6 June 2013

PRAYER

'प्रार्थना ह्रदय की ,अंत:करण की निश्छल पुकार है ,जो सीधे परमात्मा तक पहुंचती है और बदले में प्रार्थी को कृतकृत्य कर देती है | '
 प्रार्थना ईश्वर से वार्तालाप करने की सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक प्रणाली है जिसमे किसी मंत्र ,छंद  और कर्मकांड की आवश्यकता नहीं पड़ती |
प्रार्थना पुकार है अस्तित्व के प्रति कि हे ईश्वर !आपका सहारा चाहिये ,प्रत्युतर भी इसी का मिलता है |
 प्रार्थना वह मन:स्थिति है ,जिससे व्यक्ति शंका और संदेह के जाल से निकलकर श्रद्धा की भूमिका में प्रवेश करता है |
             अपने अहं को गलाकर समर्पण की नम्रता स्वीकार करना और मनोविकारों को ठुकरा कर परमेश्वर का आदेश स्वीकार करने का नाम प्रार्थना है | इसमें यह संकल्प भी जुड़ा रहता है कि भावी जीवन परमेश्वर के निर्देश के अनुसार पवित्र और परमार्थी बनकर जिया जायेगा | ऐसी गहन अंत:करण से निकली हुई प्रार्थना ,जिसमे आत्म परिवर्तन की आस्था जुड़ी हो ,भगवान का सिंहासन हिला देती है |
          प्रार्थना के द्वारा हम अपने अहंकार ,पाप ,कषाय -कल्मष एवं दुखों के अंधकार को छिन्न -भिन्न कर सकते हैं | मन को साधने एवं शिक्षित करने की सबसे पहली सीढ़ी प्रार्थना है | अपने किए हुए दुष्कर्मों के लिये पश्चाताप करना और दुबारा किसी तरह के पापकर्म में संलिप्त न होने के लिये संकल्प शक्ति की अभिवृद्धि के लिये ईश्वर से प्रार्थना करना सुधार का प्रथम सोपान है |
 रवींद्रनाथ टैगौर की एक कविता जिसमे उन्होंने यह प्रार्थना की है --हे भगवान !जब हम आपसे मुसीबत से छुटकारा पाने के लिये प्रार्थना करें तो आप इनकार कर देना और हमसे कहना अपनी गलतियों से मुसीबत बुलाई है ,गलती ठीक करो | हे भगवान !जब हम आपसे संपति मांगे तो आप इनकार कर देना और यह कहना कि यदि अपनी कलाइयों और अक्ल का ठीक इस्तेमाल किया होता तो चैन की जिंदगी जी रहे होते | आप हमारी कोई मदद मत करना ,लेकिन यदि आप दया करते हों तो एक वरदान देना ---
     कि जब हम पाप के पंक में गिर रहे हों तो हे ईश्वर !अपनी लंबी भुजाएं फैलाकर हमें रोक लेना ,ऊँचा उठा लेना ,बस और हमें कुछ नहीं चाहिये | 

