रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे ---चील कितनी ही ऊपर ऊँचाइयों पर उड़ती रहे फिर भी उसकी द्रष्टि धरती पर पड़े मृत जानवर पर ही लगी रहती है l इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि उसका शरीर उतंग ऊँचाइयों पर उड़ रहा है , पर मन फिर भी जमीन पर अटका रहता है , मांस के लोथड़े तलाशता रहता है l यह मन का स्वभाव है , उसे अधोगामी बनने में रस आता है l मन का परिष्कार जरुरी है l
17 June 2018
16 June 2018
WISDOM---- सभी समस्याओं का एक मात्र हल है ---- संवेदना
जब संवेदना होती है तब दूसरों के कष्ट तकलीफ अपनी पीड़ा के समान लगते हैं , मन में बेचैनी होती है , और जब तक उसकी पीड़ा के निवारण के लिए कुछ कर न दिया जाये तब तक मन को शांति नहीं मिलती है l
देश के लिए जीवन समर्पित करने से पूर्व एक बार महात्मा गाँधी ने देश का भ्रमण किया और देश की स्थिति से परिचित होने पर वे अपने शरीर पर आजीवन पूरी धोती भी नहीं पहन सके l क्योंकि देश की पीड़ा को देखकर , महसूस कर के पूरे कपड़े पहनने के सुख का उन्होंने त्याग कर दिया , और धीरे - धीरे अपने जीवन में किये जाने वाले छोटे - छोटे त्याग के फलस्वरूप वे ' महात्मा ' के पद से विभूषित हुए l
देश के लिए जीवन समर्पित करने से पूर्व एक बार महात्मा गाँधी ने देश का भ्रमण किया और देश की स्थिति से परिचित होने पर वे अपने शरीर पर आजीवन पूरी धोती भी नहीं पहन सके l क्योंकि देश की पीड़ा को देखकर , महसूस कर के पूरे कपड़े पहनने के सुख का उन्होंने त्याग कर दिया , और धीरे - धीरे अपने जीवन में किये जाने वाले छोटे - छोटे त्याग के फलस्वरूप वे ' महात्मा ' के पद से विभूषित हुए l
15 June 2018
WISDOM ---- अच्छे कर्मों पर भरोसा रखना चाहिए , मुफ्त के चमत्कारों पर नहीं
मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह सरलता से बहुत कुछ पाना चाहता है l ईश्वर सर्वशक्तिमान है उसकी कृपा माला घुमाकर , फूल - प्रसाद चढ़ाकर और सबसे बढ़कर संतों और धर्म के ठेकेदारों को खुश कर के मिल जाये तो क्या बुराई है , ऐसी सोच के कारण ही धर्म का सच्चा स्वरुप खो गया और आज धर्म ने भी एक व्यवसाय का रूप ले लिया , जिसमे लाखों लोगों को रोजगार मिल जाता है l जिसको कहीं कोई रोजगार नहीं है उसके लिए यह क्षेत्र खुला है l
पूजा - पाठ , भजन - पूजन , कर्मकांड आदि सब कुछ बहुत अच्छा , पवित्र भावना से यह सब कुछ होने से वातावरण शुद्ध होता है लेकिन आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि आज पवित्र भावना का अभाव है l स्वार्थ , लालच , अनीति , अत्याचार , शोषण , कर्तव्य की चोरी जैसी दुष्प्रवृतियों , अनैतिक इच्छाओं की पूर्ति व्यक्ति धर्म की आड़ में ही करता है l
संसार में केवल पर्यावरण प्रदूषण नहीं है , विचारों और भावनाओं का प्रदूषण बहुत गहरा है l यदि कोई व्यक्ति बहुत दुष्ट , पापी है , कपटी है तो उसकी नकारात्मकता के कारण उसकी उपस्थिति ही कष्टकारक होती है , जब ऐसे लोगों की अधिकता हो जाती है तो पूरा वातावरण ही कितना कष्टकारी हो जाता है इसका अनुमान लगाया जा सकता है l l समाज में बढ़ते अपराध भी इसी का परिणाम है l
पूजा - पाठ , भजन - पूजन , कर्मकांड आदि सब कुछ बहुत अच्छा , पवित्र भावना से यह सब कुछ होने से वातावरण शुद्ध होता है लेकिन आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि आज पवित्र भावना का अभाव है l स्वार्थ , लालच , अनीति , अत्याचार , शोषण , कर्तव्य की चोरी जैसी दुष्प्रवृतियों , अनैतिक इच्छाओं की पूर्ति व्यक्ति धर्म की आड़ में ही करता है l
