बुद्धि तो सहज रूप में सभी को प्राप्त होती है -- किसी को कम , किसी को ज्यादा l लेकिन बुद्धि यदि भ्रष्ट होकर कुमार्गगामी बन जाये तो वह व्यक्ति का स्वयं का तो पतन करती ही है , उसके क्रिया - कलाप समाज को भी क्षति पहुंचाते हैं l जिस प्रकार द्रष्टि दोष होने के कारण मात्र नजदीक की वस्तुएं ही दीख पड़ती हैं और दूर रखी हुई वस्तुओं को पहचानना कठिन होता है उसी प्रकार दुर्बुद्धिग्रस्त व्यक्ति तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ समझता है , किस कृत्य का भविष्य में क्या परिणाम होगा , इसका अनुमान नहीं लगा पाता l तात्कालिक लाभ कमाने की अविवेकपूर्ण कामना की वजह से ही समाज में भ्रष्टाचार , अनाचार , अत्याचार , अन्याय , शोषण बढ़ा है l
25 February 2019
23 February 2019
WISDOM ----- बुराई को रोकना भलाई करने के बराबर है
इस संसार में अच्छाई और बुराई दोनों शक्तियां कार्य करती हैं l अच्छाई की रक्षा के लिए आवश्यक है कि बुराई का विरोध किया जाये , उसे नष्ट किया जाये l
बुराई छोटी है , यह समझकर यदि उसकी उपेक्षा की जाये तो वह क्षय रोग की तरह उस उपेक्षा से उठकर चुपके - चुपके अपना कब्ज़ा जमाती है और एक दिन उसका पूरा आधिपत्य हो जाता है l बुराइयों का आकर्षण अच्छाइयों की अपेक्षा अधिक चमकदार होता है , इसलिए देखा जाता है कि निर्बल शक्ति वाले प्राय: बड़ी आसानी से बुराइयों का प्रलोभन सामने आते ही फिसल जाते हैं और उसके चंगुल में फंस जाते हैं l
भगवान ने गीता में अर्जुन को " सदा युद्ध में रत रहने का उपदेश दिया है l यह सतत युद्ध निम्न वृतियों के विरुद्ध जारी रहना चाहिए l " हम अन्य आवश्यक कार्यों की तरह अपनी बुराइयों का नाश करें और अपने चारों ओर फैली हुई बुराइयों , अन्याय और अत्याचार से लड़ें l
निर्बल को देखकर हर किसी को आक्रमण , अन्याय और शोषण करने का लालच आता है इसलिए ऋषियों का मत है कि --- ' न्याय रक्षा के लिए जहाँ शक्तिमानो का धर्मात्मा बनना उचित है , वहां दुर्बलों को भी अपना बल बढ़ाना आवश्यक है l गायत्री मन्त्र में ' भर्ग ' शब्द का सन्देश है कि हम अपना शारीरिक , बौद्धिक , आर्थिक , चारित्रिक तथा संगठन बल बढ़ाएं , जिससे दुर्बलता तथा अन्य हानियों से बच सकें l
बुराई छोटी है , यह समझकर यदि उसकी उपेक्षा की जाये तो वह क्षय रोग की तरह उस उपेक्षा से उठकर चुपके - चुपके अपना कब्ज़ा जमाती है और एक दिन उसका पूरा आधिपत्य हो जाता है l बुराइयों का आकर्षण अच्छाइयों की अपेक्षा अधिक चमकदार होता है , इसलिए देखा जाता है कि निर्बल शक्ति वाले प्राय: बड़ी आसानी से बुराइयों का प्रलोभन सामने आते ही फिसल जाते हैं और उसके चंगुल में फंस जाते हैं l
भगवान ने गीता में अर्जुन को " सदा युद्ध में रत रहने का उपदेश दिया है l यह सतत युद्ध निम्न वृतियों के विरुद्ध जारी रहना चाहिए l " हम अन्य आवश्यक कार्यों की तरह अपनी बुराइयों का नाश करें और अपने चारों ओर फैली हुई बुराइयों , अन्याय और अत्याचार से लड़ें l
