29 June 2018

WISDOM ------ मानसिकता का परिष्कार अनिवार्य है l

समाज  की , संसार  की   जो भी समस्या  हों ,   जब  तक  लोगों  की  मानसिकता  परिष्कृत  नहीं  होगी   ,  उनका  उचित  व   स्थायी  हल  संभव  नहीं  है   l  जब  तक  लोगों  के  मन  में  ईर्ष्या - द्वेष ,  छल - कपट  ,  लोभ - लालच  आदि   बुराइयाँ  हैं   ,  समस्याओं  का  हल  संभव  नहीं  है   l 
       एक  सधा  हुआ    ऊंट   था   l  नक्कारखाने  का  कोई  उत्सव  होता  तो   उसकी  पीठ  पर  नगाड़ा  लादकर  चोबदार  उसे  बजाता  हुआ  चलता  l  ऊँट  बहुत  बूढ़ा  हो  गया  तो   काम  का  न  रहा   इसलिए  उसे  खुला  छोड़  दिया  गया   l   राजा  का  होने  से  उसे  कोई  मारता  नहीं  था   l  ऊंट  एक  दिन  बुढ़िया  के  सूखते  हुए  अनाज  को  खाने  लगा   l         बुढ़िया  ने  सूप  बजाकर  भगाना  चाहा  l   ऊंट  ने  कहा --- " जन्म  भर  नगाड़ों  की  आवाज  सुनता  रहा  हूँ  ,  तुम्हारे  सूप  से  क्या  डरने  वाला  हूँ   l  " 
  जिस   पर  समाज  को  दिशा  देने  की  जिम्मेदारी  है ,  अपने  आचरण  से   समाज  को  शिक्षित  करना  है  ,  वे  भी   अपने  जीवन  भर  के  संस्कारों  से  ग्रसित  हैं   l 

28 June 2018

संत कबीर --- मजहब और जाति के नाम पर विभाजित समाज को प्रेम का पाठ पढ़ाया l

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26 June 2018

WISDOM ----- विलासिता और वैभव व्यक्ति को आंतरिक रूप से कमजोर बना देते हैं

  नादिरशाह  करनाल  के  मैदान  में   मुहम्मद शाह  की  सेना  को  परास्त  कर  दिल्ली  पहुंचा  l  वहां  दोनों  ही  बादशाह  एक  ही  सिंहासन  पर  आसीन  हुए   l  नादिरशाह  ने  मुहम्मद शाह  से  पीने  के  लिए  पानी  माँगा  ---- और  वहां  बजने  लगा  नगाड़ा  ,  जैसे  किसी  उत्सव  की  शुरुआत  होने  जा  रही  हो  l
  दस - बारह  सेवक  उपस्थित  हो  गए  l  किसी  के  हाथ  में  रुमाल  था  तो  किसी  के  हाथ  में  खासदान  l  दो  तीन  सेवक  चांदी  के  बड़े  थाल  को  लेकर  आगे  बढ़े,  उसमें  माणिक  का  कटोरा  जल  से  भरा  रखा  था  l  और  दो  सेवक  कपड़े  से  उस  परात  को  ढके  हुए  बराबर  चल  रहे  थे   l
                  नादिरशाह  की  समझ  में  यह  नाटक  न  आया  ,  वह  घबरा  गया  कि  पानी  माँगा  था  और  यह  क्या  तमाशा  होने  जा  रहा  है  l   उसने  पूछा ---- " यह  सब  क्या  हो  रहा  है  ? " 
मुहम्मद शाह  ने  उत्तर  दिया ---- " आपके  लिए  पानी  लाया  जा  रहा  है  l  "  नादिरशाह  ने  ऐसा पानी  पीने  से  साफ  इनकार  कर  दिया  l  उसने  तुरंत  अपने  भिश्ती  को  आवाज  लगाई  l  भिश्ती  हाजिर  हुआ  ,  नादिर  ने  अपना  लोहे  का  टोप  उतार कर  भिश्ती  से  पानी  भरवाकर  प्यास  बुझाई  l  
  पानी  पीने  के  बाद   बड़े  गंभीर  स्वर  में  उसने  कहा  ----- " यदि  हम  भी  तुम्हारी  तरह  पानी  पीते  तो  ईरान  से  भारत   न  आ  पाते  l  "   
  आलसी  और  विलासी  जीवन   व्यक्ति ,  समाज  और  राष्ट्र  सभी  के  लिए  खतरा  है  l  

