12 July 2024

WISDOM ------

 एक  बार  एक  व्यक्ति  भगवान  से  प्रार्थना  करने  के  लिए  बैठा   और  बोला ---- " प्रभु  ! आप  मुझसे  वार्तालाप  कीजिए  l "  वह  प्रार्थना  कर  ही  रहा  था   कि  समीप  के  पेड़  पर  बैठी  चिड़िया  चहचहाने   लगीं  l  वह  व्यक्ति  चिड़ियों  को  चुप  कराकर  फिर  प्रार्थना  करने  के  लिए  बैठ  गया  l  इतनी  देर  में  बदल  गरजने  लगे   और  आसमान  में  बिजली  कौंध  उठी    l  उस  व्यक्ति  ने  मौसम  ठीक  होने  का  इंतजार  किया  और   फिर  प्रार्थना  के  लिए  बैठ  गया  l  इसी  समय  एक  तितली  आकर  उसकी  बांह  पर  बैठ   गई  l  उसने  तितली  को झटककर  दूर  किया  और  फिर  प्रार्थना  करने  के  लिए  बैठ  गया  l  वह  व्यक्ति  दिन  भर  इसी  तरह  प्रार्थना  करता  रहा  , उसे  लगा  कि  भगवान  उसकी  प्रार्थना  पर  ध्यान  नहीं  दे  रहे  हैं  l  रात  होने  पर  उसने  अपनी  प्रार्थना  पुन:  आरम्भ  की  , उसी  समय  एक  सितारा  चमक  उठा   l  उस  व्यक्ति  ने  उस  ओर  कोई  ध्यान  नहीं  दिया  और  निराश  होकर  सो  गया   l  स्वप्न  में  उसे  भगवान  दिखाई  पड़े   और  बोले ---- " पुत्र  !  चहचहाती  चिड़ियों , चमकते  सितारे  , इठलाती  तितलियों   और  गरजती  बिजलियों  के  माध्यम  से   मैं  ही  तुमसे वार्तालाप  कर  रहा  था  l  यदि  तुम  मुझे  प्रकृति  के  कण -कण  में  महसूस  करोगे   तो  अलग  से  वार्तालाप  करने  की  कोई  आवश्यकता   नहीं   रह  जाएगी  l "   उस  व्यक्ति  को  कण -कण  में  प्रभु  की  उपस्थिति  का  सन्देश  मिल  गया  l  

10 July 2024

WISDOM -------

   महात्मा  बुद्ध  अक्सर   अपने  अनुयायियों  और  आम  लोगों  के  बीच  उपदेश  दिया  करते  थे  l  एक  बार  एक  युवक  ने  उनसे  कहा ---- " प्रभु  ! आपके  उपदेश  सुनने  के  बाद  मैं  उन्हें  अपने  गृहस्थ  जीवन  में  पालन  करने  का  प्रयास  तो  करता  हूँ  , पर  मैं  वैसा  सदाचरण  नहीं  कर  पाता  , जैसा  आपके  सत्संग  में  सुनकर  जाता  हूँ  l  फिर  इसमें  मेरा  क्या  दोष  है  ?  बताइए  मैं  क्या  करूँ  ? "    भगवान  बुद्ध  मुस्कराते  हुए  बोले ---- " वत्स  ! यदि  प्रयास  सच्चा  हो  और   सही  दिशा  में  हो   तो  उसमें  सफलता  अवश्य  मिलती  है  l  आधे -अधूरे  मन  से  किए  गए  प्रयास  निष्फल  ही  होते  हैं  l "  भगवान  बुद्ध  ने  उसे  एक  बाँस  की  टोकरी  दी   और  उसमें  पास  की  नदी  से  जल  भरकर  लाने  को  कहा  l  युवक  नदी  में  जाकर  टोकरी  में  जल  भरता  , पर  उसे  बाहर  निकालते  ही  पूरा  जल  टोकरी  से  बाहर  निकल  जाता  l  भगवान  बुद्ध  ने  कहा --- " भले  ही  उसमें  जल  नहीं  रहा  हो  , पर  तुम  अपना  प्रयास  जारी  रखो  l "  युवक  ने  वैसा  ही  किया   l  युवक  प्रतिदिन  टोकरी  में  जल  भरने  का  प्रयास  करता  , पर  हर  बार  असफल  रहता  l   भगवान  बुद्ध  की   प्रेरणा  से  युवक  ने  हार  नहीं  मानी  निरंतर  प्रयास  करता  रहा   और  आखिर  वह  दिन  आ  गया  जब  टोकरी   के  छिद्र  फूलकर  पूरी  तरह  बंद  हो  गए   और  उस  टोकरी  में में  जल  भी  भर  आया  l  युवक  ने  जल  भरी  टोकरी  भगवान  बुद्ध  को  दिखाते  हुए  कहा  --- ' प्रभु  !  आपने  सच  ही  कहा  था ,  आज  इस  टोकरी  में  पूरा  जल  भर  आया  l "   भगवान  बुद्ध  बोले  ---- "वत्स  !  जो  इसी  प्रकार  सत्संग  करते  हैं   और  सत्संग  में  मिले  ज्ञान  के  सूत्र  को  अपने  जीवन  में  उतारने  का   सच्चा  प्रयास  करते  हैं  ,  वे  एक  दिन  उसमें  अवश्य  ही  सफल  होते  हैं  l  लगातार  सत्संग  में  शामिल  होने  से   व्यक्ति  का  मन  निर्मल  होने  लगता  है  और  उन  उपदेशों  को  अपने  जीवन  में  उतारने  से   इस  टोकरी  के  छिद्रों  की  तरह   उसके  अवगुण  के  छिद्र  भरने  लगते  हैं   और  उसमें  गुणों  का  जल  भरने  लगता  है   जिससे  उसका  जीवन  सुख  और  शांति  से  भर  जाता  है  l  "  