निर्बल को देखकर हर किसी को आक्रमण , अन्याय और शोषण करने का लालच आता है इसलिए ऋषियों का मत है कि --- ' न्याय रक्षा के लिए जहाँ शक्तिमानो का धर्मात्मा बनना उचित है , वहां दुर्बलों को भी अपना बल बढ़ाना आवश्यक है l गायत्री मन्त्र में ' भर्ग ' शब्द का सन्देश है कि हम अपना शारीरिक , बौद्धिक , आर्थिक , चारित्रिक तथा संगठन बल बढ़ाएं , जिससे दुर्बलता तथा अन्य हानियों से बच सकें l
22 February 2019
WISDOM ------ अपने गुणों के कारण गांधीजी के साथ 'बा ' ने भी अपना नाम अमर कर लिया
बचपन में तो बा को किसी ने पढ़ाया नहीं , पर बड़ी उम्र में वातावरण बदल जाने के कारण उनको पढ़ने का शौक हो गया l कभी किसी की मदद से तुलसी रामायण पढ़तीं और कभी गीता का अभ्यास करतीं l अपनी आयु के अंतिम वर्षों में आगा खां महल में कैद रहते हुए वे गांधीजी से गीता के श्लोकों का शुद्ध उच्चारण करना सीखतीं थीं l इन दोनों 75-75 वर्ष की आयु के ' शिक्षक और विद्दार्थी ' का द्रश्य देखते ही बनता था l
अपने गृहस्थ जीवन में बा ने प्राचीन भारतीय आदर्श का पालन कर के दुनिया को चकित कर दिया 35 वर्ष की आयु में गांधीजी ने यह निश्चय किया कि अब हम दोनों को काम वासना का त्याग कर भाई - बहन की तरह रहना चाहिए , तो बा ने इसे स्वीकार करने में कुछ भी आगा पीछा न
किया l और जीवन के पिछले 37 वर्ष ब्रह्मचर्य-व्रत को मनसा - वाचा - कर्मणा पालन करते हुए व्यतीत किये l इस सम्बन्ध में स्वयं गांधीजी का कथन है ----- " ब्रह्मचर्य - व्रत के पालन में बा ने कभी मेरा विरोध नहीं किया , या बा उसे कभी तोड़ने के लिए ललचाई नहीं l इसका फल यह हुआ कि हम दोनों का सम्बन्ध सच्चे मित्रों का सा हो गया l लेकिन मित्र होते हुए भी उसने पत्नी के नाते मेरे काम में समा जाने में अपना धर्म माना l यही कारण है कि मरते दम तक उसने मेरी सुख - सुविधा का ध्यान रखा l "
गांधीजी का यह कथन निराधार नहीं था l 22 फरवरी 1944 को ' बा ' का स्वर्गवास हुआ, उस दिन बा ने मनु बहन से कहा ---मनु , बापूजी की बोतल का गुड ख़त्म हो गया है l मेरे पास कई लोग बैठें हैं l तू जा , बापूजी को दूध और गुड़ देकर तू भी भोजन कर ले l ' यह थी सच्ची और निस्स्वार्थ सेवा भावना l जब यह मालूम है कि हम कुछ घंटों में इस संसार को छोड़ने वाले हैं , तब भी अपनी चिंता न कर के दूसरों का ख्याल रखना महानता का ;लक्षण है l
गांधीजी कहते थे ---" मेरी पत्नी मेरे अन्तर को जिस प्रकार हिलाती है , उस प्रकार दुनिया की कोई दूसरी स्त्री उसे हिला नहीं सकती l उसके लिए ममता के एक अटूट बंधन की भावना मेरे अन्तर में जाग्रत रहती है l
युग - पुरुष गाँधी को इतना प्रभावित कर के नारी जाति का महत्व बढ़ाना कोई साधारण बात नहीं है l श्रीमती सरोजिनी नायडू ने जो बा और बापू के साथ प्राय: रहती थीं , उनके देहावसान होने पर लिखा --- " जिस महापुरुष को वे चाहतीं , जिसकी वे सेवा करतीं और अद्वितीय श्रद्धा , धैर्य और भक्ति के साथ जिसका वे अनुसरण करतीं , उसके लिए वे निरंतर कुरबानी करती रहीं l जिस कठिन मार्ग को उन्होंने अपनाया था , उस पर चलते हुए उनके पैर एक क्षण के लिए भी लड़खड़ाये नहीं l वे मातृत्व से अमरत्व में गईं और हमारी गाथाओं , गीतों और हमारे इतिहास की वीरांगनाओं की मंडली में अपना वास्तविक स्थान पा गईं l "
