जीवन का एक महत्वपूर्ण नियम है ---- कृतज्ञता l कृतज्ञता का अर्थ है -- धन्यवाद देना l कृतज्ञ होने का भाव व्यक्ति को विनम्र बनाता है l ऐसा व्यक्ति अपने उपलब्ध साधनों के लिए ईश्वर का कृतज्ञ होता है l इतिहास में बहुत से महान व्यक्ति हुए हैं , जिन्होंने जीवन में अकल्पनीय उपलब्धियां हासिल कीं l परन्तु उनका श्रेय स्वयं न लेते हुए परमात्मा के प्रति कृतज्ञ रहे l यही गुण उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में ला कर खड़ा करता है l
29 November 2019
28 November 2019
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है कि ---" गायत्री साधना द्वारा आत्मोन्नति होती है , यह सुनिश्चित तथ्य है लेकिन केवल चौबीस अक्षरों वाले मन्त्र को रटने से काम चलने वाला नहीं है l सुबह जागकर गायत्री मन्त्र जपा और दिन भर ढेरों खुराफातें कीं l भला ऐसे कहीं गायत्री साधना संभव हो सकेगी l गायत्री को समझने के लिए गायत्री मन्त्र के अर्थ और भाव को समझना होगा l "
आचार्य श्री ने त्रिपदा गायत्री के तीन चरणों के ये व्यावहारिक अर्थ समझाए ---- " 1 . सकारात्मक सोच 2 . सुविधा - साधनों का सही - सही सदुपयोग 3 . शारीरिक व मानसिक श्रम की सही दिशा l " यह उनका सर्वथा नया व्यावहारिक चिंतन था जिसे गायत्री साधकों को आत्मसात करना चाहिए l
आचार्य श्री ने त्रिपदा गायत्री के तीन चरणों के ये व्यावहारिक अर्थ समझाए ---- " 1 . सकारात्मक सोच 2 . सुविधा - साधनों का सही - सही सदुपयोग 3 . शारीरिक व मानसिक श्रम की सही दिशा l " यह उनका सर्वथा नया व्यावहारिक चिंतन था जिसे गायत्री साधकों को आत्मसात करना चाहिए l
27 November 2019
WISDOM ----- धर्म का सार है संवेदना
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने लिखा है ---- ' धर्म एक शाश्वत नीति दर्शन का नाम है जो मूलत: संवेदना की धुरी पर जन्म लेता है l देव संस्कृति ने धर्म को इसी अर्थ में लिया है l यही कारण है कि इसके गर्भ में सभी मत - सम्प्रदाय पनपते - विकसित होते चले गए l '
आचार्य श्री आगे लिखते हैं --- मानव की संवेदना शीलता का विकास ही धर्म है l वस्तुत: धर्म हमें कर्तव्य की प्रेरणा देता है , साथ ही फल की ओर से तटस्थ रहने का आदेश भी देता है l धर्म का एकमेव लक्ष्य है --- त्याग , संवेदना का जागरण तथा पारस्परिक सद्भाव का विकास l इस भावना का जितना विस्तार होगा , धर्म की उतनी ही रक्षा होगी और आस्था संकट की विभीषिका भी तभी मिटेगी l '
संवेदना क्यों जरुरी है ? इस सम्बन्ध में यह प्रसंग है --- काशिराज युवराज संदीप के विकास से संतुष्ट थे l वे प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाते l व्यायाम , घुड़सवारी करते , समय पर अध्ययन और राजदरबार के कार्यों में रूचि लेना आदि प्रवृतियां ठीक थीं l एक क्षण भी न गंवाते और न किसी दुर्व्यसन में उलझते , किन्तु राज पुरोहित बार - बार आग्रह करते कि उन्हें कुछ वर्षों के लिए किसी संत के सान्निध्य में , आश्रम में रखने की व्यवस्था बनाई जाये l काशीराज सोचते थे कि राजकुमार को इसी क्रम में राजकार्य का अनुभव बढ़ाने का अवसर दिया जाये l