5 June 2013

Bhakti - Bhavana

'भावना दिशा देती है और श्रद्धा से प्रकाश मिलता है | केवल तर्क का आश्रय लेने वाला तो झाड़ -झंखाड़ों में भटकता है | '
                  भावनात्मक तृप्ति मानव जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है | सब कुछ पाकर भी मनुष्य अतृप्त ही बना रह्ता है | भक्ति ही मनुष्य को तृप्ति प्रदान करती है | आज भावनाओं की सार्थकता खो गई है | आज का सबसे बड़ा दुर्भिक्ष भावनाओं के क्षेत्र का है | इसी के कारण जीवन के प्रत्येक स्तर पर समस्याएं उत्पन्न हुईं हैं |
                     मनोरोग और कुछ नहीं ,मनुष्य की दबी ,कुचली ,रौंदी गई भावनाएं ही हैं | सकारात्मक भावनाओं की प्राप्ति से इन रोगों का निराकरण हो सकता है | इसके लिये भक्ति की आवश्यकता है |
                      भक्ति का अर्थ है --परमात्मा एवं उसके असंख्य रूपों के प्रति प्रेम |
 जिसके ह्रदय में भक्ति की पवित्र ज्योति जलती हो उसे संसार का अँधेरा छू भी नहीं सकता |
भक्ति अमृत रूपा है | जिसमे भक्ति अपनी सम्पूर्णता में खिली ,वह व्यक्तित्व स्वयं में अमृत का निर्झर बन जाता है | असंख्य उसके पावन स्पर्श से नव -जीवन ,दिव्य -जीवन पाते हैं |
सच्चे भक्त की पहचान दीन -दुखियों को उसी परम सत्ता का अंश मानकर ,उनकी सेवा करने से होती है |
'दरिद्र नारायण की सेवा ही भगवान की साधना है |
परमार्थ से ,निष्काम कर्म से भावनाएं परिष्कृत होती हैं और जीवन की आंतरिक नीरसता व खोखलापन दूर होता है |

        रविन्द्रनाथ टैगौर की एक कविता है ----"मैं गया दरवाजे -दरवाजे पर भीख मांगने के लिये |
                                                                     अनाज से भर ली मैंने झोली |
                                                                      एक आया भिखारी ,उसने पसारा हाथ ,
                                                                        हमको भी दे कुछ ,जो तेरे पास है |
                                                                        मैंने बड़ी कंजूसी से ,बड़ी हिम्मत को इकट्ठा किया
                                                                       और एक दाना निकाल करके उस भिखारी की हथेली पर रखा |
                                                                      भिखारी उस दाने को लेकर हँसता -मुस्कराता चला गया |
                                                                      मैं आया अपने घर और घर आकर मैंने देखा ,
                                                                      एक बड़ा सा सोने का दाना उस अनाज के बीच में रखा हुआ था |
                                                                     समझ गया मैं कि ये सोने का दाना कहाँ से आया
                                                                        मैं सिर धुन -धुन कर पछताया कि मैंने अपनी झोली के सारे
                                                                         दाने क्यों न भिखारी के हाथ में दिये ,ताकि मेरी झोली के सारे
                                                                        दाने सोने के होकर आ गये होते |
                                                                       

HONESTY

'आत्म कल्याण के इच्छुक को सदैव अपने परिश्रम और ईमानदारी से कमाया हुआ अन्न ही ग्रहण करना चाहिये '|
             "एक ही रात में इतने ढेर सारे रुपयों की थैली !अरे !यह तो बता -"माँ ने कड़क कर बेटे से पूछा -"यह धन तू कहाँ से लाया ?"
         "  सेंध लगाकर | माँ तू ही तो कहती थी कि मनुष्य को सदैव परिश्रम की कमाई ही खानी चाहिये | |महाजन की सेंध काटने में मुझे कितना परिश्रम करना पड़ा ,तू इस बात को समझ भी नहीं सकती | "
           चपत लगाते हुए माँ ने कहा -"मूर्ख !मैंने इतना ही नहीं कहा कि मनुष्य को परिश्रम का खाना चाहिये ,वरन यह भी कहा था कि वह ईमानदारी से कमाया हुआ भी हो | उठा यह धन ,जिसका है ,उसे लौटा कर आ और अपने गाढ़े पसीने की कमाई का भरोसा कर | "
   माता की इस शिक्षा को शिरोधार्य करने वाला युवक अंतत: महासंत श्रमनक के नाम से विख्यात हुआ |  

