8 September 2022

WISDOM ------

  अनमोल  वचन ---- ' फूल  को  किसी  भी  नाम  से  पुकारने  पर  उसकी  सुगंध  में  अन्तर  नहीं  पड़ता  l  भगवान  को  किसी  भी  नाम  से  पुकारो  ,  इससे  फर्क  क्या  पड़ता  है  ? '       

अनंत  ब्रह्मांड  पर  आधिपत्य  जमाने  की  मनुष्य  की  व्यर्थ  की  चेष्टा  पर  उसे  चेताते  हुए  प्रसिद्ध  साहित्यकार  बट्रेंड  रसल  ने  लिखा  है  --- " अच्छा  होता  हम  अपनी  धरती  ही  सुधारते  और  बेचारे  चंद्रमा  को  उसके  भाग्य  पर  छोड़  देते  l  अभी  तक  हमारी  मूर्खताएं  धरती  तक  ही  सीमित  रही  हैं  l  उन्हें  ब्रह्माण्ड व्यापी  बनाने  में  मुझे  कोई  ऐसी  बात  प्रतीत  नहीं  होती  ,  जिस  पर  विजयोत्सव  मनाया  जाये   l  चंद्रमा  पर  मनुष्य  पहुँच  गया  तो  क्या  ?  यदि  हम  धरती  को  ही  सुखी  नहीं  बना  पाए  तो  यह  प्रगति  बेमानी  है  l  "    आज  संसार  के  जो  हालात  हैं  उसमें  बट्रेंड  रसल  की  यह  पंक्तियाँ  सार्थक  प्रतीत  होती  हैं   l  

7 September 2022

WISDOM -----

 लघु -कथा ---- मगध  देश  के  राजा  श्रेणिक  एक  बार  भ्रमण  के  लिए  महल  से  बाहर  निकले  l  उनने  देखा  कि  एक  साधु  नदी  तट  पर  बैठे  पूजा -पाठ  में  मग्न  हैं  l  वे  साधू  महाराज  के  पास  गए  और  बोले  --- आप  इतनी  अल्प  आयु  में  घर  से  निकल  पड़े  हैं  l  आपका  चेहरा  तप  से  दीप्तिमान  हो  रहा  है  l  आप  कौन  हैं ? कहाँ  रहते  हैं  ?  साधु  ने  उत्तर  दिया --- 'मैं  एक  अनाथ , असहाय  हूँ  l  किन्तु  इस  उत्तर  से  राजा  संतुष्ट  नहीं  हुए  l  उन्होंने  कहा --- मुझसे  कुछ  न  छिपाएं ,  सच -सच  बताएं  ल  यदि  आप  अनाथ  भी  हैं  तो  मैं  आपका  संरक्षक  हूँ  l  मेरे  राज्य  में  कोई  अनाथ  और  असहाय  नहीं  है  l   महात्मा  ने  कहा  ---राजा , भले  ही  आप  विपुल  सम्पति  के  मालिक  हैं l  हठी , घोड़े , सैनिक , राज्यकोष  , राजमहल  सब  कुछ  है  ,  फिर  भी  आप  किसी  न  किसी  मामले  में   अनाथ  और  असहाय  हैं  ही  l  किन्तु  राजा  मानने  को  तैयार  न  था  l  तब  साधु  ने  आपबीती  कह  सुनाई  l  उसने  कहा ---- मैं  कौशाम्बी  नगर  के   नगर  सेठ  धनराज  का  पुत्र  हूँ  l  मुझे  आइखों  के  रोग  ने  घेर  लिया  l  समस्त  उपचार  कराए  गए  l  वैद्य , राज वैद्य  सभी  परेशान  व  हैरान  थे  l  धन -सम्पदा , मित्र , संबंधी  , परिवार  कोई  भी  मेरे  रोग  में  सहायक  न  बन  सके  l  ऐश्वर्य  कुछ  काम  न  आ  सका  तो  मुझे  मेरे  हाल  पर  छोड़  दिया  गया  l   बस ,  मैं  प्रभु  से  प्रार्थना  करने  लगा  l  अंतत:  ईश्वर  ने  मेरी  प्रार्थना  सुनी  ,  वही  भगवान  काम  आए  और  मैं  रोगमुक्त  हो  गया  l  तब  से  मैं  भगवान  के  ध्यान , स्मरण   और  उनके  काम  में  लगा  रहता  हूँ  l  सेवा -पूजा  के  बाद  बचे  समय   को  अशक्त , रोगी , असहाय , निर्बलों , अभावग्रस्तों  की  सेवा  में  लगाकर  व्यतीत  करता  हूँ  l  राजा  की  आँखें  खुल  गईं  ,  वह  समझ  गया  कि  ईश्वर  ही  समर्थ  हैं  ,  सबकी  सहायता  कर  पाने  में  l  

