विश्व के सर्वोच्च वैज्ञानिक आइंस्टीन को प्रयोगशाला से संन्यास लेकर एक छोटे से विद्यालय में देखकर जापानी वैज्ञानिकों के प्रतिनिधि मंडल ने जानना चाहा कि यह उनकी प्रतिभा का दुरूपयोग तो नहीं ? तब आइन्स्टीन ने प्रतिभा की यथार्थता को समझाते हुए कहा ----- " प्रतिभावान वह नहीं जिसने कोई बड़ा पद हथिया लिया हो , जिसकी शारीरिक और बौद्धिक क्षमताएं बढ़ी - चढ़ी हों l इसके साथ एक शर्त यह भी जुड़ी है कि उसकी दिशा क्या है l दिशा विहीनता की स्थिति में व्यक्ति क्षमतावान तो हो सकता है , किन्तु प्रतिभावान नहीं l अंतर उतना ही है जितना वेग और गति में , एक दिशाहीन है दूसरा दिशायुक्त है l उन्होंने भौतिक विज्ञान की भाषा में समझाया l सामर्थ्य दोनों में है , क्रियाशील भी दोनों हैं पर एक को अपने गंतव्य का कोई पता - ठिकाना नहीं , और दूसरा प्रतिपल गंतव्य की और बढ़ रहा है l प्रतिभा वह क्षमता है जिसकी दिशा सृजन की ओर हो l जिसके हर बढ़ते कदम का स्वागत मानवीय मुस्कान करे l सुख - सुविधा के साधन हमारी प्रथम आवश्यकता नहीं हैं , हमारी प्राथमिकता है इस बात की जानकारी कि जीवन कैसे जिया जाये , समूची जिंदगी अनेकों सद्गुणों की सुरभि बिखेरने वाला गुलदस्ता बनें l "
7 January 2022
WISDOM ------
प्रकृति हमें अपने तरीके से जीवन जीने की कला सिखाती है l एक व्यक्ति ने सुन रखा था कि आम के फल में बहुत मिठास होती है , उसने सोचा क्यों न घर में ही आम का पेड़ लगाया जाये l कहीं से एक पौधा ले आया , उसकी बहुत हिफाजत की , खाद - पानी दिया , अपने जीवन का बहुमूल्य समय उसकी देख- रेख में ही गुजार दिया , पेड़ बड़ा हो गया लेकिन उसमे फल नहीं आये , उसमें तो कांटे ही कांटे थे , विशेषज्ञ को दिखाया तो पता चला कि वह तो बबूल का पेड़ है l यही स्थिति संसार में है l आज जो संसार में षड्यंत्र करते , अपराध , अत्याचार और अन्याय करते हैं उनके जीवन को गहराई से समझने की जरुरत है , जो बीज , जिससे यह वृक्ष बना वह वास्तव में क्या था ? अधिकांश लोग अपने चेहरे पर एक मुखौटा लगाए हैं , जैसे वे दीखते हैं , वास्तव में वे वैसे हैं नहीं l और जैसे वो वास्तव में हैं , वे लक्षण संस्कार रूप में आगे आने वाली पीढ़ियों में आ जाते हैं l पढ़ाई - लिखाई से व्यक्ति सभ्य तो बन जाता है लेकिन जिस पल संस्कार प्रबल हो जाते हैं तब असली रूप सामने आ जाता है l यह सत्य महाभारत में भी उजागर हुआ है l ऋषि का श्राप मिलने की वजह से महाराज पाण्डु पितामह भीष्म के संरक्षण में धृतराष्ट्र को सिंहासन सौंपकर वन चले गए l धृतराष्ट्र की आँखें नहीं थीं तो क्या हुआ , उनका लालच , उनकी कामनाएं समाप्त नहीं हुईं थीं , उन्हें सिंहासन की आदत बन गई थी , यही लालच दुर्योधन में था , वह अपने पिता के साथ मिलकर सुई की नोक बराबर भूमि भी पांडवों को देना नहीं चाहता था l कौरव , पांडवों को गुरु द्रोणाचार्य ने एक जैसी शिक्षा दी , पांडव सत्य ,नीति और धर्म के पथ पर चले लेकिन दुर्योधन पितामह भीष्म , कृपाचार्य , महात्मा विदुर , गांधारी जैसी पतिव्रता माँ के संरक्षण में रहकर भी कौरव वंश के समूल नाश का कारण बना l
