भौतिक प्रगति के साथ नैतिकता और चरित्र की श्रेष्ठता की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया , इसलिए यह विकास अधूरा है l मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए करने लगा है l जैसे पहले तीर्थ यात्रा का बहुत महत्त्व था , लोगों को तीर्थ स्थान जाकर असीम शांति और ऊर्जा मिलती थी l लेकिन अब तीर्थ भी मनोरंजन के स्थान हो गए हैं l लोगों ने पुरानी मान्यता को दूषित कर दिया l यह मान्यता है कि तीर्थ स्नान से सारे पाप धुल जाते हैं , इसका अर्थ यही था कि ऐसे पवित्र स्थल पर जाने से जीवन में नई चेतना का संचार होता है और बुद्धि सन्मार्ग की ओर प्रेरित होती है l दुर्बुद्धि के कारण लोग इस पवित्र भाव को भूल गए , सोच विकृत हो गई कि ' पाप कमाओ और गंगा में स्नान कर के उनसे छुटकारा पा लो , , ऐसी सोच ने अपराध में और वृद्धि कर दी l आचार्य श्री लिखते हैं ----" यदि इस प्रकार गंगा स्नान से पापों से छुटकारा मिल जाता तो सबसे पहले मछलियाँ और मगरमच्छ स्वर्ग पहुँच जाते जो हर समय गंगाजल में ही रहते हैं l " श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान ने कहा है कि निष्काम कर्म से मनुष्य की बुद्धि निर्मल होती है , जाने -अनजाने जो पाप किए हैं वे कटते हैं l ' नि 'स्वार्थ भाव से सेवा के कार्य करने से घर बैठे ही तीर्थ का पुण्य मिल जाता है l
9 February 2024
8 February 2024
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने ' प्रज्ञा पुराण ' में लघु कथाओं और प्रसंग के माध्यम से हमें जीवन जीने की कला सिखाई है l --- संसार में विभिन्न धर्मों के लोग अपने -अपने धर्म के कर्मकांड , उपासना करते हैं l हर धर्म के अलग तरीके हैं l मनुष्य पूजा -उपासना करने में निश्चित रूप से अपना कुछ समय भी देता है l यह सब भी जरुरी है अपने धर्म और संस्कृति को जीवित रखने के लिए l लेकिन मन चंचल है , केन्द्रित नहीं होता , हर समय कुलांचे भरता रहता है l यही कारण है कि संसार में विभिन्न तरीकों से उस परम सत्ता को पूजने और धर्म के नाम पर विभिन्न कार्य करने के बावजूद भी संसार में शांति नहीं है l आचार्य श्री लिखते हैं --- ' केवल माला घुमाते रहना जप नहीं है l भगवान की सच्ची पूजा कर्तव्यपालन और दुःखियों की सेवा है l यदि कोई व्यक्ति बड़े -बड़े व्रत -उपवास रखता है , पूजा -पाठ करता है , किसी इच्छापूर्ति के लिए यज्ञ -अनुष्ठान करता है , लेकिन गरीबों का शोषण करता है , किसी का हक छीनता है , लोगों का दिल दुखाता है तो उससे भगवान कभी प्रसन्न नहीं हो सकते l -------- एक बार रामलीला खेलने के लिए दो गरीब बच्चों को चुना गया l उन्हें राम -लक्ष्मण बना दिया गया l सबने उनकी आरती उतारी l खूब पैसे इकट्ठे हुए l तीन दिन तक इसी प्रकार कार्यक्रम चलता रहा l उन बच्चों ने सोचा था कि उन्हें भी कुछ रूपये -पैसे मिलेंगे l लेकिन अंतिम दिन प्रसाद बंटा , सबने खूब मौज -मस्ती की , ठर्रा पिया किन्तु उन दोनों बच्चों को जिन्हें राम लक्ष्मण बनाया गया था , किसी ने खाने के लिए भी नहीं पूछा और उन बच्चों से कहा --- " अभी पैसे नहीं मिले हैं , बाद में तुम्हे कपड़े देंगे , अभी जाओ l " वे दोनों बेचारे रोते हुए चले गए l यह सोचने का प्रश्न है क्या ऐसे धार्मिक कार्य से ईश्वर प्रसन्न होंगे ? ' एक प्रसंग है ---- एक बार गुरु नानकदेव जी किसी खां साहब से मिलने गए l वे उस समय नमाज पढ़ रहे थे l गुरूजी को हँसी आ गई l नमाज से उठकर खां साहब ने नानकजी से पूछा ---- " आप क्यों हँस रहे थे , मेरी नमाज देखकर l " नानकदेव जी ने कहा ---- " मैं हँस रहा था इसलिए कि तुम नमाज नहीं पढ़ रहे थे , अरब में घोड़े खरीद रहे थे l " यह सुनकर खां साहब शर्मिंदा हुए क्योंकि वे नमाज पढ़ते समय अरब में घोड़े खरीदने की बात सोच रहे थे l इसलिए पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने पूजा -उपासना के साथ नि:स्वार्थ सेवा के कार्यों को करना अनिवार्य बताया है तभी वह पूजा सार्थक है l उनका कहना है --- 'यदि भक्ति में कटौती कर के सेवा में समय लगाना पड़े तो उसे घाटा नहीं समझना चाहिए l '
7 February 2024
WISDOM ------
युग बदलते हैं , इसके साथ मनुष्य की प्रवृत्ति भी बदलती है , सोचने -विचारने का तरीका भी बदलता जाता है l कलियुग को कलियुग क्यों कहते हैं ? यदि हम इस उदाहरण से देखें तो उत्तर मिल जायेगा ------- त्रेतायुग में ---- सीता का अपहरण रावण कर रहा था l सीताजी की करुण पुकार जब जटायु ने सुनी तो वह उनकी रक्षा के लिए निकल पड़ा l कहाँ रावण जैसा शक्तिशाली राजा और कहाँ वृद्ध , शक्तिहीन गिद्ध जटायु ! किन्तु जटायु अपने को रोक नहीं सका और सीताजी की रक्षा के लिए अपने प्राण दे दिए l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --यदि हनुमान नहीं बन सकते तो गिद्ध और गिलहरी बन जाओ l भगवान राम वन चले गए थे इसलिए अपने पिता दशरथ का अंतिम संस्कार अपने हाथ से नहीं कर सके किन्तु जटायु की दाह -क्रिया अपने हाथ से की , जटायु को वह सम्मान और गति मिली जो दशरथ को भी नहीं मिली l वह जटायु आज भी इतिहास में अमर है l द्वापर युग में ---- द्रोपदी का चीर -हरण हो रहा था और सब वृद्ध धर्म और न्याय के ज्ञाता भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य , कृपाचार्य सब सिर झुकाए बैठे रहे l अपनी ही कुलवधू के साथ होने वाले अन्याय के विरुद्ध कोई एक शब्द भी नहीं बोला l हस्तिनापुर के वृद्ध एक गिद्ध की गरिमा को भी नहीं पहुँच सके l अत्याचार , अन्याय तो हर युग में रहा है लेकिन कलियुग में ईर्ष्या , द्वेष , अहंकार , लालच , छल कपट , षड्यंत्र आदि दुष्प्रवृत्तियाँ मनुष्य पर इतनी हावी हो गईं है कि मनुष्य के ह्रदय की करुणा , संवेदना बिलकुल समाप्त हो गई है l अब किसी की रक्षा करना तो बहुत दूर की बात है , वीडियो बनाना , ब्लैकमेल करना , समाज के सामने शरीफ बनकर अपनी काली -करतूतों को छिपाना ---- आदि ऐसे तथ्य हैं जो इस बात को बताते हैं कि इस युग में चरित्र और नैतिकता का स्तर बहुत गिर गया है l समाज को दिशा देने के लिए जिन अनुभवी लोगों की आवश्यकता है , उनकी इच्छाएं , लालसाएं किसी तरह समाप्त ही नहीं होतीं l सच्चाई को अपमानित किया जाता है और अपराधी समाज में सम्मान पाते हैं l एक वाक्य में यदि कहा जाए तो --- धन , बुद्धि , शक्ति का दुरूपयोग होने के कारण ही यह युग कलियुग है l एक ऐसा युग जिसमें सुख -शांति हो , लोगों में तनाव न हों , अस्पताल बीमारों से भरे न हों , छीना -झपटी न हो ------ यह सब तभी संभव होगा जब धन के स्थान पर व्यक्ति की पहचान उसके गुणों से होगी l कामना , वासना , लालच , महत्वाकांक्षा ही व्यक्ति को जीवन में और जीवन के बाद भी भटकाते हैं और युग को कलियुग बनाते हैं l
6 February 2024
WISDOM ------
