13 September 2024
WISDOM -----
11 September 2024
WISDOM -----
संसार में आज इतना पाप , अनर्थ , अनीति , अत्याचार बढ़ रहा है , इसका मुख्य कारण यही है कि मनुष्यों ने कर्म फल और पुनर्जन्म पर विश्वास करना छोड़ दिया है l विद्वानों के इस सन्देश को कि ' वर्तमान में जिओ ' लोगों ने गलत ढंग से ले लिया l अब लोग इस तरह सोचने लग गए हैं कि नैतिक - अनैतिक , सही -गलत किसी भी तरीके से जितना सुख , ऐशो -आराम भोग लो , चाहे जितना छल -कपट , षड्यंत्र कर लोगों को उत्पीड़ित कर लो , अगला जन्म किसने देखा ? जो होगा सो देखा जायेगा l ---इस तरह की सोच होने के करण ही समाज में पाप अपराध बढ़ रहे हैं l थोड़ी सी भी शक्ति आ जाए तो व्यक्ति अपने को सर्वसमर्थ , भगवान समझने लगता है , उसे लगता है कि वही सबका भाग्य -विधाता है l कर्मफल विधान को समझाने वाले अनेक प्रसंग , कथाएं हैं लेकिन अपने ही मानसिक विकारों में फँसा हुआ व्यक्ति समझता नहीं है l -------- आचार्य महीधर अपने शिष्यों के साथ तीर्थयात्रा पर थे l रात्रि में जंगल में रुक गए l रात्रि में ही उन्हें समीप के अंधे कुएं से करुण क्रंदन सुनाई पड़ा l वे वहां पहुंचे तो देखा पांच व्यक्ति औधेमुँह पड़े बिलख रहे हैं l आचार्य ने उनसे पूछा --- 'आप कौन हैं , इस कुएं में क्यों गिरे हैं ? ' उनमें से एक ने कहा --- " हम पांच प्रेत हैं , कर्मफल भोग रहे हैं l ' आचार्य ने उनसे उनकी ऐसी दुर्गति का कारण पूछा , तब उनमें से एक ने कहा ---- " वह पूर्वजन्म में ब्राह्मण था l दक्षिणा बटोर कर विलासिता में खर्च करता था l उपासना कभी नहीं की l " दूसरे ने कहा ---- " वह क्षत्रिय था , पर दुःखियों को पीड़ा देता , मांस - नशा , आदि विभिन्न कुकृत्य में निरत रहा l " तीसरा बोला --- " मैं वैश्य था l हमेशा अपने ही लाभ की सोचता , बिक्री में हेराफेरी करता , कभी दान नहीं किया l " चौथे ने कहा --- " मैं शूद्र था , अहंकारी , आलसी , दुर्व्यसनी l कभी जिम्मेदारी का पालन नहीं किया l " पांचवां प्रेत किसी को अपना मुँह नहीं दिखाता था , निरंतर रोता जा रहा था l बहुत पूछने पर वह बोला --- " मैं पूर्वजन्म में साहित्यकार था , पर अपनी कलम से मैंने अश्लीलता और फूहड़पन फ़ैलाने वाला साहित्य लिखा l मैंने वासना भड़काई और सारे समाज को भ्रष्ट किया l इसलिए मुझे ब्रह्म राक्षस बनकर इस स्थिति में भटकना पड़ रहा है l " उन पाँचों प्रेतों ने आचार्य से प्रार्थना की कि वे समाज में उनकी ( प्रेतों ) की दुर्गति का कारण सभी को बता दें , ताकि वे लोग ऐसी भूल न करें l
10 September 2024
WISDOM -----
इंद्र का वैभव नष्ट हो रहा था l वे बड़े चिंतित हुए और राजर्षि प्रह्लाद के पास जाकर उसका कारण पूछा l प्रह्लाद ने बताया --- राजन तुमने अहिल्या जैसी सती -साध्वी का शील नष्ट किया है l जब तक उसका प्रायश्चित कर पुन: शील संग्रह नहीं करोगे , अपने वैभव को भी बचा नहीं सकोगे l लोभी इंद्र ने अपने को प्रह्लाद का अतिथि बताकर , उन्ही का शील मांग लिया l प्रह्लाद ने अपना शील उन्हें दान कर दिया l ऐसा करते ही उनके शरीर से तीन ज्योति पुरुष निकले और बोले --- हम सत्य , धर्म और वैभव हैं , जहाँ चरित्र ( शील ) नहीं रहता , वहां हम भी नहीं रहते l प्रह्लाद ने कहा --- मैंने इंद्र को नेक सलाह देकर सत्य का तथा अतिथि को याचित वास्तु दान कर धर्म का ही पालन किया है l अत: आपका जाना उचित नहीं है l फिर मैंने शील दान ही तो किया है l जिस जीवन देवता की आराधना से मैंने शील अर्जित किया था , उसे मैं पुन: संग्रह कर लूँगा l प्रह्लाद की यह बात सुनकर जाते हुए सत्य , धर्म और वैभव के चरण रुक गए और प्रह्लाद को अपने खोये हुए चारों देव वापस मिल गए l महामानव हर स्थिति में इस बहुमूल्य जीवन संपदा को नष्ट नहीं करते इस कारण उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में दैवी अनुदान भी मिलते हैं l
8 September 2024
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अरब देश में एक प्रसिद्ध सुल्तान रहा करते थे l वे बड़े न्याय प्रिय एवं प्रजावत्सल थे l एक बार सुल्तान जंगल की सैर को निकले l उन्हें शिकार अत्यंत प्रिय था l एक बार संध्या के समय वे सूर्यास्त का द्रश्य देख रहे थे , तभी उन्हें लगा कि टीले पर कोई जानवर बैठा है तो उन्होंने तुरंत निशाना साध कर उस पर तीर छोड़ा l तीर लगते ही एक जोर की चीख सुनाई पड़ी l चीख सुनकर सुल्तान काँप उठे क्योंकि यह एक मनुष्य की चीख थी l उन्होंने पास जाकर देखा कि एक बालक तीर से घायल होकर पीड़ा से छटपटा रहा था l कुछ ही समय में उसका मजदूर पिता भी वहां आ गया l अपने पुत्र की यह हालत देखकर , वह बहुत बेहाल हो गया l सुल्तान ने बालक का शीघ्र उपचार कराया और उसके बाद दो थाल बालक के पिता के लिए मंगवाए l एक में अशर्फियाँ और दूसरे में तलवार रखी थी l सुल्तान मजदूर से बोले ---- " मैंने जानवर समझ कर तीर छोड़ा था , परन्तु गलती से तुम्हारे पुत्र को लगा l किन्तु तब भी तीर चलाने के कारण दोष तो मेरा ही है l तुम चाहो तो अशर्फियाँ लेकर इस भूल को माफ़ कर दो अन्यथा यदि मुझे माफ़ी का हक़दार न पाओ तो मेरा सिर तलवार से कलम कर दो l " सुल्तान की न्यायप्रियता देखकर मजदूर दांग रह गया l उसने कहा ---- " हुजुर ! मुझे दोनों में से कुछ नहीं चाहिए l केवल आप यह भूल दोबारा न करें l आप निरीह प्राणियों का वध करना छोड़ दें l " बादशाह ने उस दिन के बाद से शिकार करना छोड़ दिया l
6 September 2024
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4 September 2024
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इस संसार में असुरता स्रष्टि के आरम्भ से ही रही है l ईश्वर ने इतने अवतार लिए असुरों के नाश के लिए लेकिन असुर समाप्त नहीं हुए l असुरता के संस्कार ऐसे हैं कि वे पीढ़ी -दर -पीढ़ी बढ़ते ही जा रहे हैं l अंतर केवल इतना है कि पहले संसार में असुर स्पष्ट दिखाई देते थे जैसे रावण और उसके एक लाख पूत , सवा लाख नाती और विभिन्न सहयोगी , उन सबकी असुर के रूप में स्पष्ट पहचान थी l वे ऋषियों को मारते , सताते थे , सत्कार्यों में बाधा डालते थे l द्वापर युग में भी दुर्योधन आदि कौरवों का अधर्मी और षड्यंत्रकारी होना सबके सामने स्पष्ट था l ------ लेकिन कलियुग में स्थिति इतनी खतरनाक इसलिए हो गई है क्योंकि अब असुरता लोगों के