8 March 2013

SELF KNOWLEDGE

'स्वयं के भीतर प्रकाश की छोटी सी टिमटिमाती ज्योति हो तो सारे ब्रह्मांड का सारा अंधेरा पराजित हो जाता है ,लेकिन यदि स्वयं के केंद्र पर अंधियारा हो तो बाह्य आकाश के कोटि -कोटि सूर्य भी उसे मिटा नहीं सकते | '
अपने लिये अंतरिक्ष के द्वार खोलने वाले मनुष्य ने स्वयं के अंतस के द्वार बंद कर लिये हैं | जब व्यक्ति स्वयं को बदलना चाहे ,अपने ह्रदय में सद्ज्ञान का दीप जलाये तभी उसका सुधार संभव है | पांडवों और कौरवों के बीच मध्यस्थता कराने भगवान श्री कृष्ण स्वयं शांति दूत बनकर गये लेकिन दुर्योधन का विवेक नष्ट हो चुका था उसने शांति के बजाययुद्ध का निर्णय लिया | जब तक व्यक्ति स्वयं न सुधरना चाहे उसे भगवान भी नहीं सुधार सकते | -'ईश्वर मात्र उन्ही की सहायता करते हैं ,जो अपनी सहायता आप करते हैं | '

7 March 2013

SUPERIOR MAN

'जीवन शास्त्र तो कर्मों के अक्षरों और भावनाओं की स्याही से लिखा जाता है | इसे जो जान लेता है ,पढ़ लेता है ,समझ लेता है ,वही पंडित है ,ज्ञानी है | '
लगभग एक सौ पचास वर्ष पूर्व की बात है | जापान के एक प्रतिष्ठित बौद्ध भिक्षुक ने पाली में प्राप्त उपदेशों को जापान में प्रचारित करने के लिए जापानी भाषा में अनुदित किया | प्रकाशन के लिए धन जरुरी था ,संघ के नियम अनुसार किसी से मांगना नियम विरुद्ध था | स्वयं को ही भिक्षा से जितना धन मिल जाये उतने से ही व्यवस्था बनानी थी | पांच वर्ष में इतना धन एकत्र हो गया कि प्रकाशन की व्यवस्था बन सके | अचानक जापान के एक क्षेत्र में ऐसा घोर दुर्भिक्ष पड़ा कि स्थिति देख| भिक्षु करुणा से भर गये ,उन्होंने सारा धन आकाल पीड़ितों की सेवा -भूखों को भोजन ,वस्त्रहीन को वस्त्र ,आदि में लगा दिया | जब दुर्भिक्ष के बादल छंट गये तब फिर धन संग्रह करना शुरू किया ,दस वर्षों में धन राशि एकत्र हुई ,प्रकाशन की व्यवस्था बनाने लगे तभी उस क्षेत्र में बाढ़ आ गई| इस बार महा भिक्षु ने एकत्र किया सारा धन बाढ़ पीड़ितों की सेवा में लगा दिया | अब उनके सभी अनुयायियों ने उनका साथ छोड़ दिया किंतु महा भिक्षु ने दान संग्रह जारी रखा | योग ऐसा रहा कि पुस्तक प्रकाशित हो गई ,उसके ऊपर लिखा था -तृतीय संस्करण | लोगों ने पूछा कि पहले दो संस्करण कौन से हैं ?महा भिक्षु बोले "वे उन्हीं को दिखायी देंगे जिनके पास सेवा और प्रेम की आँखे हैं | यह ग्रंथ अति लोकप्रिय हुआ एवं बौद्ध धर्म का आधार बनाने में सफल हुआ | 
मन:स्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है | मनुष्य जैसा सोचता है ,वैसा ही करता है और वैसा ही बन जाता है |
हमारे भले -बुरे कर्म ही संकट और सौभाग्य बनकर सामने आते हैं | इसलिए अपनी दीन -हीन ,दयनीय स्थिति के लिये किसी दूसरे को दोष देने से अच्छा है अपनी भावना मान्यता ,आकांक्षा ,विचारणा और गतिविधियों को परिष्कृत किया जाये | यदि मनुष्य अपने को सुधार ले तो अपना सुधरा प्रतिबिम्ब व्यक्तियों और परिस्थितियों में चमकता दिखायी पड़ने लगता है | 'यह संसार गुम्बद की तरह अपने ही उच्चारण को प्रतिध्वनित करता है | अपने जैसे लोगों का जमघट ही साथ में जुड़ जाता है |