WISDOM -----

   महाराजा  सगर  की  दोनों  रानियों  ने  तप  किया   और  वरदान  मांगने  के  अवसर  पर   एक  ने  हजार  पुत्र  माँगे  और  दूसरी  रानी  ने  एक  पुत्र  माँगा  l  समुचित  भावनात्मक  पोषण  के  अभाव  में  हजारों  पुत्र  झगड़ालू , उपद्रवी  और  अनाचारी  निकले  l  अंतत:  अपने  दर्प  एवं  दुर्बुद्धि  के  कारण  महर्षि  कपिल  के  साथ  अन्याय  कर  बैठे  और  मारे  गए  l  दूसरी  रानी  का  जो  एकमात्र  अकेला  पुत्र  था  उसने  समुचित  भावनात्मक  पोषण , मार्गदर्शन  प्राप्त   कर  महर्षि  कपिल  को  भी  प्रसन्न  कर  लिया  तथा  राज्य  का  समुचित  सञ्चालन  भी  किया  तथा  कीर्ति  का  भागीदार  बना  l  नीतिशास्त्र  में  इसलिए  कहा  भी  गया  है  ----- 'सैकड़ों  मुर्ख  बेटों  की  अपेक्षा   एक  ही  गुणी  पुत्र  श्रेष्ठ  है  l  जैसे  अकेला  चाँद  अंधकार  को  दूर  करता  है  ,  हजारों  तारे  नहीं  l  उसी  प्रकार  एक  गुणी  पुत्र  समाज  में  अंधकार  को  दूर  करता  और  प्रकाश   फैलाता  है  l ' 

