7 March 2022

WISDOM

  मनुष्य  के  अहंकार  और  दूसरों  पर  अपनी  हुकूमत  जताने  की  चरम  सीमा  ' युद्ध  '  है  l   अपनी  शक्ति  की  धाक  जमाने   के  लिए  ही  युद्ध  होता  है   l   रामायण  और  महाभारत  काल  में   जो  अस्त्र - शस्त्र   थे   उन्हें  मन्त्रों  से    सिद्ध    किया  जाता  था   l   अनेक  अस्त्रों  के  साथ  यह  शर्त  जुड़ी   थी  कि   किसी  निर्दोष  पर  उनका  प्रयोग  न  किया  जाये ,  यदि  कोई  ऐसा  करता  है  तो  वह  अस्त्र  पलटकर   प्रयोग  करने  वाले  के  ही  प्राण  ले  लेगा   l   किसी  भी  युद्ध  में  निर्दोष   प्राणियों , बच्चों ,  महिलाओं  की  हत्या  करना   और   पर्यावरण  को   प्रदूषित  करने  को   सहमति  नहीं  दी  गई  है  l   जिसने  ऐसा  किया  उसे  स्वयं  भगवान  ने  दंड  दिया   l    महाभारत का  युद्ध   शुरू  होने  से  पहले  ही   भगवान  श्रीकृष्ण  ने  प्रतिज्ञा  की  थी  कि  वे  युद्ध  में  अस्त्र - शस्त्र  नहीं  उठाएंगे   l   जब  युद्ध  समाप्त  हो  गया   तब   रात्रि  के  समय  जब  सब  शिविर  में  सो  रहे  थे  तब  द्रोणाचार्य  के  पुत्र  अश्वत्थामा  ने  शिविर  में  आग  लगा  दी   और  द्रोपदी  के   अबोध   पांच  पुत्र   जो    निद्रा  में  थे  उनका  वध  कर  दिया  l   इतना  ही  नहीं  उसने   अभिमन्यु  की  पत्नी  उत्तरा  के  गर्भ  की   ओर   लक्ष्य  कर  के  ब्रह्मास्त्र  का  प्रयोग  किया  जिससे  पांडवों  का  वंश  ही  समाप्त  हो  जाये  l   भगवान  कृष्ण  ने  उत्तरा  के  गर्भ  की  रक्षा   की    लेकिन  अश्वत्थामा  के  इस  दुष्कृत्य  को  क्षमा  नहीं  किया    l   अश्वत्थामा  के  मस्तक  पर  मणि  चमकती  थी  ,  भगवान  ने  भीम  से  कहा  -- इसकी  यह   मणि  निकाल  दो   l   जिससे  उस  स्थान  पर   कभी  न  ठीक  होने  वाला  घाव   हो गया   l   इस   घाव  को  लेकर  जिससे  मवाद  रिसता   था  , अश्वत्थामा  न  जाने  कितने  वर्षों  से  भटक  रहा  है  l   यह  प्रसंग  उन  लोगों  को  जागरूक  करने  के  लिए  है    जो   युद्ध  हो  या  कोई  अन्य  परिस्थिति  हो  बच्चों  को  सताते  हैं ,  अमानुषिक  व्यवहार  करते  हैं  l   और   अनेक    सब  जानकर  भी  अनजान  बने  रहते  हैं  l   हर  क्रिया  की  प्रतिक्रिया  होती  है   l   प्रकृति  में  क्षमा   का प्रावधान  नहीं  है   l 

