भगवान बुद्ध अपने ज्ञान का प्रकाश संसार को दे रहे थे l एक सेठ भी उनका प्रवचन नियमित सुनता था l उसने तथागत से कहा --- भगवन ! मैं नियमित प्रवचन सुनता हूँ लेकिन मेरे मन में शांति नहीं है l ईश्वर की कृपा कैसे मिले ? महात्मा बुद्ध ने उस समय तो कुछ नहीं कहा l दूसरे दिन वे उस सेठ के घर पहुंचे , उनके आने की सूचना मिलने पर उसने बड़े प्रेम से उनके लिए खीर बनवाई और उनके कमंडल में देने लगा l उसने आश्चर्य से देखा कि कमंडल में तो गोबर भरा हुआ है l उसने कमंडल उठाया , उसे अच्छी तरह साफ़ किया , फिर उसमें खीर रखी l खीर रखने के बाद वह तथागत से बोला ---- " भगवन ! कहीं भिक्षा हेतु पधारा करें तो अपना कमंडल साफ़ करके ही लाया करें l गंदे पात्र में खीर रखने से आहार की पवित्रता नष्ट हो जाएगी l " भगवान बुद्ध शांत भाव से बोले --- " वत्स ! भविष्य में कभी आऊंगा तो कमंडल साफ कर के ही लाऊंगा l तुम भी अपना कमंडल साफ रखा करो l " सेठ ने आश्चर्य से कहा --- " कौन सा कमंडल ? " तथागत बोले ---- " यह तन रूपी कमंडल ! मन में मलिनता भरी रहने से जीवन भी कलुषित हो जाता है l मन को शांति नहीं मिलती और भगवान की कृपा भी उसमें ठीक से कार्य नहीं करती l " सेठ को बात समझ में आ गई और अब वह भी अपने दोष -दुर्गुणों को मिटाने में जुट गया l
5 August 2025
4 August 2025
WISDOM -----
संसार के लगभग सभी देशों में धर्म , जाति , रंग , ऊँच -नीच , अमीर -गरीब आदि के आधार पर भेदभाव प्राचीन काल से ही रहा है और इस वैज्ञानिक युग में भी इस प्रकार के भेदभाव समाप्त नहीं हुए l ऐसी बेवजह की बातों पर विवाद , युद्ध , दंगे आदि कर के मनुष्य ने बहुत कुछ खोया है l भौतिक प्रगति तो हो गई लेकिन चेतना के स्तर पर आज मनुष्य कहाँ पर है इसे संसार में होने वाले युद्ध , हत्याकांड , आत्महत्या , और धन कमाने की अंधी दौड़ को देखकर समझा जा सकता है l यदि मनुष्य की चेतना विकसित हो , उसमें अहंकार न हो तो वह जीवन में घटने वाली अनेक घटनाओं के पीछे की वजह समझ जाता है और उनसे लाभान्वित होता है l ---------- महाभारत में जब चौसर के खेल में पराजित होने पर पांडवों को वनवास हुआ l उस समय दिव्य अस्त्रों को प्राप्त करने के लिए अर्जुन ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए तप किया l ईश्वर से कुछ प्राप्त करना हो तो बड़ी परीक्षाएं देनी पड़ती हैं l अर्जुन जिस वन में तप कर रहा था वहीँ महादेव जी व्याध के रूप में शिकार करने उसी वन में पहुंचे l वे एक जंगली सुअर का पीछा कर रहे थे l सामने अर्जुन को देख सुअर उस पर झपटा l अर्जुन चौंक गया और तुरंत अपने गांडीव से बाण चला दिया l उसी समप व्याध रूप धारी महादेव ने भी सूअर पर तीर चला दिया l दोनों के तीर एक साथ लगे l अपने शिकार पर एक शिकारी को हमला करते देख अर्जुन को क्रोध आया उसने शिकारी से कहा --- ' तुमने मेरे शिकार पर अपना तीर चलाने की हिम्मत कैसे की ? ' दोनों में बहुत विवाद हुआ कि किसका तीर पहले लगा ? विवाद इतना बड़ा कि यह निश्चय हुआ कि आपस में लड़कर निश्चय हो कि किसके तीर से शिकार मरा है l अर्जुन ने व्याध पर बाणों की वर्षा की l जितने भी उसके पास बाण थे , सब चला दिए लेकिन व्याध पर कोई असर नहीं , वह हँसता रहा और उसने हँसते हुए अर्जुन के हाथ से उसका धनुष छीन लिया l अर्जुन ने तलवार से मारा तो तलवार टूट गई , अब अर्जुन ने घूंसे मारना