तभी एक घटना घटी l राजकुमार नगर भ्रमण के लिए घोड़े पर निकले l जहाँ वे रुकते स्नेह भाव से नागरिक उन्हें घेर लेते l एक बालक कुतूहलवश घोड़े के पास जाकर उसकी पूंछ सहलाने लगा l घोड़े ने लात फटकारी तो बालक दूर जा गिरा l उसके पैर की हड्डी टूट गई l राजकुमार ने देखा , हंसकर बोले , असावधानी बरतने वालों का यही हाल होता है , और आगे बढ़ गए l सिद्धान्तः बात सही थी लेकिन लोगों को व्यवहार खटक गया l
काशिराज को सारा विवरण मिला , तो वे भी दुःखी हुए l राजपुरोहित ने कहा ---- महाराज ! स्पष्ट हुआ है कि युवराज में संवेदनाओं का अभाव है l मात्र सतर्कता और सक्रियता के बल पर वे जनश्रद्धा का अर्जन और पोषण नहीं कर पाएंगे l हो सकता है कभी क्रूर कर्मी भी बन जाएँ l इसलिए समय रहते युवराज की इस कमी को पूरा कर लिया जाना चाहिए l राजा का समाधान हो गया और उन्होंने राजपुरोहित के मतानुसार व्यवस्था कर दी l
आचार्य श्री आगे लिखते हैं --- मानव की संवेदना शीलता का विकास ही धर्म है l वस्तुत: धर्म हमें कर्तव्य की प्रेरणा देता है , साथ ही फल की ओर से तटस्थ रहने का आदेश भी देता है l धर्म का एकमेव लक्ष्य है --- त्याग , संवेदना का जागरण तथा पारस्परिक सद्भाव का विकास l इस भावना का जितना विस्तार होगा , धर्म की उतनी ही रक्षा होगी और आस्था संकट की विभीषिका भी तभी मिटेगी l '
संवेदना क्यों जरुरी है ? इस सम्बन्ध में यह प्रसंग है --- काशिराज युवराज संदीप के विकास से संतुष्ट थे l वे प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाते l व्यायाम , घुड़सवारी करते , समय पर अध्ययन और राजदरबार के कार्यों में रूचि लेना आदि प्रवृतियां ठीक थीं l एक क्षण भी न गंवाते और न किसी दुर्व्यसन में उलझते , किन्तु राज पुरोहित बार - बार आग्रह करते कि उन्हें कुछ वर्षों के लिए किसी संत के सान्निध्य में , आश्रम में रखने की व्यवस्था बनाई जाये l काशीराज सोचते थे कि राजकुमार को इसी क्रम में राजकार्य का अनुभव बढ़ाने का अवसर दिया जाये l
तभी एक घटना घटी l राजकुमार नगर भ्रमण के लिए घोड़े पर निकले l जहाँ वे रुकते स्नेह भाव से नागरिक उन्हें घेर लेते l एक बालक कुतूहलवश घोड़े के पास जाकर उसकी पूंछ सहलाने लगा l घोड़े ने लात फटकारी तो बालक दूर जा गिरा l उसके पैर की हड्डी टूट गई l राजकुमार ने देखा , हंसकर बोले , असावधानी बरतने वालों का यही हाल होता है , और आगे बढ़ गए l सिद्धान्तः बात सही थी लेकिन लोगों को व्यवहार खटक गया l
काशिराज को सारा विवरण मिला , तो वे भी दुःखी हुए l राजपुरोहित ने कहा ---- महाराज ! स्पष्ट हुआ है कि युवराज में संवेदनाओं का अभाव है l मात्र सतर्कता और सक्रियता के बल पर वे जनश्रद्धा का अर्जन और पोषण नहीं कर पाएंगे l हो सकता है कभी क्रूर कर्मी भी बन जाएँ l इसलिए समय रहते युवराज की इस कमी को पूरा कर लिया जाना चाहिए l राजा का समाधान हो गया और उन्होंने राजपुरोहित के मतानुसार व्यवस्था कर दी l
26 November 2019
WISDOM ------ गौ माता कामधेनु