WISDOM -----

  संसार  में  अनेक  प्राणी  हैं  , भूख , प्यास ,  निद्रा -------- आदि   की  जरुरत  सभी  प्राणियों  को  है   लेकिन  मनुष्य  को   यह  विशेषाधिकार   बुद्धि  के  रूप  में  केवल  मनुष्य  को  ही  प्राप्त  है  कि  वह  अपनी  चेतना  को  विकसित  करे , परिष्कृत  करे  और  इनसान  बने  l    मनुष्य  के  पास  बुद्धि  है  ज्ञान  है   लेकिन  ज्ञान  के  साथ  यदि  विवेक  नहीं  है  , चेतना शून्य  है  तो  वह  अपनी  बुद्धि  का  दुरूपयोग  करता  है   और  बुद्धि  का  दुरूपयोग  करते -करते  वह  नर -पशु    और  मनुष्य  शरीर  में  पिशाच  की  श्रेणी  में  आ  जाता  है   जो  केवल  ध्वंस  और  उत्पीड़न  का  ही  कार्य  करते  हैं  , उनमें  संवेदना  नहीं  होती  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----- " विज्ञानं  ने  असीमित  शक्तियां  मानव  के  हाथ  में  दे  दीं  हैं  ,  पर  उस  शक्ति  से  कुछ  भी  शुभ  नहीं  हुआ  l  शक्ति  आई  है  पर  शांति  नहीं  आई  है  l  मानव  चेतना  को  सही  ढंग  से   जाने  बिना  विज्ञान  को  जानना  अधूरा  ज्ञान  है   और  ऐसे  अधूरे  ज्ञान  से  ,  अपनी  ही  चेतना  को  न  जानने  से   जीवन  दुःख  में  परिणत   हो  जाता  है   l   "                              इतना  विकास  और  भौतिक  सुख -सुविधाओं  में  इतनी  वृद्धि  के  बावजूद   मनुष्य  तनाव  से  और  नई -नई  बीमारियों  से  पीड़ित  है   l  विवेकहीन  विकास  कुछ  ऐसा  होता  है  जिसमें  मनुष्य  स्वयं  अपने  ही  हाथों  से  स्वयं  को  और  समूची  मानव सभ्यता  को  मिटाने  की  दिशा  में  आगे  बढ़ता  जाता  है  l                                                      राजकुमार  शालिवाहन  गुरु  आश्रम  में  अध्ययन  कर  रहे  थे  l  आश्रम  में  अन्य  प्राणियों   के  जीवनक्रम  को  देखने -समझने  का  अवसर  मिला   तथा  मानवोचित  मर्यादाओं  के  पालन  की  कड़ाई  से  भी  गुजरना  पड़ा  l  उन्हें  लगा  कि  पशुओं  पर   मनुष्य  जैसे  अनुशासन -नियंत्रण  नहीं  लगते  ,  वे  इस  द्रष्टि  से  अधिक  स्वतंत्र  हैं  l  मनुष्य  को  तो  कदम -कदम  पर  प्रतिबंधों  को  ध्यान  में  रखना  पड़ता  है  l  एक  दिन  उन्होंने  अपने  विचार  गुरुदेव  के  सामने  रख  दिए  l   गुरुदेव  ने  स्नेहपूर्वक  उनका  समाधान  किया ----- " वत्स  !  पशु  जीवन  में  चेतना   कुएं  या  गड्ढे  के  पानी  की  तरह  रहती  है  l  उसे  अपनी  सीमा  में  रहना  पड़ता  है  , इसलिए  उस  पर  बाँध  या  किनारा  बनाने  की  आवश्यकता  नहीं  पड़ती  l  लेकिन  मनुष्य  जीवन  में  चेतना  प्रवाहित  जल  की  तरह  रहती  है  ,  उसे  अपने  गंतव्य  तक  पहुंचना  होता  है  ,  इसलिए  उसे  मार्ग निर्धारण , बिखराव  और  भटकाव  से  रोक  आदि  की  आवश्यकता  पड़ती  है  l  कर्तव्य -अकर्तव्य  के  बाँध  बनाकर  ही   उसे  मानवोचित  लक्ष्य  तक  पहुँचाया  जा  सकता  हैं  l  अन्य  प्राणी  अपने  तक  सीमित  हैं  , लेकिन  मनुष्य  को  यह   उत्तरदायित्व  सौंपा  गया  है  कि  वह  अनेकों  का  हित  करते  हुए  आगे  बढ़े  l   इसलिए  उसे  प्रवाह  की  क्षमता  भी  मिली  है   और  कर्तव्यों  का  बंधन  भी  आवश्यक  है  l  