भीतर , उनके ह्रदय में , उनके अस्तित्व में समां गई है l अब हम उन्हें देखकर , उनके साथ कार्य कर के , एक थाली में खाना खाकर भी हम पहचान नहीं सकते कि वे कितने बड़े असुर हैं l चेहरे पर इतने नकाब हैं कि उनके भीतर के दानव को समझ पाना असंभव है l ईश्वर की कृपा से जिसका विवेक जाग्रत हो जाए वही उन्हें पहचान सकता है l देवता और असुरों में केवल सोच का फरक है l देवता अपनी शक्तियों का सदुपयोग करते हैं , संसार के कल्याण के लिए कार्य करते हैं और असुर अपनी उन्ही शक्तियों का प्रयोग दूसरों को सताने , उत्पीड़ित करने और प्रकृति को नष्ट करने , मानवता को मिटाने के लिए करते हैं l सच तो यह है कि ये असुर दया के पात्र हैं , सबको मिटाने के चक्कर में वे स्वयं मिट जाएंगे l बड़ी मुश्किल से मिला ये मानव शरीर , युगों -युगों तक प्रेत और पिशाच योनि में फिरेगा l असुर बड़े अहंकारी होते हैं , कभी सुधरते नहीं , लोगों को सताना , छल , कपट षड्यंत्र करना नहीं छोड़ते नहीं इसलिए जो भी देवत्व के मार्ग पर हैं और आसुरी तत्वों से पीड़ित हैं वे स्वयं बदले की भावना न रखें , न्याय के लिए ईश्वर हैं l ईश्वर से उनकी सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करें , असुरों की सोच बदल जाये तो धरती पर शांति और सुकून हो l ------ एक संत नाव से नदी पर कर रहे थे l नाव में बैठे शरारती तत्व उन्हें परेशान करने लगे l जब वे रात्रिकालीन प्रार्थना में बैठे , ध्यान करने लगे तो शरारती तत्वों ने उनके सिर पर जूते मारना शुरू कर दिया l तभी आकाशवाणी हुई --- " मेरे प्यारे ! तू कहे तो मैं नाव उलट दूँ l " संत यह सुनकर हैरान हुए और कहा ---- " हे प्रभु ! प्रार्थना के समय यह शैतान की वाणी क्यों सुनाई पड़ने लगी l यदि कुछ उलटने की आवश्यकता है तो इनकी बुद्धि उलट दे l " बुद्धि सन्मार्ग पर आ जाए तो वे ऐसी हरकत करेंगे ही नहीं l परमात्मा ने कहा --- " मैं बहुत खुश हूँ कि तुमने शैतान को पहचान लिया l मैं तो सर्वदा प्रेम में विश्वास करता हूँ , बैर और विध्वंस से मेरा कोई संबंध नहीं है l "
2 September 2024
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महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम की बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए समय -समय पर उनसे बेतुके सवाल किया करते थे l एक दिन उन्होंने तेनालीराम से पूछा ---- " ये बताओ हमारे राज्य में कबूतरों की संख्या कुल कितनी है ? सही संख्या जानने के लिए हम तुम्हे एक सप्ताह का समय देते हैं , यदि तुम गणना नहीं कर पाए तो तुम्हारा सिर कलम कर दिया जायेगा l " तेनालीराम से कुढ़ने वाले दरबारियों ने सोचा कि इस बार तेनालीराम का बच पाना मुश्किल है l एक सप्ताह बाद तेनालीराम फिर दरबार में हाजिर हुए l महाराज के पूछने पर वे बोले ----- " महाराज हमारे राज्य में कुल तीन लाख बाईस हजार चार सौ बीस कबूतर हैं l आप संतुष्ट न हों तो किसी से इनकी गिनती करा लें l यदि गिनती ज्यादा हुई तो ये वो कबूतर हैं जो हमारे राज्य में मेहमान बनकर आए हैं और कम हुई तो उन कबूतरों के कारण जो दूसरे राज्य में मेहमान बन कर गए हैं l "