मनुष्य जिसे अपने बुद्धिमान और ज्ञानी होने का अभिमान है , क्या इस बात में कुछ सच्चाई है ? बुद्धिमान और ज्ञानी तो हम तब होते जब हमारे हृदय में संवेदना और सहयोग की भावना होती , मानवीयता होती l जिस भौतिक प्रगति का मनुष्य अभिमान करता है उसका एक पक्ष यह भी है ---- मनुष्य ने अपनी बुद्धि के बल पर जल में तैरने आदि की क्षमता हासिल की है , परन्तु यह क्षमता तो मछली आदि जल -जीव जंतुओं ने कब से प्राप्त कर रखी है l मनुष्य ने आकाश में विचरण की कला सीख ली है तो यह कला तो आदिम युग से पक्षियों के पास है , बाज कितनी ऊंचाई पर उड़ता है l हमने यह सब सीखकर कुछ नया , कोई कमाल नहीं किया l जहाँ तक जमीन पर जीने की बात है तो मनुष्य ने उत्पात और उपद्रव ही मचाया है , प्रकृति की दुर्दशा कर दी , रासायनिक कीटनाशक डालकर स्वयं अपने लिए विषैले खाद्य का उत्पादन किया , इसे क्या बुद्धिमानी कहा जायेगा ? चींटी , दीमक , मधुमक्खी ने कितने युग पहले से समूह में , सहयोग से रहना सीख लिया लेकिन मनुष्य किसी समूह या संगठन से जुड़ा है तो उसके पीछे उसका स्वार्थ है l हमने जीवन जीने की कला नहीं सीखी l एक छोटे से परिवार में ही कितना कलह , क्लेश होता है , कोई परिवार लड़ाई - झगड़े से अछूता नहीं है , तो फिर समाज राष्ट्र और संसार में क्या शांति होगी ? शांति तो बहुत दूर की बात है , आज संसार में असुरता के प्रति आकर्षण बड़ा तीव्र है l बुराई में तुरंत लाभ होता है यही कारण है कि स्वार्थ , लाभ और महत्वाकांक्षा के कारण ही संसार असुरता की और भाग रहा है l अहंकार ने बुद्धि भ्रष्ट कर दी है , मनुष्य स्वयं अपने विनाश के साधन जुटा रहा है l हमारी बुद्धिमानी इनसान बनने में है , हम इंसानियत का पाठ जानवरों से ही सीख लें ! ------ पुराण में एक कथा है ------- कौशल देश का राजा ब्रह्मदत्त को आखेट का व्यसन था , अपने बहुत से सैनिकों के साथ राजा अक्सर शिकार पर जाता था जिससे अनेक वन्य जंतुओं , मृग व पक्षियों का भारी संहार होता था l उस वन में नंदीय नाम का मृग अपने कुटुंब के साथ रहता था , उसे नित्य के संहार से बड़ा कष्ट होता था तो उसने सब जानवरों की एक सभा बुलाई और यह निश्चय हुआ कि हममें से एक मृग रोज राजा से मिलने स्वयं चला जाये इससे यह विनाश लीला कुछ थम जाएगी l राजा ने भी जानवरों के इस निर्णय को मान लिया l कुछ दिन बाद नन्दीय मृग की बारी आई l उसका शांत और सौम्य भाव देखकर राजा ने अपना धनुष बाण नीचे रख दिया l मृग ने कहा ---- 'राजन ! तुम मुझे मारते क्यों नहीं ? ' राजा ने कहा ---- " मृग ! तुममें बहुत से दिव्य गुण है इसलिए मैं तुम्हे मार नहीं रहा l ' मृग ने कहा ---- ' इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ , लेकिन मेरा जीवन मेरा समूह है , मैं जीता रहूं , और मेरे परिवार के , समूह के सदस्य मरते रहें , यह मेरे लिए असहनीय होगा l मेरी मृत्यु ही मेरे लिए कल्याणकारी होगी l ' यह सुनकर राजा ने कहा --- ' मैं तुम्हारे सम्पूर्ण समूह को अभयदान देता हूँ l ' मृग ने कहा ----- ' क्या आप यह