काम , क्रोध , लोभ , मोह , मनुष्य की वो कमजोरियाँ हैं जिनमे फँसकर मनुष्य भटकता रहता है , उसे न मुक्ति मिलती है , न शांति l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी इसे स्पष्ट करने के लिए एक कथा कहते हैं ----- भँवरे को यों तो सभी फूलों से प्यार होता है , लेकिन उसे कमल के फूल से सबसे अधिक प्यार होता है l वह फूलों के पराग - रस का मतवाला होता है l कमल के फूल में जैसे उसके प्राण बास्ते हैं और इस अतिमोह में वह अपने प्राण गँवा देता है l सुबह से शाम तक कमल के सौंदर्य और स्वाद में खोया हुआ भंवरा सांझ होने पर भी उसके मोह से नहीं निकल पाता l सांझ होने पर सूर्य अस्त की वेला में कमल की पंखुड़ियाँ बंद होने लगती हैं , पर कमल की माया में बंधा भंवरा वहीँ जस का तस बैठा रहता है l कमल के पूरी तरह बंद होने पर भंवरा उसी में कैद हो जाता है l जो भ्रमर अपने पराक्रम से कठोर काष्ठ को भी काटकर चूर -चूर कर देता है , वही मोहवश कमल की कोमल पंखुड़ियों को नहीं काट पाता , बस , उन्ही के बीच सहमा , सिकुड़ा बैठा रहता है l उसे प्रतीक्षा रहती है सुबह होने की , पर यह सुबह उसके जीवन में कभी नहीं आती l कमल के अंदर प्राणवायु के अभाव में उसके प्राण ही निकल जाते हैं अथवा सरोवर में स्नान करने आये हाथी उस समूची कमलनाल को उखाड़ कर ही खा जाते हैं l उस भ्रमर के भाग्य में मृत्यु के अलावा और कुछ नहीं होता l
6 February 2022
5 February 2022
WISDOM ------
आज संसार में लोगों के सामने इतनी समस्याएं हैं , तनाव है , सुख -शांति नहीं है , इसके मूल में प्रमुख कारण यही है कि जीवन जीने की कला का ज्ञान नहीं है l यह ज्ञान किसी स्कूल , कॉलेज या किसी संस्था में अध्ययन करने से नहीं आता l इसके लिए श्रेष्ठ और प्रामाणिक ग्रंथों के स्वाध्याय की जरुरत है l श्रीमद्भगवद्गीता , रामायण , महाभारत और पुराणों की कथाएं हमें जीवन जीने की कला सिखाती हैं l उनके अध्ययन - मनन से यह स्पष्ट हो जाता है कि संसार में अच्छा और बुरा दोनों है , ईश्वर ने हमें चयन की स्वतंत्रता दी है , हमारी वृत्ति हंस जैसी होनी चाहिए कि हम श्रेष्ठता को चुने और अपने समय व शक्ति का सदुपयोग करें l महाभारत का पात्र - दुर्योधन , सुयोधन था लेकिन गलत मार्ग का चयन करने , ईर्ष्या , द्वेष और षड्यंत्र में लिप्त रहने के कारण वह दुर्योधन कहलाया l ईर्ष्या , द्वेष तो उसमें इतना कूट - कूटकर भरा था कि जब पांडव उसके छल - कपट से जुए में हारकर वन में थे , तब भी उसने उनके विरुद्ध षड्यंत्र करने , उन्हें परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी l जैसी उसकी करनी थी , वैसा ही उसका परिणाम उसे मिला l दूसरी और पांडव थे , जिन्होंने अपने वनवास के वर्षों को विलाप कर नहीं बिताया और न ही परेशान हुए , यह समय उन्होंने स्वयं को हर दृष्टि से अधिक योग्य बनाने में बिताया , अर्जुन ने तपस्या से भगवान शिव से और देवराज इंद्र से अमोघ अस्त्र प्राप्त किये , अपने व्यक्तित्व को निखारा , स्वर्ग की सर्वश्रेष्ठ सुंदरी उर्वशी ने जब उनसे प्रणय निवेदन किया तो अर्जुन ने कहा -- जब आप नृत्य कर रही थीं तब मेरी दृष्टि आपके चरणों पर थी , आप मेरी माँ समान पूजनीय हो l उर्वशी ने चाहे क्रोधित होकर उन्हें श्राप दे दिया , लेकिन अर्जुन का मन , उनकी भावना श्रेष्ठ थी इसलिए वह श्राप भी उनके लिए वरदान बन गया l हमारे धर्म ग्रन्थ हमें संसार से भागना नहीं सिखाते , बल्कि यह शिक्षा देते हैं कि विपरीत परिस्थितियों का कैसे सकारात्मक तरीके से , धैर्य और विश्वास के साथ सामना किया जाये l
4 February 2022
