3 March 2025

WISDOM -----

 कर्मफल  के  सिद्धांत  को  माने  या  न  माने  ,  यह  व्यक्ति  की  अपनी  इच्छा  है  l  लेकिन  यह  निश्चित  है  कि  मनुष्य  का  जीवन  प्रकृति  के  अनुसार  ही  चलता  है  l  जैसे  हर  रात  के  बाद  दिन  होता  है ,  फिर  दिन  के  बाद  रात  l  यह  क्रम  निरंतर  चलता  ही  रहता  है  l  इसी  तरह  मनुष्य  के  जीवन  में  कभी  दुःख  और  कष्ट  की  अँधेरी  रात  होती  है   और  कभी  सुख  का  सुनहरा  सूर्योदय  होता  है  l  कभी  पतझड़  तो  कभी  वसंत  l  प्रकृति  के  इस  नियम  को  स्वीकार  करने  पर  ही   व्यक्ति  तनाव रहित  जीवन  जी  सकता  है  l  शांति  का  जीवन  जीने  के  लिए  उस  अद्रश्य  शक्ति  पर  गहरी  आस्था  होनी  चाहिए  l  आज  की  सबसे  बड़ी  समस्या  यही  है  कि  मनुष्य  स्वयं  को  भगवान  समझने  लगा  है  ,  फिर  आस्था  और  विश्वास  किस  पर  करें ?  

2 March 2025

WISDOM ------

    भौतिकता  की  अंधी  दौड़  के  साथ  मनुष्य  की  मानसिकता  बहुत  बदल  गई  l  कलियुग  का  भी  असर  है  कि   अधिकांश  व्यक्ति  अच्छाई  में  भी  बुराई  ढूंढ  लेते  हैं  l  किसी  के  साथ  अच्छा  व्यवहार  करो  तो  लोग   उसे   उसकी  कमजोरी  और  दिखावा  समझते  हैं  कि  जरुर  कोई  स्वार्थ  होगा  इसीलिए सद् व्यवहार  है  l  लेकिन  मनुष्य  के  अतिरक्त  सभी  प्राणी --पशु -पक्षी  आदि  इस  भौतिकता  की  दौड़  में  नहीं  हैं   इसलिए  वे  नि:स्वार्थ  प्रेम  को  समझते  हैं  l  इनसान  से  अधिक  विश्वसनीय   अब  पशु -पक्षी  हैं   l  एक  कथा  है  ----- एक  राजा  ने  एक  दिन  स्वप्न  देखा   कि  कोई  साधु  उससे  कह  रहा  है  कि   बेटा  !  कल  रात  को   तुझे  एक विषैला  सर्प  काटेगा   और  उसके  काटने  से  तेरी  मृत्यु  हो  जाएगी  l  वह  सर्प  अमुक  पेड़  की  जड़  में  रहता  है  ,  पूर्व  जन्म  की  शत्रुता  का  बदला  लेने  के  लिए   वह  तुझे  काटेगा  l  राजा  धर्मात्मा  था   , उसे  स्वप्न  की  सत्यता  पर  विश्वास  था  l  राजा  ने  सोचा  कि   मधुर  व्यवहार  से  सर्प  के  मन   में  जो  शत्रुता  है  ,  उसे  दूर  किया  जा  सकता  है  l  यह  निर्णय  कर  राजा  ने  उस  पेड़  की  जड़  से  लेकर  अपनी  शैया  तक  फूलों  का  बिछौना  बिछवा  दिया  ,  सुगन्धित  जल  का   छिड़काव   कराया  ,  मीठे  दूध  के  कटोरे  जगह -जगह  रखवा  दिए   और  सेवकों  से  कह  दिया  कि  रात  को  जब  सर्प  निकले   तो  कोई  भी  उसे   किसी  प्रकार  का कष्ट   पहुँचाने  का  प्रयत्न  न  करे    रात  के  ठीक  बारह  बजे  सर्प  अपनी  बाबी  में  से  फुफकारता  हुआ  निकला   और  राजा  के  महल  की तरफ  चल  दिया  l  रास्ते  में  मीठा  दूध , सुगन्धित  जल , फूलों  का  बिछौना  -- इन  सबके  आनंद  से  उसके  मन  का  क्रोध  शांत  होने  लगा  l  द्वार  पर  खड़े  सशस्त्र  प्रहरी  ने  भी  उसे  कोई  कष्ट  नहीं  दिया  l  वह  सोचने  लगा  कि  जो  राजा  इतना  धर्मात्मा  है  , शत्रु  के  साथ  इतना  मधुर  व्यवहार  करता  है  उसे  काटूं  कैसे  ?   राजा  के  पलंग  तक  पहुँचने  तक  उसका  निश्चय  बदल  गया  था  l  वहां  पहुंचकर  उसने  राजा  से  कहा --- " हे  राजन  !  मैं  तुम्हे  काटकर  अपने  पूर्व  जन्म  का  बदला  चुकाने  आया  था   परन्तु  तुम्हारे  सद व्यवहार  ने   मुझे  परास्त  कर  दिया  l  अब  मैं  तुम्हारा  शत्रु  नहीं  मित्र  हूँ  l  उसने  मित्रता  के  उपहार स्वरुप  अपनी  बहुमूल्य  मणि  राजा  को  दी  और  वापस  अपने  घर  चला  गया  l  

