देवता और असुरों में तो आदिकाल से ही संघर्ष चला आ रहा है l देवता विजयी होते हैं लेकिन कलियुग का यह दुर्भाग्य है कि इसमें असुरता पराजित नहीं होती , असुरता बढ़ती ही जाती है l असुरता को पराजित करने के लिए आध्यात्मिक बल की और सत्कर्मों की पूंजी की आवश्यकता होती है l इसी के आधार पर दैवी शक्तियां मदद करती हैं l हिरण्यकश्यप से डरकर सबने उसे भगवान मान लिया लेकिन उसी के पुत्र प्रह्लाद ने उसे भगवान नहीं माना l प्रह्लाद के पास भक्ति का बल था l वर्तमान समय में धन -वैभव के आधार पर मनुष्य की परख है l इसलिए हर व्यक्ति धन कमाने और धन के बल पर समाज में अपनी साख बनाने का हर संभव प्रयास करता है l मात्र धन कमाना है , उसमें नैतिकता मायने नहीं रखती इसलिए धन कमाने और विलासिता से उसका उपभोग करने के कारण व्यक्ति से अपने जीवन में अनेक गलतियाँ हो जाती हैं , जिन्हें वह समाज से छुपाना चाहता है l यही वजह है कि व्यक्ति में यह कहने का कि " गलत का समर्थन नहीं करूँगा " का साहस नहीं होता l अपराधी और शक्तिशाली के समर्थन में अनेकों खड़े हो जाते हैं l जब स्वयं में कमियां हों तो उसका विरोध कौन करे l इसलिए असुरता दिन दूनी रात चौगुनी ' गति से बढ़ती जाती है l आसुरी कर्म करते रहने से व्यक्ति की आत्मा मर जाती है , उनका मन रूपी दर्पण इतना मैला हो जाता है कि उन्हें उसे देखने की जरुरत ही नहीं होती l उन्हें समय -समय पर प्रकृति की मार भी पड़ती है लेकिन ऐसे लोगों को पाप कर्म करने की लत पड़ जाती है , उन्हें इसी में आनंद आता है l इसी का नाम संसार है l
22 March 2025
21 March 2025
WISDOM -----
20 March 2025
WISDOM -----
इस संसार में अँधेरे और उजाले का निरंतर संघर्ष है l अंधकार की शक्तियां निरंतर सामूहिक रूप से उजाले को रोकने का भरसक प्रयास करती हैं l ये प्रयास हर युग में हुए हैं , बस ! उनका तरीका अलग -अलग है l रावण अपने राक्षसों को आदेश देता था कि जाओ , कहीं भी यज्ञ , हवन आदि पुण्य कार्य हो रहे हों तो उन्हें नष्ट करो , उनमें विध्न , बाधाएं उपस्थित करो , ऋषि -मुनियों को मार डालो , कोई संकोच नहीं l हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान कहता था , जो उसे न पूजे , उसे फिर अपनी जिन्दगी जीने का कोई हक नहीं l महाभारत काल में अत्याचार , अन्याय और षड्यंत्रों की विस्तृत श्रंखला के रूप में अंधकार की शक्तियां प्रबल रहीं l महारानी द्रोपदी को अपमानजनक शब्दों का सामना करना पड़ा l कलियुग आते -आते लोगों की मानसिकता विकृत होने लगी l वीरता का स्थान कायरता ने ले लिया l जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं , उनमें निहित दुर्गुण इतने प्रबल हो गए कि उन दुर्गुणों के भार ने असुरों के मनोबल को बिलकुल समाप्त कर दिया , उन्हें कायर बना दिया इसलिए अब ऐसे असुर उजाले को मिटाने के लिए अनेक कायराना तरीके अपनाते हैं l चाहे भगवान बुद्ध हों , स्वामी विवेकानंद हों या अध्यात्म पथ को कोई भी पथिक हो , उसके चरित्र पर प्रहार करते हैं ताकि उसका मनोबल टूट जाए , वह अपने पथ से भटक जाए l उनके जीवन में आँधी -तूफ़ान लाने का भरपूर प्रयास करते हैं लेकिन अंत में जीत सत्य की होती है l ऐसे कायर असुरों के प्रहार से अपने आत्म बल को मजबूत बनाए रखने का एक ही तरीका है कि ईश्वर के विधान पर अटूट आस्था और विश्वास हो , वार चाहे कितना ही गहरा हो अपने मन को न गिरने दें l दुनिया क्या कहती है , इस पर ध्यान न दें l उस परम सत्ता की निगाह में श्रेष्ठ बनने का प्रयास करें l
