23 September 2019

WISDOM ---- जीवन अनमोल है

    हुसैन  नामक  एक  बड़ा  जौहरी   था  l  एक  समय   वह    व्यापार   हेतु  रामनगर  गया  l  वहां  उसकी  मित्रता  देश  के मंत्री  से  हो   गई  l  एक  दिन  वह  मंत्री  के  साथ  भ्रमण  पर  निकला    तो  रास्ते  में  उसे  एक  विशाल  तम्बू  नजर  आया    और  एक  सुसज्जित  सेना  उस  तम्बू  की  परिक्रमा  कर  रही  थी   l  फिर  क्रमशः  विद्वान्  पुरुष ,    दो - तीन   सौ  सेवक  जवाहरात  भरे  थाल  के  साथ    और  फिर  अंत  में  राजा  आये  और  ये  सब  भी  परिक्रमा  कर  के  चले  गए   l
जौहरी   ने  मंत्री  से    इस  अद्भुत  लगने  वाली   घटना  के  बारे  में  जिज्ञासा  की  तो  मंत्री  ने  बताया   कि  राजा  का  एक   अत्यंत  गुणवान  पुत्र  था  l  राजा  उस  से  अत्याधिक  स्नेह  करता  था  l   एक  दिन  अकस्मात  उसका  निधन  हो  गया   l  इस  तम्बू  में  उसकी  कब्र  बनी  है    प्रतिवर्ष  राजकुमार  की  मृत्यु - तिथि  के  दिन   राजा  सेना  व  परिवार  सहित  यहाँ  आता  है   और  प्रदक्षिणा  कर  के  लौट  जाता  है   l  हुसैन  ने  मंत्री  से  पूछा  --- "  तो  क्या  राजा  अपने  पुत्र  की  कब्र  पर  कुछ  चढ़ाता  नहीं  l "    मंत्री  ने  उत्तर  दिया --- "  नहीं  !   इस  पूरे  प्रयोजन  का  उद्देश्य  मात्र  इतना  है  कि --  सेना  की  वीरता ,  विद्वानों  का  ज्ञान    और  पूरे  राज्य  की  धन - सम्पति   सब  व्यर्थ  है  l  यह  सब  देकर  भी   मनुष्य  आयु  नहीं  प्राप्त  कर  सकता   l  "   यह  सुनकर  हुसैन  के  मन  में  भी  तीव्र  वैराग्य  उत्पन्न  हुआ  और  अत्यधिक  सम्पति  संग्रह  करने  का  लालच  छोड़  कर  वह  भगवद  भजन  और  लोक कल्याण  के  कार्यों    में    स्वयं  को  व्यस्त  रखने  लगा   l

22 September 2019

WISDOM ---- श्रम के साथ भावना और मनोयोग तथा बुद्धि और विवेक जुड़ जाये --

 
पं.  श्रीराम  शर्मा  आचार्य  ने  अपने  जीवन  के  अंतिम  दिनों  में  सभी  लोगों  की  गोष्ठी  बुलाई  और  कहा   कि  आज  हम  तुम  लोगों  को  अपने  जीवन  का  सार  बताएँगे  ,  उन्होंने  कहा --- "  मैं  जीवन  भर  तुम  लोगों  से  गायत्री  की  बातें  करता  रहा  ,  अब  मैं  तुम  लोगों  से  गायत्री  माता  की माता  के  बारे  में  कहता  हूँ  l  गायत्री  माता  की माता  का  नाम  है ----' श्रम  '  l  जो  श्रम  करता  है  ,  उसे  गायत्री  माता वरदान  देती  है  ,  जो  श्रम  नहीं  करता ,  उस  निठल्ले  को  कोई  वरदान  नहीं  देता  l  "
उन्होंने  आगे  कहा ---- "  यह  श्रम  तब  और  भी  व्यापक  एवं  आध्यात्मिक  बन  जाता  है  और  व्यक्तित्व  की  प्रगति  के  द्वार  खोलता  है   ,  जब  श्रम  सेवा  में  तब्दील  हो  जाता  है   l  जब हम   सेवा  के  माध्यम  से  श्रम  करते  हैं   तो  हम  निजी  जीवन  को  समृद्ध  बनाते  हैं    और  अपने  व्यक्तित्व  को  व्यापक  बनाते  हैं   l  "