1 March 2025

WISDOM -----

  संसार  में   जब -तब  युद्ध , दंगे -फसाद    होते  रहते  हैं  l    यह  मानव  निर्मित  आपदा  है  l  इसके  अनेक  कारण  है  l  प्राचीन  समय  में   राजा  अपनी  शक्ति , योग्यता  , प्रशासनिक  कुशलता  के  बल  पर  चक्रवर्ती  सम्राट  बनते  थे   और  उनके  शासनकाल  में  प्रजा  बहुत  सुखपूर्वक  रहती  थी  l  चारों  ओर  शांति  रहती  थी l  कला , साहित्य , उद्योग   ,  व्यापार  सभी  क्षेत्र  तरक्की  करते  थे , कहीं  कोई  अराजकता , अशांति  नहीं  होती  थी  l  ऐसा  युग  'स्वर्ण युग  ' कहलाता  था  l  चक्रवर्ती  सम्राट   बनने   की  प्रतिस्पर्धा  तो  अब  भी  है   l  लेकिन  अब  इसके  मायने  बदल  गए  l  अब  प्रशासनिक  कुशलता  का  स्थान  धन -संपदा  ने  ले  लिया  l  जो  जितना  अमीर  है  , उसकी  उतनी  ही  हुकूमत  है  l  अति  की  धन -संपदा  व्यापारी  वर्ग  ही  अर्जित  कर  सकते  हैं  l  व्यापारी  का  उदेश्य   अधिकाधिक  लाभ  कमाना  होता  है ,  उनमें  संवेदना  नहीं  होती  l  वे  केवल  अपना  हित  देखते  हैं  ,  लोगों  के  सुख -दुःख  से  उन्हें  कोई  मतलब  नहीं  होता  l   मात्र  सोच  बदल  जाने  से  संसार  में  युद्ध  उत्पात  होते  हैं  l  जब  सत्ता  की  चाबी  व्यापारियों  के  हाथ  में  आ   जाती   है  तो ' जन हित ' के  स्थान  पर ' स्वहित ' हो  जाता  है  l   सारी  नीतियाँ  ऐसी  ही  बनती  हैं  जिससे  वे  और अमीर ---और  अमीर  होते  जाएँ  l   हथियार  का  व्यापारी  चाहेगा  की  युद्ध  होते  रहें   ताकि  उसके  हथियार  बिक  जाएँ , दवा , इंजेक्शन  बनाने  वाला  चाहेगा  कि  लोग  खूब  बीमार  पड़ें  जिससे  वो  और  अमीर  हो  जाये  l  रासायनिक  खाद , बीज  , कीटनाशक  का  निर्माता  चाहेगा  कि  कृषि  में  इनका  अधिकाधिक  प्रयोग  हो  चाहें  इनकी  वजह  से  कितनी  ही   घातक    बीमारियाँ  क्यों  न  हो  जाएँ  l  जब  सारा  संसार  धन  के  पीछे  भागेगा  तो  किसी  भी  राष्ट्र  की  नींव  --शिक्षा , चिकित्सा , बाल -कल्याण  --- ये  क्षेत्र  भी  बेईमानी  और  भ्रष्टाचार  में  कोई  कमी  नहीं  रहने  देंगे  l  धन -संपदा  की  एक  खास  बात  है   कि  यदि  धन   सीमित  मात्रा  में  है  और  उसका  सदुपयोग  होता  है   तब  वह  परिवार  हो  या  कोई  देश  हो  वह  फलता  -फूलता  है  लेकिन  यदि  वही  धन  असीमित   मात्रा    में  है   और  उसका  दुरूपयोग  होता  है  तब  ऐसा  धन   व्यक्ति  हो , परिवार  हो  या  कोई  राष्ट्र  हो  उसे  भीतर  से  खोखला  कर  देता  है  l  बाहरी   तौर    से  तो  बहुत  दिखावा ,  बहुत  शान-शौकत  होगी   लेकिन  भीतर  से  खोखला  l  इसलिए  धन  का  सदुपयोग  करने  की  कला   आनी    चाहिए  l  यदि  आज  के  जो  इतने  अमीर  हैं  यदि  इन्हें   धन   के  सदुपयोग  करने  की  कला  आ  जाये   तो  इनके   जीवन  में  ही  संसार  इन्हें  देवता  की  तरह  पूजे  l  लेकिन  देवता  बनना  इतना  आसान  नहीं  है  l  अब  तो  देवता  बनने  के  मार्ग  पर  अग्रसर   साधु -संत  भी  धन  की  चपेट  में  आकर   अपने  मार्ग  से  भटक  गए  l  ईश्वर  सबको  सद्बुद्धि  दे  l  