19 March 2025
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आतंकवाद एक दूषित मानसिकता है l आतंकवादी केवल वे नहीं हैं जो दूसरे देशों से आकर मासूम , निर्दोष और निरीह लोगों को मारकर अपनी कायरता का प्रमाण देते हैं l आतंकवादी एक राक्षस के समान होते हैं , इनके ह्रदय में संवेदना नहीं होती l इनका दिल पत्थर की तरह होता है जिसमें क्रूरता होती है l ये निर्दयी और क्रूर होते हैं मानवता इनमें नहीं होती l ऐसे दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति परिवार , समाज राष्ट्र और संसार में हैं जो अक्सर मुखौटा लगाकर , कभी प्रत्यक्ष रूप से , कभी तंत्र आदि नकारात्मक शक्तियों की मदद से और कभी षड्यंत्र रचकर , धोखा देकर अपनी निर्दयता और क्रूरता का परिचय देते हैं l ऐसे आतंकवादियों से स्वयं की सुरक्षा बड़ा कठिन है l कहीं तो जन्म से ही आतंकी बनने की ट्रेंनिंग दी जाती है लेकिन अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहाँ व्यक्ति के पूर्व जन्मों के संस्कार के जाग्रत हो जाने के कारण उसमें निर्दयता , क्रूरता , अहंकार जैसे दुर्गुण आ जाते हैं और इन्हीं के पोषण के लिए वो जघन्य कार्य करता है l त्रेतायुग और द्वापरयुग में जब पाप का प्रतिशत इतना अधिक नहीं था तब अत्याचार , अन्याय अधिकांशत: प्रत्यक्ष था लेकिन कलियुग में कायरता बढ़ जाने के कारण पीठ में छुरा भौंकने के उदाहरण बहुत अधिक हैं l आतंकवादी मानसिकता का महाभारत का प्रसंग है ----- गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा बहुत वीर था l उसे भी शस्त्र -शास्त्र का अच्छा ज्ञान था लेकिन बुद्धि भ्रष्ट हो गई , उसने शिविर में रात्रि में प्रवेश कर सोए हुए द्रोपदी के पांच पुत्रों को मार डाला l इससे भी उसको शांति न मिली तो अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भस्थ पुत्र को मारने के लिए किया l इस अमानवीय कृत्य से सभी चीत्कार उठे l द्रोपदी ने भीम से कहा कि तुम्हारा इतना बल किस काम का , जो निर्दयी अश्वत्थामा को दण्डित न कर सके l जब भीम अश्वत्थामा के पास जाने लगे तो भगवान श्रीकृष्ण ने भीम को रोका और कहा कि इस समय अश्वत्थामा राक्षस बन चुका है , अपनी सभी मर्यादा और नीतियों को भूलकर दानव बन गया है l उसकी मन:स्थिति में दया नहीं , क्रूरता है , वह भीम को भी मार सकता है l ---यही मानसिकता आतंकवादियों की होती है l निर्दयता , क्रूरता , चालाकी जैसे दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति अब समाज में ही घुल-मिलकर रहते हैं l इनका सच तो वही समझ पाता है जिसका उनसे पाला पड़ता है l
14 March 2025
