ईश्वर के समक्ष अच्छे और बुरे लोगों के प्रति कोई भेदभाव नहीं है l ईश्वर यदि किसी की प्रार्थना सुनते हैं तो वह है सच्चे लोगों की l इसलिए तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है ------ ' निर्मल मन जन सो मोहि पावा , मोहि कपट छल छिद्र न भावा l ' भगवान को तो निष्कपट और सरल हृदय मनुष्य ही प्रिय हैं और इन्ही में भगवान का वास होता है l गीता में कहा है --- भगवान दुराचारी के तो हो सकते हैं पर कपटी के कभी नहीं हो सकते l श्री कृष्ण ने कुब्जा का कूबड़ तो ठीक कर दिया था क्योंकि अनन्य भाव से श्रीकृष्ण उसमे बसते थे , लेकिन कपट लेकर आई रावण की बहन सूर्पणखा जो कहती थी --- " तुम सम पुरुष न मो सम नारी " को अपनी नाक कटवा कर जाना पड़ा भगवान कभी छल - कपट पसंद नहीं करते l
11 October 2021
9 October 2021
WISDOM --------
प्रसंग है ---- डाकुओं के आत्मसमर्पण के संबंध में विनोबा भावे और पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के परस्पर विचार - विमर्श का l बात उन दिनों की है जब विनोबा जी पूरे देश की पद यात्रा पर निकले थे और तब कश्मीर में थे तभी उन्हें मशहूर डाकू मानसिंह के पुत्र तहसीलदार सिंह का पत्र मिला , वह तब नैनी जेल में था और उसे फाँसी की सजा सुनाई जा चुकी थी l उसने लिखा था कि वह मरने से पहले विनोबा जी के दर्शन करना चाहता है l विनोबा जी ने अपने प्रतिनिधि यदुनाथ सिंह को बातचीत के लिए भेजा l यदुनाथ सिंह नैनी गए , वहां से चम्बल के बीहड़ों में गए l वहां डाकुओं ने उनके बसमने प्रस्ताव रखा की यदि विनोबा जी इस क्षेत्र की यात्रा करें तो कई डाकू आत्म -समर्पण कर सकते हैं l डाकुओं की समस्या उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में ही सर्वाधिक थी l विनोबा जी ने इस सम्बन्ध में अनेक मनस्वी व्यक्तियों से विचार विमर्श किया और इसी क्रम में उन्होंने आचार्य श्री से भी बातचीत की और कहा कि डाकू नेक चलनी का भरोसा देते हैं उन्हें सुधरने का अवसर देना चाहिए विनोबा जी का कहना था कोई जन्म से डाकू नहीं होता यह तो शोषण , क्रूरता और संवेदनहीनता का परिणाम है l इस पर आचार्य श्री का कहना था कि जिसने अपराध किया है , उसे दंड मिलना ही चाहिए l समाज के प्रति अपराध करने वाले को क्षमा नहीं किया जाये l उनका कहना था कि अपराध को क्षमा कर देने से एक गलत परिपाटी जन्म लेगी l माफ़ी मांगकर छूट जायेंगे , यह सोचकर दूसरे लोग भी अपराध में प्रवृत हो सकते हैं l विनोबा जी का कहना था कि आप आचार्य हैं , आपको विदित होगा कि प्राचीन काल में भी हृदय परिवर्तन के बाद क्षमा का विधान रहा है , वाल्मीकि और अंगुलिमाल इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं l आचार्य श्री ने कहा ----- ' वे घटनाएं अपवाद थीं और क्षमा के बाद उन्होंने घनघोर प्रायश्चित भी किया था लेकिन डाकुओं को क्षमा के बाद हम सम्मानित जीवन दे रहे हैं l आचार्य श्री ने कहा ------- आपके प्रयत्न महान हैं लेकिन इन प्रयत्नों की सफलता में कुछ खतरे भी हैं l क्षमा मिल जाने के बाद डाकू रहेंगे तो ग्राम समाज में ही , उनका रौब - दाब भी रहेगा l सामान्य नागरिक स्वीकार कर लेने पर भविष्य में उनका राजनीतिक उपयोग भी हो सकता है l चुनाव आदि के समय लोगों को अपने पक्ष में वोट डलवाने के लिए उनकी स्थिति का उपयोग किया जा सकता है l विनोबा जी ने इस आशंका को सही माना लेकिन क्षमादान को स्थगित नहीं किया l आचार्य श्री के परामर्श पर आज चिन्तन करने की आवश्यकता है l
7 October 2021
WISDOM ------
इस संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि मृत्यु को निश्चित जानकर भी मनुष्य यह चाहता है कि वो अमर हो जाये l इसके लिए चिकित्सा क्षेत्र में तरह - तरह के अनुसन्धान किये जाते हैं l प्रचार - प्रसार द्वारा सामान्य जन को समझाया जाता है कि इन सब तरीकों से वे स्वस्थ हो जायेंगे l एक लेख में पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ------ " जरा , मृत्यु तथा व्याधि का ही निवारण तो कर सकोगे l भय -शोक , लोभ , मोह , ईर्ष्या - द्वेष तो मनुष्य के मन से उत्पन्न होते हैं l ये दुःख तो उसके मन से पैदा होते हैं l अमर होने मात्र से मनुष्य सुखी कैसे हो जायेगा ? मृत्यु से अभय होकर अजितेन्द्रिय प्राणी अधिक तमोगुणी , विषय लोलुप , अधर्माचारी होकर परिणामस्वरूप अनंत काल तक अशांत , क्षुब्ध और दुःखी रहने लगेगा l मानव का कल्याण चाहते हो तो उसके विचारों में परिवर्तन करो l उसके शरीर का नहीं मन का कायाकल्प करो l उसे जीवन जीने की कला सिखाओ l
