20 August 2023

WISDOM -----

    धर्म  के  नाम  पर  लोग  कितना  लड़ते -झगड़ते  हैं   लेकिन  सत्य   यही  है  कि  जैसे  सूर्य  एक  है  वैसे  ही  ईश्वर  भी  एक  है , हम  अपनी  सुविधा  अनुसार  उसे  अपने -अपने  ढंग  से  पुकारते  हैं l बहुत  सरल  ढंग  से  देखें  तो  एक  हिन्दू  अचानक  दुर्घटना  होने , चोट  लगने  पर  कहेगा 'हाय  राम ',  मुस्लिम  कहेगा  'उई  अल्लाह '   ईसाई  कहेगा  'ओ माय गॉड '  !  पुकारते  सब  उसी  अज्ञात  शक्ति  को  हैं  बस  ! भाषा  अलग  और  नाम  अलग  है  l  सभी  धर्मों  की  मूल  शिक्षा  एक  सी  हैं , सभी  ने  सत्य , अहिंसा , प्रेम , करुणा , दया , ईमानदारी , कर्तव्यपालन   आदि  सद्गुणों  को  अपनाकर  सन्मार्ग  पर  चलने  पर  जोर  दिया  है  l  अपने  ईश्वर  को  पुकारने  के  तरीके  चाहे  हमारे  भिन्न -भिन्न  हों   लेकिन  धर्म  सारे  संसार  के  लिए  एक  ही  हो  ' मानव  धर्म ' --मनुष्य  की  चेतना  विकसित  हो  , वह  सच्चा  इन्सान  बनें  , तभी  संसार  में  सुख -शांति  आएगी  l -------  जापानी  संत  नान -इन  के  पास  एक  कैथोलिक  पादरी  मिलने  गए  l  उन्होंने  उनसे  कहा --- " मेरे  पास  ईसा   के  उपदेशों  की  एक  पुस्तक  है  , यह  मुझे  अत्यंत  प्रिय  है  l  मैं  इसे  आपको  पढ़कर  सुनाना  चाहता  हूँ  l " संत  नान -इन  ने  कहा  --- " अवश्य  , यह  मेरे  ऊपर  अनुग्रह  होगा   l "  यह  सुनकर  पादरी  ने  'दि सरमन  ऑन  दि  माउंट  '  की  कुछ  पंक्तियाँ  पढ़ीं  l  इन्हें  सुनकर  नान -इन  भावविभोर  हो  गए  l  उनकी  आँखों  से  आँसू  बह  निकले   और  वह  ध्यानस्थ  हो  गए  l  ध्यान  टूटने  पर  उन्होंने  कहा --- " ये  तो  बुद्ध  के  वचन  हैं , इन्हें  सुनकर  मैं  धन्य  हो  गया  l " यह  सुनकर  पादरी  बोले  ---"  लेकिन  ये  तो  ईसा  के  वचन  हैं   l "  इस  पर  नान -इन  ने  कहा --- "  तुम  जो  भी  नाम  दो  , पर  मैं  कहता  हूँ  , जहाँ  ज्ञान  और  प्रेम  अपने  शिखर  पर  होते  हैं ,  मानव  चेतना  का  शिखर  होता  है  , वहां  सब  एक  हैं ,  फिर  उनका  स्वरुप  कोई  भी  क्यों  न  हो  l "