6 September 2022

WISDOM ----

 पं.श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- ' आसुरी  प्रवृति  वाले  व्यक्तियों  की  मूल  रूचि  अपने  अहंकार  की  पूर्ति  में  ही  होती  है  ,  इसलिए  उनको  लगता  है  कि  वे  ही  श्रेष्ठतम  हैं  l  उनसे  बढ़कर  और  उनसे  ऊपर  कोई  और  नहीं  हो  सकता  l  वे  यदि  शुभ  कर्म  भी  करते  हैं  तो  इसलिए  ताकि  उनके  स्वयं  के  अहंकार  की  पूर्ति  हो  सके  l  उनके  दान , उनके  यज्ञ   इसलिए  होते  हैं  ,  ताकि  उनको  वाहवाही  मिले  ,  लोग  उनका  नाम  लें  और  कहें  कि वे  श्रेष्ठ  हैं  l "  श्रीमद् भगवद्गीता  में  भगवान  कहते  हैं --- ऐसी  प्रवृति  वाले  मनुष्य  अपने  आप  को  ही  श्रेष्ठ  मानने  वाले  धन  और  मान  के  मद  से  युक्त  होते  हैं  तथा  दिखावे  के  लिए  यज्ञ   आदि  कर्मों  को  करते  हैं  l  उनका  उद्देश्य  इन  कर्मों  को  कर  के  धर्म  की  रक्षा  करना  नहीं  होता  ,  बल्कि  अपने  अहंकार  की  पुष्टि  करना  होता  है   l  " ------- इस  सन्दर्भ  में  एक  कथा  है ----- एक  राजा  ने  अपने  अहंकार  की  पूर्ति  के  लिए  एक  बार  बड़े -बड़े  यज्ञ  कराए  l  बहुत  सा  दान  दिया  l  लोगों  ने  उसकी  बहुत  प्रशंसा  की  ,  इससे  उसका  अहंकार  और  बढ़  गया   l  वह  सोचने  लगा  कि  उसके  समान  धार्मिक  और  परोपकारी  और  कोई  नहीं  है  l   एक  दिन   एक   संत   उसके  महल  में     पधारे  l  उसने  संत  को  अपना  सब  खजाना  ,  वैभव  दिखाया   और  सोचा  कि   संत   उसकी  प्रशंसा  करेंगे  ,  पर  संत  बोले --- " राजन ! क्षण भंगुर  में  सुख  कैसा  ?  जो  शाश्वत  नहीं  है  ,  उसमें  सुख  या  धर्म  ढूँढना   मूर्खता  है  l  इससे  राजा  के  अहंकार  को  बहुत  चोट  लगी  और  उसने  संत  को  सूली  पर  चढ़ाने  का  आदेश  दे  दिया  l  उसे  यह  देखकर  बड़ा  आश्चर्य  हुआ  कि  संत  सूली  चढ़ते  समय  भी  मस्ती  से   मुस्करा  रहे  थे  ,  मानों  कुछ  हुआ  ही  न  हो  l  कुछ  वर्षों  बाद  राजा  एक  युद्ध  में  पराजित  हुआ  l  विजेता  राजा  ने  उसको  उसी  के  महल  के  खम्भे  से  बांधकर   फाँसी  चढ़ाने  का  आदेश  दिया   तब  उस  राजा  को  उन  संत  की  बातें  याद  आईं  l  आसुरी  प्रवृति  वाले  ऐसे  अहंकारी  के  द्वारा  किए  गए  धर्मार्थ  कार्य  भी  पाखंड  के  समान  प्रतीत  होते  हैं  l  अहंकार  का  अंत  होता  ही  है  l  

5 September 2022

WISDOM ---

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- 'सारे  झगड़े  कटु  वचन  से  होते  हैं  l  मीठी  वाणी  सबको  वश  में  कर  लेती  है   l  वाणी  का  संयम  आवश्यक  है  l '  ----एक  औरत  ने  अपनी  सहेली  से  कहा ---- ' मेरे  पति  बहुत  गुस्सा  करते  हैं  , घर  में  रोज  लड़ाई  होती  है  l "  उसने  कहा --- " अरे ,  इसकी   तो  बहुत  अच्छी  दवा  है  मेरे  पास  ,  तुम  एक  काम  करना  l   जब  वे  कुछ  कहें  तो  मुंह  में  गोली  रख  लेना  l  पर  कुछ  बोलना  मत  ,  नहीं  तो   दवा  का  असर  ख़त्म  हो  जायेगा  l  उसने  ऐसा  ही   किया  ,  दो  दिन  बाद  बोली ---" बहन  !  तुम्हारी  दवा  ने  बहुत  काम  किया  l  क्या  नाम  है  इस  दवा  का , मैं  भी  मंगवा  लुंगी  l  उसने  कहा --- " प्यारी  बहन !  वह  तो  मिश्री  की  डली  थी  l  काम  उस  गोली  ने  नहीं  , तुम्हारे  चुप  रहने  ने  किया  l  एक  चुप  सौ  को  हराए  l  "