4 June 2013

GENEROUS

'भक्ति भावना सही अर्थों में दीन -दुखियों के लिये अंत:से उत्पन्न परमार्थ भावना ही है | ईश्वर इसे ही मान्यता देते हैं |
           हज यात्रा पूरी करके एक दिन अब्दुल्ला बिन मुबारक कावा में सोए हुए थे | सपने में उन्होंने दो फरिश्तों को आपस में बातें करते देखा | एक ने दूसरे से पूछा -"इस वर्ष हज के लिये कितने आदमी आये और उनमे से कितनों की दुआ कबूल हुई ?'जवाब में दूसरे फरिश्ते ने कहा -"यों हज करने को 40 लाख आये थे ,पर इनमे से किसी की दुआ कबूल नहीं हुई है | इस वर्ष दुआ सिर्फ एक की कबूल हुई है और वह भी ऐसा है ,जो यहां नहीं आया | " पहले फरिश्ते को बहुत अचंभा हुआ ,उसने पूछा -"भला वह कौन खुशनसीब है ,जो यहां आया भी नहीं और उसकी हज कबूल हो गई ?"
     दूसरे फरिश्ते ने बताया -"वह है दमिश्क का मोची -अली बिन मूफिक | "
उस पाक हस्ती को देखने के लिये अब्दुल्ला बिन मुबारक अगले ही दिन दमिश्क के लिये चल पड़े और वहां उन्होंने मोची मूफिक का घर ढूंढ निकाला | और उनसे पूछा -"क्या तुम हज को गये थे ?"
मूफिक की आँखों में आँसू भर आये और सिर हिलाते हुए कहा -"मेरा भाग्य ऐसा कहाँ ,जो हज को जा पाता | जिंदगी भर की मेहनत से 700 दिरम उस यात्रा के लिये जमा किये थे ,पर एक दिन मैंने देखा कि पड़ोस के गरीब लोग पेट की ज्वाला बुझाने के लिये उन चीजों को खा रहे थे ,जिन्हें खाया नहीं जा सकता | उनकी बेबसी ने मेरा दिल हिला दिया और हज के लिये जो रकम जमा की थी ,सो उन गरीबों को बाँट दी | "
  दीन -दुखियों की सहायता ही सच्ची तीर्थ यात्रा है |

'मानव ह्रदय से बढ़ कर कोई तीर्थ नहीं | भगवान इसी में बसते हैं और वहां तक पहुँचने वाले को दर्शन दिये बिना नहीं लौटने देते | '     

3 June 2013

'जिसके जीने के कारण अन्य बहुत से प्राणी जीवन पाते हैं ,वही मनुष्य जीवित माना जाता है | अन्यथा कौआ भी अपनी चोंच से ही अपना पेट भर लेता है | जो अपने लिये जीता है ,उसका जीवन भी कोई जीवन है | '

    'जो उदारता पूर्वक सबके हित की बात सोचता है ,वही मनुष्य श्रेय का अधिकारी हो सकता है | '

WORSHIP

'कहाँ  छिपा  बैठा  है  सच्चा  इनसान ,
खोजते  जिसे  स्वयं  भगवान | '
                                              खलीफा उमर एक बार अपने धर्म स्थान पर बैठे हुए थे | उन्हें एक फरिश्ता उड़ता हुआ दिखाई दिया | उसके कंधे पर बहुत मोटी पुस्तक लदी हुई थी | खलीफा ने उसे पुकारा ,वह नीचे उतरा तो उन्होंने उस पुस्तक के बारे में पूछा कि इसमें क्या है ?फरिश्ते ने कहा -"इसमें उन लोगों के नाम हैं ,जो खुदा की इबादत करते हैं | "उन्होंने अपना नाम तलाश कराया तो फरिश्ते ने सारी पुस्तक ढूँढ डाली ,उनका नाम कहीं न मिला | इस पर खलीफा बहुत दुखी हुए कि हमारा इतना परिश्रम बेकार चला गया |
                  कुछ दिन बाद एक और फरिश्ता छोटी सी किताब लिये उधर से गुजरा | खलीफा ने उसे भी पुकारा और पूछा कि इस पुस्तक में क्या है ?उसने उत्तर दिया -"इसमें उन लोगों के नाम हैं ,जिनकी इबादत खुदा स्वयं करते हैं | "
    खलीफा ने पूछा -"क्या ईश्वर भी किसी की इबादत करता है ?"फरिश्ते ने कहा -"हाँ !जो लोग खुदा के आदेशों का पालन करते हैं ,उन पर दुनिया को चलाने की कोशिश करते हैं ,संसार रूपी बगिया को सुंदर बनाने की कोशिश करते हैं ,उन्हें खुदा बहुत आदर की द्रष्टि से देखता है और उनकी इबादत वह स्वयं करता है | "
    खलीफा ने पूछा क्या इसमें मेरा भी नाम है ?फरिश्ता बोला कुछ नहीं ,पुस्तक वहीं छोड़कर आगे बढ़ गया | खलीफा ने खोल कर देखा तो उनका नाम सबसे पहला था | 

