पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'धन का आकर्षण बड़ा जबरदस्त है l जब लोभ सवार होता है , तो मनुष्य अँधा हो जाता है और पाप - पुण्य में कुछ भी फर्क नहीं देखता है l धन - सम्पदा पाने के लिए वह बुरे से बुरे कर्म करने पर उतारू हो जाता है और स्वयं भी उस पाप के फल से नष्ट हो जाता है l आचार्य श्री लिखते हैं ---- ' लोभ आते ही अर्थात अन्यायपूर्वक द्रव्य लेने की इच्छा होते ही पाप की भावनाएं बढ़ती हैं , क्योंकि पाप का बाप लोभ है l धन जीवन के लिए बहुत जरुरी है लेकिन पैसा बढ़ने के साथ - साथ लोगों का ईमान , लोगों का दृष्टिकोण और चिंतन भी बढ़ना चाहिए l यदि दृष्टिकोण का परिष्कार न हुआ , लोगों के हृदय में संवेदना और ईमान नहीं है तो यह विनाश का कारण होगा l गरीबी से ज्यादा अमीरी महँगी पड़ सकती है l ------- गरीबी की बुराइयाँ केवल उस गरीब परिवार के लिए ही कष्टदायी होती हैं लेकिन अमीरी की जो बुराइयाँ हैं वे न केवल समाज बल्कि सारे संसार के विनाश का कारण बन जाती हैं l धन और बुद्धि --यदि इन दोनों का सदुपयोग न हो तो ये दोनों मिलकर संसार में तबाही ला सकती हैं l
21 September 2021
19 September 2021
WISDOM-------
देवता हों या असुर जो भी तपस्या करता है , संघर्ष करता है उसे उसका प्रतिफल, वरदान अवश्य मिलता है l पुराणों में अनेक कथाएं हैं जिनमे यह बताया गया है कि असुर बहुत कठिन तपस्या करते हैं l देवता या दैवी प्रकृति के लोग जब तपस्या करते हैं तो उनका उद्देश्य लोक कल्याण होता है और वे इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर ईश्वर से वरदान मांगते हैं लेकिन असुर कठिन तपस्या इसलिए करते हैं कि उन्हें ईश्वर से अमर होने का वरदान मिल जाये l कलियुग में जब आसुरी प्रवृति का वर्चस्व है तब विभिन्न अविष्कार - अनुसन्धान इसी उद्देश्य से किए जाते हैं कि किसी तरह मृत्यु से बचा जाएँ , उसे हराया जाये , ऐसा इलाज हो कि मृत्यु असंभव हो जाये लेकिन क्या कोई मृत्यु से बचा है ? पुराण में एक कथा है ------ तारकासुर ने कठोर तप किया और ब्रह्मा जी से अमरता का वरदान माँगा l ब्रह्मा जी ने कहा --- यह तो प्रकृति के विरुद्ध है , तब तारकासुर ने कहा ---- ऐसा वरदान दें कि मैं केवल शिव पुत्र के हाथों ही मारा जाऊं l उस समय शिवजी तप और वैराग्य में इतने लीन थे कि उनके विवाह की संभावना ही नहीं थी l इसलिए तारकासुर ने सोचा कि जब शिवजी का विवाह ही नहीं होगा , तो पुत्र भी नहीं होगा और इस तरह वो अमर बना रहेगा l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- मृत्यु को असंभव बनाने वाले वरदान असुरों को मिल भी जाते हैं किन्तु जीवन - मृत्यु प्रकृति का अनिवार्य व्यवस्था क्रम है l जब किसी स्थान पर कोई कर्म किया जाता है तो तत्काल प्रकृति इसके परिणाम देने की व्यवस्था करने लगती है और असुरों को मृत्यु को असंभव बनाने का वरदान मिल जाता है लेकिन प्रकृति सही समय , सही स्थान में उनकी मृत्यु -- उन्ही के बताये रास्ते के अनुसार उन्हें खोज लेती है l , वरदान के अनुरूप शिव - पार्वती का विवाह हुआ और उनके पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया l आज के युग में भी चिकित्सा के क्षेत्र में कितनी प्रगति हुई है कि किसी तरह लोगों का जीवन बच जाये लेकिन जितने इलाज हैं उससे कहीं ज्यादा और नई - नई बीमारियाँ हैं l यहाँ भी प्रकृति का नियम है , मृत्यु सही समय व सही स्थान पर जिसकी आ गई है , उसे खोज लेती है l इसलिए मनुष्य का प्रयास मृत्यु से बचने का नहीं , जीवन को सार्थक करने का होना चाहिए l
WISDOM--------