अपने गृहस्थ जीवन में बा ने प्राचीन भारतीय आदर्श का पालन कर के दुनिया को चकित कर दिया 35 वर्ष की आयु में गांधीजी ने यह निश्चय किया कि अब हम दोनों को काम वासना का त्याग कर भाई - बहन की तरह रहना चाहिए , तो बा ने इसे स्वीकार करने में कुछ भी आगा पीछा न
किया l और जीवन के पिछले 37 वर्ष ब्रह्मचर्य-व्रत को मनसा - वाचा - कर्मणा पालन करते हुए व्यतीत किये l इस सम्बन्ध में स्वयं गांधीजी का कथन है ----- " ब्रह्मचर्य - व्रत के पालन में बा ने कभी मेरा विरोध नहीं किया , या बा उसे कभी तोड़ने के लिए ललचाई नहीं l इसका फल यह हुआ कि हम दोनों का सम्बन्ध सच्चे मित्रों का सा हो गया l लेकिन मित्र होते हुए भी उसने पत्नी के नाते मेरे काम में समा जाने में अपना धर्म माना l यही कारण है कि मरते दम तक उसने मेरी सुख - सुविधा का ध्यान रखा l "
गांधीजी का यह कथन निराधार नहीं था l 22 फरवरी 1944 को ' बा ' का स्वर्गवास हुआ, उस दिन बा ने मनु बहन से कहा ---मनु , बापूजी की बोतल का गुड ख़त्म हो गया है l मेरे पास कई लोग बैठें हैं l तू जा , बापूजी को दूध और गुड़ देकर तू भी भोजन कर ले l ' यह थी सच्ची और निस्स्वार्थ सेवा भावना l जब यह मालूम है कि हम कुछ घंटों में इस संसार को छोड़ने वाले हैं , तब भी अपनी चिंता न कर के दूसरों का ख्याल रखना महानता का ;लक्षण है l
गांधीजी कहते थे ---" मेरी पत्नी मेरे अन्तर को जिस प्रकार हिलाती है , उस प्रकार दुनिया की कोई दूसरी स्त्री उसे हिला नहीं सकती l उसके लिए ममता के एक अटूट बंधन की भावना मेरे अन्तर में जाग्रत रहती है l
युग - पुरुष गाँधी को इतना प्रभावित कर के नारी जाति का महत्व बढ़ाना कोई साधारण बात नहीं है l श्रीमती सरोजिनी नायडू ने जो बा और बापू के साथ प्राय: रहती थीं , उनके देहावसान होने पर लिखा --- " जिस महापुरुष को वे चाहतीं , जिसकी वे सेवा करतीं और अद्वितीय श्रद्धा , धैर्य और भक्ति के साथ जिसका वे अनुसरण करतीं , उसके लिए वे निरंतर कुरबानी करती रहीं l जिस कठिन मार्ग को उन्होंने अपनाया था , उस पर चलते हुए उनके पैर एक क्षण के लिए भी लड़खड़ाये नहीं l वे मातृत्व से अमरत्व में गईं और हमारी गाथाओं , गीतों और हमारे इतिहास की वीरांगनाओं की मंडली में अपना वास्तविक स्थान पा गईं l "
21 February 2019
WISDOM ------ मोह से दुर्गति
मनुष्य अपना जीवन लालच और तृष्णा में , धन एकत्र करने में गँवा देता है l ईश्वर का नाम लेने , सत्साहित्य का अध्ययन करने और परोपकार करने के लिए उसके पास समय नहीं होता l ऐसी तृष्णा से व्यक्ति की कैसी गति होती है उसे समझाने के लिए एक पौराणिक कथा है -----
एक आदमी बूढ़ा हुआ तो नारदजी उसके पास आये और उससे कहा कि भगवान को याद कर लो ! इतना समय ऐसे ही बीत गया l बूढ़े ने कहा --- " व्यापार ठिकाने लग जाये , बच्चे संभल जाएँ , नाती - पोते देख लें फिर भगवान को याद करेंगे l "" मृत्यु आई और वह चल बसा l कंजूस था , परोपकार किया नहीं , बैल की तरह श्रम किया तो अगले जन्म में बैल बना l मोह के कारण अपने बच्चों की जमीन पर ही खूब काम करता l नारदजी ने समझाया -- भगवान को याद कर लो , इस बैल की योनि से मुक्त हो जाओगे l वह बोला --- बच्चों के लिए ही तो काम कर रहे हैं l
