25 May 2013

POSITIVE ATTITUDE AND PATIENCE

'अविराम श्रम साधना के अभाव में कोई बीज कभी वृक्ष नहीं बनता | '
जीवन में सफल होने के लिये यदि हम सही रास्ते अपनाये ,नीति का सहारा लें ,कठोर परिश्रम करें ,अपनी असफलताओं से सीख लें ,तो उसके बाद मिलने वाली सफलता या असफलता उस व्यक्ति के लिये कोई विशेष मायने नहीं रखती ,वरन व्यक्ति वह चीज हासिल करता है ,जिसे संतुष्टि एवं अनुभव कहते हैं ,लेकिन यहाँ तक का सफर केवल वे ही पूरा कर पाते हैं ,जो अपने कार्य के प्रति सकारात्मक द्रष्टिकोण एवं धैर्य रखते हैं | 
          
          थॉमस अल्वा एडिसन अमेरिका के न्यूजर्सी में अपनी  किसी एक कार्यशाला में देर रात तक बिजली के बल्ब बनाने की कोशिश में जुटे थे | उन्होंने कई प्रयोग किये ,लेकिन हर बार विफल रहे | उनकी विफलता की कहानियाँ शहर में तब और मशहूर हो गईं ,जब उनका पांच सौवाँ (5 0 O )प्रयोग भी असफल रहा | तब एक महिला पत्रकार ने साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा -"आप अपना यह प्रयास बंद क्यों नहीं कर देते ?"इस पर एडिसन का जवाब था -"नहीं ,नहीं मैडम !यह आप क्या कह रहीं हैं !....मैं पांच सौ बार विफल नहीं हुआ ,बल्कि मैंने पांच सौ बार काम न कर सकने वाले तरीकों की तलाश करने में सफलता पाई है | मैं सफलता के बिलकुल करीब हूँ | "और इसके बाद 1879 में एडिसन अपने फिलामेंट वाले बिजली के बल्ब का अविष्कार कर सकने में सफल हो सके | यह उनका ऐसा अविष्कार था ,जिसने पूरी दुनिया को रोशन कर दिया | अपनी मृत्यु के समय तक पांच सौ बार असफल होने वाला यह व्यक्ति 1 0 2 4 आविष्कारों का    पेटेंट करा चुके थे | 
             उन्होंने संसार को द्रढ़ता की शक्ति से परिचित कराया ,असफलताओं से सबक लेना और हार न मानने का जादुई नतीजा हासिल कर दिखाया | सफल होने के लिये असफलता से घबराना छोड़कर नाकामी को गले लगाना सिखाया | असफलता हमें बहुमूल्य सबक सिखाती है ,बशर्ते हम में सीखने की चाहत हो 
            | हमारे जीवन के राजमार्ग पर मील का ऐसा कोई पत्थर नहीं होता ,जो हमें यह बताये कि सफलता से अब हमारा फासला कितने किलोमीटर बचा है | ऐसी परिस्थिति में पेशे से फोटोग्राफर और पत्रकार जैकब रीस का द्रष्टिकोण सकारात्मक है | उन्हें जब लगता है कि जीवन में वे कुछ काम नही कर पा रहे तो वे पत्थर तोड़ने वालों को देखने चले जाते हैं ,जिनके सौ बार किये गये आघात के बावजूद पत्थर के उस टुकड़े पर सिर्फ दरारें नजर आती हैं ,लेकिन जैसे ही 101 वां आघात पड़ता है ,पत्थर के दो टुकड़े हो जाते हैं | इस प्रक्रिया में पत्थर के टूटने में पिछले सौ प्रहारों का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान था ,जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता | 
इसी प्रकार हमारी जिंदगी में भी किये गये हमारे हर प्रयास महत्वपूर्ण होते हैं ,भले ही हम उनके महत्व को समझ सकें या नहीं | 
               

24 May 2013

COMPASSION

तेप्सुगन दोको कनाई युग के प्रसिद्ध झेन संत हुए हैं | तेरह वर्ष की छोटी आयु में ही उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली और जन जन तक भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को पहुँचाने का बीड़ा उठाया शीघ्र ही उन्हें यह भान हो गया कि समाज के हर वर्ग तक बौद्ध धर्म पहुँचाने हेतु धर्म सूत्रों का प्रकाशन स्थानीय भाषा में करना होगा |