संसार में केवल पर्यावरण प्रदूषण नहीं है , विचारों और भावनाओं का प्रदूषण बहुत गहरा है l यदि कोई व्यक्ति बहुत दुष्ट , पापी है , कपटी है तो उसकी नकारात्मकता के कारण उसकी उपस्थिति ही कष्टकारक होती है , जब ऐसे लोगों की अधिकता हो जाती है तो पूरा वातावरण ही कितना कष्टकारी हो जाता है इसका अनुमान लगाया जा सकता है l l समाज में बढ़ते अपराध भी इसी का परिणाम है l
14 June 2018
WISDOM ----- अनीति और अत्याचार के विरुद्ध जनमानस का जागना जरुरी है
गुरु गोविन्दसिंह ने अपने समय की दुर्दशा का कारण जन - समाज की आंतरिक भीरुता को माना l उनका निष्कर्ष था कि जब तक जन आक्रोश नहीं जागेगा तब तक पददलित स्थिति से उबरने का अवसर न मिलेगा l उन्होंने संघर्ष के लिए जनमानस को ललकारा l
जब अर्जुन महाभारत के महासमर से भागना व बचना चाहते थे तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया ---- ऐसा कर के तुम कहीं भी चैन से न बैठ सकोगे l पाप को हम न मारें , अधर्म, अनीति का संहार हम न करें , तो निर्विरोध स्थिति पाकर ये पाप , अधर्म व अनीति हमें व हमारी सामाजिक व्यवस्था को मार डालेंगे l इसलिए जीवित रहने पर सुख और मरने पर स्वर्ग का उभयपक्षीय लाभ समझाते हुए उठ खड़े होने का उद्बोधन भगवान श्री कृष्ण उन्हें देते हैं l
समझाने और सज्जनता की नीति हमेशा सफल नहीं होती l दुष्टता को भय की भाषा ही समझ में आती है l नीति शास्त्र में साम की तरह दंड को भी औचित्य की संज्ञा दी गई है l
जब अर्जुन महाभारत के महासमर से भागना व बचना चाहते थे तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया ---- ऐसा कर के तुम कहीं भी चैन से न बैठ सकोगे l पाप को हम न मारें , अधर्म, अनीति का संहार हम न करें , तो निर्विरोध स्थिति पाकर ये पाप , अधर्म व अनीति हमें व हमारी सामाजिक व्यवस्था को मार डालेंगे l इसलिए जीवित रहने पर सुख और मरने पर स्वर्ग का उभयपक्षीय लाभ समझाते हुए उठ खड़े होने का उद्बोधन भगवान श्री कृष्ण उन्हें देते हैं l
समझाने और सज्जनता की नीति हमेशा सफल नहीं होती l दुष्टता को भय की भाषा ही समझ में आती है l नीति शास्त्र में साम की तरह दंड को भी औचित्य की संज्ञा दी गई है l
13 June 2018
WISDOM
ज्ञान और धन , दोनों में एक दिन अपनी श्रेष्ठता के प्रतिपादन के लिए झगड़ा उठ खड़ा हुआ l दोनों अपनी - अपनी महत्ता बताते और एक - दूसरे को छोटा सिद्ध करते l अंत में निर्णय के लिए दोनों आत्मा के पास पहुंचे l
आत्मा ने कहा ---- " तुम दोनों कारण मात्र हो , इसलिए श्रेष्ठ बात तुम में क्या है ? सदुपयोग किये जाने पर ही तुम्हारी श्रेष्ठता है , अन्यथा दुरूपयोग होने पर तो तुम दोनों ही घ्रणित बन कर रह जाते हो l "
आत्मा ने कहा ---- " तुम दोनों कारण मात्र हो , इसलिए श्रेष्ठ बात तुम में क्या है ? सदुपयोग किये जाने पर ही तुम्हारी श्रेष्ठता है , अन्यथा दुरूपयोग होने पर तो तुम दोनों ही घ्रणित बन कर रह जाते हो l "
12 June 2018
WISDOM ----- अच्छे या बुरे कर्मों का फल अवश्य मिलता है , लेकिन कब मिलेगा यह काल ( समय ) निश्चित करता है l
यह मनुष्य की अदूरदर्शिता और अज्ञान है कि वह क्षणिक लाभ के लिए वर्तमान में बुरे कर्म करने , अत्याचारी , अन्यायी का साथ देने के लिए तैयार हो जाता है और अच्छे कर्मों के माध्यम से लाभ कमाने के लिए तैयार नहीं होता l इसे प्रकृति अपने ढंग से समझाती है --- यदि खेत में आम बोया है तो एक निश्चित समय के बाद आम ही मिलेगा लेकिन यदि हमने बबूल बोया है तो कांटे ही मिलेंगे , उसमे किसी तकनीक से परिवर्तन संभव नहीं है l