21 September 2019

WISDOM ------

    नोबेल  पुरस्कार  विजेता  श्री  बर्नार्ड  शा   ने  स्कूल में  बहुत  कम  शिक्षा  पाई  थी   और  16  वर्ष  की  आयु में ही  दफ्तर में  क्लर्की  करने  लगे  थे  l  वे  सच्ची  और  खरी  बात  कहने  ,  तीखे  व्यंग्य  द्वारा   लोगों  को  उनकी  कमजोरियों  का  ज्ञान  कराने  वाले  थे   l  इसलिए  वे  धीरे - धीरे  एक  प्रसिद्ध  आलोचक  और  नाटककार  बन  गए   l
बर्नार्ड  शा  के  एक  नाटक  '  मिसेज  वारेन्स  प्रोफेशन '   में  समाज  में  फैली   वेश्यावृति  पर  आक्रमण  किया  गया  है  l  उसमे  दिखाया  गया  है  कि  जो  लोग  समाज  में  ऊपर  से ' सज्जन '  और  ' सभ्य '  बने  रहते  हैं  ,  उनमे  से  कितनों  का  ही   भीतरी  जीवन    कैसा  पतित  होता  है  l  इस  नाटक  की  प्रमुख  शिक्षा  यही  है  कि  --- दुरंगा  व्यक्तित्व रखना  नीचता  का  लक्षण  है  l  जो  जैसा  है   उसे  वैसा  ही  जीवन  व्यतीत  करना  चाहिए   l

WISDOM ------ सर्वधर्म समभाव के प्रतीक --- दाराशिकोह ( अखंड ज्योति जुलाई 2017 से )

  भारत  में  कुछ  ऐसे  व्यक्तित्व  हुए  हैं   जिनके  योगदान  को  भुलाया  नहीं  जा  सकता  l  ऐसा  व्यक्तित्व  है  -- दाराशिकोह  का   l   दाराशिकोह   शाहजहाँ  के  बड़े  पुत्र  व  औरंगजेब  के  बड़े  भाई  थे  l
  औरंगजेब  को  सत्ता  का  लोभ  था   l  उसने  अपने  पिता  शाहजहाँ  को  जेल  में  डाल  दिया  और  दाराशिकोह  को  धोखा  देकर  छल  से  मार  दिया  l
  दाराशिकोह    द्वारा   किये  गए  प्रयासों  से  ही  प्राचीन  भारतीय  दर्शन  का  का  प्रवाह  अंतर्राष्ट्रीय  फलक  पर  चर्चित  हुआ   l   दाराशिकोह  ने  50  भारतीय  उपनिषदों  का  संस्कृत  से  फारसी  में  अनुवाद  किया  l  19 वीं  सदी  की  शुरुआत  में  फ्रांसीसी  विद्वान्    आकतील  दुपेरो  ने  इसका  अनुवाद  फारसी  से  लैटिन   भाषा  में  कर  के  इसे  प्रकाशित  किया   l   इसे  जब  प्रसिद्ध  दार्शनिक    शोपेनहावर  ने  पढ़ा  तो   इसकी  बहुत  प्रशंसा  की   और  अपने  स्वयं  के  जीवन  के  लिए   प्रेरणादायी  बताया   l
  दाराशिकोह  को  सदैव  मुस्लिम  रहस्यवाद  और  हिन्दू  रहस्यवाद  की  साझी शिक्षाएं  आकर्षित  करती  थीं  l  इन  दोनों  धर्मों  के  बीच  आपसी  समझ  बढ़ाने  के  लिए  ही  वे   भारतीय  धर्म ग्रंथों  का  फारसी  में  अनुवाद करने  लगे  l   1656  में  दाराशिकोह  ने  ' मजमा - अल - बहरीन  ( दो  समंदर  का  मिलन )  नामक  पुस्तक  लिखी  l  इसके  बारे  में  उनका  मानना  था  की  ये  किताब  दोनों  धर्मों  के  सर्वश्रेष्ठ  ज्ञान  का  निचोड़  है  l  दाराशिकोह  के  चिंतन  में  भारतीयता  का  वास  है   l  वे   महान  लेखक  थे  l
 '  सूफीनात  अल  औलिया '  और  ' सकीनात  अल औलिया '   उनकी   सूफी  संतों  के  जीवन  चरित्र   पर  लिखी  हुई  पुस्तकें  हैं  l  उनके  द्वारा  लिखी  गई  पुस्तक  ' रिसाला  ए  हकनुमा '   और  ' तारीकात  ए  हकीकत '   में  सूफीवाद  का  दार्शनिक  चिंतन  है  l  ' अक्सीर  ए  आजम '  नामक  उनके  कविता  संग्रह  में  उनकी  सर्वेश्वरवादी  प्रवृति  का  बोध  होता  है  l  इसके  अतिरिक्त  उनकी  पुस्तक  ' हसनात  अल   आरिफीन '   और   ' मुकालम  ए  बाबालाल  ओ  दाराशिकोह '  में  धर्म  और  वैराग्य  का  विवेचन  हुआ  है  l 
 दाराशिकोह  का  जीवन  अल्प  किन्तु  भव्य  था  l  यदि  उन्होंने  उस  समय  उपनिषदों  का  फारसी  अनुवाद  न  किया  होता  ,  तो  उनका  लैटिन  अनुवाद  भी  न  होता  l फिर  उनका  अन्य  भाषाओँ  में  भी  अनुवाद  नहीं  हो  सकता  था  l   ऋग्वेद  ,  हमारी  पूरी  दुनिया  का  सबसे  प्राचीनतम  ज्ञानकोष  है    ल मैक्समूलर  के  अनुवाद  के  बाद   इसकी  अंतर्राष्ट्रीय  स्तर  पर  धाक  जमी  और  बाद  में   यूनेस्को  ने  भी  इसे  अपनी  विश्व  धरोहर  की  सूची  में  जगह  दी  l
दाराशिकोह  का  व्यक्तित्व  अनूठा  था   l  इस महान  राजकुमार  को  असमय  ही  धरती  से  जाना  पड़ा  l