अभयदान पक्षियों और जल में रहने वाले जंतुओं व मछलियों को दे सकते है l ' राजा ने कहा --- ' तुम्हारे लिए निश्चित ही l ' राजा ने अपने दूतों से राज्य में घोषणा करा दी कि अब से सभी वन्य जंतु , पक्षी और जलचरों को अभयदान दिया जा रहा है , कोई हिंसा न करे l राजा ने नन्दीय मृग से कहा ---- " तुमने वन - पशु होकर मुझे जीवन - संवेदना का पाठ पढ़ाया , जीवन जीने की कला सिखा दी l तुमने बताया कि जीवन सामूहिक संवेदनशीलता , सहयोग -सहकार का पर्याय है l "
12 September 2021
11 September 2021
WISDOM ----
' सत्य की विजय होती है , शक्ति की नहीं l ' रावण का आतंक दसों दिशाओं में था l युग चाहे कोई भी हो असुरता के लक्षण हर युग में एक जैसे ही होते हैं , उन्ही के आधार पर असुर की पहचान होती है l रावण था तो ऋषि पुत्र लेकिन वो स्वयं को गर्व से ' दानवराज ' कहता था l असुरता को पराजित करना इतना आसान नहीं होता , उसके लिए अध्यात्म की शक्ति की आवश्यकता होती है l उस युग में एक राजा था ' सहस्त्रार्जुन ' उसके पास तपबल , आत्मबल और सत्य का बल था l उसके विशाल साम्राज्य में सभी ओर सदाचरण , न्याय और संतोष था , उसे देखकर रावण का हृदय ईर्ष्या के मारे फट जाता था l रावण जानता था कि सहस्त्रार्जुन को सीधे युद्ध में हराना असंभव है l इसलिए उसने छल युद्ध का सहारा लिया l जब सहस्त्रार्जुन नर्मदा के किनारे सूर्य भगवान को जल चढ़ा रहा था तब रावण ने उस पर अचानक आक्रमण किया और कहा --- आज तुम हमारे बंदी बनोगे , यह विशाल साम्राज्य मेरा अपना होगा l ' उसकी बात सुनकर सहस्त्रार्जुन भयभीत नहीं हुआ , मुस्कराता रहा फिर अचानक नर्मदा के जल से हजारों नावें प्रकट हो गईं , सेना ने चारों तरफ से आक्रमण कर रावण को बंदी बना लिया l जेल में उसे यातना नहीं दी गई , उसे सम्मान के साथ रखा l जब महर्षि पुलस्त्य उसे लेने पहुंचे तो सहस्त्रार्जुन ने रावण से कहा ------ ' रावण ! ध्यान रखना दुराचारी चाहे कितना ही बलवान ,, शक्तिवान क्यों न हो , एक न एक दिन उसका दर्दनाक अंत निश्चित है l इतिहास किसी को याद नहीं करता और काल किसी को क्षमा नहीं करता l तुम्हारा विनाश निश्चित है l
10 September 2021
WISDOM ------
कुटिल से मित्रता घातक होती है l ---- इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण है जो यह स्पष्ट करते हैं कि जिसने भी कुटिल व्यक्ति से जिसके हृदय में छल - कपट हो , उससे मित्रता की है तो उसका परिणाम कभी भी शुभ नहीं हुआ " l ----- रावण के पास सोने की लंका थी , धरती , आकाश और पाताल सब तरफ उसका वैभव था l किसी ने भय के कारण , तो किसी ने उसकी सम्पदा के लालच में उससे मित्रता की , परिणाम रावण समेत सबका अंत हो गया l इसी तरह दुर्योधन , इसके पास अपार वैभव था किन्तु षड्यंत्र करने से नहीं चूकता था l उससे जिसने भी मित्रता की सबका अंत हुआ l वर्तमान समय में देखें तो औरंगजेब के हाथ अपने भाइयों के खून से रंगे थे , बहुत अन्यायी और अत्याचारी था फिर भी जोधपुर के महाराज जसवंतसिंह ने उससे मित्रता की l औरंगजेब ने उनसे जी भर के फायदा उठाया और बाद में उन्हें व उनके दो पुत्रों को छल से मरवा दिया l जीवन में सफल होने के लिए विवेक और जागरूकता जरुरी है , इतिहास से हमें शिक्षा मिलती है l