6 March 2022

WISDOM--------

   सच्चा  मित्र  कौन  है   ?    सच्चा  मित्र  वो  है  जो  आपको  गलत  राह  पर  चलने  से  रोके  l   सच्चाई  और  ईमानदारी  से  स्वयं  जीवन  जिए   और आपको  भी   वैसा  ही  जीवन   जीने  की  प्रेरणा  दे   l ---- यदि  ऐसा  नहीं  है   तब  वह  मित्रता  स्वार्थ   के  लिए  है   l   ऐसा  मित्र  यदि  पाप  के  रास्ते  पर  चलता  है   और  स्वार्थवश  आप  उसका  समर्थन  करते   हैं   तो  यह  उसके  पाप  में  भागीदारी  हो  गई   और  इसके  साथ  ही   प्रकृति  के  दंड  से  भी  नहीं  बच  सकते   l   ---महाभारत  का  एक  पात्र  कर्ण   का  जीवन  कुछ  ऐसा  ही  था   l   जब  सभा  में  उसको  सूत पुत्र  कहकर  अपमानित  किया  जा  रहा  था  ,  तब  दुर्योधन  ने  उसको  अंगदेश  का  राजा  बनाकर  सम्मान  दिया  था  l   इस  एहसान   के  कारण  ही  कर्ण   ने  मित्र- धर्म  निभाया  l   दुर्योधन  अधर्म  पर  था   l   मामा   शकुनि  के  साथ  मिलकर  पांडवों   को  हर  तरह  से  परेशान    करना   l   छल कपट  और  षड्यंत्र  ही   उसकी  नीति   थी  l   कर्ण   में  विवेक  था  वह  जानता   भी  था  कि   दुर्योधन  गलत  है  ,  लेकिन  उसने   कभी  दुर्योधन  को  सही - गलत  नहीं  समझाया  ,  पांडवों  के  प्रति  किये  जाने  वाले   उसके  हर  गलत  कदम  का  समर्थन  किया  l   उसका  कहना  था  कि   यह  उसका  मित्र  के  प्रति  धर्म   है  l  अधर्मी  और  अत्याचारी  का  साथ  देने   का परिणाम    उसके  लिए  घातक  हुआ  l   कर्ण    महावीर   और महादानी  था  , वह  यह  जनता   था कि   वह  सूर्य पुत्र  है   लेकिन  अधर्म  और  अन्याय  का  साथ  देने  के  कारण  वह  पराजित  हुआ   l   अत्याचारी  और  अन्यायी  स्वयं  तो  डूबता  है  ,  अपने  मित्र  और  कुटुम्बियों  को  भी  संग  में  ले  डूबता  है   l 

WISDOM -----

    संसार  में  आज   जितनी  भी  समस्याएं  हैं  उनके  लिए  मनुष्य  स्वयं  जिम्मेदार  है   l   जीवन  का  कोई  भी  क्षेत्र  हो  , यदि  उसमें  संतुलन  न  हो  तो   अशांति  उत्पन्न  होती  है   l   जैसे   किसी  राज्य  में  सुख - शांति  हो  ,  कुशल  प्रशासन  हो  , इसके  लिए  एक  विशेष  प्रशासनिक  योग्यता  की  आवश्यकता  होती  है   l    इसी तरह  व्यापारिक  कार्यों  के  लिए  एक  अलग  कुशलता  की  आवश्यकता  होती  है   l   ये  दोनों  योग्यता  बिलकुल  अलग  है   और  इन  दोनों  के  उद्देश्य  भी  अलग  हैं   l    अब  यदि  राजनीति   में    व्यापारिक  बुद्धि  का  दखल  हो  जायेगा  ,  तो  संतुलन   भंग    हो  जायेगा   फिर  उनके  गुणा - भाग  , लाभ  सक्रिय  हो  जायेंगे  , इसका  खामियाजा  जनता  को  भुगतना  पड़ेगा  l '   व्यापार  '   यह   ऐसा  ही  है  ,  जिस  भी  क्षेत्र  में  घुस  जाये   , चाहे  वह  शिक्षा  हो , चिकित्सा  हो , सुरक्षा  हो  ,   उसी  क्षेत्र  का  बंटाधार  कर  देता  है   l   इसलिए   हमारे प्राचीन  ऋषियों  ने  हर  क्षेत्र   की  मर्यादा  निर्धारित  की  थी   l    