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- " धैर्य , धर्म और साहस दिव्य गुण हैं जो मनुष्य को ईश्वर विश्वास से ओत -प्रोत करते हैं l जीवन के कठिनतम समय में , सारी विपरीतताओं में भी इन गुणों का अपने जीवन में अवश्य पालन करना चाहिए l आचार्य श्री लिखते हैं --- ' धैर्य का तात्पर्य है --- अनगिनत कष्टों , पीड़ा व मान - अपमान को शांत भाव से सहना l इनसे विचलित नहीं होना और इनके प्रति प्रतिक्रिया न देना l धैर्य से आत्मबल बढ़ता है l धैर्य सहना कायरता नहीं है l धैर्यवान वही हो सकता है , जो साहसी एवं वीर होता है l सच्चा साहस धैर्य से ही जन्म लेता है l मन को किसी भी स्थिति में हीन एवं क्षीण मत होने दो l वायु और अंतरिक्ष कभी किसी से नहीं डरते l " कष्ट , अपमान , पीड़ा सहना सामान्य बात नहीं है लेकिन जो धैर्य से सब सहन करता है , प्रतिक्रिया नहीं करता वही सच्चा साहसी है l एक सत्य घटना है ------ अमेरिका का एक प्रसिद्द मुक्केबाज था , जो विश्व चैंपियन भी बना l एक बार वह एक रेस्टोरेंट में भोजन करने गया l वहां कुछ युवक भी बैठे थे , जो शराब के नशे में उस मुक्केबाज को उलटा - सीधा बोलने लगे , परन्तु वह मुक्केबाज उनकी बातों को चुपचाप सहन कर शांत भाव से वहां से वापस लौटने लगा l मुक्केबाज के साथ आये उसके मित्र बोले --- " अरे , इनसे डरकर वापस लौटने की क्या आवश्यकता है ? इनमें से कोई ऐसा नहीं है , जो तुम्हारा एक घूंसा भी ढंग से सहन कर सके l " मुक्केबाज शांत भाव से बोला ---- " यही तो बात है l निर्बल पर बल दिखाना साहसी का कार्य नहीं है , सच्चा साहस तो शक्ति होते हुए भी विपरीतताओं को सहन कर जाने में है l "
3 February 2022
WISDOM -----
मन , वचन और कर्म में एकरूपता को सत्य कहते हैं l यह सत्य भी समय और परिस्थिति को देखते हुए ही बोलने का निर्देश है l देश के रक्षक यदि गोपनीय सूचनाओं को शत्रुओं के समक्ष सही प्रकट कर दें तो राष्ट्र की रक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो जायेगा l एक कथा है ----- एक बार एक कसाई अपनी बूढ़ी गाय को ढूंढते हुए एक निर्जन स्थान से गुजरा l वहां एक ब्राह्मण वेद पाठ कर रहा था l कसाई ने उससे गाय के बारे में पूछा , तो उसने वस्तुस्थिति को भांपते हुए गोलमोल उत्तर दिया , कहा --- जिसने देखा , वह बोलती नहीं और जो बोलती है उसने देखा नहीं l इससे एक साथ दो प्रयोजन सधे l गाय की प्राण रक्षा भी हो गई और मिथ्या न बोलने का संकल्प भी पूरा हो गया l ऐसे ही कठोर सत्य को न बोलने के निर्देश हैं l
2 February 2022
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- अहंकार एक ऐसा दोष है जिसके उत्पन्न होते ही काम , क्रोध , लोभ , मोह , ईर्ष्या द्वेष आदि विकार उठ खड़े होते हैं l ' अहंकार का सबसे बड़ा दोष यह है कि अहंकारी चाहता है कि सब उसके आगे सिर झुकाएं , वही सर्वश्रेष्ठ है l अहंकार को जब पोषण नहीं मिलता तब यही अहंकार उसे काँटे की तरह चुभता है , घाव की तरह रिसता है l अहंकार घाव है , फिर हर चीज उसी में लगती है l अहंकारी स्वयं अपने लिए नरक की सृष्टि करता है , उससे किसी की हँसी , किसी की ख़ुशी देखी नहीं जाती l वह अपनी पूरी ऊर्जा दूसरों की ख़ुशी छीनने में ही गँवा देता है रावण , कंस , दुर्योधन , हिटलर आदि को उनका अहंकार ही खा गया l हिरण्यकश्यप तो स्वयं को भगवान समझने लगा था , उसके अहंकार को तो अपने ही पुत्र प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से ही चोट लगी l उसने अपने पुत्र को मृत्यु के मुँह में धकलने के असंख्य प्रयास किए l कहते हैं जिसके हृदय में ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास हो , वह मृत्यु को दिन - रात अपने सामने देखकर भी विचलित नहीं होता क्योंकि उसे पता है कि उसके जीवन की बागडोर भगवान के हाथ में है l भगवान भी अपने भक्त को कष्ट देने वाले को कभी क्षमा नहीं करते l जब हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने दौड़ा तो नृसिंह भगवान खम्भे से प्रकट हो गए और हिरण्यकश्यप को अपनी गोदी में लिटाकर अपने नाखूनों से उसका पेट चीर डाला l जिस वरदान के बल पर वह इतना अहंकारी था , उसी से उसका अंत हो गया l
