पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी मानव मन के मर्मज्ञ थे , उनके विचार हमें जीवन जीने की कला सिखाते हैं l भावनाओं के संबंध में उन्होंने लिखा है -----" भावनाओं का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है l सकारात्मक भावनाएं जहाँ प्रसन्नता , हर्ष , उत्साह , उमंग , साहस , संतोष व आत्मविश्वास के रूप में अभिव्यक्त होती हैं , वहीँ नकारात्मक भावनाएं ईर्ष्या , द्वेष , दुःख , असंतोष , चिंता , आत्महीनता , असुरक्षा आदि के रूप में प्रकट होती हैं और व्यक्ति के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती हैं l आचार्य श्री लिखते हैं ----- " भावनाओं में बहकर कभी भी अपने जीवन के निर्णय नहीं लेने चाहिएं क्योंकि ऐसी नाजुक मन: स्थिति में लिए गए निर्णय भविष्य के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध होते हैं l भावनाओं पर नियंत्रण पाने के लिए हमें अपने जीवन में कठोर श्रम करना चाहिए और उससे मिलने वाले परिणामों को स्वीकार करना चाहिए l यदि परिणाम आशा के अनुकूल है तो ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए और आशा के विपरीत होने पर अपनी कमियों पर ध्यान देकर उन्हें सुधारना चाहिए l " आचार्य श्री एक बात और समझाते हुए कहते हैं ----- ' अपने जीवन में चाहें जितने भी रिश्ते हों , लेकिन एक रिश्ता भगवान से भी रखना चाहिए और अपने मन की हर बात को उनसे बताना चाहिए l यह संवाद भले ही एकतरफा होता है , लेकिन जिंदगी में बहुत सारी उलझनों को सुलझाता है l इससे हमारी भावनाओं को सम्बल मिलता है कि कहीं कोई तो है , जो हमारा ध्यान रखता है और मुसीबत के समय भी हमें गिरने नहीं देता है , संभाल लेता है l आचार्य श्री कहते हैं ---इसके साथ ही अपने कर्तव्य पालन और प्रबल पुरुषार्थ करने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए l "
13 October 2021
12 October 2021
WISDOM--------
दुर्गा सप्तशती में कथानक है ----- माँ दुर्गा सभी दैत्यों को मार गिराती हैं , परन्तु महिषासुर ही एक ऐसा दैत्य है , जो मरता नहीं है , माता के चरणों में शरणागति को प्राप्त करता है l यहाँ महिषासुर कामवासना का प्रतीक है जो मरता नहीं है , माँ के चरणों में , माँ की शरण में जाकर भक्ति के रूप में रूपांतरित हो जाता है l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " वासना का समाधान केवल उसके रूपांतरण में ही निहित है और भक्ति वासना का दिव्य रूपांतरण है l "
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " यदि आप आज किन्ही कठिनाइयों में हैं तो इसका कारण ईश्वर नहीं , वरन आपके ही कुछ दोष हैं , जिन्हें आप भले ही जानते हो या न जानते हो l पाप एवं दुष्कर्म ही एकमात्र दुःख का कारण नहीं होते l अयोग्यता , मूर्खता , निर्बलता , निराशा , फूट एवं आलस्य भी ऐसे दोष हैं , जिनका परिणाम पाप के ही समान और कई बार उससे भी अधिक दुखदायी होता है l " आचार्य श्री लिखते हैं ---- " आप कठिनाइयों से छुटकारा पाना चाहते हैं तो अपने भीतरी दोषों को ढूंढ डालिए और उन्हें निकल बाहर करने में जुट जाइये l दुर्गुणों को हटाकर उनके स्थान पर आप सद्गुणों को अपने अंदर जितना स्थान देते जायेंगे , उसी अनुपात के अनुसार आपका जीवन विपत्ति से छूटता जायेगा l " आचार्य श्री लिखते हैं ----- " इस संसार में कर्म ही एकमात्र सत्य है l