6 January 2022
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है -----' अधिकार के लिए आतुर और कर्तव्य से बचने वालों को घाटा भी पड़ता है और अपयश भी मिलता है l ' एक कहानी है ----चार चोर एक गाय चुराकर लाये l बंटवारा इस प्रकार हुआ कि चारों बारी - बारी से एक एक दिन उसे अपने घर रखें l चतुरता में चारों एक दूसरे से बढ़े चढ़े थे , जिस दिन जिसकी बारी होती तो गाय का दूध तो निकालते , पर घास यह सोचकर नहीं खिलाते कि पिछले दिन वाले ने इसका पेट भरा ही होगा और अगले दिन वाला भी खिलायेगा ही l एक दिन मैं न खिलाऊँ तो क्या हर्ज है l यह क्रम कई दिन चला l भूखी गाय का दूध भी सूखता गया और अंत में उसके प्राण ही निकल गए l --- अधिकार के साथ कर्तव्यपालन भी जरुरी है l
WISDOM ----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'कर्मफल का सिद्धांत बड़ा ही अकाट्य और शाश्वत है , कर्मों के फल से कोई नहीं बच सकता l ' कबीर दास जी कहते हैं --- 'करै बुराई सुख चहै , कैसे पावै कोय l रोपे पेड़ बबूल का , आम कहाँ से होय l ' पाप और पुण्य दो बीज हैं l जो बोयेंगे , वही काटेंगे l पुराण में एक कथा है ----- एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु से मिलने वैकुण्ठ पहुंचे l उन्होंने भगवान को नमन - वंदन करते हुए कहा --- " भगवान ! आजकल धरती पर तो कर्मफल विधान के विपरीत परिणाम देखने को मिल रहे हैं l सब देखकर मुझे बड़ी हैरानी है l पापी को सुख मिल रहा है और पुण्यात्मा कष्ट में हैं l " भगवान ने कहा ---- " नारद जी ! आपने ऐसा क्या देख लिया , मुझे विस्तार से बताएं l " नारद जी ने कहा --- " भगवन ! जब मैं धरती पर भ्रमण कर रहा था , जंगल के रास्ते में बहुत कीचड़ था तभी मैंने देखा एक गाय कीचड़ में गहरे धँस चुकी थी और बाहर नहीं निकल पा रही थी l तभी वहां से एक चोर निकला , गाय को बाहर निकालने की बात तो दूर वह गाय के शरीर पर पैर रखकर आगे निकल गया जिससे गाय कीचड़ में और भी धँस गई l जैसे ही वह चोर आगे बढ़ा , उसे एक वृक्ष के नीचे सोने की मोहरों से भरी थैली मिली, जिसे पाकर वह बहुत खुश हुआ l फिर मैंने देखा कि उसी मार्ग से एक साधु पुरुष जा रहे थे l जैसे ही उन्होंने उस गाय को देखा , तुरंत कीचड़ में उतर गए और बहुत मेहनत कर गाय को बाहर निकाल लिया l इसके बाद जैसे ही वे बाहर निकले कि वहां रखे एक पत्थर से उनका पैर टकरा गया और वे गिर गए जिससे उनके सिर में गहरी चोट लगी खून बहने लगा l " नारद जी आगे बोले ---- " भगवान ! ऐसा अनर्थ आखिर क्यों हुआ ? चोर को सोने की मोहरें मिली और गाय की मदद करने वाले को सिर में चोट लगी ? " भगवान विष्णु ने कहा --- " नारद ! पूर्व में किए गए एक शुभ कर्म के कारण चोर को सोने की मोहरें मिली , उससे ज्यादा उसे और कुछ नहीं मिल सकता था , लेकिन उस साधु पुरुष की तो आज जंगल में ही उसके पूर्व प्रारब्ध के कारण मौत लिखी थी , जो गाय की सेवा करने के कारण टल गई l " इस कथा से हमें यही प्रेरणा मिलती है कि हमारे द्वारा किए गए शुभ कर्म कभी निष्फल नहीं होते हैं , हमें उनका पारितोषिक किसी न किसी रूप में अवश्य मिलता है l इसलिए हम हमेशा पुण्य कर्म करें l निस्स्वार्थ भाव से किए गए पुण्य कर्म अकाल मृत्यु से हमारी रक्षा करते हैं , तनाव से मुक्ति और शांति प्रदान करते हैं l
