इस संसार का नियम ही ऐसा है कि जो आया है उसे जाना पड़ेगा l इस तथ्य को हर कोई जानता है , पर जानते हुए भी मानने को तैयार नहीं होता l हर किसी को मृत्यु का भय आरंभ से ही सताता है और उससे बचे रहने का हर संभव प्रयत्न भी किया जाता है , पर विधि के विधान के आगे किसी का वश नहीं चलता l ----- यमराज ने एक बार मौत को एक क्षेत्र से पांच हजार आदमी मारकर लाने के लिए भेजा l वह जब झोली भरकर लाई तो गिनने पर पंद्रह हजार निकले l जवाब - तलब हुआ कि इतने अधिक क्यों ? मौत ने सबूत समेत सिद्ध किया कि बीमारी से तो पांच हजार ही मरे हैं l शेष तो डर के मारे बिना मौत ही मर गए और परलोक आने वाली भीड़ के साथ जुड़ गए l कहा जाता है ---' साहसी तो जीवन में एक बार मरता है पर कायर तो भयभीत रहकर पग - पग पर , पल -पल मरता है l
5 November 2020
4 November 2020
WISDOM ------
रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि दक्षिणेश्वर मंदिर के कुत्ते , बिल्ली भी धन्य हैं l देखो ! वह माता का प्रसाद खा रहे हैं l गंगादर्शन कर उसका जल पी रहे हैं l उद्दान मंदिर में एक कुत्ता था , जिसे ठाकुर कप्तान कहकर पुकारते थे l कप्तान अक्सर काली माँ के मंदिर के सामने सबसे ऊँची सीढ़ी के तल पर बैठता था l ठाकुर के बुलाते ही वह उनके चरणों में आकर लोटने लगता l तब ठाकुर उसे पूड़ी व संदेश देते थे l वे कहते थे ---- " इतने कुत्ते हैं , पर कप्तान को छोड़कर कोई भी काली माँ के सामने नहीं बैठता l किसी शाप के कारण ही कुत्ते की योनि में जन्म हुआ l पूर्व जन्म में कुछ अच्छा संस्कार भी रहा होगा , तभी तो वह यहाँ है l अब इस जन्म में मुक्त हो जायेगा l बड़ी धन्य आत्मा है l "
WISDOM -----
भगवान श्रीराम के एक ही शिष्य हैं --- हनुमान जी l बड़े से बड़ा काम कर के भी कोई अहंकार नहीं l काम दिया तो कर दिया l सतत राम - नाम का जप l जब वे अकेले ही लंका जलाकर , रावण का मान - मर्दन प्रभु के पास लौटे और प्रभु ने पूछा कि त्रिभुवन विजयी रावण की लंका को तुमने कैसे जलाया हनुमान ! तब उनने कहा ---- ' सो सब तव प्रताप रघुराई l नाथ न कछू मोरि प्रभुताई l l हनुमान जी व्याकरण के पंडित , वेदज्ञ , ज्ञान शिरोमणि , बड़े विचारशील , तीक्ष्ण बुद्धि और अतुल पराक्रमी हैं , पर अति विनम्र , अहं जैसे छू भी नहीं गया हो l सभी भक्तों के वे आदर्श हैं l तभी तो श्रीराम कहते हैं --- 'सुन सुत तोहि उरिन मैं नाहीं l देखेउँ करि बिचार मन माहीं ll
3 November 2020
WISDOM ------
मधुसूदन सरस्वती भारत के ऐसे प्रकांड पंडितों में गिने जाते हैं , जिनने काशीधाम में बैठकर सारी विश्व - वसुधा को अपने ज्ञान और भक्ति से प्रभावित किया l अपने गुरु विश्वेश्वर सरस्वती के आदेश पर यमुना तट पर आसन जमाया l इसी बीच एक अलौकिक घटना घटी l सम्राट अकबर की राजमहिषी शूल रोग से बहुत त्रस्त थीं l एक रात उनने स्वप्न में देखा कि यमुना किनारे एक संन्यासी तपस्या कर रहे हैं और उनकी औषधि मिलते ही वे स्वस्थ हो गईं l उनने सम्राट को बताया l अकबर ने पता लगाया l समाचार सही था l एक तरुण तपस्वी चारों ओर से बालू से ढका तप कर रहा था l राजमहिषी वहां गईं और अपने रोग के बारे में तरुण तपस्वी मधुसूदन सरस्वती को बताया l वे बोले ----- " माँ , तुम घर जाओ , तुम शीघ्र ही रोग मुक्त हो जाओगी l " ऐसा ही हुआ l भेंट में मिली दौलत उन्होंने स्वीकार नहीं की l इसके बदले संन्यासियों की रक्षा करने की बात कही l इसके बाद नागा संन्यासियों ने आत्मरक्षा का प्रशिक्षण मधुसूदन के मार्गदर्शन में लिया और शासन ने भी उनकी रक्षा की l