राम -रावण का युद्ध समाप्त हुआ l रावण के अतिरिक्त युद्ध में कुम्भकरण की भी मृत्यु हुई l कुम्भकरण के पुत्र का नाम था मूलकासुर l मूलकासुर जब बड़ा हुआ तो उसके मन में प्रतिशोध की भावना बलवती हुई l घनघोर तपस्या कर उसने अपार शक्ति अर्जित कर ली और वरदान प्राप्त किया कि उसकी मृत्यु किसी नर के हाथों नहीं होगी l असुरों की निगाह में नारी का कोई महत्त्व नहीं है , वे नारी शक्ति को समझते नहीं हैं इसलिए ऐसा वर माँगा l इसके उपरांत उसने असुरों की सेना एकत्र कर लंका पर चढ़ाई कर दी , उस समय लंका पर विभीषण का राज था , उसने अपनी हार प्रत्यक्ष देखकर भगवान राम से सहायता मांगी l भगवान श्रीराम जानते थे कि मूलकासुर किसी नर से पराजित नहीं हो सकता l इस स्थिति में भगवान राम ने सीताजी से अनुरोध किया l सीताजी ने वहां पहुंचकर भगवती का रूप धारण कर मूलकासुर का वध किया , आदिशक्ति के हाथों असुरता का संहार हुआ l
18 September 2021
WISDOM-----
बहुत सारे केकड़े एक गड्डे में रहा करते थे l एक दिन आसमान में जोर से बिजली कड़की तो उसकी आवाज सुनकर सारे केकड़े चौंक गए , किन्तु केकड़ों का राजा खुश होकर बाकी केकड़ों से बोला ---- " मेरे प्यारे देशवासियों ! मैं तुम्हे खुशखबरी देना चाहता हूँ कि अभी जो आकाशवाणी तुमने सुनी उसके अनुसार मुझे इंद्र का सिंहासन प्राप्त हो गया है , अब मैं स्वर्ग की ओर प्रस्थान करूँगा l " यह कहकर केकड़ों के राजा ने गड्ढ़े से बाहर निकलने का प्रयास आरम्भ किया , परन्तु बाकी सारे केकड़े उसके पैरों को पकड़ कर लटक गए और सब एक दूसरे पर आ गिरे l इस आपा -धापी में केकड़ों का राजा कुचलकर मारा गया l स्वार्थियों और बुद्धिहीनों की जोड़ी हमेशा दुर्गति को प्राप्त होती है l
17 September 2021
WISDOM-----
घटना रूस की है ---जार के महामंत्री ने एक दिन अपने सचिव को बुलाकर कहा कि वह उन लोगों की सूची बनाये ,जो अपने लेखों में उनकी आलोचना करते रहे हैं l आदेशानुसार सूची बनाकर महामंत्री विटी को दी गई l सूची में लगभग सौ नाम थे l महामंत्री ने पुन: सचिव से कहा कि इसमें उसका नाम ढूंढ़ के लाओ , जिसने सबसे कठोर आलोचना की हो l सचिव ने पूछा --- उस व्यक्ति को क्या सजा दी जाएगी ? ' विटी बोले ----- " कैसी सजा ? उस व्यक्ति को मैं अपने कार्यालय में नियुक्त करूँगा l क्योंकि सबसे कठोर आलोचक ही हमारा सच्चा हितैषी होता है l
16 September 2021
WISDOM ----- काल के विधान को कोई भी नहीं बदल सकता
विधि का विधान अटल है , कर्म की गति को कोई भी नहीं बदल सकता , महाभारत युद्ध एक सुनिश्चित विधान था , इसे टालने के लिए स्वयं भगवान कृष्ण शांतिदूत बनकर दुर्योधन के राजप्रासाद में पहुंचे l उस काल में विदुर जैसे नीतिज्ञ , भीष्म के समान ज्ञानी एवं वीर , कुंती , गांधारी , द्रोपदी जैसी पतिव्रताएँ और अनेक योगी , तपस्वी थे l सबके सम्मिलित प्रयास के बावजूद युद्ध टाला न जा सका l ऋषियों का कहना है --- चरम पुरुषार्थ के बाद भी यदि अनहोनी न टले तो उसे नियंता का विधान कहते हैं l युद्ध उस काल का विधान था और भगवान श्रीकृष्ण को बिना अस्त्र -शस्त्र उठाए उसे संचालित करना था l इस युद्ध में कौरव पक्ष के सभी महारथी मारे गए l गांधारी शिव भक्त थीं ,सारा जीवन आँखों पर पट्टी बांधकर साधना करती रहीं , कभी गलत का साथ नहीं दिया लेकिन सौ पुत्रों के मारे जाने की पीड़ा उनके हृदय में थी l जब श्रीकृष्ण उन्हें सांत्वना देने पहुंचे तो बोलीं ---- " कृष्ण ! तुम चाहते तो महाभारत रोक सकते थे , तुम सर्वसमर्थ थे l " श्रीकृष्ण बोले --- "काल के विधान को , कर्म की गति