दस वर्ष के अबाध परिश्रम के बाद ग्रंथ के प्रकाशन हेतु पूंजी एकत्र हो पाई | प्रकाशन का कार्य आरम्भ ही हुआ था कि ऊजी नदी में भयंकर बाढ़ आ गई हजारों बेघर हो गये | दया व प्रेम की मूर्ति संत तेप्सुगन ने सारा धन जरुरतमंदो में बाँट दिया और पुन:देशाटन पर निकल पड़े | कई वर्षों के प्रयास और धन संग्रह के बाद प्रकाशन प्रारंभ हुआ | उस वर्ष जापान को महामारी ने आ घेरा | तेप्सुगन ने एकत्रित धन पुन:पीड़ितों में बाँट दिया |
           कहते हैं उसके बाद उन्हें बीस वर्ष और लगे | अपनी मृत्यु से एक वर्ष पूर्व संत तेप्सुगन ने जनसामान्य के लिये बोध सूत्रों का प्रथम जापानी संस्करण उपलब्ध कराया ,जो आज भी ओबाकु विश्वविद्दालय में सुरक्षित है | वर्ष 1681 में प्रकाशित इस ग्रंथ की साठ हजार (6 0 0 0 0 )प्रतियाँ उपलब्ध हैं ,जो संत तेप्सुगन के संकल्प ,करुणा और समर्पण की कहानी कहती हैं |    

23 May 2013

ISHVAR

'कण -कण में व्याप्त ईश्वर को करुणा और सेवा के दो नेत्रों से देखा जा सकता है | '

युवक तार्किक था | संत ने ईश्वर के पक्ष में अनेक प्रमाण दिये ,किंतु वह मानने के लिये तैयार न था | युवक ने कहा -"स्वामी जी विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि यदि ईश्वर ह्रदय की गुफा में भी होता ,तो डॉक्टर को हार्ट आपरेशन के समय मिल गया होता | "
स्वामी जी को युवक की स्थूल द्रष्टि समझते देर न लगी | उन्होंने समझाया -"जिस तरह फूल की गंध आँख से नहीं ,घ्राण (सूंघना )से मालुम होती है ,संगीत का रस आँख से नहीं कान से अनुभव होता है | दूध के अंदर का मक्खन मथने से प्रकट होता है | उसी प्रकार कण -कण में व्याप्त ईश्वर करुणा और सेवा के दो नेत्रों से ही देखा जा सकता है | "

21 May 2013

'ज्ञान, वैभव और आनंद को बांटो ,वह अनेक गुना होकर वापस लौटेगा |

एक संत से किसी ने पूछा -"मेरा दिल बहुत कड़ा है ,इसमें मुलायमी लाने के लिये क्या करूँ ?"
संत ने हँसकर कहा -"दरदमंदो के सिर पर हाथ फिराया कर और अपनी रोटी बांटकर खाया कर | "

EGO

'भगवान की कृपा सब प्राणियों पर एक समान ही बरसती है ,परंतु उसका आनंद वे ही उठा पाते हें ,जो मन रुपी पात्र को तृष्णा और अहंकार से रिक्त कर देते हैं | '
         
         घटना सुविख्यात बौद्ध संत नान -इन के जीवन की है | सम्राट मेइजी ने राजकीय विश्वविद्दालय के कुलपति को नान -इन के पास आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने भेजा | कुलपति को अपने पद व किताबी शिक्षा का बड़ा अहंकार था और उनके व्यवहार से स्पष्ट था कि यदि राजा का आदेश न होता तो वे नान -इन के पास कदापि न आये होते | विचार विमर्श के दौरान नान -इन ने कुलपति सेपूछा कीक्या वे चाय लेना पसंद करेंगे ?कुलपति के हाँ कहने पर नान -इन ने एक भरे प्यालेमें चाय उड़ेलना शुरू कर दिया| यह देख कुलपति चकराये और बोले -"वह प्याला तो भरा हुआ है ,उसमे और कुछ डालने की जगह ही कहां है ?"
नान -इन ने उत्तर दिया -"मित्रतुम्हारा  मन भी तो ऐसी थोथी जानकारियों से भरा हुआ है ,उसमे परमात्मा के लिये स्थान कहां है | अहंकार को विदा कर दो तो तुम्हे मेरी सहायता की कोई आवश्यकता नहीं रह जायेगी | "अहंकार आत्मघाती शत्रु है | 