लघु कथा ----- एक बार एक घुड़सवार एक बस्ती से होकर जा रहा था l मार्ग में एक चोर का घर पड़ा l उसके बरामदे में एक तोता पिंजरे में बंद था , जो उसे देखकर बोला --- " पकड़ो इसे , इसका सारा माल लूट लो l " थोड़ आगे बढ़ने पर उसने देखा एक झोंपड़ी है , वहां भी एक तोता पिंजरे में बंद है l यह तोता उसे देखकर बोला --- " आओ बन्धु !थक गए होंगे , थोड़ा विश्राम कर लो l " घुड़सवार को बड़ा आश्चर्य हुआ और वह वहीँ बैठ गया l कुछ समय बाद उस झोंपड़ी के अन्दर से साधु निकले और उसकी कुशल -क्षेम पूछने लगे l घुड़सवार ने उन्हें सारा वृतांत कह सुनाया और उनसे दोनों तोते के भिन्न व्यवहार का कारण पूछा l साधु ने कहा --- ' यह साधुओं की वाणी सुनता है , इसलिए भला बोल रहा है और वह तोता चोर -डाकुओं की बातें सुनता है , इसलिए वैसा ही बोलता है l सत्य यही है कि अच्छाई और बुराई संगत से ही उपजती हैं l घुड़सवार को समझ में आ गया कि सत्संग से सज्जन बनते हैं और कुसंग से दुर्जन l
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- 'जीवन उमंग , उत्साह एवं उदेश्य से परिभाषित होता है , उम्र से नहीं l जीवन में उत्साह बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य सकारात्मक चिंतन बनाए रखे और निराशा को हावी न होने दे l व्यक्ति जितना कार्य अपने शरीर से करता है , उससे कई गुना कार्य वह अपने मन से करता है l यदि मन की शक्तियां ही कमजोर पड़ गईं हैं , तो फिर जरूरत है उन्हें जगाने की l " ------- एक कथा है ------ एक राजा के पास कई हाथी थे , लेकिन एक हाथी बहुत शक्तिशाली था , बहुत आज्ञाकारी , समझदार एवं युद्ध कौशल में निपुण था l बहुत से युद्धों में वह भेजा गया था और वह राजा को विजय श्री दिलाकर वापस लौटा था l इसलिए वह महाराज का सबसे प्रिय हाथी था l उसकी भी जब वृद्धावस्था आ गई तो वह पहले की तरह कार्य नहीं कर सकता था इसलिए अब राजा उसे युद्ध क्षेत्र में नहीं भेजते थे l एक दिन वह सरोवर में जल पीने गया तो वहां कीचड़ में उसका पैर धंस गया l उस हाथी ने बहुत कोशिश की स्वयं को बाहर निकालने की , लेकिन वह धंसता ही जा रहा था l उसके चिंघाड़ने की आवाज सुनकर बहुत लोग वहां आ गए , अनेक पहलवान और सैनिक उसे निकालने का प्रयत्न करने लगे लेकिन कोई सफलता नहीं मिली l राजा ने हाथी के वृद्ध महावत को बुलाया l महावत ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और राजा से कहा ---' सरोवर के चारों ओर युद्ध के नगाड़े बजाएं जाएँ l सुनने वालों को बड़ा विचित्र लगा कि जब व्यक्तियों के शारीरिक प्रयत्न से फँसा हुआ हाथी बाहर नहीं निकला तो भला नगाड़े की आवाज से कैसे बाहर निकलेगा l लेकिन आश्चर्य ! जैसे ही युद्ध के नगाड़े बजने प्रारम्भ हुए , मृतप्राय हाथी के हाव -भाव में परिवर्तन आने लगा और धीरे -धीरे कोशिश कर के वह स्वयं ही कीचड़ से बाहर आ गया l महावत ने बताया कि वह हाथी युद्ध में अनेकों बार गया है और नगाड़े की आवाज से परिचित है , इस आवाज को सुनकर उसकी चेतना जाग गई , वह उत्साह -उमंग से भर गया कि राजा को युद्ध के लिए उसकी जरुरत है और यह विचार आते ही वह जोश के साथ बाहर आ गया l आचार्य श्री लिखते हैं ---- यदि हमारे मन में एक बार उत्साह -उमंग जाग जाए तो फिर हमें कार्य करने की ऊर्जा स्वत: ही मिलने लगती है और कार्य के प्रति उत्साह का मनुष्य की उम्र से कोई संबंध नहीं है l
5 February 2024
