कहा था कि एक आयु के बाद ईश्वर का नाम लो , अपने मन को विकारों से मुक्त करने का प्रयास करो ताकि आगे की यात्रा शांतिपूर्ण हो सके l कलियुग में दुर्बुद्धि का प्रकोप है इस कारण सभी क्षेत्रों में संतुलन बिगाड़ गया है l
WISDOM -----
हमारे आचार्य और ऋषियों का कहना है कि -- धन मानव जीवन के लिए आवश्यक है किन्तु धर्म से रहित धन व्यर्थ है , हानिकारक है , रोग -शोक को आमंत्रित करता है l ' इस कथन की सत्यता को आज संसार में देखा जा सकता है l भ्रष्टाचार , बेईमानी , शोषण करना , दूसरों का हक छीनना , अनैतिक साधनों से धन कमाना ये सब आसुरी प्रवृत्ति के लक्षण हैं l जब देवत्व की तुलना में असुरता बलशाली हो जाती है तब उसका परिणाम युद्ध , दंगे , तनाव , बीमारी , महामारी , आत्महत्या , अकाल मृत्यु आदि नकारात्मक घटनाओं में वृद्धि के रूप में देखने को मिलता है l पुराणों में एक कथा है ----- एक बार ऋषि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा ने उनसे कुछ आभूषण की मांग की l ऋषि ने कहा उनके कई शिष्य राजा हैं ,वे उनसे धन मांग कर लाएंगे लेकिन वही धन लाएंगे जो धर्म पूर्वक कमाया गया हो और जिससे राजकोष की हानि न हो l उस समय ईमानदारी बहुत थी , वे अनेक राजाओं के पास गए , उनके राजकोष में जो धन था वह तो धर्म पूर्वक अर्जित था , लेकिन ऋषि अगस्त्य उसमे से धन लेते तो राजकोष में घाटा आ जाता l अत: उन्होंने धन लेने से इनकार कर दिया और वापस लौटने लगे l रास्ते में उन्हें इल्वन नमक एक असुर मिला l उसने महर्षि का अभिप्राय जाना तो प्रार्थना की कि मेरे पास विपुल सम्पदा है , आप जितनी चाहे ले जा सकते हैं l ऋषि , इल्वन के महल में पहुंचे और हिसाब जांचना शुरू किया तो देखा वहां सम्पदा तो अपार थी लेकिन सब कुछ अनीति से , शोषण से , दूसरों को कष्ट देकर उपार्जित थी l ऋषि ने उसे लेने से मना कर दिया और खाली हाथ लौट आए और लोपामुद्रा से बोले --- " भद्रे ! धर्म से कमाई करने और उदारतापूर्वक उचित खर्च करने वालों के पास कुछ बचता नहीं l अनीति से कमाने वालों के पास ही विपुल धन पाया जाता है , लेकिन उसके लेने से हमारे ऋषि जीवन में बाधा पड़ेगी और अशांति होगी l " लोपामुद्रा ने इस सत्य को समझा और सादगी के साथ सुख पूर्वक जीवन जीने में ही गर्व का अनुभव किया l
WISDOM ----
उद्यान में भ्रमण करते -करते सहसा राजा विक्रमादित्य महाकवि कालिदास से बोले ,---" आप कितने प्रतिभाशाली , मेधावी हैं l साहित्य के क्षेत्र में आपकी विद्वता का कोई मुकाबला नहीं l भगवान ने आपका शरीर भी बुद्धि के अनुसार सुन्दर क्यों नहीं बनाया ? " कालिदास जी राजा के व्यंग्य को समझ गए l उस समय तो वे कुछ भी नहीं बोले l राजमहल आकर उन्होंने दो पात्र मंगवाए --- एक मिटटी का , एक सोने का l दोनों में जल भर दिया l कुछ देर बाद कालिदास ने राजा से पूछा --- " अब बताएं राजन ! किस पात्र का जल अधिक शीतल है ? " विक्रमादित्य ने उत्तर दिया --- " मिटटी के पात्र का l " तब कालिदास बोले --- " जिस प्रकार शीतलता पात्र के बाहरी आधार पर निर्भर नहीं है , उसी प्रकार प्रतिभा भी शरीर की आकृति पर निर्भर नहीं है l राजन ! बाहर के सौन्दर्य को नहीं , सद्गुणों को देखा जाना चाहिए l आत्मा का सौन्दर्य ही प्रधान होता है l विद्वता और महानता का संबंध शरीर से नहीं , आत्मा से है l "
25 September 2022
WISDOM ---
पुराण में कथा है कि परशुराम जी ने शिवजी से शिक्षा प्राप्त की l शिक्षा पूर्ण होने पर शिवजी ने अपने प्रिय शिष्य को ' परशु ' उपहार में दिया l संसार में फैले हुए अधर्म के उन्मूलन के लिए यह उपहार दिया और कहा --- " केवल दान , धर्म , जप -तप , व्रत , उपवास ही धर्म के लक्षण नहीं हैं l अनीति से लड़ने का कठोर व्रत लेना भी धर्म साधना का एक अंग है l शिवजी का आशीर्वाद पाकर परशुराम जी ने अनाचार विरोधी महान अभियान की तैयारी की l उनका कहना था कि अनीति ही हिंसा है और अत्याचार , अन्याय , अनीति के विरुद्ध खड़े होना मानवता का चिन्ह है l ' अनाचारी का मुकाबला अकेले नहीं किया जा सकता , यह बात हर युग में सत्य है अत: उन्होंने जन -सहयोग से अत्याचारियों के विनाश का व्यापक अभियान चलाया और इक्कीस बार उन्होंने अत्याचारियों , अहंकारियों का उन्मूलन कर पृथ्वी की सुरक्षा की l उनका कहना था कि किसी के पास कितनी ही बड़ी शक्ति क्यों न हो , जनता की संगठित सामर्थ्य से कम ही रहती है l आज संसार में शांति के लिए परशुराम जी जैसी शक्ति की जरुरत है l हर युग की समस्याएं भिन्न -भिन्न हैं लेकिन उनका निदान संगठित होकर ही किया जा सकता है l आज हमारी कृषि , कला , साहित्य , सम्पूर्ण पर्यावरण ही प्रदूषित हो गया है l कृषि में रसायन घुल जाने से लोग स्वस्थ नहीं हैं , प्रतिरोधक शक्ति कम हो गई है , ,कला और साहित्य के प्रदूषण से लोगों के चरित्र में गिरावट आई है l अब जागरूक होने की जरुरत है l आज सारा संसार एक मंच पर है , जिसके पास शक्ति है , सम्पदा है वही सारी दुनिया पर अपनी हुकूमत चलाना चाहता है ऐसे में अपने अस्तित्व को बचाना चुनौती है l जागरूक और ईमानदार होकर ही हम अपनी कृषि , शिक्षा , चिकित्सा , कला और संस्कृति को पुनर्जीवित कर सकते हैं l