राबिया परम विदुषी महिला संत थीं l एक दिन कुछ लोगों ने उनसे कहा --- ' हमारे मन में शांति नहीं है , आनंद नहीं है l सब सुख वैभव है लेकिन मन बहुत बेचैन रहता है l " राबिया ने उस समय तो कुछ नहीं कहा l एक दिन उन लोगों ने देखा कि वे अपनी झोंपड़ी के बाहर कुछ ढूंढ रहीं हैं l लोगों के पूछने पर वे बोलीं --- " मैं सुई ढूंढ रही हूँ l यह सुनकर लोग भी उनके साथ सुई ढूँढने लगे l बहुत देर तक सुई खोजने पर भी नहीं मिली तो किसी ने पूछा ---- " आपकी सुई कहाँ कहाँ गिरी थी , ताकि उसी स्थान पर हम उसे खोजें ? " राबिया ने कहा --- " सुई तो मेरी झोंपड़ी के अन्दर खोई थी l " सुनकर सभी लोग हँसने लगे l उनमें से एक व्यक्ति ने कहा --- ' जब आपकी सुई झोंपड़ी के अन्दर खोई थी , तो आप उसे बाहर क्यों ढूंढ रही हैं ? ' राबिया ने कहा ---- " अंदर झोंपड़ी में अँधेरा है , लेकिन बाहर रौशनी है , इसलिए मुझे अँधेरे में सुई कैसे मिलती ? " लोग बोले ---- " अंदर प्रकाश करो और ढूंढों , सुई मिल जाएगी l " इस पर राबिया मुस्कराते हुए बोलीं ---- " अपने जीवन में तुम सभी इस ज्ञान का प्रयोग क्यों नहीं करते ? तुम बाहर आनंद की खोज करते हो , जबकि वह अंदर ही है l तुम्हे अंदर प्रकाश की व्यवस्था कर के उसे वहां ढूंढना चाहिए न कि बाहर l "
22 August 2024
21 August 2024
WISDOM ------
श्रेणिक पुत्र मेघ ने भगवान बुद्ध से मन्त्रदीक्षा ली और उनके साथ रहकर तपस्या में लग गए l भगवान बुद्ध का कहना था कि आत्मोत्कर्ष के लिए केवल मन्त्र जप ही नहीं तप भी अनिवार्य है l अत: वे मेघ को बार -बार उस ओर धकेलने लगे l मेघ ने कभी रुखा भोजन नहीं किया था , अब उन्हें रुखा भोजन दिया जाने लगा l कोमल शैया के स्थान पर भूमि शयन , आकर्षक वेशभूषा के स्थान पर मोटे वल्कल वस्त्र और सुखद सामाजिक संपर्क के स्थान पर राजगृह आश्रम की स्वच्छता , सेवा -व्यवस्था एक -एक कर इन सब में जितना अधिक मेघ को लगाया जाता , उनका मन उतना ही उत्तेजित होता , महत्वाकांक्षा और अहंकार बार -बार सामने आकर खड़ा हो जाता और कहता ---- " ओ रे मूर्ख ! कहाँ गया वह रस ? जीवन के सुखोपभोग को छोड़कर कहाँ आ फँसा l " जब मन बहुत परेशान हो गया तो मेघ भगवान बुद्ध से कहने लगा --- " तात ! मुझे तो साधना कराइए, तप कराइए , जिससे मेरा अंत:करण पवित्र बने l " भगवान बुद्ध बोले ---- " तात ! यही तो तप है l विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक स्थिरता -- यह गुण है , जिसमें आ गया , वही सच्चा तपस्वी है , स्वर्ग विजेता है l उपासना तो उसका एक अंग मात्र है l " मेघ की आँखें खुल गईं और वे एक सच्चे योद्धा की भांति अपने मन से लड़ने , मन को जीतने चल पड़े l
20 August 2024
WISDOM ---