अब मरे तो कुत्ते की योनि मिली l अब भी बेटों के यहाँ गए l घर की रक्षा करते l नारदजी फिर गए और कहा -- तुम्हे मोह से कब मुक्ति मिलेगी , अब तो भगवान को याद कर लो l कुत्ता बोला -- नाती - पोते बड़े हो जाएँ , इनका घर बस जाये l " अब उसे मरने के बाद सांप की योनी मिली l अब वह अपने द्वारा गाड़े गए खजाने की रक्षा करने लगा l बच्चों को खजाने का पता चला तो उन्होंने लाठी से सांप को मार डाला और खजाने पर अधिकार कर लिया l
नारदजी ने उस आत्मा से कहा --- " देख लिया ! तुम इन्हीं के लिए सब कुछ करते थे न l "
आत्मा बोली --- " आप सही कहते हैं , हमारे मोह ने हमारी दुर्गति की "
पुराणों की ये कथाएं हमें होश में लाने के लिए हैं कि हम यह ख्याल रखें कि परमात्मा हर पल हमारे साथ है , हमें देख रहा है इसलिए ईमानदारी से कर्तव्य पालन करें , बेईमानी और भ्रष्टाचार छोड़कर सन्मार्ग पर चलें l
एक आदमी बूढ़ा हुआ तो नारदजी उसके पास आये और उससे कहा कि भगवान को याद कर लो ! इतना समय ऐसे ही बीत गया l बूढ़े ने कहा --- " व्यापार ठिकाने लग जाये , बच्चे संभल जाएँ , नाती - पोते देख लें फिर भगवान को याद करेंगे l "" मृत्यु आई और वह चल बसा l कंजूस था , परोपकार किया नहीं , बैल की तरह श्रम किया तो अगले जन्म में बैल बना l मोह के कारण अपने बच्चों की जमीन पर ही खूब काम करता l नारदजी ने समझाया -- भगवान को याद कर लो , इस बैल की योनि से मुक्त हो जाओगे l वह बोला --- बच्चों के लिए ही तो काम कर रहे हैं l
अब मरे तो कुत्ते की योनि मिली l अब भी बेटों के यहाँ गए l घर की रक्षा करते l नारदजी फिर गए और कहा -- तुम्हे मोह से कब मुक्ति मिलेगी , अब तो भगवान को याद कर लो l कुत्ता बोला -- नाती - पोते बड़े हो जाएँ , इनका घर बस जाये l " अब उसे मरने के बाद सांप की योनी मिली l अब वह अपने द्वारा गाड़े गए खजाने की रक्षा करने लगा l बच्चों को खजाने का पता चला तो उन्होंने लाठी से सांप को मार डाला और खजाने पर अधिकार कर लिया l
नारदजी ने उस आत्मा से कहा --- " देख लिया ! तुम इन्हीं के लिए सब कुछ करते थे न l "
आत्मा बोली --- " आप सही कहते हैं , हमारे मोह ने हमारी दुर्गति की "
पुराणों की ये कथाएं हमें होश में लाने के लिए हैं कि हम यह ख्याल रखें कि परमात्मा हर पल हमारे साथ है , हमें देख रहा है इसलिए ईमानदारी से कर्तव्य पालन करें , बेईमानी और भ्रष्टाचार छोड़कर सन्मार्ग पर चलें l
WISDOM ------ मनुष्य को यदि वास्तविक आत्मग्लानि हो जाये , तो वह आत्मसुधार हेतु बड़े से बड़ा कदम उठा सकता है--- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य -