28 February 2025

WISDOM -----

  लघु कथा ----- ' मन  का  अभ्यास '---- भिखारी  ने  हाथ  आगे   बढ़ाया  लेकिन  अश्वपति  की  जेब  में  कुछ  न  निकला  l  वे  दुःखी  होकर  घर  गए   और  एक  बरतन  उठाकर  ले  आए  और  उसे  भिखारी  को   दे  दिया  l   थोड़ी  देर  में  अश्वपति  की  पत्नी  आई   और  वह  बरतन  न  पाकर  चिल्लाई  ---अरे , अरे  चांदी  का  बरतन  भिखारी  को  दे  दिया  l  दौड़कर  उसे  वापस  ले  आओ  l   अश्वपति  ने  आगे  बढ़कर  भिखारी  को  रोककर  कहा  --- " भाई  !  मेरी  पत्नी  ने  बताया  कि  यह  गिलास  चांदी  का  है  ,  इसे  सस्ता  मत   बेच  देना  l "   एक  पड़ोसी  ने  पूछा  ---- "  अश्वपति  !  जब  तुम्हे   पता  हो  गया  था  कि   गिलास  चांदी  का  है  ,  तो  भी  उसे  क्यों  ले  जाने  दिया  ? " अश्वपति  ने  हँसकर  कहा ---- " मन  को  इस  बात  का   अभ्यस्त  बनाने  के  लिए   कि  यह  बड़ी  से  बड़ी   हानि  में  भी   दुःखी   और  निराश  न  हो  l "   