कर्मानुसार जीव की गति होती है , कर्मानुसार भोग बनता है और उस भोग को भोगने के लिए जीव उस भोग भूमि में जन्म लेता है l यदि जीवन को श्रेष्ठ करना है तो कर्म को ठीक करना होगा l श्रेष्ठ कर्म से पुण्य और दुष्कर्म से पाप बनता है l प्रकृति न तो पाप के अतिरेक को बर्दाश्त करती है और न प्रबल पुण्य को सहन करती है l वह दोनों का परिणाम प्रदान करती है ---- पापी को भारी यातना एवं यंत्रणा का शिकार होना पड़ता है और पुण्यवान को सुख - ऐश्वर्य का भोग भोगना पड़ता है l अत: मनुष्य को निष्काम कर्म कर के इन दोनों अवस्थाओं को पार कर लेना चाहिए l
11 October 2021
WISDOM -------
ईश्वर के समक्ष अच्छे और बुरे लोगों के प्रति कोई भेदभाव नहीं है l ईश्वर यदि किसी की प्रार्थना सुनते हैं तो वह है सच्चे लोगों की l इसलिए तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है ------ ' निर्मल मन जन सो मोहि पावा , मोहि कपट छल छिद्र न भावा l ' भगवान को तो निष्कपट और सरल हृदय मनुष्य ही प्रिय हैं और इन्ही में भगवान का वास होता है l गीता में कहा है --- भगवान दुराचारी के तो हो सकते हैं पर कपटी के कभी नहीं हो सकते l श्री कृष्ण ने कुब्जा का कूबड़ तो ठीक कर दिया था क्योंकि अनन्य भाव से श्रीकृष्ण उसमे बसते थे , लेकिन कपट लेकर आई रावण की बहन सूर्पणखा जो कहती थी --- " तुम सम पुरुष न मो सम नारी " को अपनी नाक कटवा कर जाना पड़ा भगवान कभी छल - कपट पसंद नहीं करते l
9 October 2021
WISDOM --------
प्रसंग है ---- डाकुओं के आत्मसमर्पण के संबंध में विनोबा भावे और पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के परस्पर विचार - विमर्श का l बात उन दिनों की है जब विनोबा जी पूरे देश की पद यात्रा पर निकले थे और तब कश्मीर में थे तभी उन्हें मशहूर डाकू मानसिंह के पुत्र तहसीलदार सिंह का पत्र मिला , वह तब नैनी जेल में था और उसे फाँसी की सजा सुनाई जा चुकी थी l उसने लिखा था कि वह मरने से पहले विनोबा जी के दर्शन करना चाहता है l विनोबा जी ने अपने प्रतिनिधि यदुनाथ सिंह को बातचीत के लिए भेजा l यदुनाथ सिंह नैनी गए , वहां से चम्बल के बीहड़ों में गए l वहां डाकुओं ने उनके बसमने प्रस्ताव रखा की यदि विनोबा जी इस क्षेत्र की यात्रा करें तो कई डाकू आत्म -समर्पण कर सकते हैं l डाकुओं की समस्या उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में ही सर्वाधिक थी l विनोबा जी ने इस सम्बन्ध में अनेक मनस्वी व्यक्तियों से विचार विमर्श किया और इसी क्रम में उन्होंने आचार्य श्री से भी बातचीत की और कहा कि डाकू नेक चलनी का भरोसा देते हैं उन्हें सुधरने का अवसर देना चाहिए विनोबा जी का कहना था कोई जन्म से डाकू नहीं होता यह तो शोषण , क्रूरता और संवेदनहीनता का परिणाम है l इस पर आचार्य श्री का कहना था कि जिसने अपराध किया है , उसे दंड मिलना ही चाहिए l समाज के प्रति अपराध करने वाले को क्षमा नहीं किया जाये l उनका कहना था कि अपराध को क्षमा कर देने से एक गलत परिपाटी जन्म लेगी l माफ़ी मांगकर छूट जायेंगे , यह सोचकर दूसरे लोग भी अपराध में प्रवृत हो सकते हैं l विनोबा जी का कहना था कि आप आचार्य हैं , आपको विदित होगा कि प्राचीन काल में भी हृदय परिवर्तन के बाद क्षमा का विधान रहा है , वाल्मीकि और अंगुलिमाल इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं l आचार्य श्री ने कहा ----- ' वे घटनाएं अपवाद थीं और क्षमा के बाद उन्होंने घनघोर प्रायश्चित भी किया था लेकिन डाकुओं को क्षमा के बाद हम सम्मानित जीवन दे रहे हैं l आचार्य श्री ने कहा ------- आपके प्रयत्न महान हैं लेकिन इन प्रयत्नों की सफलता में कुछ खतरे भी हैं l क्षमा मिल जाने के बाद डाकू रहेंगे तो ग्राम समाज में ही , उनका रौब - दाब भी रहेगा l सामान्य नागरिक स्वीकार कर लेने पर भविष्य में उनका राजनीतिक उपयोग भी हो सकता है l चुनाव आदि के समय लोगों को अपने पक्ष में वोट डलवाने के लिए उनकी स्थिति का उपयोग किया जा सकता है l विनोबा जी ने इस आशंका को सही माना लेकिन क्षमादान को स्थगित नहीं किया l आचार्य श्री के परामर्श पर आज चिन्तन करने की आवश्यकता है l
7 October 2021
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इस संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि मृत्यु को निश्चित जानकर भी मनुष्य यह चाहता है कि वो अमर हो जाये l इसके लिए चिकित्सा क्षेत्र में तरह - तरह के अनुसन्धान किये जाते हैं l प्रचार - प्रसार द्वारा सामान्य जन को समझाया जाता है कि इन सब तरीकों से वे स्वस्थ हो जायेंगे l एक लेख में पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ------ " जरा , मृत्यु तथा व्याधि का ही निवारण तो कर सकोगे l भय -शोक , लोभ , मोह , ईर्ष्या - द्वेष तो मनुष्य के मन से उत्पन्न होते हैं l ये दुःख तो उसके मन से पैदा होते हैं l अमर होने मात्र से मनुष्य सुखी कैसे हो जायेगा ? मृत्यु से अभय होकर अजितेन्द्रिय प्राणी अधिक तमोगुणी , विषय लोलुप , अधर्माचारी होकर परिणामस्वरूप अनंत काल तक अशांत , क्षुब्ध और दुःखी रहने लगेगा l मानव का कल्याण चाहते हो तो उसके विचारों में परिवर्तन करो l उसके शरीर का नहीं मन का कायाकल्प करो l उसे जीवन जीने की कला सिखाओ l
WISDOM -------
स्वामी विवेकानंद ने अपने शिष्य को एक कथा सुनाई ------ एक तत्वज्ञानी अपनी पत्नी से कह रहे थे , संध्या आने वाली है कपड़े समेट लो l एक सिंह कुटी के पीछे यह सुन रहा था ' उसने समझा कि संध्या कोई बड़ी शक्ति है , जिससे डरकर यह निर्भय रहने वाले ज्ञानी भी अपना सामान समेटने को विवश हुए l सिंह चिंता में डूब गया और संध्या का डर सताने लगा l पास के घाट का धोबी दिन छिपने पर अपने कपड़े समेट कर गधे पर लाने की तयारी करने लगा l इधर - उधर देखा तो गधा गायब था l रात घिर आई और पानी बरसने लगा l धोबी को एक झाडी में खड़खड़ाहट सुनाई दी , वह समझा कि गधा है तो उसे लाठी से पीटने लगा --- धूर्त यहाँ छिपकर बैठा है , सिंह की पीठ पर लाठियाँ पड़ीं तो उसने समझा यही संध्या है , सो डर से थर - थर काँपने लगा l धोबी उसे घसीट लाया और कपड़े लादकर घर चल दिया l रास्ते में एक दूसरा सिंह मिला , उसने अपने साथी की दुर्गति देखी तो पूछा ---- यह क्या हुआ ? तुम इस प्रकार लदे क्यों फिर रहे हो l सिंह ने कहा ---- संध्या के चंगुल में फंस गए हैं l वह बुरी तरह पीटती है और इतना वजन लादती है l सिंह को कष्ट देने वाली संध्या नहीं उसकी भ्रान्ति थी , जिसके कारण धोबी को कोई बड़ा देव - दानव समझ लिया और भार व प्रहार बिना शिर हिलाये स्वीकार कर लिया l आज मानव समुदाय की भी यही स्थिति है , जागरूकता और सद्बुद्धि के अभाव में अपने ऊपर अनेक प्रकार के बोझ लाद लिए हैं l अपने वास्तविक स्वरुप को न समझ पाने के कारण ही भटक रहा है l