5 January 2022
WISDOM------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' क्रोध पल भर में व्यक्ति की सारी अच्छाई को नष्ट कर सकता है और उससे कुछ भी अनिष्ट करवा सकता है l क्रोध दहकते हुए उस कोयले के समान है , जिसे व्यक्ति दूसरों को जलाने के लिए अपने पास रखे रहता है , अपने मन में रखे रहता है और उससे हर पल वह स्वयं ही जलता रहता है l इसलिए क्रोध से बाहर निकालो l प्रेम , करुणा और सहिष्णुता के जल से इस क्रोध की चिनगारी को बुझाओ l क्रोध के शांत होते ही अंदर से सुख और शांति की प्राप्ति होने लगेगी l '
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' आप अपनी ऊर्जा कैसे खर्च करेंगे , यह आपके ऊपर निर्भर करता है l यदि आप अपनी ऊर्जा और शक्ति दूसरों की बुराई करने में खरच कर देते हैं तो यह मानकर चलिए कि इससे दूसरे व्यक्ति का कोई नुकसान नहीं होगा , बल्कि आपको ही इससे दोगुना नुकसान होगा l ' महाभारत का एक पात्र है -- ' शकुनि '--गांधार नरेश होते हुए भी वह हस्तिनापुर में रहा और पांडवों के विरुद्ध दुर्योधन के मन में विषबीज बोता रहा , बुराई और षड्यंत्र करता रहा l इसका परिणाम महाभारत का युद्ध हुआ l वह स्वयं तो डूबा , मारा गया , अपने साथ पूरे कौरव वंश को ले डूबा l निर्दोष और धर्म की राह पर चलने वालों के साथ षड्यंत्र करने का परिणाम ऐसा ही विनाशकारी होता है l यह परिणाम कब और किस रूप में मिलेगा इसे काल निर्धारित करता है l समझदार व्यक्ति दूसरों की बुराई करने और षड्यंत्र रचने में अपनी ऊर्जा नहीं गँवाते , बल्कि उस समय का उपयोग अपनी रचनात्मकता को निखारने में करते हैं l हैरी पॉटर सीरीज की लेखिका ने लिखा है ---- " मैं जिंदगी भर ऐसे लोगों से जूझती रही हूँ , जिन्होंने मेरी लेखनी को कमतर , निकृष्ट और अविश्वसनीय बताया l ये लोग मुंह पर मेरी तारीफ करते और पीठ पीछे बुराई l क्या इससे मुझे नुकसान हुआ ? नहीं l बल्कि फायदा ही हुआ l मैं बिना वजह कई लोगों को याद रह गई l "
4 January 2022
WISDOM -----
एक बार की बात है धारा नगरी में आग लग गई l दो सुकुमार बच्चे आग की लपट में घिर गए l महाराज भोज चिल्लाये जो इन बच्चों को बचाएगा उसे पुरस्कार दिया जायेगा l भीड़ में से कोई आगे नहीं बढ़ रहा था l तभी एक ओर से एक व्यक्ति आया और आग में घुस गया l दोनों बच्चों को निकाल तो लाया , पर स्वयं बुरी तरह जल गया l उपचार के बाद पहचान में आया कि वह तो महान उदार , दयालु कवि माघ थे l महाराजा भोज ने शीश झुकाते हुए कहा --- " कविवर ! आज तो तुमने काव्य से भी अधिक अपनी कर्तव्य परायणता से हम सबको जीत लिया l " कवि बोले ---- " महाराज ! आप सबका स्नेह - सम्मान बहुमूल्य है , परन्तु आज मैंने अपना कर्तव्यपालन कर के अपनी अंतरात्मा का स्नेह - सम्मान पा लिया l इस आत्मसंतोष के आगे चमड़ी की जलन कोई महत्व नहीं रखती l "