25 June 2018

WISDOM ----- गुरु कृपा से अहंकार नष्ट हुआ

     सूखे  से  संकट ग्रस्त  जनता  की  सहायता  के  लिए  शिवाजी  एक  बाँध  बना  रहे  थे  l   मजदूरी  कर  के  सहस्त्रों  व्यक्तियों   का  जीवन- यापन    हो  रहा  था  l   शिवाजी  ने  एक   दिन  यह  देखा  तो  गर्व  से  फूले  न  समाये   कि    वे  ही  इतने  लोगों  को  आजीविका  दे  रहे  हैं  l   यदि  वे  ये  प्रयास  न  करते  तो  उतने  लोगों  को  भूखे  मरना  पड़ता  l 
  समर्थ  गुरु  रामदास  उधर  से  निकले   l  शिवाजी  ने  उनका  सम्मान - सत्कार  किया  और  अपने  उदार   अनुदान  की  गाथा  कह  सुनाई  l  समर्थ  उस  दिन  तो  चुप  हो  गए  ,  पर  जब  दूसरे  दिन  चलने  लगे  तो  शांत  भाव  से   एक  पत्थर  की  ओर  संकेत  कर  के   शिवाजी  से  कहा  ---- "  इस  पत्थर  को  तुड़वा  दो  l " 
 पत्थर  को  तोड़ा  गया  तो  उसके  बीच  एक  गड्ढा  निकला  l  उसमे  पानी  भरा  था   और  एक  मेंढकी  कल्लोल  कर  रही  थी  l
  समर्थ  ने  शिवाजी  से  पूछा ---- " इस  मेंढ़की  के  लिए  संभवतः  तुमने  ही  पत्थर  के  भीतर   यह  जीवन  रक्षा   की  व्यवस्था  की  होगी   ? "
  शिवाजी  का  अहंकार  चूर - चूर  हो  गया   और  वे  समर्थ  गुरु  के  चरणों  में  गिर  पड़े  l  समर्थ  गुरु  रामदास  ने  उन्हें  अपनी  भूमिका  का  बोध  कराया  और  आततायियों  से  संघर्ष  हेतु  नीति  बनाने  के  लिए  बाध्य  किया  l  समर्थ   गुरु  का  मार्गदर्शन   और  कृपा  ही  थी  जिसने  शिवाजी  को   समय - समय  पर   सही  सूत्र  देकर   आपति  से  बचाया  व  श्रेय  पथ  पर   अग्रसर  किया   l  