गौ सेवा के अग्रणी सेठ जमनालाल बजाज वृंदावन गए थे , वहां उन्हें जो अनुभूति हुई उससे वे सोचने लगे कि भारतीय संस्कृति में गौ को माँ कहकर पूजनीय माना जाता है लेकिन उसे घरों में बांधकर चारा - पानी के लिए तरसाने वाले कम नहीं है , दूध की आखिरी बूंद तक दुहकर बछड़े को भूख से तड़पता छोड़ने वाले भी गाय को माता कहते हैं l
एक वृद्ध खानसामा उन्हें बताया कि ---' एक अमेरिकन पशु विशेषज्ञ मि. ह्यूमैन भारत आये थे l गायों की नस्ल सुधारने के लिए उन्होंने कई देशों का भ्रमण किया l संस्कृत का अध्ययन किया l उनका कहना था कि पुस्तकों में गाय को कामधेनु कहा गया है l उन्हें इस बात की धुन लगी थी कि मैं संस्कृत की इन पुस्तकों में लिखे एक - एक शब्द का प्रयोग करूँगा l हमारे पवित्र ग्रंथों में गाय की जो महिमा है , उसकी सच्चाई जानने की उन्हें ललक थी l
उन्होंने आगरा से पंद्रह मील दूर एक ढाक का जंगल खरीद लिया और वही अपना छोटा सा बंगला बना लिया l उस बंगले पर ह्यूमन साहब , वह खानसामा , कपिला गाय और उसकी बछड़ी रहते थे l
ह्यूमैन साहब ने अपने जीवन , रहन - सहन सबमें परिवर्तन कर लिया , चाय भी छोड़ दी l गाय के ऊपर मक्खी - मच्छर उड़ाते , शाम से गाय के पास दीपक जलाते जो रात भर जलता , वहीँ चटाई बिछाकर सोते , बहुत सेवा करते l वह खानसामा दोपहर को जंगल में खाना दे आता l छह महीने बीत गए l एक दिन उसने सोचा कि देखें यह साहब जंगल में क्या करते हैं l वह एक झाड़ी में छुप गया l और जो दृश्य देखा तो चीख कर बेहोश हो गया --- गाय ढाक के पेड़ के नीचे बैठी थी , बछड़ी पास में फुदक रही थी , साहब घुटनों के बल बैठे हाथ जोड़ प्रार्थना कर रहे थे , उनकी आँखों से निरंतर आंसू झर रहे थे और आश्चर्य ! वह गाय साफ अंग्रेजी बोल रही थी l
यह अनुभूति बताते हुए उसकी आँखें भर आईं l
उसने बताया कि ह्यूमन साहब तो अब नहीं रहे , सामने जो गाय है वह उसी कपिला गाय कामधेनु की बछड़ी है l उसने उन्हें ढाक के पत्ते से दोना बनाकर दिया और कहा कि गाय के थन के पास बैठ जाओ l गाय से कहा --- ' अम्मा , मेहमान आये हैं अपने घर l ' और आश्चर्य ! गाय के चारों थनों से दूध की धारा बहने लगी , ऐसा स्वादिष्ट दूध उन्होंने पहले कभी नहीं पिया था l
वृंदावन की इस अनुभूति ने जमनालाल जी के जीवन में चमत्कारी परिवर्तन किये l अक्टूबर 1 9 4 1 में उन्होंने वर्धा में गौ सेवा संघ की स्थापना की l नाम और यश से दूर गौ -पुरी में निवास किया l श्रद्धा और विश्वास से , सत्य के अन्वेषक के लिए सब कुछ संभव है l
एक वृद्ध खानसामा उन्हें बताया कि ---' एक अमेरिकन पशु विशेषज्ञ मि. ह्यूमैन भारत आये थे l गायों की नस्ल सुधारने के लिए उन्होंने कई देशों का भ्रमण किया l संस्कृत का अध्ययन किया l उनका कहना था कि पुस्तकों में गाय को कामधेनु कहा गया है l उन्हें इस बात की धुन लगी थी कि मैं संस्कृत की इन पुस्तकों में लिखे एक - एक शब्द का प्रयोग करूँगा l हमारे पवित्र ग्रंथों में गाय की जो महिमा है , उसकी सच्चाई जानने की उन्हें ललक थी l
उन्होंने आगरा से पंद्रह मील दूर एक ढाक का जंगल खरीद लिया और वही अपना छोटा सा बंगला बना लिया l उस बंगले पर ह्यूमन साहब , वह खानसामा , कपिला गाय और उसकी बछड़ी रहते थे l