9 September 2021
WISDOM -------
कहते हैं यदि भावनाएं परिष्कृत हों , हृदय में ईश्वर से मिलने की उत्कट अभिलाषा हो तभी श्रीमद भागवत कथा सुनने का लाभ मिल पता है l यदि कथावाचक का मन अपने नाम का प्रचार करने और धन कमाने में है और सुनने वाले का मन कथा स्थल पर बैठकर भी सांसारिक प्रपंच में उलझा हुआ है तो उस कथा से कोई लाभ नहीं मिल पाता l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' आज किसी के हृदय में भागवत कथा के प्रति अनुराग नहीं है l ईर्ष्या , निंदा , चुगली , कलंक , लांछन की कथाएं कहने - सुनने के लिए सभी आतुर हैं , इसके लिए बिना बुलाये पूरा गाँव सिमट कर आ जाता है लेकिन यदि कथा भगवान की हो तो लोग बुलाने पर भी नहीं जाते l यदि किसी भी तरह चले भी गए तो भागवत कथा की अनदेखी कर अपनी कुटिल चर्चाएं करते रहते हैं l ' भावनाएं केवल भगवान के प्रति ही शुष्क नहीं हुई हैं , अब मनुष्य परिवार , समाज , राष्ट्र सबके प्रति भावनाशून्य हो गया है l इसी कारण संसार में इतना दुःख और तनाव है l वैज्ञानिकों के एक दल ने जिसमे मनोवैज्ञानिक , , समाजशास्त्री , डॉक्टर आदि अनेक विधाओं के विशेषज्ञ थे और उनके मुखिया थे कार्ल कोलब्रुक , इन सबने मिलकर यह जानने की कोशिश की कि पृथ्वी पर जो गहन दुःख व्याप्त है , उसका कारण क्या है ? दुनिया के प्राय: सभी देशों में भ्रमण कर उन्होंने पाया कि गरीबी , अशिक्षा , बीमारी पहले भी थी , आज भी है बल्कि आज पहले से कुछ कम है , लेकिन इनसान का दुःख पहले से बढ़ा है l इसकी वजह उन्होंने यह खोजी कि आज इनसान में भावनात्मक तृप्ति का अभाव है , उसके जीवन की लय बिखर गई है l यदि इनसान को अपना दुःख मिटाना है तो उसे अपनी भावनाओं में भक्ति जगानी होगी l ' जब मनुष्य स्वार्थ , लालच और भौतिक सुख - सुविधाओं के पीछे न भागकर अपने हृदय में भावनाओं और संवेदना को प्रमुख स्थान देगा तभी संसार का दुःख दूर होगा l
8 September 2021
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- आधिपत्य की इस दौड़ में सभी के जीवन की दशा बिगड़ गई क्योंकि हम त्याग का मूलमंत्र ही भूल गए हैं l यदि हम त्याग की डगर में थोड़ा सा आगे बढ़ेंगे तो हमारे जीवन में अमृत घुलने लगेगा , हमारे जीवन से विषैलापन समाप्त होता जायेगा l ' आचार्य श्री आगे लिखते हैं -- भगवान श्रीराम अपना अधिकार त्यागने के लिए तत्पर हैं और भरत अपने सुख को त्यागने के लिए तत्पर हैं तो कोई झगड़ा नहीं है l लेकिन जब दुर्योधन कहता है की पांच गांव तो बहुत दूर की बात है , मैं सुई की नोंक बराबर भी भूमि नहीं दूंगा तब झगड़ा खड़ा होता है , महाभारत हो जाता है l आज बात देश की हो या विश्व की हो भीषण रूप से छिना - झपटी मची हुई है , आधिपत्य की होड़ है l जब कोई त्याग में प्रतिष्ठित हो जाता है तब उसके अंत:करण में प्रसन्नता और शांति