19 August 2023

WISDOM -----

     छत्रपति  शिवाजी  अपने  गुरु   समर्थ  गुरु  रामदास    को  आनंद  में  निमग्न  देखा  तो  उनका  मन  हुआ  कि  राज्य , शासन  और  अन्य  परेशान  करने  वाले  दायित्वों  से  छुटकारा  पा  लिया  जाए  l  इसलिए  जब  एक  दिन  समर्थ  गुरु  का  आगमन  हुआ   तो  शिवाजी  ने  उनसे  कहा --- " गुरुदेव  ! मैं  राज्य  के  इन  झंझटों  से  परेशान  हो  गया  हूँ  l  नित्य  प्रति  नई  उलझनें  , इसलिए  मैं  संन्यास  लेने  की  सोच  रहा  हूँ  l "  गुरुदेव  बोले  --- " हाँ , ठीक  है  l संन्यास  ले  लो  , इससे  अच्छा  और  क्या  हो  सकता  है  l  "  शिवाजी  प्रसन्न  हो  गए   और  बोले  --- "  आप  कोई  ऐसा  व्यक्ति  बताइए  , जिसे  मैं  राज्य  सौंप  सकूँ  l "  समर्थ  बोले --- " मुझे  राज्य  दे  दे  और  निश्चिन्त  होकर  वन  में  चला  जा  ! "  शिवाजी  ने  हाथ  में  जल  लेकर   राज्य  दान  का  संकल्प  कर  लिया   और  वन  को  जाने  लगे  l  उन्होंने  दैनिक  दिनचर्या  के  कुछ  सामान  ले  जाना  चाहा   तो  समर्थ  बोले ---- " तुम  राज्य  दान  कर  चुके  हो  ,  तुम्हारा  उस  पर  कोई  अधिकार  नहीं  l  तब  शिवाजी  खाली  हाथ  ही  जाने  लगे   तो  समर्थ  बोले ---- "  दिनचर्या  के  लिए  साधनों  की  आवश्यकता  पड़ेगी  ,  वो  कहाँ  से  लाओगे  ? " शिवाजी  ने  उत्तर  दिया ---- " कहीं  नौकरी  कर  लूँगा  ,  उन्ही  पैसों  से  व्यवस्था  बना  लूँगा  l "  समर्थ  ने  हँसते  हुए  कहा --- "  राज्य  तो  तुम  मुझे  दे  ही  चुके  हो ,  अब  तुम्हे  नौकरी  करनी  है  तो  मेरे  सेवक  बनकर   इस  राज्य  का  सञ्चालन  करो  l  यह  राज -काज  ही  तुम्हारी  नौकरी  है  l "  इसके  उपरांत  छत्रपति  शिवाजी  को  राज्य  करने  में  कभी  कोई  तनाव   अनुभव  नहीं  हुआ  l  सत्य  यही  है  कि  मनुष्य  कार्य  करने  से  नहीं ,  वरन  उसे  बोझ  समझकर   करने  से  तनावग्रस्त  होता  है  ,  कार्य  को  प्रसन्नतापूर्वक  , दायित्व  रूप  में   करने  से  मन  निष्कलुष  और  तनावमुक्त  रहता  है  l  