1 February 2022
WISDOM -----
आज हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं , यंत्रों के साथ रहने से मन भी यंत्रवत हो गया है l धर्म के नाम पर जितने झगड़े , दंगा - फसाद इस युग में हुआ , उतना पहले कभी नहीं हुआ l कहा तो यही जाता है कि महाभारत -- धर्म और अधर्म के बीच युद्ध था , जो धर्म पर था वह विजयी हुआ l लेकिन जो युद्ध कर रहे थे , वे सब भाई - भाई थे , एक ही जाति के थे l इसी तरह राम - रावण के बीच युद्ध भी धर्म और अधर्म के बीच था l रावण तो परम शिवभक्त था , महापंडित , वेद - शास्त्रों का ज्ञाता था , फिर भी वह अधर्मी था , उसी की तरह आसुरी प्रवृति के उसके साथी थे l भगवान राम धर्म के रथ पर सवार थे , उनकी सेना में नर , वानर , भालू , रीछ सब थे l जाति के आधार पर कोई विवाद नहीं था , अनीति , अत्याचार और अन्याय को मिटाने के लिए युद्ध था l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- ' धर्म का मर्म है ----- अन्याय का प्रतिकार , अनीति का विरोध एवं आतंक का उन्मूलन l धर्म की सार्थकता प्रकृति का पोषण करने में है और कमजोर व दीन - दुःखियों के पीड़ा और पतन निवारण में है l " मनुष्य पर दुर्बुद्धि का प्रकोप है , स्वार्थ , लोभ , लालच ऐसा हावी है कि वह धर्म के मर्म को नहीं समझता और अपनी सारी ऊर्जा व्यर्थ के झगड़ों में व्यय कर देता है जिनका कोई सकारात्मक परिणाम भी नहीं निकलता l सत्य तो यही है कि महाभारत की तरह अत्याचार , अन्याय , उत्पीड़न परिवार से ही शुरू होता है जैसे भीम को जहर देकर तालाब में फेंक दिया , लाक्षागृह में पांडवों को जलाने का प्रयास , फिर द्रोपदी का अपमान ---- यही अत्याचार , अपमान , अन्याय ने युद्ध का रूप ले लिया l जिनकी धर्म में रूचि है वे जहाँ हैं वहीँ अत्याचार , उत्पीड़न को रोकें तभी वे सच्चे धार्मिक होंगे l
31 January 2022
WISDOM ------
कहते हैं जो कुछ महाभारत में है , वही इस धरती पर भी है l जिनका दृष्टिकोण सकारात्मक है वे इस महाकाव्य से अच्छी बातों को सीखकर अपने जीवन को सार्थक करते हैं लेकिन जो आसुरी प्रकृति के हैं वे षड्यंत्र , फरेब , छल , अनीति , अत्याचार --- महाभारत से ही सीखते हैं l फिर उनका अंत भी वैसा ही होता है जैसा कौरवों का हुआ l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य श्री लिखते हैं ---- " नीति से नियति का निर्माण होता है l नीति का मतलब है व्यक्ति का उद्देश्य क्या है ? वह क्या करता है ? और नियति उसके कर्मों का परिणाम होती है l " दुर्योधन आदि कौरव सदा से ही षड्यंत्रकारी , फरेबी और अहंकारी थे l उनका उद्देश्य छल , कपट से , षड्यंत्र से पांडवों का हक छीनकर स्वयं को स्थापित करना था l अधर्म और पाप का आचरण ही उनकी नीति थी l इस कारण विनाश ही उनकी नियति थी l भीष्म पितामह , गुरु द्रोणाचार्य , कृपाचार्य और कर्ण जैसे महारथी भी दुर्योधन को विनाश की नियति से नहीं बचा पाए और अधर्म का साथ देने के कारण स्वयं भी नष्ट हो गए l इसके ठीक विपरीत पांडव सदाचारी , सत्य , न्यायप्रिय , और परोपकारी थे l उनकी नीति और आचरण धर्म के अनुकूल था इस कारण भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं उनके रथ की बागडोर सम्हाली l इस महासंग्राम में पांडव विजयी हुए l हम भी सतत श्रेष्ठ कर्म और अच्छी नियत द्वारा अपनी नियति को श्रेष्ठ बना सकते हैं l