6 March 2013

UNDERSTANDING--WAY OF LIFE

हम सबको इतिहास की भीषणतम लड़ाई लड़नी है ,परन्तु यह लड़ाई स्वयं से लड़नी है -यह युद्ध अपने अंतर्जगत के  विकारों से करना है -अनीति के विरुद्ध जीवन मूल्यों के लिए यह महासंग्राम है | मनुष्य की अंतरात्मा उसे ऊँचा उठने के लिए कहती है लेकिन सिर पर लदी दोष -दुर्गुणों की भारी चट्टानें उसे नीचे गिरने को बाधित करती हैं | स्वार्थ सिद्धि की ललक उसकी बुद्धि को भ्रमित कर देती है ,वह लाभ को हानि और हानि को लाभ समझता है | वासनाएँ आदमी को नीबू की तरह निचोड़ लेती हैं ,जीवन में से स्वास्थ्य ,आयुष्य सब कुछ निचोड़कर उसे छिलके जैसा निस्तेज कर देती हैं |
भूल समझ आने पर उल्टे पैरों लौट आने में कोई बुराई नहीं है | मकड़ी अपने लिए अपना जाल स्वयं बुनती है | उसे कभी -कभी बंधन समझती है तो रोती भी है ,किंतु जब भी वस्तु स्थिति की अनुभूति होती है तो समूचा मकड़ जाल समेट कर उसे गोली बना लेती है और पेट में निगल लेती है तथा अनुभव करती है कि सारे बंधन कट गये और वेदनाएँ सदा के लिए समाप्त हो गईं इसी तरह मनुष्य अपने स्तर की दुनियां अपने हाथों रचता है ,वही अपने हाथों गिरने के लिए खाई खोदता है | वह चाहे तो उठने के लिए समतल सीढ़ियों वाली मीनार भी चुन सकता है | मनुष्य अपनी विवेक शक्ति को जाग्रत कर संकल्प भरी साहसिकता से अपने व्यक्तित्व और कर्तव्य को ऊँचा उठाकर महानता की मंजिल तक पहुंच सकता है |
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है |
भाग्य और पुरुषार्थ जिंदगी के दो छोर हैं | जिसका एक सिरा वर्तमान में है तो दूसरा हमारे जीवन के अतीत में अपना विस्तार लिए हुए है | भाग्य का दायरा बढ़ा है जबकि पुरुषार्थ के पास अपना कहने के लिए केवल एक पल है ,जो अभी अपना होते हुए भी अगले ही पल भाग्य के कोष में जा गिरेगा | पुरुषार्थ आत्मा की चैतन्य शक्ति है ,जबकि भाग्य केवल जड़ कर्मों का समुदाय | जिस तरह छोटे से दीखने वाले' सूर्य मंडल के उदय होते ही तीनों लोकों का अंधेरा भाग जाता है ठीक उसी तरह पुरुषार्थ का एक पल भी कई जन्मों के भाग्य पर भारी पड़ता है |
पुरुषार्थ की प्रक्रिया यदि निरंतर अनवरत एवं अविराम जारी रहे तो पुराने भाग्य के मिटने और मनचाहे नये भाग्य के बनने में देर नहीं | पुरुषार्थ का प्रचंड पवन आत्मा पर छाए भाग्य के सभी  | आवरणों को छिन्न -भिन्न कर देता है | तब ऐसे संकल्पनिष्ठ पुरुषार्थी की आत्म शक्ति से प्रत्येक असंभव संभव और साकार होता है | तभी तो ऋषि वाणी कहती है -'मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है|

5 March 2013

इच्छा शक्ति परमात्मा का मनुष्य को सबसे शक्तिशाली एवं दिव्य वरदान है |
भौतिक जीवन में सफलता और आत्म बल का संपादन प्रबल इच्छा शक्ति के बिना संभव नहीं हो सकता | मनुष्य को महानता के शिखर पर पहुँचाने में इच्छा शक्ति या संकल्प बल सर्वोपरि है | संकल्प में आकांक्षा ,योजना और आगे बढ़ने के लायक साहसिकता जुड़ी रहती है | यह संकल्प ही मनुष्य जीवन का वास्तविक बल है | प्रत्येक मनुष्य में अपनी इच्छा शक्ति होती है | यदि उसे ईश्वर अर्पित कर श्रेष्ठ कार्यों के लिये सदुपयोग किया जाये तो जीवन में कोई कमी नहीं रहती | मानव जीवन का परम पुरुषार्थ यही है कि वह अपनी निकृष्ट मानसिकता ,लोभ ,मोह और अहंकार की जंजीरों को तोड़ने का द्रढ़ संकल्प ले और अपनी प्राणशक्ति का प्रयोग सत्प्रयोजन व उदारता के लिये करे | इसी में जीवन की सार्थकता है |

EGO

'जिस प्रकार सूखे बांस आपस की रगड़ से ही जलकर भस्म हो जाते हैं .उसी प्रकार अहंकारी व्यक्ति आपस में टकराते हैं और कलह की अग्नि में जल मरते हैं | '
अहंकार एक रोग है इसके कारण सही सोच -समझ और सम्यक जीवन द्रष्टि समाप्त हो जाती है | इसकी पीड़ा से हर कोई पीड़ित है | अहंकार के रोग की खास बात यह है कि यदि व्यक्ति सफल होता है तो उसका अहंकार भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है और वह एक विशाल चट्टान की भाँति जीवन के सुपथ को रोक लेता है | इसके विपरीत यदि व्यक्ति असफल हुआ तो उसका अहंकार एक घाव की भाँति रिसने लगता है और धीरे धीरे मन में हीनता की ग्रंथि बन जाती है | सद्विवेक और सद्ज्ञान ही इस अहंकार के रोग की औषधि व उपचार है | सद्विवेक होने पर व्यक्ति कार्य की सफलता या विफलता से प्रभावित नहीं होता | विवेक कठिन परिस्थितियों में शान्ति और धैर्य के साथ संघर्षशील रहने की प्रेरणा देता है | जब कार्य को ईश्वर की पूजा समझकर किया जाता है तब वहां अहंकार नहीं होता ,केवल विवेक होता है |