शुरू किया लेकिन व्याध पर कोई असर नहीं , वह मुस्कराता रहा l अर्जुन का दर्प चूर -चूर हो गया , अपना घमंड छोड़कर उसने देवाधिदेव महादेव का ध्यान किया , ईश्वर की शरण ली तो उसके मन में ज्ञान का प्रकाश फ़ैल गया , वह समझ गया कि ये व्याध नहीं साक्षात् महादेव हैं , अर्जुन उनके चरणों में गिर गया , उनसे क्षमा मांगी l महादेव ने प्रसन्न होकर अर्जुन को पाशुपत अस्त्र और अनेक दिव्य अस्त्र तथा अनेक वरदान दिए l यहाँ अर्जुन ने अपने अहंकार को छोड़ा और ईश्वर के प्रति शरणागत हुआ तब उसे ईश्वर की कृपा मिली l ------------- एक दूसरी कथा है ------ उत्तंक मुनि मरुभूमि के आसपास घूमने वाले तपस्वी थे l जब जब भगवान श्रीकृष्ण पांडवों से विदा लेकर द्वारका लौट रहे थे तब मार्ग में उनकी भेंट उत्तंक मुनि से हुई l उनसे प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा --- 'मुनिवर ! मैं आपको कुछ वरदान देना चाहता हूँ , जो चाहें मांग लो l ' उत्तंक मुनि ने कहा --- " भगवन आपके दर्शन हो गए , अब किसी वरदान की चाह नहीं है l ' भगवान ने उनसे आग्रह किया कि कोई वरदान मांग लो ! ' उत्तंक मुनि मरुभूमि में घूमते थे इसलिए उन्होंने कहा ---" प्रभो ! आप इतना वरदान दें कि मुझे जब भी और जहाँ कहीं भी जल की आवश्यकता हो , मुझे वहीँ जल मिल जाए l ' भगवान वरदान देकर द्वारका चले गए l बहुत दिन बाद उत्तंक मुनि वन में फिर रहे थे , उन्हें बड़ी प्यास लगी , उन्होंने श्रीकृष्ण का ध्यान किया , तुरंत ही उन्हें सामने एक चाण्डाल खड़ा दिखाई दिया , उसने फटे -पुराने चीथड़े पहन रखे थे , साथ में चार -पांच जंगली कुत्ते थे और कंधे पर मशक में पानी था l चांडाल बोला --- " मालूम होता है आप प्यास से परेशान हैं l यह लीजिए पानी l ' चांडाल की गन्दी सूरत , उसकी चमड़े की मशक और कुत्तों को देखकर उन्होंने नाक -भौं सिकोड़ ली और उसका पानी लेने से इनकार कर दिया उत्तंक मुनि को बहुत क्रोध आया कि श्रीकृष्ण ने मुझे झूठा वरदान कैसे दिया , मैं ब्राह्मण , उस चांडाल के हाथ का , मशक का गन्दा पानी कैसे पी सकता हूँ ? ' उसी समय चांडाल अचानक कुत्तों समेत आँखों से ओझल हो गया l अब उत्तंक मुनि समझे कि यह तो उनकी परीक्षा थी , उनसे भारी भूल हो गई , मेरे ज्ञान ने समय पर मेरा साथ नहीं दिया l थोड़ी देर में भगवान श्रीकृष्ण शंख , चक्र लिए उनके सामने प्रकट हुए l श्रीकृष्ण ने कहा --- " मुनिवर ! आपने पानी की इच्छा की थी तो मैंने देवराज से आग्रह किया कि मुनि को अमृत ले जाकर पिलाओ l तब देवराज ने कहा कि मैं चांडाल के रूप में जाऊँगा , यदि मुनि ने इनकार कर दिया तो नहीं पिलाऊंगा l ' कृष्णजी ने कहा मैंने सोचा था कि आप ज्ञानी और महात्मा हैं , आपके लिए तो चांडाल और ब्राह्मण समान होंगे और चांडाल के हाथ का पानी पीने में आप संकोच नहीं करेंगे लेकिन स्वयं को श्रेष्ठ समझने के कारण आप अमृत से वंचित रह गए l " उत्तंक मुनि अपनी गलती पर बहुत लज्जित हुए लेकिन अब क्या हो सकता है ? देवराज अमृत लेकर वापस जा चुके थे l
2 August 2025
WISDOM ------