17 August 2023

WISDOM ----

  तनाव  कहीं  बाहर  से  नहीं  आता  , यह  हमारी  अपनी  ही  कमजोरियों  से  उपजता  है  l  नाम , पद , यश , सम्मान  पाने  की  इच्छा  ही  हमें  तनाव  देती  है  l  यदि  हम  अपने  मन  में   इस  सत्य  को  बैठा  लें   कि  ' देने  वाला  ईश्वर  है  , वह  जो  दे  वह  अच्छा  है  , और  जो  न  दे  उसमें  कहीं  न  कहीं  हमारी  ही  कोई  भलाई  छुपी  है    हमने  अपना  कर्तव्य  किया  , आगे  ईश्वर  की  मर्जी  '     तो  हमें  कभी  कोई  तनाव  नहीं  होगा  l  सुख -चैन  की  नींद  आना  ईश्वर  की  बहुत  बड़ी  देन   है  l  ----एक  बार  गाँधी जी  का  एक  परिचित  धनाढ्य  व्यक्ति  गांधी जी  से  मिलने  पहुंचा  l  उसने  कहा  --- " गांधी जी  !  आप  तो  जानते  हैं  कि  मैंने  लाखों  रूपये  खरच  कर  के  धर्मशाला  का  निर्माण  कराया  था  l  अब  गुटबाजों  ने  मुझे  ही  प्रबंध  समिति  से  हटा  दिया  l  ऐसे  लोग  समिति  में  आ  गए  हैं  , जिनका  धन  की  द्रष्टि  से  योगदान   नगण्य  ही  है  l  इस  संबंध  में  क्या  न्यायालय में  मामला  दर्ज  कराना  उचित  नहीं  होगा  ? "   गांधी जी  ने  कहा --- "  तुमने  धर्मशाला  धर्मार्थ  बनाई  थी   या  उसे  व्यक्तिगत  संपत्ति  बनाए  रखने  के  लोभ  में  ?  असली  धर्म  तो  वह  होता  है  ,  जो  बिना  लाभ  की  इच्छा  के  किया  गया  हो  l  तुम  अभी  तक  नाम  व  प्रसिद्धि  का  लालच  नहीं  त्याग  पाए  हो  , इसलिए  तुम  धर्मशाला  में  प्रबंध  समिति  के  पद  से   हटाए  जाने  से  दुःखी  हो   l  मेरी  बात  मानो   तो  तुम  धर्मशाला   की  प्रबंध  समिति  में  पद   और  नाम  की  प्रसिद्धि   के  मोह  को  त्याग  दो  l  इससे  तुम्हारे  मन  को  शांति  प्राप्त  होगी  l "  यह  सुनकर  उस  व्यक्ति  ने  संकल्प   किया  कि  अब  वह  पद   अथवा  नाम  के  लोभ  में  कभी  नहीं  पड़ेगा   l  

15 August 2023

WISDOM ------

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----" यदि  हम  समस्या  को  सुलझाना  चाहते  हैं  , उस  पर  विजय  पाना  चाहते  हैं   तो  हमें  अपनी  प्रतिक्रिया  को  नियंत्रित  करना  होगा  l  समस्या  के  कारणों   को  जाने -समझे  बिना   तुरंत  रिऐक्ट  करने  से  समस्या  और  भी  जटिल  हो  जाती  है  l  यदि  हमें  समस्या  को  सुलझाना  है  , उससे  बाहर  निकलना  है   तो  हमें  अपना  ध्यान   उसके  समाधान  पर  केन्द्रित  करना  होगा  l  "------- एक  बार  महात्मा  बुद्ध   अपने  शिष्यों  के  साथ  यात्रा  कर  रहे  थे  l  एक  झील  देखकर  उन्होंने  अपने  दोनों  शिष्यों  से  कहा ----" मुझे  प्यास  लग  रही  है  , झील  से  पानी  ले  आओ  l "  तभी  एक  बैलगाड़ी  झील  में   उतरकर    उस  पार  जाने  लगी  l  इससे  पानी  मटमैला  हो  गया  l  एक  शिष्य  तुरंत  लौट  आया   और  बुद्ध  से  बोला --- " पानी  गन्दा  है  , आपके  पीने  लायक  नहीं  है  l "  जबकि  दूसरा  शिष्य   चुपचाप  वहीँ  झील  के  किनारे  ही  बैठ  गया  l  कुछ  समय  बाद  वह  साफ़  पानी  लेकर  बुद्ध  के  पास  पहुंचा  ,  तो  वे  बोले ---- "तुमने  पानी  को  साफ़  करने  के  लिए  क्या  किया  ? "  दूसरे  शिष्य  ने  कहा --- " कुछ  नहीं , सिर्फ  समय  दिया  , मिटटी  अपने  आप  जम  गई   और  मुझे  साफ़  पानी  मिल  गया  l "  आचार्य श्री  लिखते  हैं  --- इस  घटना क्रम  में  दोनों  शिष्यों  के  पास  समान  समस्या  थी   किन्तु  पहले  शिष्य  का  ध्यान  सिर्फ  समस्या  पर  था  इसलिए  वह  पानी  लाने  में  असफल  रहा  l  जबकि  दूसरे  शिष्य  का  ध्यान  समस्या  के  कारण  और  उसके  समाधान  पर  थ  , इसलिए  वह  सफल  रहा  l  आचार्य श्री  लिखते  हैं --- इस  सूत्र  को  अपनाकर  जीवन  में  आने  वाली  किसी  भी  मुश्किल  समस्या  को  हम  सहजता  से  हल  कर  सकते  हैं  l  जीवन  की  हलचल  को  शांत  होने  के  लिए  कुछ  वक्त  देना  जरुरी  है  l  जिस  तरह  गंदे  पानी  को  स्वच्छ  बनाने  के  लिए   उसमे  मिली  मिटटी  के  नीचे  बैठने  का  इंतजार  करना  होता  है  ,  उसी  प्रकार  जीवन  की  हलचलों  को  शांत  करने  के  लिए   कुछ  वक्त  देना  भी  जरुरी  होता  है  l " 