5 March 2022

WISDOM ----

    यह  एक  निश्चित  तथ्य  है  कि   जो  लोग  छल - कपट, षड्यंत्र , अत्याचार , अन्याय , अपराध     या  कोई  भी  अनैतिक    कार्य  करते  हैं   तो  इसकी  शुरुआत  उनके  बचपन  से  ही  हो  जाती  है   l   यदि  उन्हें  उसी  वक्त  उस  गलती  को  करने  से  रोका  जाये  ,  उस  गलती  के  लिए  दंडित   किया  जाये   तो  वह  बुराई  आगे  नहीं  बढ़ेगी   लेकिन  जब  समझदार  लोग   मूक  दर्शक  बने  रहते  हैं   तो  वह  गलती  आगे   चलकर विकराल  रूप  ले  लेती  है    महाभारत   का प्रसंग  है  -----   कौरव , पांडव   के  बचपन  का  प्रसंग  है   कि   वे  सब  नदी  के  किनारे  खेल  रहे  थे   तब  ईर्ष्यावश  दुर्योधन  आदि  ने   भीम  के  भोजन  में  विष  मिला  दिया   और  उसे  नदी  में  फेंक  दिया   l   भीम  की  मृत्यु  हो  जाने  से  पांडव  कमजोर  हो  जायेंगे  और   इस  तरह  उसके  मार्ग  की  सब  बाधा  दूर  हो  जाएगी   l   दुर्योधन  की  इस  गलती  पर  भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य  , धृतराष्ट्र, महात्मा  विदुर    ने  कुछ  नहीं  कहा   l   इससे  दुर्योधन  की  हिम्मत   और  बढ़  गई   और  उसने  जीवन  भर  मामा   शकुनि  के  साथ  अनेक  षड्यंत्र  रचे    जिसका परिणाम  अंत  में  महाभारत  हुआ   l   प्रश्न  यह  है   कि   इतने  वीर , ज्ञानी  और  धर्मात्मा  होते  हुए  भी   वे  खामोश  क्यों  रहे  ?    जब  भीष्म  पितामह  शर शय्या  पर  लेटे   थे  और  पांडवों  को   धर्म  का , नीति   का  उपदेश  दे  रहे  थे   तब  द्रोपदी  को  हँसी   आ  गई   l  युधिष्ठिर  ने  पूछा  --- ऐसे  गंभीर  समय  में  तुम्हे  हँसी   कैसे  आ  गई   ?  द्रोपदी  ने  कहा --- पितामह  के  ये  उपदेश  और  धर्म  व  नीति   उस  समय  कहाँ  थी  जब  मेरा  चीर  हरण  हो  रहा  था   ?   तब  भीष्म  पितामह  ने  कहा  --- उस  समय  मैं  दुर्योधन  का  कुधान्य   खाता    था   , अब  शर शय्या  पर  लेटने  से  वह  सब   रक्त  के  साथ   बह   गया   और  मन  निर्मल  हो  गया  ,  इसलिए यह  उपदेश  देने  में  समर्थ  हुआ  l  "  आज  संसार  में  इतनी  अशांति  , इतना  तनाव  इसीलिए  है   कि   लोग  अपने  स्वार्थ  के  लिए  अपराधियों  को  संरक्षण  देते  हैं  ,  उनकी  सहायता  से   अपनी अनेक  महत्वाकांक्षाओं  की  पूर्ति  करते  हैं   l  कामना , वासना , तृष्णा ,  स्वार्थ , अहंकार     ये  सब  मानसिक  विकृतियाँ   ही  संसार  में  उत्पात  मचाती   हैं   l  