हिलोरें लेती है और तब बाहर कुछ पाने की इच्छा नहीं होती लेकिन जो अंदर से रिक्त है , कंगाल हैं , वही बाहर के लिए भागते - दौड़ते हैं l ------- तैमूर लंग लंगड़ा था , कहते हैं एक बार उसने एक राज्य पर आक्रमण किया , वहां का सुल्तान भी अपंग था , काना था l हमले के बाद सुलह हुई , समझौता हुआ उसके बाद दोनों मिल बैठकर बातें कर रहे थे l इस अवसर पर बहुत से लोग आमंत्रित थे , उनमें एक फकीर भी था l उस समय तैमूर लंग हँसता हुआ सुल्तान से बोला ---- मैं लंगड़ा और तुम काने , ये खुदा को भी क्या हो गया है ? लंगड़े - कानों को सुल्तान बनाता रहता है l तैमूर परिहास की मनोदशा में था , हँसी कर रहा था l लेकिन उस समय सभा में उपस्थित उस फकीर ने कहा ----- " हुजूर ! लंगड़े - कानों को ही सल्तनत की जरुरत होती है l वे आत्महीनता की ग्रंथि से ग्रस्त रहते हैं l वे अपने अंदर कुछ कमी महसूस करते हैं , जिसको वे बाहर पूरा करना चाहते हैं l जो अपने आप में जितना संतुष्ट है , संतृप्त होता है , वो बाहर की उपलब्धियों की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखता हैं l त्याग ही सर्वोच्च संतुष्ट का प्रमाण है l
7 September 2021
WISDOM -----
एक कुष्ठी भिक्षा मांग रहा था l उधर से जो भी निकलता , कुष्ठी अपना हाथ फैलाकर कहता , जो दे उसका भी भला , जो न दे उसका भी भला l एक युवक ने एक सिक्का उसके हाथ पर डालते हुए पूछा ---- क्यों भाई , तुम्हारा पूरा शरीर गला जा रहा है l हाथ और पैर की उँगलियाँ तक अब ऐसी न रहीं कि कुछ काम कर सको l फिर इस कष्ट का जीवन जीने से क्या लाभ ? यह तो जीवित अवस्था में लाश ढोने जैसी स्थिति है l कुष्ठी ने कहा ----- ' मित्र ! तुम बात तो ठीक कहते हो और कभी - कभी मेरे मन में भी इस प्रकार का प्रश्न उठता है , पर मुझे ऐसा लगता है कि ईश्वर मुझे इसलिए जीवित रखे हुए है कि लोग कम से कम मुझे देखकर यह समझ सकें कि मूर्ख , इस संसार में कभी तू भी मेरे जैसा हो सकता है , अत: इस संसार में काया की सुंदरता का घमंड करने से कोई लाभ नहीं है l
6 September 2021
WISDOM ------
मरते समय मनुष्य को जिस पीड़ा का अनुभव होता है , वह पीड़ा मरने की नहीं , बल्कि चले गए जीवन की होती है l कबीर दास जी ने कहा है ---- कहत कबीर अंत की बारी l हाथ झारि जस चलै जुआरी l l कबीर दास जी कहते हैं ---- अंत में मृत्यु के समय ऐसे जाना पड़ता है , जैसे जुआरी को अपने खेल के अंत में अपना सब कुछ गँवा कर लौटना पड़ता है l जुए में जो जीतता है वह भी हारता है और जो हारता है वह तो हारता ही है l यह छल है क्योंकि हारने वाला यह सोचता है कि अभी हार गए तो कोई बात नहीं , अगली बार जीत निश्चित है , एक बार और भाग्य आजमा लूँ l ठीक यही बात जीतने वाला सोचता है , अभी एक बार और , अपनी जीत तो पक्की है l इस एक बार का सिलसिला तब तक चलता है , जब तक कि सब कुछ गँवा नहीं दिया जाता l जीवन भी ऐसा ही है l हम सारा जीवन कुछ पाने के लिए भागते रहते हैं , जो कुछ पाया भी वह भी अंत में छूट जाता है , खाली हाथ चले जाते हैं l