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संत हाशिम की गणना प्रसिद्ध सूफी फकीरों में होती है l वे एक बार बगदाद पहुंचे l जब बगदाद के खलीफा हारून को उनके वहां पहुँचने का समाचार मिला तो वे संत हाशिम से मिलने पहुंचे l खलीफा हारून की ख्याति एक पथ भ्रष्ट और विलासी राजा के रूप में थी l संत हाशिम के पास पहुंचकर खलीफा हारून उन्हें अभिवादन करने के लिए नीचे झुकने लगे तो संत हाशिम ने उन्हें रोकते हुए कहा ---- " आप नीचे न झुकें हुजुर ! आप तो बड़े त्यागी और विरक्त इनसान हैं l झुकना तो मुझे आपके सामने चाहिए l " खलीफा हारून को लगा कि संत हाशिम ने उन पर व्यंग्य मारा है l वो थोडा क्रोधित होते हुए बोले --- " ये आप कैसी बाते करते हैं ? संत होकर दूसरों की खिल्ली उड़ाना आपको शोभा नहीं देता l " संत हाशिम बोले ---- " नहीं ! मैं आपका मजाक नहीं उड़ा रहा l सच तो ये है कि मैंने तो केवल दुनिया के ऐशोआराम का त्याग किया है , आप तो अपनी आत्मा और उन परवरदिगार को भुलाकर बैठे हैं , जो सारी दुनिया के रखवाले हैं l तो उसको त्यागने वाला तो दुनिया की सबसे कीमती चीज को त्यागने वाला है l इसलिए आपका त्याग , मेरे त्याग से कई गुना बड़ा हुआ l बताइए अब कौन किसके आगे झुके ? " संत हाशिम की बातें खलीफा हारून के दिल पर चोट कर गईं और वे सब कुछ छोड़कर संत हाशिम के साथ निकल पड़े l
4 February 2024
WISDOM ----
पेट पालने के लिए धन कमाना बहुत जरुरी है और धन कमाने के कई तरीके हैं l जब राजतन्त्र था , बड़ी -बड़ी कम्पनियां नहीं थीं , तब राजा को खुश करने एवं प्रसन्न करने के लिए विशेष रूप से विशेषज्ञ चाटुकारों की व्यवस्था की जाती थी l उनका काम ही था कि वे राजाओं के विभिन्न कार्यों , गुणों और रूप आदि की प्रशंसा करें l ये चाटुकार अपनी कविता , गीतों आदि विभिन्न तरीकों से राजा की प्रशंसा करते थे और राजा प्रसन्न होकर दरबार में सबके सामने उन्हें तोहफे देते , कभी अपने गले से उतार कर हीरे -मोतियों के हार आदि बहुमूल्य तोहफे देते थे l यही इनकी जीविका का साधन था , वे इस कार्य के विशेषज्ञ होते थे l अब वक्त बदल गया , अब अलग से ' चाटुकार ' रोजगार का साधन नहीं है l अब लोग विभिन्न कार्यों में , रोजगार में संलग्न रहते हुए , अपने चाटुकारिता के गुण के कारण अपने वेतन के साथ अतिरिक्त फायदा भी कमा लेते हैं l अपनी प्रशंसा सबको अच्छी लगती है , दिल को छूती है , प्रशंसा सुनकर मन इतना प्रसन्न हो जाता है कि कई दिन तक उसका नशा दिल पर छाया रहता है l इसलिए चाहे कोई छोटी सी संस्था हो , बड़ा संगठन हो , छोटा -बड़ा नेता हो ----, सबको प्रशंसा अच्छी लगती है इसलिए कुशल व्यक्ति चाटुकारिता के गुण से एक सम्पन्नता का जीवन जी लेते हैं l चाटुकारिता करने वाला तो हर तरह से फायदे में रहता है , यह उसका स्वभाव होता है जैसे अधिकारी बदल गया , तो जो नया अधिकारी आता है , वे सुबह से रात तक उसकी खुशामद में लग जाते हैं l हमारे ऋषियों का कहना है ---यह संसार गणित से चलता है , संसार में स्वार्थ और लालच बहुत है इसलिए प्रशंसा से विचलित नहीं होना चाहिए l यह प्रशंसा खतरनाक तब हो जाती है जब प्रशंसा या चाटुकारिता करने वाला इतना सक्षम है , होशियार है कि वह उस चाटुकारिता प्रिय के व्यक्तित्व पर हावी हो जाता है , उसके जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करता है , अपने स्वार्थ के अनुरूप निर्णय लेने को विवश कर देता है l यह स्थिति केवल संस्थाओं में , राजनीति में , संगठनों में ही नहीं होती , विभिन्न घर -परिवारों में भी इसी ' गुण विशेष ' के कारण कलह , मुकदमे होते है , परिवार में भेदभाव होता है l इन सबके मूल में यही कारण है कि सद्बुद्धि की , विवेक की कमी है l यह सद्बुद्धि कैसे आए ? पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा है --- ' गायत्री मन्त्र में वह शक्ति है जिससे व्यक्ति को सद्बुद्धि का वरदान मिलता है , वह क्या सही है और क्या गलत है , यह समझकर विवेकपूर्ण ढंग से निर्णय लेता है l श्रद्धा और विश्वास जरुरी है l