घटना 1939 की है -- जारक खान --कबयिली सरदार का होनहार बेटा था जो समाज की अव्यवस्था तथा दुष्प्रवृत्तियों का शिकार होकर दस्यु बन गया था l एक हजार सुसंगठित दस्यु सेना का सेनापति l उसका आतंक इतना अधिक था कि ब्रिटिश सरकार ने उसके सिर की कीमत 25000 पौंड रखी थी l एक बार उसने एक व्यक्ति को कोड़ों से पीट - पीटकर मार डाला l अपने हाथों मार डालने के पश्चात उसे पता चला कि वह एक निर्दोष संत था जो सेवा कार्य में लगा था l इस पवित्र , निर्दोष व्यक्ति की हत्या का उसे इतना दुःख हुआ कि वह अड्डे से भाग निकला और दो वर्ष तक भिखारी की तरह घूम फिर कर पिता के पास आत्मसमर्पण कर दिया l कानून की निगाह से बचा नहीं उसे फांसी की सजा सुना दी गई l
1942 में विश्व युद्ध में हिटलर के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण ब्रिटिश सरकार के लिए एक - एक सिपाही मूल्यवान था l तभी जारक ने प्रस्ताव रखा -- " मेरे जैसे व्यक्ति के लिए मौत कोई मायने नहीं रखती l मरना तो मुझे है ही l अच्छा हो कि फांसी के फंदे को गन्दा करने के स्थान पर मुझे दुश्मन की गोलियों का सामना करने दिया जाये l " उसकी आवाज में सच्चाई थी , प्रस्ताव स्वीकृत हो गया l जारक को विभिन्न क्षेत्रों में जासूसी तथा गुरिल्ला टुकड़ियों में रखा गया l हर जगह उसकी सूझ - बूझ और साहस की धाक जमती रही l 1943 में उसे बर्मा की गुरिल्ला टुकड़ी में भेज दिया गया l 6 अप्रैल को वह अपने एक गोरखा साथी के साथ जापानी शत्रु सेना की टोह लेने गया l
लौटा तो देखा कि उसके अड्डे पर जापानी सेना की एक टुकड़ी ने कब्ज़ा कर लिया और 12 साथियों में से 9 को वे मार चुके थे , तीन बंधे थे l दो सैनिकों को मार से अधमरा कर दिया था , उसके बाद नायक का नंबर था l जारक चाहता तो भाग सकता था लेकिन उसे अपना संकल्प याद था कि वह कैदी की घ्रणित मौत नहीं , शहीद की शानदार मौत मरेगा l जारक ने अपने गोरखा साथी को पास की छावनी से सहायता लाने को कहा l गोरखा साथी सुरक्षित दूरी तक निकल गया , अब उसने पिस्तौल निकल ली l अब तक दो साथी भी मर चुके थे और जापानी सैनिक उसके नायक की और बढ़ रहे थे l जारक ने दो जापानी सैनिकों को निशाना बना दिया l अपनी फुर्ती , सूझ - बूझ से जापानी सैनिकों को उलझाये रखा l जानबूझकर उसने जापानी सैनिकों को कठोर व्यंग किये जिससे जापानी कमांडर अपना संतुलन खो बैठा और जारक पर कोड़े बरसाने लगा , भयंकर अत्याचार किया l इसके पीछे जारक का यही उद्देश्य था कि छावनी से कुमुक आ जाये जापानियों को खदेड़ दे और नायक बच जाये l उसके प्राण छटपटा रहे थे लेकिन प्रबल संकल्प से मौत भी ठहर गई l जारक सफल हुआ l छावनी से कुमुक आ गई , सभी जापानी सैनिक खदेड़ दिए गए l नायक के बंधन खोले जाते देख, उसकी आँखों में संतोष था l अब उसने मृत्यु को आज्ञा दे दी , प्राण - पखेरू उड़ गए l उसका प्रायश्चित पूरा हो गया l पूर्ण सैनिक सम्मान के साथ उसकी अंत्येष्टि की गई l