8 July 2024

WISDOM ----

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- ' निष्काम  कर्म  से  आप  अपने  लिए  सुन्दर  दुनिया  बना  सकते       हैं l  व्यक्ति  के  श्रेष्ठ  कर्म  ढाल  के  समान  उसकी  रक्षा  करते  हैं  l श्रेष्ठ  कर्मों  से  भगवान  भी  प्रसन्न  होते  हैं   और  उनकी  कृपा  द्रष्टि  बनी  रहती  है  l  ईश्वर  की  कृपा  हो  तो  असंभव  भी  संभव  है   l "     ---- ज्योतिर्मठ   के  शंकराचार्य  के  शिष्य  कृष्ण बोधाश्रम  120  वर्ष  जीवित  रहे  l  एक  बार  वे  प्रवास  पर  थे   l  उस  इलाके  में  लगातार  चार  साल  से  पानी  नहीं  गिरा  था  l  कुएं  तालाबों  का  पानी  सूख  गया  था  l  सभी  आए  , कहा ---- " महाराज  जी  ! उपाय  बताएं  ! "   वे  मंद -मंद  मुस्कान  के  साथ  बोले  ---- "  पुण्य  होंगे   तो  प्रसन्न  होगा  भगवान  l "  लोगों  ने  पूछा  ---- " क्या  पुण्य  करें  ? "   तो  वे  बोले  ---- " सामने  तालाब  है  , थोड़ा  ही  पानी  है   उसमें  l  मछलियाँ   इसमें  मर  रही  हैं   l  इसमें  पानी  डालो  l "  लोग  बोले  ---- " हमारे  लिए  पानी  नहीं  है  , मछलियों  को  पानी  कहाँ  से  दें  ?  "  कृष्ण  बोधाश्रम  ने  कहा ---- " कहीं  से  भी  लाओ  , कुओं  से  भर -भरकर  लाओ,  तालाब  में  डालो  l "  सभी  ने  पानी  तालाब  में  डालना  शुरू  किया  l  तीसरे  दिन  बादल  आए  l  घटाएं  भरकर  महीने  भर  बरसीं  l  सारा  दुर्भिक्ष  --पानी  का  अभाव  दूर  हो  गया  l  ' परहित  सरिस  धर्म   नहिं  भाई  l "    