2 June 2013

SPIRITUAL

'अध्यात्म अंत:करण में परिवर्तन है ,आंतरिक जीवन का रूपांतरण है | जीवन का सत्य बाह्य आवरण में नहीं है | मन की पवित्रता का उद्देश्य यदि पूरा न हुआ तो बाह्य कर्मकांडो का कुछ विशेष लाभ नहीं मिल पाता | '
         कथा पुरानी है पर इसका सत्य सदा ही नया रहता है |
    एक शहर में एक दिन ,एक ही समय दो मौतें हो गईं | इनमे एक सन्यासी थे ,एक नर्तकी | इन दोनों का निवास भी आमने -सामने था | जैसे ही उन दोनों की मृत्यु हुई ,उन्हें ले जाने के लिये ऊपर से दूत आये | वे दूत नर्तकी को स्वर्ग की ओर तथा सन्यासी को नरक की ओर ले चले | सन्यासी ज्यादा देर तक अपना धीरज बनाये न रख सके और बोले -"अरे भाई !तुमसे जरुर कुछ भूल हुई है | नर्तकी को स्वर्ग और मुझे नरक की ओर ,यह अन्याय और अंधेर के सिवा और क्या है | अपनी भूल सुधारो ,गलत राह मत चलो | "फिर धरती की ओर दिखाते हुए कहा -"देखो !धरती वासी कितने समझदार हैं ,सन्यासी की लाश को फूलों से सजा कर ले जा रहें हैं और नर्तकी की लाश को कोई पूछने वाला नहीं है | "
    दूत ठहाका लगाकर हँसने लगे और बोले --"ये बेचारे तो केवल वही जानते हैं ,जो बाहर था | ये व्यवहार तो देख पाते हैं ,किंतु अंत:करण का उन्हें कुछ भी अनुभव नहीं | इन लोगों ने वही जाना जो तुम दिखाते रहे परंतु जो तुम सोचते रहे ,मन की दीवारों के भीतर करते रहे ,उसे ये सब जान नहीं पाये | सच तो यही रहा कि शरी र से तुम सन्यासी थे ,पर तुम्हारा मन तो सदा नर्तकी में अनुरक्त रहा ,सदा ही तुम्हारे मन में वासना  उठती रही कि नर्तकी के घर में कितना सुंदर संगीत और नृत्य चल रहा है और मेरा जीवन कितना नीरस है | "
"जबकि नर्तकी निरंतर यही सोचती रही कि इन सन्यासी महाराज का जीवन कितना पवित्र व आनंदपूर्ण है | रात को तुम जब भजन गाते थे तब वह बेचारी अपने पापों की पीड़ा से विगलित होती ,रोती थी | तुम अपने तथाकथित ज्ञान के कारण कठोर और अहंकारी होते गये और वह अपने अज्ञान बोध के कारण सरल होती गई |               मृत्यु की घड़ी में तुम्हारे चित में अहंकार था ,वासना थी ,जबकि उसके चित में न तो अहंकार था और न वासना थी | उसका चित तो परमात्मा के प्रकाश ,प्रेम एवं प्रार्थना से परिपूर्ण था | इसलिये यही स्वर्ग की अधिकारी है |
अध्यात्म व्यवहार का अभिनय नहीं ,चित का रूपांतरण है ,अंत:करण की क्रांति है |