ह्यूमैन साहब ने अपने जीवन , रहन - सहन सबमें परिवर्तन कर लिया , चाय भी छोड़ दी l गाय के ऊपर मक्खी - मच्छर उड़ाते , शाम से गाय के पास दीपक जलाते जो रात भर जलता , वहीँ चटाई बिछाकर सोते , बहुत सेवा करते l वह खानसामा दोपहर को जंगल में खाना दे आता l छह महीने बीत गए l एक दिन उसने सोचा कि देखें यह साहब जंगल में क्या करते हैं l वह एक झाड़ी में छुप गया l और जो दृश्य देखा तो चीख कर बेहोश हो गया --- गाय ढाक के पेड़ के नीचे बैठी थी , बछड़ी पास में फुदक रही थी , साहब घुटनों के बल बैठे हाथ जोड़ प्रार्थना कर रहे थे , उनकी आँखों से निरंतर आंसू झर रहे थे और आश्चर्य ! वह गाय साफ अंग्रेजी बोल रही थी l
यह अनुभूति बताते हुए उसकी आँखें भर आईं l
उसने बताया कि ह्यूमन साहब तो अब नहीं रहे , सामने जो गाय है वह उसी कपिला गाय कामधेनु की बछड़ी है l उसने उन्हें ढाक के पत्ते से दोना बनाकर दिया और कहा कि गाय के थन के पास बैठ जाओ l गाय से कहा --- ' अम्मा , मेहमान आये हैं अपने घर l ' और आश्चर्य ! गाय के चारों थनों से दूध की धारा बहने लगी , ऐसा स्वादिष्ट दूध उन्होंने पहले कभी नहीं पिया था l
वृंदावन की इस अनुभूति ने जमनालाल जी के जीवन में चमत्कारी परिवर्तन किये l अक्टूबर 1 9 4 1 में उन्होंने वर्धा में गौ सेवा संघ की स्थापना की l नाम और यश से दूर गौ -पुरी में निवास किया l श्रद्धा और विश्वास से , सत्य के अन्वेषक के लिए सब कुछ संभव है l
25 November 2019
WISDOM -----
श्रीमद भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --- ज्ञानी का लक्षण यह है कि वह जीवन के प्रत्येक दुःख , प्रत्येक कष्ट में दूसरों के नहीं , अपने दोष ढूंढता है l वह सोचता है कि जरूर हमने कोई दोष किया , कोई भूल हुई हमसे , जिसका परिणाम हम भोग रहे हैं l
लेकिन अज्ञानी हमेशा दूसरों को दोषी ठहरता है इसलिए वह अपने दोषों से मुक्त नहीं होता है l
यदि अपने हर दुःख , कष्ट , पीड़ा और हर रोग में हमें अपनी कमियां , अपने दोष समझ में आने लगें तो हम आगे ऐसी गलतियां नहीं करेंगे जिनके कारन जीवन दुःखमय हो गया l
जब मन में यह सत्य गहराई से बैठ गया कि सभी दुःख हमारे अपने ही कारण पैदा हुए हैं , ऐसा होश आने पर हम उन कारणों को हटाने लगेंगे l और हमारा मन संस्कारित होने लगेगा l
लेकिन अज्ञानी हमेशा दूसरों को दोषी ठहरता है इसलिए वह अपने दोषों से मुक्त नहीं होता है l
यदि अपने हर दुःख , कष्ट , पीड़ा और हर रोग में हमें अपनी कमियां , अपने दोष समझ में आने लगें तो हम आगे ऐसी गलतियां नहीं करेंगे जिनके कारन जीवन दुःखमय हो गया l
जब मन में यह सत्य गहराई से बैठ गया कि सभी दुःख हमारे अपने ही कारण पैदा हुए हैं , ऐसा होश आने पर हम उन कारणों को हटाने लगेंगे l और हमारा मन संस्कारित होने लगेगा l
23 November 2019
WISDOM ----- सकारात्मक सोच जीवन को ऊर्जा से भर देती है
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन उन दिनों बीमार थे l उन्हें देखने के लिए उनके एक पुराने साथी प्रयाग गए l तब राजर्षि ने बातों ही बातों में अपना एक संस्मरण सुनाया ----- " किसी समय मैं
