युद्ध , लड़ाई -झगड़े , उन्माद , प्राकृतिक आपदाएं --- भूकंप , तूफ़ान , बाढ़ , सुनामी , आग, दुर्घटनाएं ----- यह सब आदिकाल से ही चली आ रही हैं , यह सब कोई नई बात नहीं है l कितनी ही सभ्यताएं इन्हीं कारणों से काल के गर्त में समां गईं l अब जब वे खुदाई में मिलती हैं तब गणना होने पर समझ में आता है कि वे कितने हजारों वर्ष पुरानी थीं l इन आपदाओं से जो बच जाते हैं वे अपनी बुद्धि और ज्ञान से केवल ऊपरी सतह पर इनके कारण और इनसे सुरक्षा के उपाय खोजते हैं , वे इनकी गहराई में नहीं जाते कि इनका वास्तविक कारण क्या है ? और कैसे इस पृथ्वी पर सुख -चैन से जिया जा सकता है ? मनुष्य ने अपनी चेतना के द्वार को बंद कर लिया है और काम , क्रोध , लोभ , मोह , महत्वाकांक्षा , स्वार्थ , अहंकार ----- के जाल में फँसकर , इनमें लिप्त होकर स्वयं को ही भूल गया है l ईश्वर ने कई बार अवतार लेकर , अपनी विभिन्न लीलाओं से मनुष्य को समझाने का बहुत प्रयास किया लेकिन सांसारिक आकर्षण इतना तीव्र है कि मनुष्य ने इसे अनदेखा कर दिया l स्वयं भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका उनके वंशजों की गलतियों के कारण समुद्र में डूब गई l ईश्वर ने इस स्रष्टि की रचना की l यह धरती ईश्वर को सबसे ज्यादा प्रिय है l वे चाहते हैं कि मनुष्य इस पृथ्वी को और सुंदर बनाए l समस्या ये है कि ईश्वर स्वयं प्रत्यक्ष रूप से बात नहीं करते , वे संकेतों में समझाते हैं और संसार के विभिन्न धर्म के पवित्र ग्रंथों में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य को सुख -शांति से जीने के लिए कैसा आचरण करना चाहिए l लेकिन रावण से लेकर अब तक मनुष्य ने इसे समझा ही नहीं l इसलिए रावण की लंका जल गई , कौरव वंश का अंत हो गया , भीषण युद्धों में खून की नदियाँ बह गईं l ईश्वर सब कुछ सहन करते हैं लेकिन मनुष्य के अहंकार को सहन नहीं करते l लोग कहते हैं ईश्वर कहाँ है ? हमने देखा नहीं ! यह प्रकृति माँ , आकाश पिता , सबको प्राण ऊर्जा देने वाले सूर्य भगवान ही तो प्रत्यक्ष देवता हैं जो हर पल हमारे सामने हैं , हमें दर्शन देते हैं l लेकिन जब मनुष्य इनके उपेक्षा कर स्वयं को भगवान समझता है l अपने अहंकार में लोगों पर अत्याचार करता है l अपनी शक्ति , पद , धन , वैभव , सौन्दर्य , रंग , धर्म , जाति , ऊँच -नीच आदि विभिन्न कारणों से अपने अहंकार में आकर लोगों को प्रताड़ित करता है , निर्दोष के प्राण लेता है , लोगों के जीवन को नरकतुल्य बना देता है ---- तब ऐसे उत्पीड़ित लोगों की आहें इस वायुमंडल में रहती हैं l इतिहास के पन्ने पलटें तो देखें कितने भयंकर युद्ध हुए , कभी रंग के आधार पर , कभी धर्म के आधार पर कभी बिना कारण ही महिलाओं और बच्चों और गर्भस्थ शिशु पर अत्याचार किए , उन सबकी आहें इस वायुमंडल में हैं , वे अतृप्त आत्माएं आज भी अपनी मुक्ति के लिए भटक रहीं हैं l इन्हें मुक्त करने के लिए प्रयास करना तो बहुत दूर की बात है , मनुष्य इतना स्वार्थी हो गया है कि लगभग सारे संसार में ही लोग तंत्र जैसे विभिन्न तरीकों से इन आत्माओं को अपने नियंत्रण में कर के अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं l एक तो वायुमंडल में व्याप्त ये आहें और इसके साथ मनुष्य का यह स्वार्थ यह सब मिलकर ही अनहोनी घटनाओं को जन्म देते हैं , प्राकृतिक आपदाएं आती है l ईश्वर चाहते हैं मनुष्य इनसान बने , किसी को सताओ नहीं , बद्दुआ न लो l एक बार इनसान बनों और देखो कि दुआओं में कितनी ताकत है l प्रकृति से प्रेम करो l कितने भी ताकतवर हो जाओ , ईश्वर से बड़ा कोई नहीं l यह अहंकार ही सब के पतन का कारण है l
