वर्तमान समय में संसार में जो भी विकट परिस्थितियां हैं उसके लिए हम कलियुग को दोष देते हैं लेकिन श्रीमद् भागवत में शुकदेव जी परीक्षित से कहते हैं ---- कलियुग में अनेक दोष हैं , फिर भी सब दोषों का मूल स्रोत हमारा अन्त:करण ही है l हमारे दोष -दुर्गुण ही कलियुग के रूप में हमें पीड़ा और पतन में झोंक देते हैं l लेकिन जिस समय हमारा मन , बुद्धि और इन्द्रिय सतोगुण में स्थित होकर अपना -अपना काम करने लगती हैं उस समय सतयुग समझना चाहिए l श्रीमद् भागवत में अपने भीतर सतयुग की स्थापना का रहस्य बताया गया है ---- यदि हम चाहते हैं कि हमारे अन्दर और बाहर सतयुग आ जाये तो हमें विवेकी बनना चाहिए l अपनी भावना , विचार और क्रियाओं को विवेक की कसौटी पर कसना चाहिए , जो सही हो उसे अपनाना और जो गलत हो उसे छोड़ देने का साहस करना चाहिए l ' पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " अविवेकी व्यक्ति थोड़े से काम में ढेरों शक्ति व समय लगा देता है किन्तु विवेक संपन्न व्यक्ति थोड़े का भी बड़ा सार्थक उपयोग कर लेते हैं l ढेरों संपत्ति के बीच लोग फूहड़ जिन्दगी जीते हैं और थोड़े साधनों में भी व्यक्ति व्यवस्थित और शानदार ढंग से रह लेता है l यह विवेक का ही अंतर है l जीवन भी एक संपदा है l निरर्थक कार्यों में सारा जीवन लगा देने से कुछ हाथ नहीं आता , किन्तु विवेकपूर्ण थोड़ा सा भी समय श्रेष्ठ कार्यों में लगता रहे तो मनुष्यों का यश चारों दिशाओं में फ़ैल जाता है l" पांडवों ने अपने वनवास के कष्टपूर्ण समय को नियम , संयम और शक्ति अर्जित करने में बिताया l अर्जुन ने तपस्या कर के शिवजी और देवराज इंद्र से दिव्य अस्त्र -शस्त्र प्राप्त किए l जबकि कौरवों ने अपना समय छल , कपट और षडयंत्र करने , पांडवों को हर समय नीचा दिखाने में ही गँवा दिया l
26 February 2024
25 February 2024
WISDOM -----
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दरभंगा में शंकर मिश्र नमक बहुत बड़े विद्वान् थे l जब वे छोटे थे तो किसी कारण से माँ का दूध न मिल पाने के कारण धाय रखनी पड़ी l दाई ने माता के समान प्रेम से बालक को अपना दूध पिलाया l शंकर मिश्र की माता दाई से कहा करती थीं कि बच्चा जो पहली कमाई लायेगा वो तेरी होगी l बालक बड़ा होने पर किशोर अवस्था में ही संस्कृत का विद्वान् हो गया l राजा ने उसकी प्रशंसा सुनकर उसे दरबार में बुलाया और उसकी काव्य रचना पर प्रसन्न होकर उसे अत्यंत मूल्यवान हार उपहार में दिया l शंकर मिश्र हार लेकर अपनी माता के पास पहुंचे l माता ने वह हार अपने वचन का पालन करते हुए तुरंत ही दाई को दे दिया l दाई ने उसका मूल्य जंचवाया तो वह लाखों रूपये का था l इतनी कीमती चीज वह लेकर क्या करती ? लौटाने आई l पर शंकर मिश्र और उनकी माता के लिए दिए गए वचन का पालन करना गौरव की बात थी इसलिए वह हार वापस लेने को तैयार नहीं हुए l बहुत दिन देने , लौटाने का झंझट बना रहा l अंत में दाई ने उस धन से एक बड़ा तालाब बनवा दिया जो आज भी दाई का तालाब के नाम से अब भी मौजूद है l शंकर मिश्र का वचन पालन और दाई का नि:स्वार्थ प्रेम प्रशंसीय है l
24 February 2024