24 June 2018

WISDOM -----

 हर  व्यक्ति  के  अन्दर  अनंत  सामर्थ्य  भरी  पड़ी  है  ,  वह  चाहे  तो   उसके  माध्यम  से  ,  जो  भी  असंभव  दीख  पड़ता  है  वह  कर  के   दिखा  दे  l  
  श्रीमद्भगवद्गीता  में  कहा  गया  है  कि  मनुष्य  स्वयं  अपना  मित्र  है   और  स्वयं  ही  अपना  शत्रु  है  l 
 मनुष्य  स्वयं  का  मित्र  बनकर   सकारात्मक   व   आशावादी     सोच  से   और  अपने  आत्मबल  को  बढाकर  ,  जीवन  की  हर  प्रतिकूलताओं  से  जूझकर  सफल  हो  सकता  है  l 
  लेकिन  आज  मनुष्य  परावलम्बी  हो  गया  है   l  अपने  जीवन  की  नाव  ढोने  के  लिए  दूसरों  से  आशाएं ,  अपेक्षा  रखने  वाला   l   अपने  स्वार्थ  के  लिए   व्यक्ति  ने  अध्यात्म  की  व्याख्या  भी  इसी  प्रकार  कर  ली  कि --- पात्रता  के  विकास  पर  ध्यान  न  देकर  केवल   बाह्य    आडम्बर  और  कर्मकांड  कर  के  ही  ईश्वरीय  अनुदान  मिल  जाएँ  l
   शबरी  के  घर  भगवान  गए   और  उससे मांग - मांग कर  झूठे  बेर   खाए  l   वह  अशिक्षित  थी  और  साधना - विधान  से  अपरिचित  थी  फिर  भी  उसे  इतना  श्रेय   मिला  l   भक्तों  ने  मातंग  ऋषि  से  पूछा  --- " हम  लोग  उस  श्रेय  और  सम्मान  से  क्यों  वंचित  रहे  ? "
ऋषि  ने  कहा ---- "  हम  लोग  पूजन  मात्र  में  अपनी  सद्गति  के  लिए  किए  प्रयासों  को  भक्ति  मानते  रहे   जबकि  भगवान  की  द्रष्टि  में  सेवा - साधना  श्रेष्ठ  है  l  जिसमे  छल - कपट  नहीं  है ,  अहंकार  नहीं  है  वही  भगवन  को  प्रिय  है  l  शबरी  ही  है  ,  रात - रात  भर  जागकर  आश्रम  से  लेकर  सरोवर  तक  कंटीला  रास्ता  साफ  करती  रही  और  सज्जनों  का  पथ  प्रशस्त  करने  के  लिए    अपना  अविज्ञात ,  निरहंकारी  ,  भाव भरा  योगदान  प्रस्तुत  करती  रही   l  "

23 June 2018

WISDOM ----- पाप और पुण्य

    कहते  हैं   विधाता  के  पास  प्रत्येक  मनुष्य  के  दो  घड़े  होते  हैं ---- एक  पाप  का  घड़ा  और  एक  पुण्य  का  घड़ा  l 
  कोई  व्यक्ति   पिछले  जन्मों  में  और  इस  जन्म  में   श्रेष्ठ  कर्म  करता  है  ,  इससे  उसका  पुण्य  का  घड़ा  भर  जाता  है    फिर  इस  पुण्य  का  भोग  करने  के  लिए  उसे  मान - सम्मान ,  पद - प्रतिष्ठा ,  धन - दौलत  सब  कुछ  मिलता  है   l  यह  सब  पा  कर  व्यक्ति  अहंकारी  हो  जाता  है ,  और  अधिक  सुख - सम्मान  पाने  की  लालसा  बढ़ती  जाती  है  l  इस  लालसा - लोभ  व  अहंकार  में  वह  ऐसा  कुछ  कर  गुजरता  है   जो  पाप  कर्म  हो  जाता  है  l  एक   ओर  पुण्य  के  फलस्वरूप  मिलने  वाला  सुख  भोगने  से  पुण्य  का  घड़ा  खाली  होता  जाता  है   तो  दूसरी  ओर  लालच  और  अहंकार  के  कारण  दूसरों  को  पीड़ित  करने ,  अत्याचार  व  अनीति  करने  से  पाप  का  घड़ा  भरने  लगता  है   l  जब  पाप  का  घड़ा  भर  जाता  है   तो  उसका  भोग   भोगने  के  लिए  पीड़ा ,  कष्ट - कठिनाइयों  का  समय  शुरू  हो  जाता  है  l   इस  तरह  उत्थान - पतन ,  सुख - दुःख  का  यह  चक्र  चलता  रहता  है  l 
  जो    जागरूक  होते  हैं ,  पाप  और  पुण्य  की  गहराई  को   समझते  हैं ,  वे  कभी  अहंकार  नहीं  करते   अपनी  शक्ति ,  अपनी  धन - संपदा  का  सदुपयोग  करते  हैं  ,  दुःखी   और  पीड़ित  व्यक्ति  की  पीड़ा  निवारण  के  कार्य  करते  हैं   l  ऐसा  करने  वाले  व्यक्तियों  का  उत्थान  के  बाद  पतन  नहीं  होता    क्योंकि     पुण्यों  के  फलस्वरूप  जो  सुख वैभव  मिला  ,  उसका  उपयोग  करने  से  जो   पुण्य   खर्च  हो  जाते  हैं  अथवा  पुण्य का  घड़ा  खाली  होता  है ,    वह  शक्ति  और  संपदा  के  सदुपयोग  से  पुन:  भरता  जाता  है  l 
      अब  ये  मनुष्य  का  विवेक  है ,  ईश्वर  ने  उसे  चयन  की  स्वतंत्रता  दी  है  ---- सफलता  की  ऊँचाइयों  पर   बने  रहना  पसंद  है  या  धड़ाम   से  नीचे  गिरना    पसंद  है   l       प्रकृति  में  क्षमा  का  प्रावधान  नहीं  होता   l 