12 January 2025
11 January 2025
WISDOM -----
सभी प्राणियों में ईश्वर ने मनुष्य को सबसे ज्यादा बुद्धिमान बनाया l अपनी बुद्धि के बल पर मनुष्य ने धन -दौलत , शक्ति -संपदा सब एकत्र कर ली और स्वयं को भगवान समझ बैठा जैसे सबके भाग्य का फैसला करना उसी के हाथ में है l यह अहंकार ही मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है l प्रकृति समय =समय पर अपना तांडव दिखाती है , मनुष्य के सचेत करती है लेकिन मनुष्य सुधरता ही नहीं है l इसका कारण यही है कि मनुष्य के पास बुद्धि तो है लेकिन विवेक नहीं है l विवेक न होने से ही वह अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करता है l विवेक कही बाजार में , संस्था में नहीं मिलता , यह तो ईश्वरीय कृपा से ही मिलता है l जब कोई मनुष्य सन्मार्ग पर चलता , सत्कर्म करता है और ऐसा करने के साथ गायत्री मन्त्र का जप करता है तब ईश्वर की कृपा से उसे विवेक का वरदान मिलता है l आज सारे संसार को गायत्री मन्त्र को जपने की जरुरत है l विवेक न होने के कारण ही मनुष्य वे सब कार्य करता है जो स्वयं उसके लिए और मानवता के लिए घातक है l
9 January 2025
WISDOM -----
मनुष्य के जीवन में अनेक समस्याएं निरंतर ही उसे घेरे रहती हैं l धन -वैभव , सुख -सुविधा के साधनों से सभी समस्याएं हल नहीं होतीं , टेंशन बना ही रहता है l इस तनाव का सबसे बड़ा कारण यह है ---- दिखावे की जिंदगी l वह जैसा है वैसा दिखना और दिखाना नहीं चाहता < अपनी असलियत को समाज से छुपाना चाहता है l यह समस्या गरीब वर्ग की नहीं है l यह समस्या है मध्यम और अमीर वर्ग की l यदि जीवन खुली किताब की तरह हो तो कहीं कोई तनाव नहीं होगा लेकिन इस युग में लोगों के स्वयं को बहुत अच्छा , श्रेष्ठ गुण संपन्न , सबका भला चाहने वाला , सब की मदद करने वाला संभ्रांत व्यक्ति होने की होड़ लगी है l मनुष्य होने के नाते काम , क्रोध , लोभ , मोह , ईर्ष्या ,द्वेष , स्वार्थ , लालच , महत्वाकांक्षा सभी में थोड़ी -बहुत होती है लेकिन जिसमें इनमे से कोई भी भाव अधिक है वह उनसे जुड़ी हुई गलतियाँ भी करता है , बड़े अपराध भी करता है और फिर समाज में स्वयं को शरीफ दिखाने के लिए मुखौटा लगाए रहता है ताकि कोई उसकी असलियत न जान पाए l उसका सबसे बड़ा तनाव इस मुखौटे के उतरने का है l इस मुखौटे को बचाए रखने के लिए उसे कितने पापड़ बेलने पड़ते है , यह उसके तनाव का सबसे बड़ा कारण है , इसका इलाज डॉक्टर के पास भी नहीं है l ऋषि चिन्तन यही है कि जैसे हो वैसे ही दिखो , , जो उपदेश देते हो वैसा ही स्वयं का आचरण हो , यदि गलती हो गई है तो उसे स्वीकार करो , स्वयं को सुधारने का संकल्प लो l अपने अहंकार के कारण व्यक्ति स्वयं ही अपने जीवन को तनावग्रस्त बना लेता है और बीमारियों को आमंत्रित करता है l
8 January 2025
WISDOM -----