1942 में विश्व युद्ध में हिटलर के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण ब्रिटिश सरकार के लिए एक - एक सिपाही मूल्यवान था l तभी जारक ने प्रस्ताव रखा -- " मेरे जैसे व्यक्ति के लिए मौत कोई मायने नहीं रखती l मरना तो मुझे है ही l अच्छा हो कि फांसी के फंदे को गन्दा करने के स्थान पर मुझे दुश्मन की गोलियों का सामना करने दिया जाये l " उसकी आवाज में सच्चाई थी , प्रस्ताव स्वीकृत हो गया l जारक को विभिन्न क्षेत्रों में जासूसी तथा गुरिल्ला टुकड़ियों में रखा गया l हर जगह उसकी सूझ - बूझ और साहस की धाक जमती रही l 1943 में उसे बर्मा की गुरिल्ला टुकड़ी में भेज दिया गया l 6 अप्रैल को वह अपने एक गोरखा साथी के साथ जापानी शत्रु सेना की टोह लेने गया l
लौटा तो देखा कि उसके अड्डे पर जापानी सेना की एक टुकड़ी ने कब्ज़ा कर लिया और 12 साथियों में से 9 को वे मार चुके थे , तीन बंधे थे l दो सैनिकों को मार से अधमरा कर दिया था , उसके बाद नायक का नंबर था l जारक चाहता तो भाग सकता था लेकिन उसे अपना संकल्प याद था कि वह कैदी की घ्रणित मौत नहीं , शहीद की शानदार मौत मरेगा l जारक ने अपने गोरखा साथी को पास की छावनी से सहायता लाने को कहा l गोरखा साथी सुरक्षित दूरी तक निकल गया , अब उसने पिस्तौल निकल ली l अब तक दो साथी भी मर चुके थे और जापानी सैनिक उसके नायक की और बढ़ रहे थे l जारक ने दो जापानी सैनिकों को निशाना बना दिया l अपनी फुर्ती , सूझ - बूझ से जापानी सैनिकों को उलझाये रखा l जानबूझकर उसने जापानी सैनिकों को कठोर व्यंग किये जिससे जापानी कमांडर अपना संतुलन खो बैठा और जारक पर कोड़े बरसाने लगा , भयंकर अत्याचार किया l इसके पीछे जारक का यही उद्देश्य था कि छावनी से कुमुक आ जाये जापानियों को खदेड़ दे और नायक बच जाये l उसके प्राण छटपटा रहे थे लेकिन प्रबल संकल्प से मौत भी ठहर गई l जारक सफल हुआ l छावनी से कुमुक आ गई , सभी जापानी सैनिक खदेड़ दिए गए l नायक के बंधन खोले जाते देख, उसकी आँखों में संतोष था l अब उसने मृत्यु को आज्ञा दे दी , प्राण - पखेरू उड़ गए l उसका प्रायश्चित पूरा हो गया l पूर्ण सैनिक सम्मान के साथ उसकी अंत्येष्टि की गई l
18 February 2019
WISDOM ------ शत्रु से सतर्कता जरुरी है
छत्रपति शिवाजी के दक्षिण में विस्तार , उनकी वीरता और साहस से अनेक ईर्ष्या करते थे और हिन्दुस्तान का बादशाह औरंगजेब इसे दिल्ली पर खतरा समझता था l उसने भी उन्हें बंदी बनाने का षडयंत्र रचा l --- जिनके संस्कार विकृत होते हैं उन्हें शत्रुओं की चाटुकारी करने और अपनों को हानि पहुँचाने में ही सुख - संतोष अनुभव होता है , वे अपने स्वार्थ के लिए शत्रुओं के प्रति वफादार रहते हैं , लेकिन अपने देश व समाज के लिए नहीं रह पाते l जयसिंह नाम का हिन्दू राजा औरंगजेब का दूत बनकर शिवाजी के पास आया l जयसिंह ने शिवाजी को विश्वास दिलाया कि यदि वह उनके साथ चलकर औरंगजेब से मिल लें तो वे उनको उससे जीते हुए इलाके और दरबार में ऊँचा पद दिलवा देंगे l शिवाजी ने अपने विशाल मंतव्य के लिए इसे एक अच्छा अवसर समझा और जयसिंह की बातों पर विश्वास कर लिया l सतर्कता में थोड़ा सा असावधान होते ही शिवाजी धोखा खा गए और आगरे में बंदी बना लिए गए l लेकिन अपनी सूझ - बूझ और साहस के बल पर फलों की टोकरी में बैठकर कैद से बाहर निकल आये और पूना जा पहुंचे l
शिवाजी की अनुपम सफलता का एकमात्र कारण उनकी समयानुकूल कार्य प्रणाली और परिस्थितियों के अनुसार चलने का गुण था l