वृक्ष ने पथिक से कहा --- " तुम जितनी बार पत्थर मारोगे , उतनी ही बार मैं उपहार में फल दूंगा l यह तो मेरा व्रत है l पत्थर का उत्तर पत्थर से देना मुझे नहीं आता , भले ही मुझे कितना ही कष्ट क्यों न हो l " पथिक ने कुढ़कर कहा --- " तुम यों फलो -फूलो और मैं भूखा फिरु, क्या यह तुम्हारा और तुम्हारे भगवान का अन्याय नहीं l " वृक्ष ने हँसकर कहा --- " ईर्ष्या क्यों करते हो पथिक ! मेरे पतझड़ के कष्टों को देखते तो पता चलता कि यह फल मैंने कितनी तपस्या कर प्राप्त किए हैं ? तू भी वैसा ही पुरुषार्थ कर देखो l " सत्य है किसी को सफल होते देख उससे ईर्ष्या करने वालों की कमी नहीं है l लोग सफल व्यक्ति को देखकर जलते भी हैं और उसे नीचे गिराने का हर संभव प्रयत्न भी करते हैं l सफलता प्राप्त करने के लिए उसने जो त्याग और तपस्या की , कठिन संघर्ष किया , उससे प्रेरणा लेकर वे स्वयं सफल होने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करते l अब लोग शार्ट कट से सफल होना चाहते हैं लेकिन गलत तरीके से प्राप्त सफलता में कोई सुकून व आनंद नहीं होता , हमेशा गिरने का भय सताता रहता है l
31 July 2025
WISDOM -----
लघु -कथा ---- जीवन का रहस्य ---- देवताओं और असुरों में घोर युद्ध हो रहा था l राक्षसों के शस्त्र बल और युद्ध कौशल के सम्मुख देवता टिक नहीं पाते थे l वे हारकर जान बचने भागे और महर्षि दत्तात्रेय के पास पहुंचे और उन्हें अपनी विपत्ति की गाथा सुनाई l महर्षि ने उन्हें धैर्य बँधाया और पुन: लड़ने को कहा l इस बार भी देवता पराजित हो गए और भागकर महर्षि दत्तात्रेय के पास आए l इस बार असुरों ने भी उनका पीछा किया और वे भी आश्रम में आ पहुंचे l असुरों ने आश्रम में बैठी हुई एक अति सुन्दर युवती को देखा तो वह लड़ना भूल गए और उस स्त्री पर मुग्ध हो गए और उसके अपहरण की योजना बनाने लग गए l वह स्त्री रूप बदले हुए लक्ष्मीजी थीं , असुरों का पुइरा ध्यान उन्ही पर केन्द्रित हो गया l महर्षि ने देवताओं से कहा --- " अब तुम तैयारी कर असुरों पर आक्रमण करो l " इस बार के युद्ध में असुर बुरी तरह पराजित हुए l विजय प्राप्त कर के देवता फिर से महर्षि दत्तात्रेय के आश्रम पहुंचे और उनसे पूछा --- " भगवान ! दो बार पराजय और अंतिम बार विजय का रहस्य क्या है ? " महर्षि ने कहा --- " जब तक मनुष्य सदाचारी और संयमी रहता है , तब तक उसमें पूर्ण बल विद्यमान रहता है और जब वह कुपथ पर कदम रखता है , तो उसका आधा बल क्षीण हो जाता है l पर -स्त्री का अपहरण करने की कुचेष्टा में असुरों का आधा बल नष्ट हो गया , तभी तुम उन पर विजय प्राप्त कर सके l "
29 July 2025
WISDOM ---
इस युग की सबसे बड़ी समस्या दुर्बुद्धि की है l मनुष्य स्वस्थ रहे , सुखी रहे , इसके लिए विभिन्न तरह की चिकित्सा पद्धति हैं लेकिन फिर भी मनुष्य स्वस्थ नहीं है l बड़े - छोटे , सस्ते - महँगे हर तरह के अस्पताल बीमार लोगों से भरे हैं l जिसके पास सब सुख -सुविधा है , वह भी पूर्ण स्वस्थ नहीं है l इसका कारण हमारे ऋषियों ने बताया --' ओषधियां तो व्याधियों की रोकथाम भर करती हैं , मन के पतन पर उनका नियंत्रण नहीं है l जब मनुष्य का मन अधर्मरत होकर विपत्तियों को आमंत्रित करेगा , तब मनुष्य के हाथ में उपचार का अमृत कलश भी हो तब भी वह रोगी होगा l ' दुर्बुद्धि के कारण ही आज मनुष्य पांचो तत्वों को , सम्पूर्ण प्रकृति को प्रदूषित कर रहा है और स्वयं आत्महत्या की ओर बढ़ रहा है l ऋषि पुनर्वसु कहते हैं ---- " बुद्धि विपर्यय मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है l बुद्धि के भ्रमित और पतित होने पर मनुष्य जो करने योग्य काम है उसका परित्याग कर देता है और न करने योग्य काम को करने की प्रवृत्ति बढ़ती है l इससे न केवल शारीरिक व्याधियां बढ़ती हैं , वरन हर दिशा से विपत्तियाँ बरसती हैं l इसलिए शारीरिक व्याधियों के निवारण हेतु मानसिक व्याधियों का समाधान अधिक आवश्यक और प्राथमिकता देने योग्य है l "