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " यदि व्यक्ति में असाधारण योग्यता के साथ लगन है तो वह अपने जीवन में कुछ भी हासिल कर सकता है l यदि साधारण योग्यता के साथ कार्य करने की लगन है तो वह जीवन में कुछ -न -कुछ विशेष कर ही लेता हैं l लेकिन यदि व्यक्ति में लगन ही नहीं है तो ऐसा व्यक्ति जीवन में कुछ खास नहीं कर पाता l लगन के साथ अभ्यास कर के व्यक्ति अपनी कमजोरी को ताकत में बदल सकता है l " एक प्रेरणादायक कहानी है ------ जापान के एक दस वर्षीय बच्चे को जूडो सीखने का बहुत शौक था , लेकिन उसका बांया हाथ नहीं था l फिर भी वह अपने माता -पिता से जूडो सीखने की जिद करने लगा l आखिरकार उसके माता -पिता उसे मशहूर मार्शल आर्ट्स गुरु के पास ले गए l गुरु ने जब उस बालक जिसका नाम ओकायो था , उसे देखा तो उन्हें अचरज हुआ l उन्होंने उससे पूछा --- " इस हालत में तुम अपने प्रतिद्वंदी का मुकाबला कैसे करोगे l " ओकायो ने कहा ---- " यह बताना आपका काम है l मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मुझे सभी को हराकर एक दिन खुद ' मास्टर ' बनना है l मार्शल आर्ट्स गुरु उसकी प्रबल इच्छा शक्ति से बहुत प्रभावित हुए और उसे अभ्यास कराने लगे l कुछ दिन सीखने पर ओकायो को यह महसूस हुआ कि उसके गुरु दूसरे लड़कों को अलग -अलग दांव -पेच सिखा रहे हैं , लेकिन उसे एक ही तरह की किक लगाने का ही बार -बार अभ्यास करा रहे हैं l उसने गुरु से अपने मन की शंका जाहिर भी की , लेकिन गुरु ने उसे दूसरों पर ध्यान न देते हुए उसी अभ्यास में महारत हासिल करने के लिए कहा l सभी शिष्यों के सालोंसाल अभ्यास के बाद गुरु ने सबको बुलाया और कहा --- " अब एक प्रतिस्पर्धा आयोजित की जाएगी और जीतने वाले को ' सेंसेई ' ( मास्टर ) की उपाधि दी जाएगी l " नियत समय पर प्रतिस्पर्धा शुरू हुई l ओकायो ने पहले दो मैच बड़ी आसानी से जीते l तीसरा मैच कुछ कठिन था लेकिन कुछ संघर्षों के बाद ओकायो ने तेज किक के साथ अपने प्रतिद्वंदी को गिरा दिया और विजयी हुआ l और भी कई मैच जीतने के बाद ओकायो विजेता हुआ और उसे सेंसेई ' घोषित किया गया l सेंसेई घोषित होने के बाद ओकायो ने गुरु से अपनी जीत का रहस्य पूछा l गुरु ने कहा --- " प्रतिस्पर्धा में तुमने जिस किक का इस्तेमाल किया , उससे बचने का केवल एक ही उपाय था --- कि विरोधी का बांया हाथ पकड़ कर गिरा दो और तुम्हारा तो बांया हाथ ही नहीं है l इसलिए तुम्हारे प्रतिद्वंदी से कुछ करते नहीं बना l " ओकायो समझ गया कि लगातार लगन से किए गए अभ्यास के कारण उसकी कमजोरी उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई l
18 August 2024
WISDOM ----
आचार्य ज्योतिपाद संध्या के बाद उठे ही थे कि एक व्यक्ति जिसका नाम आत्मदेव था , उसने उनके चरण पकड़ लिए और बोला ---- " आप सर्वसमर्थ हैं , एक संतान दे दीजिए , आपका जीवन भर ऋणी रहूँगा l " आचार्य बोले ---- " संतान से सुख पाने की कामना व्यर्थ है l तुम व्यर्थ इस झंझट में मत पड़ो l तुम्हारे भाग्य में संतान नहीं है l जिसने पिछले जन्म में गुरु का वरण नहीं किया , अपनी संपत्ति को लोकहित में नहीं लगाया , वह अगले जन्म में संतानहीन होता है l जाओ , अब तुम्हारी उम्र भी अधिक है संतान मिल भी गई तो कोई औचित्य नहीं है l " आत्मदेव ने आचार्य के चरण नहीं छोड़े , बोला ---" या तो पुत्र लेकर लौटूंगा या आत्मदाह कर लूँगा l " आचार्य ने कहा ---- " श्रेष्ठ आत्माएं ऐसे ही नहीं आतीं l कोई अपवित्र आत्मा ही हाथ लगती है l चलो विधाता की ऐसी ही इच्छा है तो तुम यह फल अपनी पत्नी को खिलाना l धर्मपत्नी से कहना कि