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जीवन में आने वाली कठिनाइयों को चुनौती मानकर सकारात्मक तरीके से उनका मुकाबला किया जाए तो जीवन में सफलता अवश्य मिलती है l हमारे महाकाव्य हमें इस बात की शिक्षा देते हैं कि अंधकार कितना ही घना क्यों न हो , सूर्योदय अवश्य होता है l इसी विश्वास को अपने ह्रदय में रखकर निरंतर अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने का प्रयत्न किया जाए तो सफलता अवश्य मिलती है l महाभारत में पांडवों की माता कुंती का चरित्र अनूठा है l उनकी महानता की कहीं कोई तुलना नहीं है l धृतराष्ट्र के भाई पांडु से उनका विवाह हुआ था l महाराज पांडु को शिकार का शौक था , एक दिन उन्होंने जंगल में अपने तीर से हिरन को मारा , वह एक ऋषि थे जो हिरन के वेश में थे और उस समय अपनी पत्नी के साथ थे l मरते हुए ऋषि ने पांडु को श्राप दिया कि ----अपनी पत्नी के साथ जब तुम इसी तरह प्रेम में होगे तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी l ' इस श्राप के कारण महाराज पांडु अपनी दोनों पत्नियों कुंती और माद्री के साथ ब्रह्मचारी का जीवन व्यतीत करने लगे l महारानी कुंती ने अपने जीवन में सादगी को अपना लिया , उन्होंने अपना व्यवहार संतुलित रखा ताकि महाराज के जीवन पर कोई आंच न आए l होनी को कौन टाल सकता है l एक दिन जब वह अपनी दूसरी पत्नी माद्री के साथ एकांत के पल में थे तब ऋषि के श्राप का असर हुआ और उनकी तत्काल मृत्यु हो गई l माद्री ने स्वयं को उनकी मृत्यु का कारण मानकर उसी समय अपने प्राण त्याग दिए l युवावस्था में ही पति की मृत्यु हो जाने से पांचों पुत्रों के पालन -पोषण की जिम्मेदारी कुंती पर आ गई l पिता का साया सिर पर से हटते ही दुर्योधन आदि कौरवों के अत्याचार और षड्यंत्र शुरू हो गए l कुंती ने कभी हिम्मत नहीं हारी , अनेक कष्टों को सहते हुए उन्होंने अपने बच्चों की सही परवरिश की l यह कुंती का ही त्याग और बलिदान था जिसने पांचों पांडवों को शस्त्र और शास्त्र में निपुण , धर्म , सत्य और नीति की राह पर चलने वाला बना दिया l दूसरी ओर धृतराष्ट्र की पत्नी पतिव्रता थीं , लेकिन उन्होंने अपनी आँख पर पट्टी बाँध ली ताकि अपने पति की तरह वे भी दुनिया को न देख सकें l इसका परिणाम यह हुआ कि वे अपने बच्चों की गतिविधियों पर भी नजर नहीं रख सकीं और सब साधन होते हुए भी उनके जीवन को सही दिशा न दे सकीं परिणाम स्वरुप कौरव अधर्म और अन्याय की राह पर चलने लगे और कौरव वंश का सर्वनाश हुआ l
13 March 2025
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नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति न केवल स्वयं परेशान रहता है बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी वैसी ही नकारात्मक सोच का बना देता है l ऐसे व्यक्ति कभी भी किसी भी कार्य में अच्छाई को नहीं देखते , वे हमेशा उसमें से बुराई को ढूंढ निकालते हैं l इसका परिणाम यह होता है कि वे स्वयं उन बुराइयों से , नकारात्मकता से घिरे रहते हैं l इसका परिणाम कभी भी शुभ नहीं होता l ------ महाभारत का प्रसंग है कि भीष्म पितामह ने गांधार नरेश से बात कर के उनकी पुत्री गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से संपन्न कराया l भीष्म पितामह कोई प्रस्ताव प्रस्तुत करें तो उसे कोई अस्वीकार