27 February 2025

WISDOM -----

    जाति  प्रथा  केवल  हमारे  देश  में  ही  नहीं  है  ,  संसार  के  विभिन्न  देशों  में , विभिन्न  धर्मों  में   भेदभाव  अवश्य  है   l  इसे  कुछ  भी  नाम  दे  दिया  जाये  ,  इससे  कोई  फर्क  नहीं  पड़ता  क्योंकि  इनमें  एक  वर्ग  पीड़ित  है  और  दूसरा  उसे   भिन्न -भिन्न  तरीकों  से  सताने  वाला   l  जाति  के  नाम  पर  लोग  इतना  लाभ  कमाते  हैं  कि  धर्म  भी  उसके  आगे  फीका  पड़  जाता  है  l  एक  लोक  कथा  है  ---- एक  सेठ  था  l  अपार  संपदा  थी  उसके  पास  l  जितनी  संपदा  थी  , उससे  कई  गुना  उसे  लालच  था  l  बहुमूल्य  संपदा  को  वह  मटकों  में  भरकर  जमीन  में  गाड़  कर  रखता  था  l   इतनी  संपत्ति  एकत्रित  करने  के  लिए  वह  स्वांग  रचता  था  l  उसकी  हुकूमत  आसपास  के  आठ -दस  गांवों  तक  थी  l  उसने  गुप्त  रूप  से  अपनी  एक  सेना  बना  रखी  थी  जिसमें  कुछ  युवक , कुछ  वृद्ध   पुरुष   और   कुछ  वृद्ध  महिलाएं  भी  थी  l  ये  लोग  क्या  करते  हैं ,  उस  सेठ  की  ऐसी  कोई  सेना  है  ,  इस  बात  को  कोई  नहीं  जानता  था  l  वह  सेठ  इन  गाँवों  में    अक्सर  कोई  न  कोई  उत्सव  , प्रवचन ,  गाँव  के  लोगों  की  कलाकारी  से  संबंधित  तमाशा  कराता  रहता  था  l  जब  ये  कार्यक्रम   निश्चित  होते  तब  सेठ  के  ये  सैनिक  जो  गाँव  के  ही  विभिन्न  परिवारों  के  थे  ,  उनके  और  अधिक  हमदर्द  बनकर   लोगों  के  पास  जाते   और  कभी  प्यार  से  कभी  धमकी  देकर  लोगों  को  समझाते  कि  सेठ  जो  भी  करा  रहा  है  , उसमे  तुम्हे  जाना  है ,  गाँव  के  कल्याण  के  लिए  निश्चित  राशि  जमा  करनी  है   अन्यथा  तुम्हे  जाति  से  बहिष्कृत  कर  दिया  जायेगा , तुम्हारा  हुक्का -पानी  बंद  कर  दिया  जायेगा  l  गाँव  के  सीधे -सरल  लोग  , मरता  क्या  न  करता   अपना  पेट  तन  काटकर   इस  'आदेश ' को  मानते  l  उन्हें  भय  था  कि  जाति  से  बहिष्कृत  हो  गए  तो  अकेले  कैसे  रहेंगे , बच्चों  का  विवाह  कैसे  होगा  ?   गरीबी  और  भुखमरी  के  कारण   वहां  महामारी  फ़ैल  गई  ,   वे  गाँव  वीरान  हो  गए  ,  जो  बच  गए  वे  रातों -रात  गाँव  छोड़कर  चले  गए  l  अब  उस  वीराने  में  सेठ  अकेला  , अपनी  संपदा  के  ढेर  पर  बैठा  था  ,  और  छाती  पीट -पीट  कर  रो  रहा  था  कि   उसके  वैभव  पर  उसके  क़दमों  में  सिर  झुकाने  वाला  अब  कोई  नहीं  है  l  वह  चीख -चीख  कर  अपनी  करतूत  बता  रहा  था  लेकिन  सुनने  वाला  कोई  नहीं  था  l  उसका  परिवार  भी  महामारी  की  चपेट  में  आ   चुका  था  l  उस  गाँव  से  जब  बहुत  दिनों  तक  कोई  आवाजाही  नहीं  हुई  तो   तो  लोगों  ने  वहां  जाकर  पता  लगाना   चाहा  की  क्या  बात  हो  गई  ?  जब  लोग  वहां  पहुंचे  तो  देखा  पूरा  गाँव  वीरान  था   और  सेठ  अपने  कमरे  में   अपनी  छाती  पर   बहुमूल्य  संपदा  को  दोनों  हाथों  से  दबाए  मृत  पड़ा  था  l  