13 August 2023

WISDOM ----

   पं .श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- "भौतिक  प्रगति  के  नाम  पर  मनुष्य  ने  सुविधाओं  के  अंबार  खड़े  कर  लिए  किन्तु  फिर  भी  वह  अपने  जीवन  में  सुखी  व  संतुष्ट  दिखाई  नहीं  पड़ता  l  मनुष्य  अब  पहले  की  अपेक्षा  और  दुःखी , परेशान , निराश , अशांत  व  असंतुष्ट  नजर  आता  है  l  मनुष्य  के  शारीरिक  और  मानसिक  रोग  भी  उसी  अनुपात  में  बढ़े  हैं  l  इसका  एक  कारण  मनुष्य  के  अंतर्मन  की  भाव शून्यता  और  संवेदनहीनता  है  , जो  समय  के  साथ  निरंतर  बढ़  रही  है  l  भौतिकता  की  चकाचौंध  में  पड़कर  मनुष्य  ने  जीवन  मूल्यों  को   नकारा  है  l  स्वार्थ , अहंकार , ईर्ष्या , द्वेष  आदि  में  पड़कर  व्यक्तिगत  हित  को  ही  सब  कुछ  मान  लिया  l "  आचार्य श्री  आगे  लिखते  हैं ---- " मनुष्य  एक  सामाजिक  प्राणी  है  l  वह  उसी  अनुपात  में   सुखी  हो  सकता  है  , जिस  अनुपात  में  उसका  समाज  सुखी  है  l  वह  समाज  की  उपेक्षा  कर  अपने  लिए  सुख  के  साधन  तो  इकट्ठे  कर  सकता  है  ,  किन्तु  जीवन  में  सुखी  नहीं  बन  सकता  l  आज  समाज  में  जो  भी  आतंकवाद , दंगे , खून -खराबे  बढ़  रहे  हैं   , वे  सब  संवेदनहीनता  के  कारण  ही  उपजे  हैं   l  यह  सब  तभी  समाप्त  हो  सकता  है  जब  व्यक्ति  के  अंदर  संवेदना  जगे   और  वह  प्राणिमात्र  के  कल्याण  की  बात  सोचे  l "    एक  प्रसंग  है   जो  यह  बताता  है  कि   ह्रदय  में  संवेदना  जागने  से  हिंसा  कैसे  समाप्त  हो  जाती   है  -------   कौशाम्बी  के  राजगृह  में  कारू कसूरी  नामक  कसाई  रहता  था  l  वह  पशुओं  का  मांस  बेचकर   अपनी  जीविका  चलाता  था  l  राजगृह  में  बौद्ध  संत  आते  रहते  थे  l  अपने  पुत्र  सुलस  के  साथ  वह  कभी -कभी  उनके  दर्शन  के  लिए  चला  जाता  था  l  संत  किसी  भी  प्रकार  की  हिंसा  न  करने  की  प्रेरणा  दिया  करते  थे  l  कारू कसूरी  कहता --- मैं  अपने  पुरखों  के  धंधे  को  कैसे  छोड़  दूँ  ? यदि  मैं  हिंसा  न  करूँ  तो  खाऊंगा  क्या  ?   जब  कारू  कसाई  वृद्ध  हो  गया  , तो  उसने  तलवार  अपने  बेटे  सुलस  को  सौंप  दी  l  कसाइयों  की  पंचायत  में  सुलस  से  कहा  गया  कि   वह  कुलदेवी  की  प्रतिमा  के  समक्ष   भैंसे  की  बलि  दो  l  सुलास  का  ह्रदय   पशुओं  के  वध  के  समय  उनकी  छटपटाहट  देखकर  द्रवित  हो  उठता  था  l  अत:  उससे  तलवार  नहीं  उठी  l  मुखिया  ने  दोबारा  उससे  कहा --- " बेटे  !  यह  हमारे  कुल  की  परंपरा  है  l  देवी   को  प्रसन्न  करने  के  लिए  रक्त  निकालना  पड़ता  है  l  सुलस  ने  भैंसे  की  जगह  अपने  पैर  पर  तलवार  से  वार  कर  दिया  l  पैर  से  खून  बहने  लगा  l  ऐसा  करने  का  कारण  पूछने  पर   सुलस  बोला  --- " यदि  कुलदेवी  को  रक्त  की  ही  चाहत  है   तो  किसी  निर्दोष  का  खून  बहाने  से  बेहतर  है  कि   वे  मेरा  ही  रक्त  स्वीकार  कर  लें  l "  उसका  उत्तर  सुनकर  कारू  कसाई  का  ह्रदय  द्रवित  हो  उठा  और  उस  दिन  के  बाद  से   उसके  परिवार  में  पशु  वध  बंद  कर  दिया  गया  l  