करने का साहस नहीं कर सकता l गांधारी के भाई शकुनि ने जब देखा कि उसकी बहन का विवाह एक अंधे व्यक्ति के साथ हुआ है , भीष्म पितामह के सामने उनके पिता गांधार नरेश कुछ बोल न सके तो शकुनि को बहुत क्रोध आया और उसके मन में बदले की भावना जाग्रत हो गई कि वह किसी न किसी तरह इसका बदला अवश्य लेगा l यहाँ शकुनि को सोच नकारात्मक थी , उसने यह नहीं देखा कि उसकी बहन एक विशाल साम्राज्य की कुलवधु , सबके सम्मान की अधिकारिणी बन गई l एक ऐसा साम्राज्य जिसके संरक्षक गंगापुत्र भीष्म थे , एक से बढ़कर एक शक्तिशाली राजा -महाराजा उनके आगे सिर झुकाते थे , शस्त्र - शास्त्र के ज्ञाता द्रोणाचार्य उसमें आश्रय पाते थे l विशाल , एकछत्र साम्राज्य का वैभव गांधारी के चरणों में था l संसार का सब सुख और सम्मान उसे मिला l यह सब अच्छाई , सकारात्मकता शकुनि को दिखाई नहीं थी l उसे तो केवल यही दिखाई दे रहा था कि धृतराष्ट्र अंधे हैं l उसने अपना बदला लेने के लिए , भीष्म पितामह द्वारा संरक्षित साम्राज्य की शांति भंग करने के लिए दुर्योधन को अपना हथियार बनाया l वह निरंतर दुर्योधन के मन में पांडवों के प्रति द्वेष की भावना भरता रहता , दुर्योधन की मदद से अपनी कुत्सित चालों को अंजाम देता l हस्तिनापुर का साम्राज्य कौरव- पांडवों के आपसी बैर का षड्यंत्रों का केंद्र बन गया l इसका परिणाम हुआ --महाभारत का महायुद्ध l जिस बहन के अंधे पति को देखकर उसे दुःख हुआ , बदले की भावना जाग्रत हुई , उसी बहन के सौ पुत्र इस युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुए l बहन के प्रति ऐसा कैसा प्रेम ! उसे ऐसा दुःख दे दिया जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती , पूरा कौरव वंश नष्ट हो गया l यदि शकुनि अपना गांधार देश छोड़कर अपनी बहन के साथ हस्तिनापुर में नहीं रहता तो इतना अनर्थ न होता l यह प्रसंग हमें यही शिक्षा देता है कि मनुष्य का अपने जीवन में विभिन्न मानसिकता के लोगों से सामना होता है , व्यवहार होता है l किसी की कोई बात बुरी लगती है तो बदला लेने का सकारात्मक तरीका अपनाओ , स्वयं को उससे श्रेष्ठ साबित करो , अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठाओ , प्रतिपक्षी स्वयं ही हार जायेगा l
11 March 2025
WISDOM ---
एक गुरु के दो शिष्य थे l दोनों किसान थे l भगवान का भजन भी दोनों करते थे l किन्तु एक बड़ा सुखी था , दूसरा बड़ा दुःखी था l गुरु की मृत्यु पहले हुई , उनके बाद दोनों शिष्यों की भी मृत्यु हो गई l संयोग से स्वर्गलोक में भी तीनों एक ही स्थान पर आ मिले l पर यहाँ भी स्थिति पहले जैसी थी l जो पृथ्वी पर सुखी था , वह यहाँ भी प्रसन्नता का अनुभव कर रहा था और जो पृथ्वी पर अशांत रहता था , वह यहाँ भी अशांत दिखाई दिया l दुःखी शिष्य ने गुरुदेव से पूछा --- " भगवन ! लोग कहते हैं कि ईश्वर भक्ति से स्वर्ग में सुख मिलता है , पर हम तो यहाँ भी दुःखी के दुःखी रहे l " गुरु ने गंभीर होकर उत्तर दिया ---- " वत्स ! भक्ति से स्वर्ग तो मिल सकता है , पर सुख और दुःख मन की देन है l मन शुद्ध है तो नरक में भी सुख है और मन शुद्ध नहीं है तो स्वर्ग में भी कोई सुख नहीं है l