WISDOM -----

    इतिहास  में   पढ़ते  हैं  कि   जब  भारत  ज्ञान और  वैभव  में  अपने  चरम  शिखर  पर  था ,  तब  यूरोप  में  असभ्य  जातियों  का  निवास  था  l   इसके  बाद    उन  अनेक  देशों  ने  जिन्हे  हम  विकसित  कहते  हैं   भौतिक प्रगति  तो  बहुत  की  ,  किन्तु  अध्यात्म  में  रूचि  न  होने  के  कारण  उनका  यह  विकास  एकांगी  रहा  l   मनुष्य  के  भीतर  देवता  और  असुर  दोनों  होते  हैं  l   अध्यात्म  का  अर्थ  है --- व्यक्तित्व  का  परिष्कार ,  चिंतन  और  चेतना   का  परिष्कार    l   यह  अध्यात्म  ही  है  जो  मनुष्य  के  भीतर  के  असुर  को   मार    कर  उसके  देवत्व  को  जगाता  है   l    विकसित  कहे  जाने  वाले  देशों  ने   विज्ञान   के  साथ  अध्यात्म  को  नहीं  जोड़ा  ,  इसलिए  उनके  भीतर  की  असुरता  समाप्त  नहीं  हुई   और  ज्ञान  और  बुद्धि  के  दुरूपयोग  से   यह  असुरता   एक  विशालकाय  असुर  में  तब्दील  हो  गई  l  कहावत  है -' हाथ  कंगन  को  आरसी  क्या  '    वे  स्वयं  ही  संसार  को  अपनी  असुरता  का  सबूत   दे  रहे  हैं   l   असुरता  में  स्वयं  ही  उसके  विनाश  के  बीज  विद्यमान  हैं  l   उन्हें  तो  अंधकार  ही  पसंद  है  l   इसलिए  प्रकृति  उन्हें  वापस  वहीँ  पहुंचा  देगी  l    पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----- " ऊँट   को  नकेल  से ,  बैल  को   डंडे  से ,   घोड़े  को  लगाम  से   और  हाथी  को  अंकुश  के  सहारे  वश  में  किया   जाता  है  l   सरकस   के  जानवरों  को  उनका  शिक्षक  चाबुक  से  डराकर   इच्छित  कृत्य  सिखाता  है   और  कराता  है   l   ईश्वर  विश्वास  और  आस्तिकता  की  भावना   मनुष्य  की  उच्श्रृंखलता   पर  अंकुश  लगाती  है  l   व्यक्ति  के  जीवन क्रम   और  चरित्र  को  बनाने  के  लिए    अध्यात्म  की ,  ईश्वर  भक्ति  की   आवश्यकता  है  ताकि  मनुष्य  जाति   का  जीवन  श्रेष्ठ  व  समुन्नत  बना  रहे   l "

4 March 2022

WISDOM -----

   हमारी  नीति   कथाएं   हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाती  हैं  l   यह  कथा  बताती  है  कि    अपनी  कमजोरी   पर  नियंत्रण  रखो ,  डरो  नहीं  , अन्यथा  लोग  उसका  फायदा  उठाने  को  तैयार  रहेंगे  l   -----   एक  लोमड़ी  किसी  जंगल  में  रहती  थी   l   उसी  क्षेत्र  में  गधों  की  भरमार  थी   l  लोमड़ी  को  उनसे  असुविधा  होती  थी  l   उसके  खाने  योग्य  साधन   गधों  की  बहुलता  से  अस्त - व्यस्त  हो  जाते  थे  l   लोमड़ी  ने  एक  चालाकी  भरी  योजना  बनाई  कि   किसी  प्रकार  गधों  को  डरा  कर  भगाया  जाये   l  वह  गधों  के  पास  पहुंची   और  बोली   मैं  तुम्हे  एक  गुप्त   सूचना   देती  हूँ  --- मछलियों  ने  मिलकर  एक   सेना  गठित  की  है   और  वे  दलबल  के  साथ   तुम  सब  गधों  का  बंटाधार  करने  वाली  हैं   l   गधों  ने  वास्तविकता  जानने  का  प्रयत्न  ही  नहीं  किया  ,  डर   से  भयभीत  होकर   गांव  की   ओर   भागे   जहाँ  उन्हें  पनाह  मिल  सके   l   गाँव  धोबियों  का  था   l   उन्होंने  गधों  की  भय - व्याकुलता  देखी  l   कारण  पूछा   और  सहायता  करने  का  आश्वासन  दिया  l   गधों   ने  लोमड़ी  से  सुनी  सारी  बातें  कह  सुनाई   l   धोबियों  ने  उन्हें  बचा  लेने  का  आश्वासन  दिया  l   साथ  ही  उनके  गले  में  रस्सी  बांधकर   खूंटे  से  भी  बांध  दिया   l   गधे  स्थायी  रूप  से  उनके  चंगुल  में   बंध    गए  l 