22 June 2018

WISDOM ------ हरियाली को मनुष्य जीवन में सहचरी का स्थान मिलना चाहिए

  '  सहारा  कान्क्वेस्ट '   नामक  ग्रन्थ  के  लेखक  सेंटवार्व  बेकर  ने   सहारा  रेगिस्तान  की   20  लाख वर्गमील  भूमि  के  सम्बन्ध  में  लम्बा  और  गहरा  सर्वेक्षण  कर  के  लिखा  है  कि  यह  क्षेत्र  किसी  समय  बहुत  ही  हरा - भरा  था  ,  पर  लोगों  ने  नासमझी  से   उसे  उजाड़  दिया  l   प्रतिवर्ष  लगभग  30  वर्ग  किलोमीटर  हरी - भरी  जमीन  उस  रेगिस्तान  की  चपेट  में  आकर  सदा - सर्वदा  के  लिए  मृतक  बन  जाती  है  l 
  जिस  देश  के  लोग  जागरूक  हो  गए   वे   अपने    क्षेत्र  के  रेगिस्तानी  भाग  को  हरा - भरा  बनाते  हैं  जैसे  इजराइल   के  लोगों  ने   अपने  क्षेत्र  के  दो -तिहाई  रेगिस्तानी  भाग  को  हरा - भरा  बनाने  का  संकल्प  लिया  और   10  करोड़  से  भी  ज्यादा  नए  पौधे  लगाये  l
  द्वितीय  महायुद्ध  के  बाद  एक  बार  अमेरिका  के  राष्ट्रपति  रूजवेल्ट   हवाई  जहाज  से  मिस्र  की  भूमि  से  गुजरे   l  उन्होंने  लेबनान  के  इतिहास प्रसिद्ध  ' सिडार '  के  वन्य  प्रदेश  की  बड़ी  प्रशंसा  सुनी  थी  ,  जब  नीचे  झांक  कर  देखा  तो   नंगे  पहाड़  खड़े  हैं  ,  मुश्किल  से  दस - बीस  वृक्ष  दीख  रहे  थे  l  इसकी  विस्तृत  जानकारी  प्राप्त  करने  पर  उन्हें  बहुत  दुःख  हुआ   l  उनके  आदेश  पर   राष्ट्र संघ  पर   अमेरिकी  प्रतिनिधियों  ने  दबाव  डाला    कि  विश्व  खाद्य  और  कृषि  संगठन  में    वन - संपदा   के  संरक्षण  को  भी    महत्वपूर्ण  स्थान  मिलना  चाहिए   l   यह  प्रयास  सफल  रहा  और  राष्ट्र संघ    द्वारा  किये  जाने  वाले  प्रयत्नों   के  अंतर्गत   एक  बड़ी   आर्थिक   सहायता   देकर   लेबनान  में  नए  सिरे  से  ' सिडार  वन  ' लगाये  गए  और  हजारों  एकड़  भूमि  फिर  से  हरी - भरी  बनाई  गई   l  
  विशेषज्ञों  का  कहना  है ----- यदि  हम  वन - संपदा  को  गँवा  देंगे    तो  फिर  शुद्ध  सांस  का  अभाव  इतना  जटिल  हो  जायेगा  कि  उसका  समाधान   अन्य  किसी  उपाय  से   संभव  न  हो  सकेगा  l '