26 February 2025

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 समय  परिवर्तनशील  है  l  विज्ञान    की   नवीन    खोजों  के  साथ  लोगों  की  रूचि , तौर    -तरीके  भी  बदलते  जाते  हैं   जैसे  कुछ  वर्षों  पहले  तक  लोग  पिक्चर हाल  में  फिल्म  देखने  जाया  करते  थे   l  उसके  बाद  घर  में  ही  टीवी  पर  देखना  शुरू  हुआ  तो  अनेक  पिक्चर हाल  बंद  हो  गए  ,  अब  सब  कुछ  मोबाइल  पर  ही  उपलब्ध  है  l  विज्ञानं  ने  इतनी  सुविधा  दी  है  कि  हम  अपनी  कुर्सी  पर  बैठे -बैठे   सारे  संसार  से  जुड़  सकते  हैं  l  यदि    कोई  क्षेत्र  इन  परिवर्तनों  से   बहुत  कम  प्रभावित  हुआ  है   तो  वह  है  --कथा ,   साधु -संतों  के  प्रवचन  ,  धर्म  पर  आधारित  मेले  आदि l   सभी  कथावाचकों  , संतों  के  वचन , कथाएं  मोबाइल  पर  ही  उपलब्ध  हैं  ,  कई  संतों  का  छुपा  हुआ  रूप  भी  समाज  के  सामने  है  ,  फिर  भी  लाखों  की  भीड़  इकट्ठी  हो   जाती  है  l  कई  ऐसे धार्मिक   उत्सव  हैं   जहाँ  भीड़  की  वजह  से  लोगों  का  बुरा  हाल  हो  जाता  है   लेकिन  फिर  भी  भीड़  उमड़ी  पड़ती  है   इसका  एक  कारण  है  --भेड़  चाल   और  दूसरा  सबसे  बड़ा  कारण  है  कि  लोग  धर्म  भीरु  होते  हैं   और  चालाक  और  शातिर  व्यक्ति  उनकी  इस  भीरुता  का  फायदा  उठाने  में  माहिर  होते  हैं  l    कहते  हैं  कलियुग  में  दैवी  शक्तियां  बहुत  ही  सीमित  क्षेत्र  में  होती  हैं   लेकिन  आसुरी  शक्तियां   रावण  के  साम्राज्य  की  तरह  बहुत  विशाल  होती  है  l  आसुरी  शक्तियों  के प्रमुख  अस्त्र  हैं   सम्मोहन , वशीकरण  ,  बहकाना  ,  मन  को  डांवाडोल  कर  देना   l   विभिन्न  तरीकों  से  मन  को  इतना  कमजोर  कर  देना  कि  व्यक्ति  थक -हार  जाये  ,  उस  भेड़  चाल  का  हिस्सा  बन  जाए  l  रावण  ने   सूर्पनखा  को  इसी  लिए  भेजा  था  कि  वह  अपनी  माया  से  राम , लक्ष्मण  को  अपने  वश  में  कर  ले   लेकिन  वह  भगवान  थे , उन  पर  माया  नहीं  चली  l  सामान्य  व्यक्ति  के  लिए   मायावी  विद्या  से  बचना  बहुत  मुश्किल  है  l   तंत्र  आदि  मायावी  शक्तियां   प्राचीन  काल  से   इस   पृथ्वी  पर  है  ,  विभिन्न  देशों  में   यह  सब  भिन्न  नामों  से  है  l   अब  इस  तंत्र  के  साथ  विज्ञान  मिल  गया   तो  यह  भयावह  हो  गया   l  मनुष्य    अपनी  आसीमित  कामनाओं  के  कारण  अपनी  बुद्धि  का  दुरूपयोग  करता  है  l  