शिवाजी की अनुपम सफलता का एकमात्र कारण उनकी समयानुकूल कार्य प्रणाली और परिस्थितियों के अनुसार चलने का गुण था l
17 February 2019
WISDOM ------ लालच , ईर्ष्या - द्वेष में व्यक्ति अँधा हो जाता है और मनुष्यता के स्तर से गिर जाता है
कहते हैं स्वार्थी , अनीतिवान तथा कायर व्यक्ति के पास छल - कपट के सिवा कोई और संबल नहीं होता l छत्रपति शिवाजी की ताकत , उनकी वीरता और सफल राजनीति से बीजापुर का नवाब आदिलशाह जल गया और उसने उनको छल - प्रपंच से परास्त करने का षड्यंत्र रचा ----- सर्वप्रथम उसने एक जाति - द्रोही बाजी घोर पाण्डे को लालच देकर अपनी ओर कर लिया l बाजी घोर पाण्डे बड़ा स्वार्थी और निकृष्ट था , उसने शिवाजी के पिता शाहजी को एक प्रीति भोज निमंत्रित कर धोखे से बंदी बना लिया और एक छोटी सी कोठरी में बंद कर उसका द्वार ईंटों चुनवा दिया , सांस लेने को थोड़ी सी जगह छोड़ी l शिवाजी अपने पिता की रक्षा के लिए बीजापुर दरबार में आत्म समर्पण करें l शिवाजी ने अपनी कुशल नीति से पिता शाहजी को मुक्त करा लिया l
अब आदिलशाह और जल गया और उसने शिवा को छल से मरवा डालने की ठानी l उसने फिर किसी विश्वासघाती की तलाश की l अब उसे बाजी श्यामराज एक जाति द्रोही मिल गया l उसने उसे धन और पद का लोभ दिया l वह कायर वहीँ घात लगाकर बैठा जहाँ शिवाजी उस समय रह रहे थे l शिवाजी सतर्क थे , गुप्तचरों से उन्हें श्यामराज के रंग - ढंग पता चले तो उन्होंने श्यामराज पर हमला कर दिया l शिवाजी से मार खाकर वह कायर भागा , जवाली के राजा चन्द्रराव की मदद से वह भाग निकला l शिवाजी के अभ्युदय से वह भी जलता था इसलिए उसने श्यामराज की सहायता की l जाति - द्रोही विजातियों से अधिक भयंकर और दंडनीय होता है l शिवाजी ने श्यामराज को तो धर दबोचा और ऐसे स्वार्थी व अदूरदर्शी राजा चन्द्र्राव पर आक्रमण कर उसे परस्त किया l जवाली के किले व मंदिर का जीर्णोद्धार कराया l और वहां से दो मील की दूरी पर प्रतापगढ़ किला और अपनी इष्ट देवी भवानी का मंदिर स्थापित किया l
अब आदिलशाह और जल गया और उसने शिवा को छल से मरवा डालने की ठानी l उसने फिर किसी विश्वासघाती की तलाश की l अब उसे बाजी श्यामराज एक जाति द्रोही मिल गया l उसने उसे धन और पद का लोभ दिया l वह कायर वहीँ घात लगाकर बैठा जहाँ शिवाजी उस समय रह रहे थे l शिवाजी सतर्क थे , गुप्तचरों से उन्हें श्यामराज के रंग - ढंग पता चले तो उन्होंने श्यामराज पर हमला कर दिया l शिवाजी से मार खाकर वह कायर भागा , जवाली के राजा चन्द्रराव की मदद से वह भाग निकला l शिवाजी के अभ्युदय से वह भी जलता था इसलिए उसने श्यामराज की सहायता की l जाति - द्रोही विजातियों से अधिक भयंकर और दंडनीय होता है l शिवाजी ने श्यामराज को तो धर दबोचा और ऐसे स्वार्थी व अदूरदर्शी राजा चन्द्र्राव पर आक्रमण कर उसे परस्त किया l जवाली के किले व मंदिर का जीर्णोद्धार कराया l और वहां से दो मील की दूरी पर प्रतापगढ़ किला और अपनी इष्ट देवी भवानी का मंदिर स्थापित किया l
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