औरंगजेब दिल्ली का शासक था , उसके पास किसी तरह की कोई कमी नहीं थी लेकिन सत्ता हथियाने के लिए उसने अपने भाइयों की हत्या करवाई , पिता को मरवाया l ऐसा कर के उसने राज्य तो पा लिया लेकिन उसका अंतिम जीवन बहुत कष्टपूर्ण था , विक्षिप्त होकर मरा l
इसके विपरीत सम्राट अशोक ने ह्रदय परिवर्तन के बाद जनता के कल्याण के अनेकों कार्य किये , प्रजा जनों को सुशासन देने के हर संभव कार्य किये इसलिए आज भी सम्राट अशोक का नाम आदर के साथ लिया जाता है l
औरंगजेब दिल्ली का शासक था , उसके पास किसी तरह की कोई कमी नहीं थी लेकिन सत्ता हथियाने के लिए उसने अपने भाइयों की हत्या करवाई , पिता को मरवाया l ऐसा कर के उसने राज्य तो पा लिया लेकिन उसका अंतिम जीवन बहुत कष्टपूर्ण था , विक्षिप्त होकर मरा l
इसके विपरीत सम्राट अशोक ने ह्रदय परिवर्तन के बाद जनता के कल्याण के अनेकों कार्य किये , प्रजा जनों को सुशासन देने के हर संभव कार्य किये इसलिए आज भी सम्राट अशोक का नाम आदर के साथ लिया जाता है l
11 June 2018
WISDOM ------ कर्तव्य ही धर्म है
महाभारत समाप्त हुआ l पुत्रों के वियोग में दुःखी धृतराष्ट्र ने महात्मा विदुर को बुलाया l चर्चा के बीच उनसे पूछा --- " विदुर जी ! हमारे पक्ष का एक - एक योद्धा इतना सक्षम था कि सेनापति बनने पर उसने पांडवों के छक्के छुड़ा दिए l यह जीवन - मरण का युद्ध है , यह सबको पता है l यह सोचकर सेनापति बनने पर एक - एक कर के अपना पराक्रम प्रकट करने की अपेक्षा कर्तव्य बुद्धि से एक साथ पराक्रम प्रकट करते तो क्या युद्ध जीत न पाते l "
विदुर जी बोले ---- " राजन ! आप ठीक कहते हैं l वे जीत सकते थे यदि अपने कर्तव्य को ठीक प्रकार समझते और अपना पाते, परन्तु अधिक यश अकेले बटोर लेने की तृष्णा तथा अपने को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शित करने की अहंता ने वह कर्तव्य सोचने , उसे निभाने की उमंग पैदा करने का अवसर ही नहीं दिया l "
थोड़ा रूककर विदुर जी बोले ----- राजन ! उनके इतना न सोच पाने और न जीत पाने का दुःख न करें l उन्हें तो हारना ही था l कर्तव्य समझे बिना जीत का लक्ष्य नहीं मिल सकता l यदि वे कर्तव्य को महत्व दे पाते तो युद्ध का प्रश्न ही न उठता l कर्तव्य के नाते भाइयों का हक देने से उन्हें किसने रोका था l स्वयं युगपुरुष श्री कृष्ण समझाने आये थे , पर तृष्णा ऐसी कि पांच गाँव भी न छोड़े l अहंता ने न पितामह की सुनी , न युगपुरुष की l जिन वृतियों ने युद्ध पैदा किया , उन्होंने हरा भी दिया l
विदुर जी बोले ---- " राजन ! आप ठीक कहते हैं l वे जीत सकते थे यदि अपने कर्तव्य को ठीक प्रकार समझते और अपना पाते, परन्तु अधिक यश अकेले बटोर लेने की तृष्णा तथा अपने को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शित करने की अहंता ने वह कर्तव्य सोचने , उसे निभाने की उमंग पैदा करने का अवसर ही नहीं दिया l "
थोड़ा रूककर विदुर जी बोले ----- राजन ! उनके इतना न सोच पाने और न जीत पाने का दुःख न करें l उन्हें तो हारना ही था l कर्तव्य समझे बिना जीत का लक्ष्य नहीं मिल सकता l यदि वे कर्तव्य को महत्व दे पाते तो युद्ध का प्रश्न ही न उठता l कर्तव्य के नाते भाइयों का हक देने से उन्हें किसने रोका था l स्वयं युगपुरुष श्री कृष्ण समझाने आये थे , पर तृष्णा ऐसी कि पांच गाँव भी न छोड़े l अहंता ने न पितामह की सुनी , न युगपुरुष की l जिन वृतियों ने युद्ध पैदा किया , उन्होंने हरा भी दिया l
Subscribe to:
Posts (Atom)