24 February 2025

WISDOM -----

 कलियुग  में  तीर्थयात्रा  भी   मनोरंजन  का   साधन  हैं   l  ऐसी  यात्रा  के  पीछे  जो  पवित्र  भाव  था  , वह  अब  नहीं  है   l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  लिखते  हैं  ----" तीर्थयात्रा  के  पीछे  तन  को  नहीं  , मन  को  निर्मल   करने  का   विधान  होने  के  कारण  ही   उसे  पूज्य  माना  गया  है  l  यदि  यह  पुण्य  विधान  न  रहे  तो  यह  निष्प्राण  ही  रहती  है  l  मनुष्य  का  स्वभाव  और  संस्कार  इतना  जटिल  होता  है  कि  तीर्थों  पर  तन  के  स्नान  से   उसमें  कोई  भी  परिवर्तन  नहीं  होता  l  अपने  विकारों  को  दूर  करने  के  लिए  मन  के  स्नान  की  जरुरत  है  l  "     मनुष्य  शरीर  होने  के  नाते  गलतियाँ  होना  स्वाभाविक  हैं  l  लोग  सोचते  हैं  तीर्थ स्नान   कर  सस्ते  में  पाप  धुल  जाएँ  ,  लेकिन  ऐसा  संभव  नहीं  है  l  आचार्य श्री  लिखते  हैं  ----- "  यदि  अपने  किए  पापों  का  भार  मन  पर  है  तो  यह   अपने  से  बाहर  भागने  से  नहीं  उतरता  l  सोने  को  निर्मल  होने  के  लिए  स्वयं  ही  आग  में  तपना  पड़ता  है  l  जो  पाप  किए  हैं  , उनका  प्रायश्चित  करो , पश्चाताप  करो  l  पश्चाताप  की  अग्नि  में  जलकर  ही  चेतना  निर्मल  होगी  l  एक  कथा  है  -----महाभारत  के  युद्ध  में  अपने  ही   भाई  -बंधुओं  की  हत्या  करने  के  कारण  उनके  मन  में  ग्लानि  थी , मन  में  शांति  नहीं  थी  l  तब   विदुर जी  ने  उन्हें  तीर्थयात्रा  करने  की  सलाह  दी  l  माता  कुंती  और  द्रोपदी  के  साथ  वे  तीर्थयात्रा  को  निकल  पड़े  l  मार्ग  में  प्रथम  पड़ाव  पर  वे  व्यासजी  के  आश्रम   में  रुके  l  वहां  से  चलते  समय  व्यासजी  ने  उन्हें  एक  तुम्बा  दिया   और  युधिष्ठिर  से  कहा  जब  तुम  तीर्थ स्नान  करो  तो  इस  तुम्बे  को  भी  दो -चार   डुबकी  लगवा  देना  , यह  भी  निर्विकार  हो  जायेगा  l  युधिष्ठिर  ने  ऐसा  ही  किया  सब  तीर्थों  में  अपने  साथ  तुम्बे  को  भी    स्नान  कराया  l   तीर्थयात्रा  से  लौटते  समय  वे  सब   अंतिम  पड़ाव  पर  व्यास जी  आश्रम  में  पहुंचे  और   उन्हें  वह  तुम्बा  देते  हुए  कहा   कि  हमने  इसे  हर  पवित्र  नदी  में  स्नान  कराया  है  l  व्यास जी  ने  भीम  से  कहा  ---इस  तुम्बे  को  तोड़कर  लाओ  , प्रसाद  के  रूप  में  इसे   खाकर  हम  पुण्य  लाभ  प्राप्त  करेंगे  l  उनकी  आज्ञा    से  भीम  ने  उसे  तोड़ा   और  सबके  सामने  एक -एक  टुकड़ा  रख  दिया  , शेष  व्यासजी  के  सामने  रख  दिया  l  व्यास जी  ने  एक  टुकड़ा  चखा  , वह  तो  कड़वा  था  , उन्होंने   बुरा  सा  मुँह  कर  के  उसे  थूक  दिया   और  कहा  --- इतना  तीर्थ स्नान  कर  के  भी  इसकी  कड़वाहट  नहीं  गई  , यह  मीठा  नहीं  हुआ  l '  तब  कुंती  ने  कहा  --- प्रभो  !  यह  तो  कड़वा  ही  होता  है  l  क्या  स्वभाव  भी  कभी  बदल  सकता  है  ?  प्रकृति  के  नियम  कभी  भंग  नहीं  होते   l '  तब  व्यासजी  ने  उन्हें  समझाया  --- 'प्रकृति  के  नियम  तो  सनातन  हैं  , वे  कैसे  बदल  सकते  हैं   किन्तु  स्वभाव  के  ऊपर  जो   विकृतियाँ   छा   जाती  हैं   उन्हें  तन  के  नहीं , मन  के  स्नान  से  हटाया  जा  सकता  है  l "