 स्व. राष्ट्रपति  डा. राधाकृष्णन जब  रूस  में  भारतीय  राजदूत  थे  और  मास्को  में  रहते  थे  ,  तब  एक  बार  उन्होंने  स्टालिन  से  कहा  था --- " भारत  के  महान  सम्राट  युद्ध  में  विजय  पाकर  भिक्षु  बन  गए  l  कौन  जाने  शायद  आप  भी  उसी  प्रशस्त  मार्ग  पर  चल  पड़ें  l "  स्टालिन  ने  उत्तर  दिया --- " हाँ , कई  बार चमत्कारी  घटनाएँ  भी  हो  जाती  हैं  l  ऐसा  चमत्कार  संभव  तो  है  ही  l "    रूस  से  विदा  लेते  हुए  डा. राधाकृष्णन  जब  स्टालिन  से  मिलने  गए  ,  तो  विदा  लेते  हुए  स्टालिन  के  सिर  पर  हाथ  रखा  ,  तो  भीगी  आँखों  से  विदा  देते  हुए  स्टालिन  ने  कहा ---- " आप  प्रथम  व्यक्ति  हैं  ,  जो  मुझसे  मानव  सा  व्यवहार  करते  हैं  ,  शेष  सब  राजदूत  तो  मुझे  दैत्य  मानकर   दूर  रहते  हैं  l  मुझे  अब  अधिक  दिन  नहीं  जीना  ,  ईश्वर  आपको  चिरायु  करे  l " इस  संवाद  के  छह  महीने  बाद   स्टालिन   ने  शरीर  छोड़  दिया  l  

4 September 2022

WISDOM ----

   ईश्वर  के  नाम  में , ईश्वर  विश्वास  में  वह  शक्ति  है  जो  हमें  सभी  समस्याओं  से  पार  लगा  देती  है  l  कर्मयोगी  बनकर  हमें  प्रयास  तो  निरंतर  करना  ही  पड़ता  है  ,  अटल  विश्वास  के  कारण  ईश्वर  हमें  सद्बुद्धि  देते  हैं  जिसके  सहारे  बड़ी  से  बड़ी  कठिनाइयों  पर  हम  विजय  प्राप्त  कर  लेते  हैं  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  हमें  जीवन  जीने  की  कला  का  यही  सबसे  सरल  मार्ग  बताया  है  कि  सत्कर्म  करते  हुए  निरंतर  ईश्वर  से  सद्बुद्धि  के  लिए  प्रार्थना  करें  ,  अंधकार  दूर  होता  जायेगा  l  एक  कथा  है ------ एक  अत्याचारी  राजा  था  ,  जो  किसी  से  रुष्ट  होने  पर  उसे  बंदी  बनाकर  और  अँधा  कर  के  एक  चौरासी  कोस  के  जंगल  में  छोड़  देता  था  l  उस  जंगल  के  चारों  ओर  एक  बड़ी  व  मजबूत  दीवार  बनी  हुई  थी  l  ज्यदातर  लोग  उस  दीवार  से  सिर  टकराकर  मर  जाते  थे  ,  पर  उन्ही  में  से  एक  ऐसा  ईश्वर  भक्त  भी  था  ,  जिसे  विश्वास  था  कि  जिस  ईश्वर  ने  स्रष्टि  की  माया  रची  है  ,  क्या  उसके  पास  एक  छोटे  जंगल  से  निकलने  का  मार्ग  नहीं  होगा  l  इसी  विश्वास  के  आधार  पर  वह  रोज  दीवार  का  सहारा  लेकर  गोल -गोल  घूमा  करता  था   और  ऐसे  ही  एक  दिन  उसे  दीवार  के  मध्य  एक  ऐसा  छिद्र  मिल  गया  जिससे  बाहर  निकला  जा  सकता  था  l  उसे  जीवन  जीने  की  राह  मिल  गई  l  ------ आज  के  इस  वैज्ञानिक  युग  में  मनुष्य  ने  स्वयं  को  भगवान  समझ  लिया  है  l  विभिन्न   तरह  की  दवाइयां ,  रासायनिक   खादें , कीटनाशक , भोजन  सामग्री  आदि  सबके  प्राकृतिक  गुणों  को  नष्ट  कर  के  उन  पर  अपना  दिमाग  थोप  दिया  है  ,  स्वयं  को  प्रकृति  से  बड़ा  समझ  लिया  है  इसीलिए  संसार  में  इतनी  बीमारियाँ , आपदाएं , तनाव  है  l   कुछ  लोगों  के  अहंकार  ने  सारे  संसार  को  मुसीबत  में  डाल  दिया  l  आज  सबसे  बड़ी  जरुरत  सद्बुद्धि  की  है  ,  सद्बुद्धि  के  लिए  प्रार्थना  करें  l