7 July 2024

WISDOM ------

   एक  राज्य  में  एक  राजा  अपनी  न्याय प्रियता  के  लिए  विख्यात  था  l  एक  बार  उसके  पास  एक  जटिल  मामला  आया  l  यह  मामला  एक  भिखारी  का  था  l  भिखारी  को  एक  बटुआ  मार्ग  पर  पड़ा  मिला  , जिसमें  सौ  मोहरें  थीं  l  वह  उन्हें  सरकारी   विभाग  में  जमा  कराने  चल  दिया  , परन्तु  रास्ते  में  उसे  एक  सौदागर  मिला  ,  जो  उससे  बोला  ---- "  यह  बटुआ  उसका  है   और  वह  उसकी  ईमानदारी  के  लिए  उसे  आधी  मोहरें  देगा  l "  भिखारी  ने  बटुआ  सौदागर  को  सौंप  दिया  ,  पर  पैसे  मिलते  ही  सौदागर  के  मन  में  बदनीयती  आ  गई  l  उसी  भाव  से  वह  भिखारी  से  बोला  ---- "  अरे , इसमें  तो  दो सौ  मोहरें  थीं  , तुमने  आधी  रख  लीं   हैं  l "   भिखारी  ईमानदार  था  ,  वह  झूठा  इल्जाम  सहन  न  कर  सका   और  न्याय  मांगने  राजदरबार  पहुंचा  l   राजा  बात  सुनते  ही  समझ  गया   कि  सौदागर  बेईमान  है  l  राजा  ने  कहा --- "  सौदागर  !  भिखारी  यह  बटुआ  सरकारी  कोष  में  जमा  कर  रहा  था  ,  इससे  यह  तय  है  कि   वह  पैसे  नहीं  रखना  चाहता  था  l  तुम  कहते  हो  कि  बटुए  में  दो  सौ  मोहरें  थीं   लेकिन  इसमें  सौ  निकली  l  इसका  अर्थ  हुआ  कि  बटुआ  तुम्हारा  नहीं  है  , भिखारी  को  किसी  और  का  बटुआ  मिला  है  l  भिखारी  को  मिले  बटुए  का  आधा  हिस्सा  राजकोष  में  जमा  कर  लिया  जाए   और  आधा  उसे  पुरस्कार स्वरुप  दे  दिया  जाए  l  जहाँ  तक  तुम्हारे  बटुए  का  प्रश्न  है   तो  वह  जब  मिलेगा  , तुम्हे  वापस  कर  दिया  जायेगा  l  "  लालची  सौदागर  हाथ   मलता  रह  गया   क्योंकि  बटुआ  उसी  का  था  ,  पर  ज्यादा  पाने  के  लालच  में   वह  अपनी  ही  दौलत  गँवा  बैठा  था   l  

6 July 2024

WISDOM------

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----- " सार्थकता  स्व -सृजन  में  है  , परचर्चा , परनिंदा  में  नहीं  l  दूसरों की  निंदा  में  खर्च  किया  जाने  वाला  समय   अपने  दोष  ढूँढने  में  लगाओ  l  दूसरों  को  सुधारने  के  लिए  प्रयत्न  करने  का  पहला  चरण   अपने  सुधार  से  आरम्भ  करो   l  "    गोस्वामी  जी  कहते  हैं ----पर  निंदा  से  बढ़कर  कोई  पाप  नहीं   l  वे  कहते  हैं  कि  निंदा  हिंसा  से  भी  बढ़कर  है  l  जिसके  भी  दोषों  का  हम  चिन्तन  करते  हैं  , हमारा  मन  उससे  तदाकार  हो  जाता  है   l  उसके  दोष  भी  हमारे  अन्दर  आ  जाते  हैं  l  चित्त  में  विकृति  का  अंधकार  बढ़ता  चला  जाता  है  l  ' -----  संत  गंगा  किनारे  बैठकर  ध्यान  कर  रहे  थे   l  आरती  में  अभी  समय  था  l  दो  -चार  शिष्य  बैठकर  प्रपंच  करने  लगे  l  प्रपंच  अर्थात  व्यर्थ  की  बकवास  --- इसकी  निंदा  , उसकी  हँसी  उड़ाना  l  जैसे  ही  वे  गुरु  के  पास  आए   तो  गुरु  ने  कहा ---- " तुम  हमें  छूना  मत  !  तुम  लोग  चांडाल  हो  गए  हो  l  अभी -अभी  तो  तुम  बुराई  कर  रहे  थे  l  संन्यासी  होकर  प्रपंच   में  उलझना  ठीक  नहीं  है  l   संसारी  लोगों  की  तरह  मत  रहो  l  जाओ , गंगा  में  नहाओ  l  गंगाजल  हाथ  में  लेकर  संकल्प  लो  ,  फिर  हमें  प्रणाम  करना  और  आरती  में  भाग  लेना  l  "  