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि मनुष्य जिस व्यक्ति या वस्तु पर बहुत अधिक निर्भर रहता है , वह व्यक्ति या वस्तु धीरे -धीरे उसे अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं और वह व्यक्ति उनका गुलाम बन जाता है l जैसे वैज्ञानिक आविष्कार मनुष्य की सुख -सुविधा के लिए थे लेकिन धीरे -धीरे लोगों को उनकी आदत बन गई और अब वह उनके बिना एक कदम भी नहीं चल सकता , इसका अर्थ है कि अब वह मशीनों का गुलाम बन गया l इसी तरह जब से धन को मानवीय मूल्यों से अधिक महत्त्व दिया जाने लगा तो धन -वैभव संपन्न वर्ग विभिन्न देशों में सरकार के निर्णयों को भी प्रभावित करने लगा है l इस युग का जो सबसे बड़ा संकट है वह यह है कि अब मनुष्य अपने टेलेंट को दिखाने के लिए , अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए और अपने वर्चस्व के लिए प्रकृति में विचरण करने वाली नकारात्मक शक्तियों की मदद लेने लगा है l भूत-प्रेत --एंटिटी ---- आदि को विभिन्न तरीकों से अपने नियंत्रण कर मनमाना काम करते हैं l यहाँ तक कि इन नकारात्मक शक्तियों की मदद से वे किसी के भी माइंड को कंट्रोल कर उसे अपनी इच्छानुसार कार्य करने के लिए विवश कर देते हैं l यह सब पहले भी होता था , रावण ,मारीच , महिषासुर , घटोत्कच आदि बड़े -बड़े असुर अपना भेस बदलने में और मायावी विद्या में निपुण थे और इसके बल पर वे मनमानी करते थे l आज के युग में व्यक्ति शार्टकट से जीवन में सब कुछ हासिल करने के लिए इन मायावी विद्या का प्रयोग करता है l ऐसे कार्य करने वालों का क्षेत्र व्यापक ही होता जा रहा है l इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि विज्ञानं और धन की तरह ये नकारात्मक शक्तियां भी एक दिन मनुष्य पर हावी होकर उसे अपना गुलाम बना लेंगी और तब मनुष्य केवल शरीर से मनुष्य होगा , वह भीतर से खोखला और इन नकारात्मक शक्तियों से संचालित होगा l जैसे -जैसे इन नकारात्मक शक्तियों का प्रयोग बढ़ता जायेगा संसार में आतंक , युद्ध , हत्याकांड , आत्महत्याएं , प्राकृतिक प्रकोप , दुर्घटनाएं बढती जाएँगी क्योंकि इन्हें अपनी खुराक चाहिए l संसार को जागरूक होने की जरुरत है क्योंकि भूत -प्रेत आदि नेगेटिव एनर्जी के साथ काम करने वाले अंत में इन्ही के मेहमान बन जाते हैं और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए भुतहा संसार छोड़कर जाते हैं l
7 January 2025
WISDOM -------
एक दिन देवलोक से विशेष विज्ञप्ति निकाली गई ---- " अमुक दिन सभी चित्रगुप्त से अपनी असुंदर वस्तुओं के बदले सुंदर वस्तुएं प्राप्त कर सकते हैं l शर्त यही है कि वह विधाता की सत्ता में विश्वास रखता हो l " निश्चित तिथि पर तीनों लोकों के निवासी अपनी -अपनी असुंदर वस्तुएं लेकर देवलोक पहुँच गए l विधाता ने दिव्य द्रष्टि से देखा कि सब आए या नहीं l उनने देखा कि सब तो आ गए , केवल पृथ्वी लोक पर एक मनुष्य अपने आनंद में है l विधाता ने पूछा ---- " भाई ! तुम चित्रगुप्त के पास अपनी असुंदर वस्तुएं परिवर्तित करने क्यों नहीं गए ? " वह व्यक्ति बोला ---- " भगवान की बनाई इस स्रष्टि के कण -कण में वही तो व्याप्त है , फिर जबकि प्रत्येक कण में वही है , तो कहीं भी असुन्दरता कैसे हो सकती है ? मुझे तो इस स्रष्टि का कण -कण सुंदर दिखाई पड़ता है l " विधाता मुस्कराए और चित्रगुप्त से बोले ---- " वस्तुतः यही वह व्यक्ति जो विधाता की सत्ता में विश्वास रखता है l जो स्रष्टि को इसके समग्र रूप में स्वीकार करता है , उसके लिए सौन्दर्य और कुरूपता का भेद नहीं रह जाता l " विधाता की कृपा भी उसी मनुष्य को प्राप्त हुई है l