20 May 2013

NEETI KI SHIKSHA

राम -रावण का घोर युद्ध समाप्त हुआ | रावण मृत्यु शय्या पर पड़ा था | श्री राम ने उसका अंतिम समय जान लक्ष्मण से कहा -"जाओ !अपने समय का सर्वश्रेष्ठ पंडित मर रहा है | जाकर उससे कुछ शिक्षा लो | "
लक्ष्मण जी गये | तीन बार प्रार्थना की कि नीति की शिक्षा दो रावण !रावण ने कुछ भी नहीं कहा | देखता रहा | लक्ष्मण वापस आये तो श्री राम ने पूछा -"क्या सीखा ?"लक्ष्मण ने वस्तुस्थिति बता दी |
श्रीराम ने कहा -"तुम शत्रु के पास गये थे | अब शिष्य बनकर जाओ ,उसका पूजन करो ,शीश नवाओ ,प्रदक्षिणा करो और तब अपनी बात कहो | "अब लक्ष्मण के आचरण से संतुष्ट रावण ने उन्हें नीति की शिक्षा दी | काफी देर तक नीति उपदेश के बाद उसने कहा -"लक्ष्मण !मैं अपने जीवन में चार काम करना चाहता था --
1 लंका के आस -पास का सौ (1 0 0 )योजन समुद्र मीठा कर दूँ ,
2. सोने की लंका को सुगंधित कर दूँ ,
3. स्वर्ग के लिये सीढ़ियाँ बनवा दूँ ,
4. मृत्यु को वश में कर लूँ |
                                        मेरा बल -वैभव अपार था | चारों काम कर सकता था ,पर मैं इन्हें छोटा समझ कर टालता रहा | मैं आज मन के अरमान मन में रखकर जा रहा हूँ |
उपेक्षा ,टालना ,किसी भी काम को छोटा मान लेना ,जिसे आज कर सकते हैं ,उसे कल के लिये छोड़ना सबसे बड़ी भूल है | मैं जो करना चाहता था ,वह नहीं किया | मुझे अपनी इस भूल पर दुःख है | तुम यह गलती कभी मत करना | "इसी के साथ रावण के नेत्र बंद हो गये | लक्ष्मण ने उपदेश ग्रहण कर मृत शरीर को नमन किया और सीख के साथ वापस लौट आये | 

YOUVAN

'यौवन एक अवस्था का नाम नहीं है ,जो किसी आयु वर्ग तक सीमित हो | यौवन तो मन:स्थिति उमंगों भरी नूतन प्रेरणाओं भरी उस जवानी का नाम है ,जो हर महापुरुष पर आजीवन छाई रही | '
       
            फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट (1 9 3 2 -1 9 4 8 )अमेरिका के राष्ट्रपति एक ऐतिहासिक हस्ती कहलाते हैं |
उनकी हँसती -हँसाती जीवन शैली एवं कुशाग्र व्यवस्था बुद्धि ने उन्हें तीन बार लगातार अमेरिका का राष्ट्रपति बनाया | उन्हें अंतिम अवधि में पक्षाघात हो गया | | लोगों ने समझा कि वे संभवत:अब सामान्य कार्य नहीं कर पाएँगे | वे जार्जिया गये | वहां के गरम सोतों में स्नान किया ,तैरने की एक नई विधि निकाली | उनके सभी अंग क्रमश:फिर से कार्य करने लगे | स्वास्थ्य की कांति उनके शरीर से फूटने लगी | सवेरे चार बजे से रात बारह बजे तकउनने आजीवन काम किया | आहार पर भी उनका पूरा नियंत्रण था | उनके कायाकल्प का रहस्य था --जीवन के संबंध में उनका विधेयात्मक द्रष्टिकोण|
यही चिर यौवन का रहस्य है |