12 August 2023

WISDOM

  लघु कथा ----एक  बार  की  बात  है  घनघोर  पानी  बरस  रहा  था  l  दूर -दूर  तक  जल  ही  नजर  आता  था  l  ऊपर  उड़ती  हुई  दो  बतखों  की  द्रष्टि  एक  कछुए  पर  पड़ी  ,  जो  एक  पेड़  की  टहनी  मुँह  से  पकड़े   किसी  तरह  स्वयं  को  प्रकृति  के  प्रहार  से  बचाने  में  लगा  था  l  बतखों  को  कछुए  पर  दया  आ  गई  ,  वे  उसके  पास  जाकर  बोलीं ---" आओ  कछुए  भाई  !  तुम  टहनी  पकड़े  रहो   और  हम  तुम्हे  उड़ाकर   सूखी  जमीन  तक  पहुंचा  देते  हैं  l  बस , किसी  भी  स्थिति  में  अपना  मुँह  न  खोलना  l '  कछुए  ने  सीख  को  समझे  बिना   हाँ  कर  दी  l  दोनों  बतखों  ने  टहनी  के  सिरे   पकड़े ,  कछुआ   टहनी  को  बीच  से  पकड़े  था  , बतखें  उड़  चलीं   और  पलक  झपकते  ही  दूर   आसमान  में  जा  पहुँची  l  नीचे  जमीन    पर  खड़े  बच्चों  ने   यह  अचरज  भरा   द्रश्य  तो  जोर -जोर  से  हँसने  लगे  l   बच्चों  को  हँसते  देख   कछुआ  क्रोध  से  भर  गया   और  पलटकर  चिल्लाने  लगा  l  मुँह  खोलते  ही  टहनी  से  उसकी  पकड़   छूट  गई  और  वह  धड़ाम  से  जमीन  पर  आ  गिरा  l  इस  कथा  से  शिक्षा  है  कि  हमें  मौन  रहने  का  अभ्यास  करना  चाहिए  l  अविवेक  के  कारण  व्यक्ति  असमय  मुंह  खोलता  है  ,  ऐसी  मूढ़ता  का  परिणाम     विनाशकारी  होता  है  l  