WISDOM ----- शक्तियों का सदुपयोग जरुरी है
पुराणों में एक कथा है --- श्रुतायुध के पास शंकर जी के वरदान से प्राप्त एक अमोघ गदा थी l उसके तप से प्रसन्न होकर भगवान ने यह गदा उसे इस शर्त पर दी थी कि वह उसका अनीतिपूर्वक प्रयोग न करे , यदि वह ऐसा करेगा तो वह लौटकर उसी का विनाश कर देगी l महाभारत युद्ध में श्रुतायुध को अर्जुन से लड़ना पड़ा l युद्ध प्रबल वेग से होने लगा और दोनों ही अपना रणकौशल दिखाने लगे l सारथी का कार्य करते हुए भगवान कृष्ण किसी बात पर हँस पड़े l श्रुतायुध को लगा कि वे उसकी कुरूपता पर हँस रहे हैं l उसने आवेश में आकर अपनी अमोघ गदा श्रीकृष्ण पर फेंक चलाई l उसे यह भी भान न रहा कि उसके साथ क्या शर्त जुड़ी हुई है l गदा कृष्ण तक न पहुंची और बीच से ही वापस लौटकर श्रुतायुध पर गिर पड़ी l उसका शरीर क्षत - विक्षत होकर भूमि पर गिर पड़ा l धृतराष्ट्र को दिव्य दृष्टि से देखा हुआ यह समाचार सुनाते हुए संजय बोले -- ' राजन ! मनुष्य को समस्त शक्तियां श्रुतायुध की गदा की तरह सद्प्रयोग के लिए मिली हैं , जो उन्हें अनीतिपूर्वक प्रयोग करते हैं , वे अपने पाप से उलटे ही आहत होकर इसी तरह विनाश को प्राप्त होते हैं l
2 November 2020
WISDOM -----
श्रीमदभागवत पुराण में गजेन्द्रमोक्ष नाम से एक कथा आती है कि क्षीरसागर में दस हजार योजन ऊँचे त्रिकूट नामक पर्वत की तलहटी में गजेंद्र ( हाथी ) अपने परिवार सहित रहता था l एक बार वह निकटवर्ती मनोरम तालाब में जलक्रीड़ा कर रहा था कि पूर्वजन्म की दुश्मनी के कारण ग्राह ( मगरमच्छ ) ने गजेंद्र को पकड़ लिया l दोनों ही बलशाली होने के कारण एक हजार वर्ष तक लड़ते रहे l अंत में गजेंद्र का बल क्षीण होने लगा , तब उसने भगवान श्रीहरि की स्तुति की , जो उसे पूर्वजन्म की स्मृति के कारण इस जन्म में भी कंठस्थ थी l गजेंद्र की आर्त पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि गरुड़ पर सवार होकर शीघ्र उसके समीप उपस्थित हुए और अपने सुदर्शन चक्र से ग्राह का मुंह फाड़कर गजेंद्र को उससे मुक्त कराया l इस पौराणिक कथा में ग्राह लोभ एवं भय --- दोनों का प्रतीक है जिसके चंगुल में मनुष्य फंस जाता है और निकल नहीं पाता है , लेकिन भगवान को निरंतर सहायता के लिए पुकारने से ही हम इस लोभ और भय के चंगुल से निकल पाते हैं l
31 October 2020
WISDOM -----
एक बार भगवान कृष्ण से भेंट करने उद्धव गए l उद्धव और माधव दोनों बचपन के दोस्त थे l द्वारपाल ने कहा ---- " इस समय भगवान पूजा में बैठे हैं , इसलिए अभी आपको थोड़ी देर ठहरना होगा l समाचार पाते ही भगवान शीघ्र पूजा कार्य से निवृत होकर उद्धव से मिलने आए l कुशल - प्रश्न के बाद भगवान ने पूछा --- " उद्धव तुम किसलिए आए हो ? " उद्धव ने कहा --- " यह तो मैं बाद में बताऊंगा , पहले मुझे यह बताइये कि आप पूजा किसकी कर रहे थे ? " भगवान ने कहा --- " उद्धव ! तुम यह नहीं समझ सकते l " लेकिन उद्धव कब मानने वाले थे , उन्होंने जिद की l तब भगवान ने कहा --- " उद्धव ! तुझे क्या बताऊँ ? मैं तेरी ही पूजा कर रहा था l " उद्धव माधव की पूजा करता है और माधव उद्धव की पूजा करता है l भगवान भक्त की पूजा करते हैं और भक्त भगवान की l इस आदर्श से भगवान बताना चाहते हैं ----- " जो मालिक हैं , वे मजदूरों के सेवक बने l जो शासक हैं , वे प्रजा के सेवक बने l शिक्षक विद्दार्थियों के सेवक बने , उद्दोगपति श्रमिकों के सेवक बनें , माता - पिता अपनी संतान के सेवक बनें l जिस किसी को जिम्मेदारी का काम मिला है , वे सब सेवक बनकर काम करेंगे , तो दुनिया के सारे झगड़े मिट जायेंगे l "