को कोई भी नहीं बदल सकता l अनीति को अधर्म को मिटना ही था , यही विधि का विधान था l " गांधारी को संतोष न हुआ और उसने कृष्ण को शाप दे दिया कि जैसे उसके कौरव वंश का अंत हुआ वैसे ही कृष्ण के यादव कुल का भी अंत होगा l " गांधारी का शाप फलित हुआ l यादवों की लड़ाई में श्रीकृष्ण का सारा कुल नष्ट हो गया l भगवान कृष्ण अपने ही वंश को लड़ते -मरते -कटते शांत होकर देखते रहे l भ्राता बलराम ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की , परन्तु भगवान कृष्ण ने कहा कि यही विधान है , इस वंश का अंत होगा और द्वारका समुद्र के गर्भ में समा जाएगी , और यही हुआ l इस कथा में महत्वपूर्ण बात यह है कि संसार में जो भी घटनाएं घटित होती है , वह सब ईश्वरीय विधान है , लेकिन इन घटनाओं का कोई निमित्त होता है l श्रीकृष्ण के कुल के नाश के लिए काल ने गांधारी को निमित्त बना दिया l उसके जीवन भर की तपस्या इस शाप के माध्यम से निकल गई l आज भी संसार में विभिन्न उत्थान -पतन की , अच्छी - बुरी घटनाएं घटित होती हैं , हम जागरूक रहें और सोच -समझ कर कर्म करें , हम किसी के पतन का , किसी बुरी घटना का निमित्त न बनें l ईश्वर हमारा चयन किसी के उत्थान के लिए , संसार में श्रेष्ठ कार्यों को अंजाम देने के लिए हमें निमित्त बनाए l
15 September 2021
एक चोर चोरी करते पकड़ा गया l राजा ने उसे फांसी की सजा दे दी l जब उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई तो उसने कहा --- " मैं प्रजापालक महाराज के एक बार दर्शन करना चाहता हूँ l " राजा दयालु था l वह मिलने चोर के पास आया l चोर ने कहा ---- "राजन ! मैंने अपराध किया है , मुझे मरने का कोई अफ़सोस नहीं , पर एक विद्या मेरी मृत्यु के साथ ही इस लोक से लुप्त हो जाएगी l " राजा ने पूछा ---- कौन सी विद्या ? ' चोर बोला ---- " सोने की कृषि की l मैं खेतों में सोना देने वाला पेड़ उगा सकता हूँ l " राजा ने फाँसी स्थगित कर दी और चोर के कहने पर एक बड़ा सा खेत जुतवा दिया l दिन रात हल चलने लगे l राजा स्वयं दिन में तीन - चार बार जाकर देखता l एक ,महीना बीत गया l जिस दिन बीज बोन का क्रम आया , सारी प्रजा खेत के चारों और खड़ी थी , चोर ने अपनी जेब से काले - काले बीज निकाले और एक ऊँची जगह पर खड़ा होकर बोला ----- " यह स्वर्णलता के बीज हैं , जो मैं शल्य देश से लाया था , पर काश ! मैं पहले से चोर न होता तो खुद ही सोना उगाकर पृथ्वी का सबसे बड़ा कुबेर बन जाता l " फिर वह बोला ---- " इन बीजों को वही बो सकता है , जिसने पहले कभी चोरी न की ही , कोई अपराध न किया हो l यदि अपराध किया होगा तो शरीर तुरंत संज्ञाशून्य हो गिर जायेगा l आप तो सभी धर्मात्मा हैं , आइये l " प्रजा ही नहीं राजा भी चुपचाप खड़े थे l सभी ने कभी न कभी कोई अपराध या चोरी की ही थी l सब वहां से खिसक गए l जब राजा भी जाने लगा तो वह बोला ---- महाराज ! आप तो बो ही सकते हैं l " वे कैसे बोते ? जब से होश संभाला , हर दिन की घटनाएं आँखों के सामने घूमने लगीं , निरपराध तो वे भी नहीं थे l फिर चोर बोला ---- महाराज ! मुझे अकेले को फाँसी क्यों दे रहे हैं ? " ------- ---------- चाणक्य ने एक साधारण बालक चन्द्रगुप्त मौर्य को राष्ट्र निर्माता बना दिया l चाणक्य ने अपने शिष्य को शस्त्र और शास्त्र में पारंगत बनाने के साथ - साथ उसके चरित्र गठन की ओर भी ध्यान दिया l उनका यह स्पष्ट मत था कि चरित्र ही समस्त सफलताओं और सदुद्देश्यों को प्राप्त करने का मुख्य आधार है l इसके आभाव में बड़े - बड़े शक्तिशाली साम्राज्य और सम्राटों का नाश व पतन हुआ है l