5 July 2024

WISDOM -------

  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " यदि  ईश्वर निष्ठा  अटूट  एवं  प्रगाढ़  हो   तो  किसी  भी  तरह  का  सांसारिक  कष्ट  सच्चे  भक्त  की  भक्ति  को  विचलित  नहीं  कर  पाता  l  भक्त  को  मन  में  सतत  एक  विश्वास   होता  है  कि  जब  प्रभु  साथ  हैं  तो  कुछ  भी  अन्यथा  नहीं  होगा   l  हाँ , कठिन  परीक्षाएं  हो  सकती  हैं , कठिनाइयाँ  आ  सकती  हैं  , पर  उन्हें  धैर्यपूर्वक  सहन  कर  जाना  है   क्योंकि  प्रभु  ने  कहा  है      ---- मेरे  भक्त  का  कभी  नाश  नहीं  होता  , किसी  भी  स्थिति  में  उसका  कोई  अहित  नहीं  होता  ,  मैं  सदा  उसके  साथ  रहता  हूँ   l  "  ----------- आचार्य   श्वेताक्ष  की  युवा  पत्नी  अपने  नवजात  शिशु  को  छोड़कर  परलोक  सिधार  गईं   l  उन्होंने  उसके  सभी  अंतिम  संस्कार  पूर्ण  किए    और  आनंद पूर्वक  अपने  शिशु  का  पालन -पोषण  करते  हुए   अपने  नित्य , नियमित  कर्तव्यों  में  लग  गए   l   उनके  मुख  की  प्रसन्नता  और  कांति  यथावत  बनी  रही   परन्तु  काल  का  प्रकोप  अभी  थमा  नहीं  था  l  उनकी  संपत्ति  , वैभव  का  धीरे -धीरे  क्षय  होने  लगा   और  वे  कंगाल  हो  गए  , रोज  का  भोजन  मिलना  भी  कठिन   हो  गया   l  एक  दिन  अनायास  ही  उनकी  इकलौती  संतान  भी  मृत्यु  को  प्राप्त  हो  गई  , रोग  उन्हें  घेरने  लगे  l  इन  दारुण  यातनाओं  में  भी  वे  अविचलित  थे  ,  उनका  मन  शांत  था  l  उनके  एक  घनिष्ठ  मित्र  ने  उनसे  प्रश्न  किया  ---- " हे  विप्र  !  आप  इन  विपन्नताओं  और  विषमताओं  के  बीच  किस  तरह  प्रसन्न  रहते  हैं  l "   अपने  उत्तर  में  वे  कहने  लगे --- " मित्र  !  इस  सब  का  रहस्य   मेरी  प्रभु  में  भक्ति  है  l  मैं  अपने  आराध्य  से  -- उन  सर्वेश्वर  से  इतना  प्रगाढ़  प्रेम  करता  हूँ  कि  किसी  तरह  की  घटनाएँ   मुझे  विचलित  कर  ही  नहीं  पातीं  l  "  यह  सत्य  है  ,  इस  संसार  में  एक  पत्ता  भी  हिलता  है  तो  वह  ईश्वर  की  इच्छा  से  ,  हमें  ईश्वरीय  विधान  पर  विश्वास  रखना  चाहिए   l  हर  रात  के  बाद  सुबह  अवश्य  होती  है  l  हमारे  कर्मों  के  हिसाब  से  रात  लम्बी  अवश्य  हो  सकती  है   लेकिन  सूर्योदय  अवश्य  होगा  l  ईश्वर  अपनी  प्रत्येक  संतान  से  प्रेम  करते  हैं  ,  लेकिन  कर्म  के  विधान  से  वे  स्वयं  बंधे  हैं  l