वह एक वर्ष तक नितांत पवित्र रहकर कुछ दान करे l " आत्मदेव प्रसन्न होकर लौटा और फल अपनी पत्नी धुन्धुली को देकर आचार्य का सन्देश भी कहा l पत्नी ने सोचा ---पवित्रता का आचरण और वह भी एक साल तक , मैं न कर सकूंगी l उसने फल गाय को खिला दिया l समय पर बहन का पुत्र गोद ले लिया , उसका नाम रखा ' धुंधकारी ' l बाल्यावस्था से ही वह दुराचारी , जुआरी और निम्न वृत्तियों में लीन रहता था l माता -पिता कुढ़कर , दुःख से मर गए l धुन्धुली ने वह फल गाय को खिलाया था अत" गोमाता ने ' गोकर्ण ' नामक पुत्र को जन्म दिया , वह पशु योनि में भी परम विद्वान और धर्मात्मा था l धुंधकारी की अकाल मृत्यु हुई , वह प्रेत योनि में था l गोकर्ण ने भागवत कथा कहकर उसे प्रेत योनि से मुक्त कराया l
17 August 2024
WISDOM ------
बालधि ऋषि के नवजात पुत्र की मृत्यु हो गई l इस घटना से वे अत्यंत विचलित हो गए l उन्होंने देवराज इंद्र की उपासना कर के एक अमर पुत्र प्राप्त करने का निश्चय किया l इस संकल्प के साथ उन्होंने इंद्र की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर लिया l इन्द्रदेव प्रकट हुए और ऋषि बलाधि से वर मांगने को कहा l बलाधि बोले --- " देव ! मुझे एक ऐसा पुत्र दें , जिसकी कभी मृत्यु न हो l " देवराज इंद्र ने कहा ---- " ऋषिवर ! मनुष्य देह का अमर हो पाना तो संभव नहीं है , कोई अन्य वर मांगिए l " तब सोचकर ऋषि ने कहा ---- " आप मुझे एक ऐसा पुत्र दीजिए जो तब तक जीवित रहे , जब तक यह पर्वत सामने अचल खड़ा है l " इंद्र ने कहा 'तथास्तु ' और चले गए l कुछ समय बाद ऋषि को पुत्र की प्राप्ति हुई , उसका नाम मेधावी रखा l मेधावी को बाल्यावस्था से ही अहंकार ही गया कि उसे कोई मार नहीं सकता , वह बहुत उद्दंड हो गया l उसके व्यवहार से त्रस्त होकर लोग बलाधि ऋषि के पास गए l ऋषि ने पुत्र को समझाया --- " पुत्र ! अहंकार ही मनुष्य के पतन और सर्वनाश का कारण है l हमें कभी देव कृपा का अहंकार नहीं करना चाहिए l " मेधावी को पिता का समझाना अच्छा न लगा और वह उन्हें भी अपशब्द कहकर वहां से निकल पड़ा l मार्ग में उसकी भेंट ऋषि धनुषाक्ष से हुई l जब उसने उनके साथ भी उद्दंड व्यवहार किया तो ऋषि धनुषाक्ष ने उसे तत्काल मृत्यु का शाप दिया मेधावी को मिले वर के कारण वह जीवित खड़ा था l ऋषि को बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनका वचन व्यर्थ कैसे हुआ ? उन्होंने तत्काल ध्यान लगाकर सत्य का पता लगाया और मेधावी को मिले वरदान का बोध होते ही उन्होंने हाथी का रूप धारण कर अपने प्रहारों से पहाड़ को ध्वस्त कर दिया l पहाड़ के गिरते ही मेधावी की मृत्यु हो गई l ऋषि बलाधि यह समाचार मिलने पर बोले ---- " अमर पुत्र प्राप्त करने की अपेक्षा सदाचारी पुत्र होता , तो मुझे ज्यादा संतोष होता l "
14 August 2024
WISDOM