26 July 2025
WISDOM -------
जीवन में सफलता के लिए जागरूकता बहुत जरुरी है l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'जीवन जीना एक तकनीक है , कला है l जो इसे जानता है , सही मायने में वही कलाकार एवं प्रतिभावान है l ' व्यक्ति पढ़ -लिख कर , शिक्षा प्राप्त कर उच्च पदों पर पहुँच जाता है लेकिन अपनी सामान्य सी जिन्दगी को चलाने के लिए नशा , शराब जैसे मादक द्रव्यों का सहारा लेता है l शांति और सुकून के साथ जीवन जीने के लिए बहुत बड़ी बातों की , सिद्धांतों की आवश्यकता नहीं होती l यदि मनुष्य कोई भी कार्य सोच -विचारकर विवेकपूर्ण ढंग से करे तो व्यर्थ की परेशानियों से बच सकता है l बहुत छोटी सी बात है --मनुष्य अपने स्वाद पर नियंत्रण रखे , बिना सोचे -विचारे कुछ न खाए -पिए तो अनेक समस्याओं से , बीमारी से बच सकता है l एक कथा है --- रेगिस्तान में एक काफिला जा रहा था l रास्ते में एक पेड़ पर बहुत से पके फल लगे थे l सबको भूख लगी थी , इसलिए फल खाने को दौड़े l काफिले के सरदार ने उन्हें रोका और कहा ---'अपने विवेक से काम लो l यदि ये उपयोगी होते तो पहले वाले काफिले ही इन्हें खाकर समाप्त कर देते l पक्षी ही इन्हें कुतर डालते l लेकिन ऐसा नहीं हुआ l ' फलों का परिक्षण करने पर पता चला कि वे जहरीले थे l विवेक से काम लेने से काफिले के प्राणों की रक्षा हुई l
24 July 2025
WISDOM -----
आज संसार में चारों ओर भय का वातावरण है l इसका सबसे बड़ा कारण है कि कलियुग के प्रभाव से लोगों में कायरता बढ़ती जा रही है l ईर्ष्या , द्वेष , कामना , वासना , महत्वाकांक्षा , लालच और दमित इच्छाओं की पूर्ति के लिए अब लोग प्रत्यक्ष रूप से कोई वाद -विवाद , हाथापाई और किसी तरह की लड़ाई नहीं करते l ऐसा करने से उनका असली चेहरा सामने आ जायेगा l इसलिए समाज में सबके सामने सभ्य बने रहकर लोग पीठ पर वार करते हैं l धोखा , षड्यंत्र , ब्लैकमेल , माइंडवाश करना , यह सब आम बात हो गई है l यही कारण है कि आज सब भयभीत है l घर , परिवार , आफिस , समाज में आप जिसके साथ हैं , जिसका विश्वास करते हैं , वह अपनी चालाकी से , अपनी दुर्बुद्धि से आपको कब गिरा दे , मार दे , कोई नहीं जानता l वातावरण में इतनी नकारात्मकता है कि अब किसी का भी विश्वास नहीं किया जा सकता l भय का एक दूसरा रूप भी है , जहाँ व्यक्ति अपनी ही कमजोरियों से भयभीत है l और आश्चर्य यह है कि वह अपनी कमजोरियों पर विजय पाने का कोई प्रयास नहीं करता बल्कि अपनी कमजोरियों के साथ जीवन जीने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है l वैराग्यशतक में भतृहरि ने लिखा है ---- " भोग में रोग का भय , सत्ता में शत्रुओं का भय , सामाजिक स्थिति में गिरने का भय , सौन्दर्य में बुढ़ापे का भय और शरीर में मृत्यु का भय है l इस संसार में सब कुछ भय से युक्त है l निर्भयता से जीने के लिए उन्होंने त्याग का मार्ग बताया है l " लेकिन युग का प्रभाव ऐसा है कि अब लोग 'त्याग ' शब्द को ही भूल गए हैं l जब मनुष्य से ईश्वर से डरेगा , ईश्वर से भय खायेगा , तभी उसे संसार में दूसरा भय नहीं सताएगा l