WISDOM ------

   एक  कहावत  है ---- ' खाली  बैठे  क्या  करें ,  आओ  पड़ोसन  लड़ें  l  "    एक  सत्य  घटना  है  --- लोगों  को  लड़ने  का  बहुत  शौक  होता  है   l  झुग्गी  झोंपड़ी  में  रहने  वाली  दो  महिलायें   बात  कर  रहीं  थीं  -- एक  ने  कहा  --मैं  बकरी  खरीदूंगी   l  दूसरी  ने  कहा --- तेरी  झुग्गी  में  जगह  तो  है  नहीं  कहाँ  बांधेगी  ? '  पहली  स्त्री  ने  कहा --- ' तेरी  झुग्गी  में  बांध  दूंगी ,  क्या  कर  लेगी  मेरा  ! '  बस  !  इसी  बात  पर  दोनों  में  बहस  छिड़  गई , घर    के  पुरुष  भी  इसमें  सम्मिलित  हो  गए   l  अब  झुग्गी  में  तो  इतनी  जगह  नहीं  थी  ,  इसलिए  उनकी  लड़ाई  सड़क  पर  आ  गई  l  एक -एक  कर  के  अन्य  झुग्गी  वाले  भी  इस  लड़ाई  में  जुट  गए ,  बवाल  मच  गया  l  इस  बीच  भयंकर  आँधी    चलने  लगी ,   मूसलाधार  पानी  बरसने  लगा  ,  ओले  भी  गिरे  l   महिलाएं  तो  किसी  तरह  अपनी  झुग्गी  में  चलीं   गईं  l   लेकिन  पुरुषों  में  तो  अहंकार  होता  है  ,  अपने  पौरुष  को  सार्थक  करने  का  कोई  मौका  चाहिए   l   वे  अपने - अपने   घर  से  छाता   ले  आए ,  जिसके  पास  छाता   नहीं  था   ,  उसने  सिर   पर  से  बोरी   ओढ़  ली    और  खूब  लड़े  l ' ------ यह  हाल  आजकल  पूरी  दुनिया  का  है   l   झुग्गी  में  रहने  वाले ,   गरीब  लोग  ,  निम्न   जाति   के  लोग ,  जो  बदरंग  हैं   वे  लोग   और    अनपढ़   आपस  में  लड़ें   तो  बात   समझ  में  आती  है    लेकिन  जब  रंग - रूप ,  ज्ञान - विज्ञानं ,  धन - वैभव  ,  सुख - सुविधाएँ  ,  जाति - धर्म    हर  दृष्टि  से  स्वयं  को  श्रेष्ठ  कहने  वाले   लोग  ऐसी  लड़ाई  करें  कि   धरती  शमशान  बन  जाये    तो  मन  में  एक  प्रश्न  उत्पन्न  होता  है   कि   श्रेष्ठ  कौन   ?      सभ्य  कौन   ?     यह  दुर्बुद्धि  ही  है  कि   सकारात्मक  कोई  कार्य   नजर  नहीं  आता    तो  घमासान  युद्ध  कर  के  , निर्दोष  प्राणियों  की  हत्या  कर  के  ही  लोग  समझते  हैं  कि   उनका  जीवन  सार्थक  हो  गया   l   ऐसी  बुद्धि  !