WISDOM -------
स्वामी विवेकानंद ने अपने शिष्य को एक कथा सुनाई ------ एक तत्वज्ञानी अपनी पत्नी से कह रहे थे , संध्या आने वाली है कपड़े समेट लो l एक सिंह कुटी के पीछे यह सुन रहा था ' उसने समझा कि संध्या कोई बड़ी शक्ति है , जिससे डरकर यह निर्भय रहने वाले ज्ञानी भी अपना सामान समेटने को विवश हुए l सिंह चिंता में डूब गया और संध्या का डर सताने लगा l पास के घाट का धोबी दिन छिपने पर अपने कपड़े समेट कर गधे पर लाने की तयारी करने लगा l इधर - उधर देखा तो गधा गायब था l रात घिर आई और पानी बरसने लगा l धोबी को एक झाडी में खड़खड़ाहट सुनाई दी , वह समझा कि गधा है तो उसे लाठी से पीटने लगा --- धूर्त यहाँ छिपकर बैठा है , सिंह की पीठ पर लाठियाँ पड़ीं तो उसने समझा यही संध्या है , सो डर से थर - थर काँपने लगा l धोबी उसे घसीट लाया और कपड़े लादकर घर चल दिया l रास्ते में एक दूसरा सिंह मिला , उसने अपने साथी की दुर्गति देखी तो पूछा ---- यह क्या हुआ ? तुम इस प्रकार लदे क्यों फिर रहे हो l सिंह ने कहा ---- संध्या के चंगुल में फंस गए हैं l वह बुरी तरह पीटती है और इतना वजन लादती है l सिंह को कष्ट देने वाली संध्या नहीं उसकी भ्रान्ति थी , जिसके कारण धोबी को कोई बड़ा देव - दानव समझ लिया और भार व प्रहार बिना शिर हिलाये स्वीकार कर लिया l आज मानव समुदाय की भी यही स्थिति है , जागरूकता और सद्बुद्धि के अभाव में अपने ऊपर अनेक प्रकार के बोझ लाद लिए हैं l अपने वास्तविक स्वरुप को न समझ पाने के कारण ही भटक रहा है l
6 October 2021
WISDOM-------
इंग्लैण्ड के बादशाह हेनरी पंचम जब युवराज थे , तब बड़े उजड्ड थे l एक बार न्यायधीश ने किसी अपराधी को कानून के अनुसार दंड दिया l इस पर हेनरी ने न्यायधीश से कहा ---- " मैं युवराज की हैसियत से आदेश देता हूँ कि आप इसे छोड़ दें l " न्यायधीश ने आदेश नहीं माना और कहा कानून युवराज से बड़ा है l इस पर बौखलाए हेनरी ने न्यायधीश को एक थप्पड़ जड़ दिया l जज ने तुरंत पुलिस बुलाकर उसे जेल में बंद कर दिया l साथ ही एक नोट लिखकर भेजा --- ' आगे चलकर आपको इस देश का राजा बनना है l अगर आप ही राज्य के कानूनों का सम्मान नहीं करेंगे , तो प्रजा आपकी आज्ञा क्यों मानेगी l ' हेनरी ने अपनी भूल मानी और माफी माँगी l जब वह राजा बना , तब भी उस न्यायधीश की घटना को सदा सराहता रहा l
5 October 2021
WISDOM-----
देवता और असुर इस संसार में शुरू से हैं l मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियाँ ही उसे असुर बनती हैं l यह असुरता तब और बढ़ती जाती है जब न्याय व्यवस्था कमजोर होती है , लोगों को दंड का भय नहीं होता हृदयहीनता , बर्बरता ही असुरता है इसे अपराध , आतंक कोई भी नाम दिया जा सकता है l यह एक प्रकार की मानसिक विकृति है , आपराधिक प्रवृति के लोग इसे घटिया और वीभत्स हथकंडों के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं l ऐसी विकृति का परिणाम सम्पूर्ण समाज को भुगतना पड़ता है l
WISDOM------
संस्कार नहीं बदलते l बाह्य रूप से मनुष्य स्वयं को कितना भी सभ्य , सुसंस्कृत दिखाने की कोशिश करे लेकिन अपने कार्यों से , अपनी बोली , अपने तौर - तरीके से वह स्वयं को प्रकट कर देता है , स्पष्ट हो जाता है कि उसके संस्कार कैसे हैं ? एक बोध कथा है -------- एक सधा हुआ ऊंट था l नक्कारखाने का कोई उत्सव होता तो उसकी पीठ पर नगाड़ा लाड कर चोबदार उसे बजाता हुआ चलता l ऊँट बहुत बूढ़ा हो गया l काम का न रहा तो उसे खुला छोड़ दिया गया , राजा का होने से कोई उसे मारता न था l ऊँट एक दिन किसी बुढ़िया के सूखते हुए अनाज को खाने लगा l बुढ़िया ने सूप बजाकर भगाना चाहा l ऊँट ने कहा ---- " जन्म भर नगाड़ों की आवाज सुनता रहा हूँ l तुम्हारे सूप से क्या डरने वाला हूँ l " आयु बीत जाने पर भी सारे जीवन भर के संस्कार छाये रहते हैं , किसी शिक्षा , किसी भी बात का कोई असर ही नहीं पड़ता l