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संत तिरुवल्लुवर के पास एक व्यक्ति पहुंचा , बहुत परेशान था वह l उसने संत से कहा ---- "भगवन ! मुझे मन की शांति दें l भारत का कोई ऐसा मठ , आश्रम , मंदिर नहीं , जहाँ मैं न गया होऊं l ऐसे कोई संत नहीं , जिनके चरणों में मैंने माथा न टेका हो , पर मुझे शांति न मिल सकी l " संत तिरुवल्लुवर ने उत्तर में पास में पड़ा हुआ एक सिक्का उठाया और उसे अपनी मुट्ठी में रख लिया और फिर उस व्यक्ति से कहा ---- " क्या तुम इस सिक्के को बाहर बाग़ से ढूंढ कर ला सकते हो l ' वह व्यक्ति आश्चर्य से बोला --- " भगवन ! जो आपके हाथ के भीतर है , वह मुझे बाहर कैसे मिलेगा ? " संत तिरुवल्लुवर बोले ---- " ! पुत्र ! तुम शांति भी बाहर क्यों ढूंढ रहे हो , अपने मन को स्थिर करो l जब मन स्थिर हो जायेगा तो यही शांति तुम्हारे भीतर मिल जाएगी l " आज संसार की सबसे बड़ी समस्या यही है लोगों के मन में शांति नहीं है l जिसके पास जितना सुख , वैभव , और शक्ति है , वह उतना ही अशांत है l जब व्यक्ति स्वयं अशांत होता है तब वह अपने आसपास के वातावरण को भी अशांत कर देता है l
23 February 2024
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लघु -कथा ----- नदी किनारे चार सहेलियां रहती थीं --- छिपकली , चुहिया , लोमड़ी और बकरी l चारों साथ -साथ रहतीं और आपस में हँसती -हँसाती l एक दिन उनका मन नदी के पार जाने और सैर करने का हुआ l कछुआ भी वहीँ रहता था l चारों ने कछुए से कहा ----" हम सच्ची सहेलियां हैं l तुम हम चारों को पीठ पर बैठाकर नदी पार करा दो तो बड़ी कृपा होगी l कछुए ने पहले तो आनाकानी की फिर उनका सच्ची सहेलियां होने की बात सुनकर वह राजी हो गया l उसने कहा --- " तुम चारों मेरी पीठ पर बैठ जाओ , नदी पार करा दूंगा l " वे चारों बैठ गईं और कछुआ चल पड़ा l कुछ दूर चलने पर उसने कहा --- " वजन तो बहुत हो गया है , तुम में से एक को उतरना होगा l मुझसे ढोया नहीं जा रहा l " चुहिया ने छिपकली को पानी में धकेल दिया l कुछ दूर चलने पर एक और के उतरने की बात कही गई तो लोमड़ी ने चुहिया को पानी में धक्का दे दिया l कुछ दूर और चलने पर एक और के उतरने की बात हुई तो बकरी ने लोमड़ी को बीच धार में धकेल दिया l अकेली बकरी शेष रह गई l कछुए ने कहा --- " तुम चारों सच्ची सहेलियां बनती थीं l तब साथ ही सबको पार होना था l जब सबल द्वारा निर्बल को धकेले जाने का सिलसिला चल रहा है तो तुम्हारी मित्रता झूठी हुई l मैंने तो सच्ची सहेलियों को पार करने का वायदा किया था l " यह कहकर कछुए ने गहरी डुबकी लगाईं और बकरी को भी पानी में डुबो दिया l
22 February 2024
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पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " वासना और तृष्णा की खाई इतनी चौड़ी और गहरी है कि उसे पाटने में कुबेर की संपदा और इंद्र की समर्थता भी कम पड़ती है l " घटना रूस के साइबेरिया क्षेत्र के एक गाँव की है l उस गाँव के लिए यह विख्यात था कि गाँव वाले अपनी जमीन बिना किसी मूल्य के किसी भी आगंतुक को दे दिया करते थे , यदि वह उनके द्वारा रखी गई शर्त को पूर्ण कर दे l शर्त भी बहुत सरल थी , केवल दौड़ना भर था l यह सुनकर एक व्यक्ति उस गाँव के प्रधान से मिला l गाँव का प्रधान उस व्यक्ति को देखकर जोर से हँसा और बोला --- " लो एक और आ गया l " वह व्यक्ति आश्चर्य चकित हुआ और बोला --- " आप हँसे क्यों ? " गाँव का प्रधान बोला ---- " हँसने की बात यह है कि यहाँ तो लगभग हर दिन कोई न कोई शर्त सुनकर आता है , पर आज तक उसको जीतकर कोई वापस नहीं लौटा l किसान ने पूछा --- " शर्त क्या है ? " ग्राम प्रधान बोला --- " सारी जमीन तुम्हे नि:शुल्क उपलब्ध है l इसके लिए मात्र एक शर्त है कि तुम यहाँ खींची रेखा से सूर्योदय से दौड़ना शुरू करोगे और सूर्यास्त होने तक जितनी जमीन नापकर तुम इसी रेखा तक आ जाओगे , उतनी जमीन तुम्हारी हो जाएगी , पर यदि नहीं आ पाए तो तुम्हे आजन्म गुलाम बनकर यहीं रहना पड़ेगा l " उस व्यक्ति को लगा कि यह तो बड़ी आसान शर्त है और उसने तुरंत हाँ भर दी l सूर्योदय पर उसने भागना शुरू किया और दोपहर तक सात -आठ मील जमीन नाप ली तो उसका लालच बढ़ने लगा l उसने साथ लाया भोजन और पानी वहीँ छोड़ा और सोचा कि एक दिन नहीं भी खाया तो क्या , आज ज्यादा से ज्यादा जमीन नाप लेते हैं l भागते -भागते दोपहर के तीन बज गए l ज्यादा जमीन का लालच तो उसे दूसरी ओर खींच रहा था , पर मन मार कर वह वापस लौटा तो खींची रेखा से आधा मील दूर जमीन पर गिर पड़ा l ग्राम प्रधान वहीँ पास खड़ा था और उससे बोला ---- " शर्त आसान है , परन्तु मनुष्य के लालच का अंत नहीं है l इसीलिए आज तक इस शर्त को पूरा करने वाला कोई मिला नहीं और जितने गाँव वाले दिखाई पड़ते हैं , ये सब शर्त हारे हुए गुलाम ही हैं l "
20 February 2024
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ( प्रवचन का अंश--27. 05.77 )---- " हम और आप ऐसे वक्त में रह रहे हैं , जिसमें इनसान का स्वार्थ बेहिसाब रूप से बढ़ता जा रहा है l आदमी समझदार तो बहुत होता जा रहा है , लेकिन आदमी पत्थर का , निष्ठुर बनता जा रहा है ----- इसके अन्दर से दया , करुणा , ममता , स्नेह , दुलार और आदर्शवाद के सारे सिद्धांत खतम होते चले जा रहे हैं l पैसा , काम - वासना , तृष्णा के अलावा और कोई दूसरा लक्ष्य नहीं है l जब आदमी के ह्रदय से मुहब्बत , स्नेह , सहकारिता, ईमानदारी , भलमनसाहत चली जाएगी तब आदमी के बराबर खौफनाक जानवर दुनिया के परदे पर कोई नहीं होगा l शेर मारकाट में तो बहुत ताकतवर होता है , पर बेअक्ल होता है l हाथी भी ताकतवर बहुत होता है , पर वह भी बेअक्ल होता है लेकिन आदमी इतना समझदार है कि इसको किसी के पेट में मुंह खंगाल कर के खून पीने की जरुरत नहीं है l किसी के पेट में बिना दांत गड़ाए ही वह दूसरों का खून पी सकता है और आदमी को मुरदा बना कर के छोड़ सकता है l यह कला मनुष्य को आती है l आदमी बड़ा खौफनाक और खतरनाक है l पहले आदमी को देखकर हिम्मत बंधती थी कि वह हमारी सहायता करेगा , हम एक से दो हो गए l लेकिन अब हमको भय मालूम पड़ता है कि कहीं ऐसा न हो कि हमारे साथ -साथ जो व्यक्ति चलता है , वही हमारे लिए पिशाच न सिद्ध हो l यह तरक्की मुझे बड़ी खौफनाक मालूम पड़ती है l यदि तरक्की इसी हिसाब से होती चली गई तो आदमी को देखकर आदमी डरेगा और कहेगा कि देखो , आदमी जा रहा है , होशियार रहना l " ------- विकास की अंधी दौड़ में भावनाएं समाप्त हो गई है , संवेदनहीनता के कारण ही युद्ध , अपराध , अन्याय, अत्याचार होता है l यह एक पक्षीय विकास सम्पूर्ण मानवजाति के लिए खतरा है l