18 September 2019

WISDOM ------

  ' मनुष्य  पाप  कर  के  यह  सोचता  है  कि  मेरा  पाप  कोई  नहीं   जानता  ,  पर उसके  पाप  को  न  केवल  देवता  जानते  हैं  ,  बल्कि  सब  के ह्रदय  में  स्थित  परम  पिता  परमेश्वर  भी  जानते  हैं  l  '
    अनाचारी   और  अधर्मी   अपनी  सामर्थ्य    शक्ति   का   घोर  दुरूपयोग  करते  हैं  l  ऐसे  लोग  इस  कदर  ह्रदयहीन  होते  हैं   कि  ये  अशक्त , निरीह ,  दुर्बल  , बच्चे    बूढ़ों    पर  भी  निर्ममता  से  वार  करते  हैं  l  अत्याचारी  और  अनाचारी   के  लिए  कोई  नीति,  धर्म व   मर्यादा  नहीं    होती  l  अपने  तुच्छ   स्वार्थ   व  अहंकार  की  पूर्ति    लिए   वे  कुछ  भी  करने  के  लिए ,  किसी  भी  स्तर  तक  गिरने  के  लिए  तैयार  रहते  हैं   l                            जहाँ    बल  से  काम  न  बने  ,  वहां    छल  से  काम  लेते  हैं   l  जहाँ   शक्ति    से  काम  न  निकले  ,  वहां   वे    छद्म    से  काम  लेते  हैं  l  जहाँ   सामर्थ्य    से  हल  न  निकले  ,  वहां   ये  विश्वासघात  का  हथियार  उपयोग  करते  हैं  l
  अनाचारी  और  अधर्मी  को  स्वयं  पर  विश्वास  नहीं  होता  l  ये  डरते  रहते  हैं  कि  कहीं  कोई   अधिक  बलशाली  इनके  वर्चस्व  को  समाप्त  न  कर  दे  l  अधर्मी  मामा  कंस  के  आतंक  का  इतिहास  गवाह  है  l  शक्तिशाली  होने  के  बावजूद  भयभीत  था  ,  उसने  अपनी  ही  बहन  की  सात  नवजात  संतानों  को   मृत्यु   के   घाट   उतार  दिया  l
 पं.  श्रीराम  शर्मा  आचार्य  ने  लिखा  है ---- ' अनीति  और  अधर्म  से   किसी  को  सफलता  मिलते  भले  ही  दिखाई  पड़े  ,  परन्तु  उनका  अंत  बड़ा  ही   वीभत्स    एवं  भयानक  होता  है   l  कर्म  किसी  को  नहीं  छोड़ता   l  दुष्कर्मों  का  परिणाम  आने  में  भले  ही  देरी  हो ,  किन्तु  कर्म फल  से  कोई  नहीं  बचा  है  l  अत:  काल  और  कर्म  से  डरते  हुए  सदा  सत्कर्म  करते  रहना  चाहिए  l  