WISDOM ----

   सच्चा  अध्यात्मवादी   कौन  ? ---  एक  व्यक्ति  बहुत  गरीब  था  l  उसने  कड़ी  मेहनत  और  पुरुषार्थ  के  बल  पर   धीरे -धीरे  काफी  संपत्ति  अर्जित  कर  ली   और  अपने  गाँव  का  सबसे  अमीर  व्यक्ति  बन  गया   लेकिन  उसे  अपनी  अमीरी  का  बिलकुल  भी  घमंड  नहीं  था  l  उसका  पुत्र  जब  बड़ा  हो  गया  तो  उसने   अपने  घर  की  सारी  जिम्मेदारी  उसे  सौंप  दी  और  स्वयं  अपने  घर  से   कुछ  दूर  जंगल  में  कुटिया  बनाकर  रहने  लगा  , वहीँ  ध्यान  व  भजन  करता  और   जब -तब  घर  जाकर  अपने  पुत्र  का  मार्गदर्शन  भी  करता  l  एक  दिन  देवर्षि  नारद  उस  जंगल  से    गुजरे  l  उस  व्यक्ति  को  वहां  देख  रुक  गए  l  उस  व्यक्ति  ने  नारद जी  को  अपने  परिवार  और  धन -वैभव  के  साथ  अपनी  आध्यात्मिक  रूचि   और  तपस्या   के  बारे  में  विस्तार  से  बताया  l  नारद जी  ने  उसकी  परीक्षा  लेने  की  सोची  , कुछ  दिन  बाद  वह  पुन:  जंगल  में  आए  तो  देखा  वह   व्यक्ति  ध्यान  कर  रहा  है  l  कुछ  देर  बाद  जब  वह  ध्यान  से  बाहर  आया   तो  नारदजी  ने  उससे  कहा  -- आपके  मकान  में  भयंकर  आग  लग  गई  है  , कुछ  ही  क्षणों  में  आपका  धन -वैभव  जल  कर  राख  हो  जायेगा  l  यह  सुनकर  वह  व्यक्ति  जरा  भी  परेशान  नहीं  हुआ   और  बोला  --- 'वह  धन -वैभव  प्रभु  का  दिया  हुआ  है  , जैसी  प्रभु  की  इच्छा  l  वैसे  भी  घर  में  बहुत  लोग  हैं  जो  विपत्ति  का  सामना  कर  सकते  हैं  l '  नारदजी  प्रसन्न  होकर  चले  गए  l  कुछ  दिनों  बाद  वे  पुन:  उस  व्यक्ति  को  देखने  आए  , तो  देखा  कुटिया  खाली  है , वह  व्यक्ति  वहां  नहीं  है  l  नारदजी  को  उस  व्यक्ति  पर  शक  हुआ  और  वे  उसे  खोजते  हुए  उसके  गाँव  पहुंचे   तो  देखा  , उन  दिनों  उस  क्षेत्र  में  भयंकर  अकाल  पड़ा  था   और  वह  व्यक्ति  अपनी  तपस्या , ध्यान  छोड़कर  लोगों  को   अपने  हाथ  से  राशन -पानी , धन , भोजन  सामग्री  बांटने  में  लगा  है  l  कोई  भी  खाली  हाथ  नहीं  जा  रहा , सब  प्रसन्न  होकर  जा  रहे  हैं  l  नारद जी  उसके  सेवा भाव  से  बहुत  प्रसन्न  हुए  और  बोले  --- " तुम्हारी  तपस्या  हर  द्रष्टि  से  उत्तम  है , तुमने  अध्यात्म  को  सही  अर्थों  में  अपनाया  है  l  तुम्हारे  भीतर  मानव कल्याण  की  भावना  है  l  तुम में  न  तो  धन -वैभव  का  अभिमान  है  और  न  ही  अपनी  तपस्या  का  अभिमान  है  l  तुम्हारे  लिए  वन  और  राजमहल  दोनों  एक  समान  हैं  , तुम  सच्चे  अध्यात्मवादी  हो  l "  नारदजी  ने  उसे  आशीर्वाद  दिया   और  उससे  विदा  ली  l