देशी रियासतों में राजाओं का सुधार करने के लिए एक आदर्श योजना बना रहा था ताकि यह दिखाने का अवसर मिले कि भारतीय अंग्रेजों से अच्छा शासन कर सकते हैं l इसी उद्देश्य के लिए बनाई गई योजना को क्रियान्वित करने मैंने नाभा रियासत में नौकरी की , परन्तु मैं असफल
रहा l " उनके मित्र ने कहा --- " यह तो बड़ा अच्छा रहा l '
टंडन जी बोले ---- " यही तो मैं भी कहना चाहता था l अंग्रेजों के कारण मैं असफल हुआ तो मैंने अपना ध्यान अंग्रेजों को यहाँ से हटाने में लगाया l ईश्वर के प्रति मैं धन्यवाद से भर गया हूँ l नाभा में सफल होने पर संभव था मैं कूपमंडूक बना रह जाता l इस असफलता ने मेरे लिए सफलता और साधना का नया द्वार खोल दिया l '
अपने कार्यों मिली सफलता - असफलता के प्रति समान दृष्टि और सकारात्मक सोच अपनाने से ही वे राजर्षि उपाधि के अधिकारी सिद्ध होते रहे l यह प्रसंग हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा दायक है जो असफलताओं से जूझ रहे हैं , आगे बढ़ने को प्रयत्नशील हैं l
देशी रियासतों में राजाओं का सुधार करने के लिए एक आदर्श योजना बना रहा था ताकि यह दिखाने का अवसर मिले कि भारतीय अंग्रेजों से अच्छा शासन कर सकते हैं l इसी उद्देश्य के लिए बनाई गई योजना को क्रियान्वित करने मैंने नाभा रियासत में नौकरी की , परन्तु मैं असफल
रहा l " उनके मित्र ने कहा --- " यह तो बड़ा अच्छा रहा l '
टंडन जी बोले ---- " यही तो मैं भी कहना चाहता था l अंग्रेजों के कारण मैं असफल हुआ तो मैंने अपना ध्यान अंग्रेजों को यहाँ से हटाने में लगाया l ईश्वर के प्रति मैं धन्यवाद से भर गया हूँ l नाभा में सफल होने पर संभव था मैं कूपमंडूक बना रह जाता l इस असफलता ने मेरे लिए सफलता और साधना का नया द्वार खोल दिया l '
अपने कार्यों मिली सफलता - असफलता के प्रति समान दृष्टि और सकारात्मक सोच अपनाने से ही वे राजर्षि उपाधि के अधिकारी सिद्ध होते रहे l यह प्रसंग हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा दायक है जो असफलताओं से जूझ रहे हैं , आगे बढ़ने को प्रयत्नशील हैं l
22 November 2019
WISDOM ------ कर्मयोग
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना था ---- ' कर्मयोग परिश्रम की पराकाष्ठा का नाम है और जो परिश्रम को ही त्याग बैठते हैं , वे जीवन के किसी भी आयाम में न तो उन्नति कर पाते हैं और न ही व्यक्तित्व की समग्रता को प्राप्त कर पाते हैं l श्रम की उपेक्षा ही हमारे समाज में दरिद्रता का कारण है l वे कहते हैं कि भारतीय समाज ने विकास के दोहरे मानदंड तय कर लिए हैं l हम श्रम करने वालों से तो घृणा करते हैं और बिना मेहनत , आराम का अन्न खाने वालों को ऊँचा स्थान देते हैं , इसलिए यह देश दरिद्रता के गर्त में गिरता चला गया और अपनी समृद्धि गँवा बैठा l
आचार्य जी कहते हैं --- अध्यात्म का पहला पाठ परिश्रम और ईमानदारी से प्राप्त समृद्धि है और यह कर्मयोग से ही प्राप्त होती है l '
आचार्य जी कहते हैं --- अध्यात्म का पहला पाठ परिश्रम और ईमानदारी से प्राप्त समृद्धि है और यह कर्मयोग से ही प्राप्त होती है l '
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