17 September 2019

WISDOM

      प्रसिद्ध  कवि  अब्दुर्रहीम  खानखाना  के  पास  एक  व्यक्ति  आया   और  उनसे  पूछने  लगा  कि  जीवन  में  सबसे  महत्वपूर्ण   कौन  सा   संयम    है  ?  उन्होंने  कविता    के  माध्यम  से  उत्तर  दिया  -----
  ' रहिमन  जिह्वा  बावरी  ,  कर  गई  सरग  पताल  l  खुद  कह  भीतर  घुस  गई ,  जूती  पड़े  कपाल  l l
  अर्थात  सारे  संयमों  में  वाणी  का  संयम  अत्यंत  महत्वपूर्ण  है   l  जीभ  खुद  तो  बात  कहकर  मुंह  के  अन्दर  चली  जाती  है  ,  परन्तु  उसका  परिणाम  कहने  वाले  को  भुगतना  पड़ता  है   l
  मौन  हमें  कई  बार    व्यर्थ  के  विवादों  और  इससे  उत्पन्न  होने  वाली  परेशानियों  से  बचा  लेता  है  l  लेकिन  केवल  न  बोलना  ही  मौन  नहीं  है  l  यदि  किसी  के  मन  में  विचारों  की  उथल - पुथल  हो  रही  है   या  उसके  मन  में  किसी    अन्य   व्यक्ति  राग - द्वेष  या  क्रोध   का  ज्वार  उठ  रहा  हो  तो  इसे मौन  नहीं    कह   सकते   l  वास्तविक  व  पूर्ण  मौन    वह है  ,  जिसमे  मन  और  वाणी  दोनों  ही  पूरी  शांत   हों  l
  मौन  साधने  से  व्यक्ति  के  अन्दर  स्थिरता  व  शांति  बढ़ती  है  और  उसे  अपने   कार्यों  में  सफलता  मिलती  है   l

WISDOM -----

  पं.  श्रीराम  शर्मा  आचार्य  ने  लिखा  है  ---- ' जिस  तरह   इस स्रष्टि  में   दिन  के  बाद  रात  आती है  और  रात  के  बाद  पुन:  सवेरा  ,  वैसे  ही  यह  चक्र  लगातार  चलता  रहता  है  l  इसी  तरह  जीवन  में   यदि  सुख  है  ,  तो  दुःख  भी   आता  है  l  यदि  सफलता  है ,  तो  असफलता  का  भी  स्वाद  मिलता  है  l  यदि  प्रसन्नता  है ,  तो  विषाद  भी  जीवन  में  कभी  न  कभी  आता  है  l  यदि  सम्मान  है  ,  तो  अपमान  का  दंश  भी  सहना  होता  है  l  '   आचार्य  श्री  ने  आगे  लिखा  है ---- "  जिस  तरह    रात्रि  को  हम  दिन  में  नहीं  बदल  सकते  ,  लेकिन  विद्युत  के माध्यम  से  बल्ब  जलाकर  अंधकार  को  दूर  कर  सकते  हैं  ,  उसी  तरह  हम  दुःख ,  कष्ट ,  पीड़ा ,  अपयश   आदि  के  आने  पर  इन्हें  तुरंत  दूर  नहीं  कर  सकते  ,  लेकिन  इन  परिस्थितियों  में    भगवदस्मरण   करते  हुए  शुभ  कर्म  कर  के    इनसे  लाभान्वित    भी  हो  सकते  हैं  l 
  जीवन  को  यदि  सही  मायने  में  समझना  है   तो  इस  संसार  के  नकारात्मक  व  कष्टदायी   दीखने  वाले  तत्वों  को  सकारात्मक  द्रष्टि  से  देखना  चाहिए   और  इनसे  भी  लाभान्वित  होना  चाहिए  ,  क्योंकि  ये  सभी  तत्व  जीवन  को  निखारते  व  सँवारते  हैं   l