6 January 2025
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " झूठ और बेईमानी के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के मन में ग्लानि , भय , चिंता भरी हुई होती है , जिससे वह मानसिक बीमारियों का शिकार हो अस्वस्थ रहने लगता है l वह शारीरिक -मानसिक विकारों का शिकार होता है l उसका मनोबल आत्मबल कमजोर होता है , जिससे उसे हर काम में असफलता मिलती है l उसे पल -पल अपने झूठ और बेईमानी के पकड़े जाने का भय सताता रहता है l इसलिए वह झूठ और बेईमानी से प्राप्त सुख के साधनों के होते हुए भी अंदर से दुःखी ही रहता है जबकि सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति आत्मग्लानि और भय से मुक्त हमेशा हर्षित , प्रसन्नचित और आशावादी बना रहता है l इसके परिणामस्वरूप वह जीवन में सर्वत्र सफल होता है l "
5 January 2025
WISDOM -----
धर्म के नाम पर संसार में कितना लड़ाई झगड़ा है l थोडा बहुत झगड़ा तो ठीक है लेकिन बड़े स्तर पर झगड़ें करने से पहले सच्चा धर्म क्या है ? यह जानना बहुत जरुरी है l एक कथा है ----- एक राजा के तीन पुत्र थे l राजा हर तरह से परख कर ही अपने उत्तराधिकारी का चयन करना चाहता था l इसलिए एक दिन राजा ने उन्हें बुलाकर कहा --- "जाओ , किसी धर्मात्मा को खोजकर लाओ l " तीनों राजकुमार धर्मात्मा की खोज में निकल पड़े l कुछ दिनों बाद एक पुत्र , एक सेठ को लेकर राजा के पास पहुंचा और बोला --- : पिताजी ! इन सेठ जी ने अनेकों धर्मशालाएं व मंदिर बनाए हैं l " राजा ने सेठ से ऐसा करने का कारण पूछा तो उसने कहा ---" मैंने सुना है ऐसा करने से पुण्य मिलता है और हमारा नाम भी चलता रहता है l " राजा ने उनका सम्मान किया और आदर सहित विदा किया l दूसरा राजकुमार एक ब्राह्मण को लेकर लौटा और राजा से उनका परिचय देते हुए बोला --- " यह बहुत ज्ञानी और तपस्वी हैं l " राजा ने उनसे धर्म की परिभाषा पूछी तो उन्होंने कहा ---- " शास्त्र के अनुसार सब कर्मकांड करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है , उसका पालन करना ही धर्म है l " राजा ने उन्हें भी दक्षिणा देकर सम्मानपूर्वक विदा किया l तीसरा राजकुमार एक गरीब से व्यक्ति को लेकर पहुंचा l राजा के पूछने पर वह बोला --- " पिताजी ! यह व्यक्ति एक घायल गाय की सेवा कई दिनों से कर रहा था l मुझे लगा कि इस व्यक्ति के अन्दर सही धर्मात्मा होने का भाव है l " राजा ने उससे पूछा --- " तुम कोई धर्म का काम करते हो ? " वह आदमी बोला -महाराज ! मैं एक गरीब किसान हूँ , अनपढ़ हूँ , धर्म , कर्म कुछ जानता नहीं हूँ l यदि कोई जरूरतमंद , रोगी , दुःखी , अभावग्रस्त दीख पड़ता है तो यथाशक्ति उसकी मदद अवश्य करता हनल " यह सुनकर राजा ने उस तीसरे पुत्र से कहा --- " कुछ पाने की आशा किए बिना सचे ह्रदय से दूसरों की सेवा करना ही धर्म है l तुम ही सच्चे धर्मात्मा को लेकर लौटे हो l तुम्हे मनुष्यों की पहचान है , इसलिए तुम्हे ही राजगद्दी का उत्तराधिकारी नियुक्त किया जाता है l "