स्वामी विवेकानंद ने योग सीखने आई एक युवती से कहा था कि तुम्हे इस मार्ग पर गतिशील होने में कई जन्म लगेंगे l वह युवती कक्ष में आकर बैठी ही थी और सिर्फ इतना ही पूछ पाई थी कि मुझे सिद्धि प्राप्त करने में कितना समय लगेगा ? कितने महीनों में मैं साधना पूरी कर संकूंगी ? स्वामी जी ने इस प्रश्न का उत्तर दिया था और कारण भी तुरंत बता दिया था कि कक्ष में प्रवेश करने से पहले तुमने जूते ऐसे उतारे , जैसे उन्हें फेंक रही हो l कुरसी की बांह लगभग मरोड़ते हुए अंदाज में खींची और धमककर बैठ गई l फिर बैठे -बैठे ही इसे मेज के पास घसीटते हुए से खींचा और व्यस्थित किया l एक मिनट के इस व्यवहार में स्वामी जी ने न तो हड़बड़ी को कारण बताया और न ही फूहड़ता को l युवती ने पूछा भी नहीं था और स्वामी जी ने कारण बताया कि हम जिन वस्तुओं को काम में लाते हैं , जो हमारी जीवन यात्रा और स्थिति में सहायक हैं और जो हमारे व्यक्तित्व के ही एक अंग हैं , उनके प्रति क्रूरता हमारी चेतना के स्तर को दर्शाती है l दैनिक जीवन में काम आने वाली वस्तुओं , व्यक्तियों और प्राणियों के प्रति भी मन में संवेदना नहीं है , तो विराट अस्तित्व से किसी व्यक्ति का तादात्म्य कैसे जुड़ सकता है ? अपने आसपास के जगत के प्रति जो संवेदनशील नहीं है , वह परमात्मा के प्रति कैसे खुल सकता है ? संवेदना व्यक्ति को विराट के प्रति खोलती है , उसे ग्रहणशील बनाती है l स्वामी चिन्मयानन्द ने लिखा है कि संवेदनशील व्यक्ति जड़ वस्तुओं के प्रति भी इस तरह व्यवहार करता है जैसे वे उसके अति आत्मीय स्वजन हों l न केवल आत्मीय स्वजन हों , बल्कि उनके अपने ही शरीर का एक हिस्सा हों l
11 August 2024
WISDOM ------
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " भगवान पत्र -पुष्पों के बदले नहीं , भावनाओं के बदले प्राप्त किए जाते हैं और वे भावनाएं आवेश , उन्माद या कल्पना जैसी नहीं , वरन सच्चाई की कसौटी पर खरी उतरने वाली होनी चाहिए l उनकी सच्चाई की परीक्षा मनुष्य के त्याग , बलिदान , संयम , सदाचार एवं व्यवहार से होती है l " ---------गुजरात की राजमाता मिनल देवी ने भगवान सोमनाथ का विधिवत् अभिषेक कर के उन्हें स्वर्ण दान किया l राजमाता के मन में अहंकार आ गया कि भगवान को ऐसा दान किसी ने नहीं किया होगा l रात्रि को स्वप्न में भगवान सोमनाथ ने राजमाता से कहा ---- " मेरे मंदिर में एक गरीब महिला आई है l उसका आज का पुण्य तुम्हारे स्वर्ण दान से कई गुना ज्यादा है l " राजमाता ने उस महिला को महल में बुलवा लिया l राजमाता उससे बोलीं ---- " तुम अपना संचित पुण्य दे दो , उसके बदले में जितनी भी धनराशि लगेगी , वह मैं देने को तैयार हूँ l " वह गरीब महिला बोली ---- " राजमाता ! मुझ गरीब से भला क्या पुण्य कार्य हुआ होगा ? मुझे तो यह भी पता नहीं कि मैंने क्या पुण्य किया है , तो मैं आपको क्या अर्पित करुँगी ? " राजमाता ने उससे उसके विगत दिवस के क्रियाकलाप के विषय में पूछा ताकि यह पता चल सके कि उसे किस कार्य हेतु अपार पुण्य मिला है l प्रत्युत्तर में गरीब महिला बोली ----- " राजमाता ! मैं तो अत्यंत गरीब हूँ l मुझे कल किसी व्यक्ति ने दान में एक मुट्ठी बूंदी दी थी l उसमे से आधी बूँदी मैंने भगवान सोमेश्वर को भोग में चढ़ा दी और शेष आधी खाने चली थी कि एक भिखारी ने मुझसे मांग ली तो वह मैंने उसे दे दी l " राजमाता समझ गईं कि उस गरीब महिला का निष्काम कर्म उनके स्वर्णदान से बढ़कर है l भगवान भावनाओं का मोल समझते हैं l