6 October 2025

WISDOM ------

    कर्मफल    का  नियम  अकाट्य  है  ,  यदि  बबूल  का  पेड़  बोया  है  तो  काँटे  ही  मिलेंगे  ,  आम  नहीं  l   यदि  कोई  अपनी  चालाकी  से   किसी  की  ऊर्जा  चुरा  ले  ,  किसी  का  आशीर्वाद  लेकर   कुछ  समय  के  लिए  अपने  कुकर्मों  के  दंड  से  बच  भी  जाए  ,  तो  यह  भी  ईश्वर  का  विधान  ही  है  l  प्रत्येक  व्यक्ति  पर  जन्म -जन्मांतर  के  कर्मों  का  लेन  -देन  होता  है   ,  यह  हिसाब  किस  तरह  चुकता  होगा   यह  सब  काल  निश्चित  करता  है  l   मनुष्य  ने  जो  भी  अच्छे -बुरे  कर्म  किए  हैं  ,  उनके  परिणाम  से  वह  बच  नहीं  सकता  l  चाहे  वह  दुनिया  के  किसी  भी  कोने  में  चला  जाए  ,  उसके  कर्म  उसे  ढूंढ  ही  लेते  हैं  ,  जैसे  बछड़ा  हजारों  गायों  के  बीच  अपनी  माँ  को  ढूंढ  लेता  है  l    मनुष्य  अपनी  ओछी  बुद्धि  से  सोचता  है  कि     सिद्ध  महात्माओं  का  आशीर्वाद  लेकर , गंगा  स्नान  कर  के  उसे  अपने  पापकर्मों  से  छुटकारा  मिल  जायेगा  l  दंड  संभवतः  कुछ  समय  के  लिए  स्थगित   भले  ही  हो  जाए  लेकिन  टल  नहीं  सकता  l  ' ईश्वर  के  घर  देर  है ,   अंधेर  नहीं  l '   दुर्योधन  ने   पांडवों  का  हक  छीनने  , उन्हें  कष्ट  देने  के  लिए    जीवन  भर  छल , कपट , षड्यंत्र  किए  l    वह  तो  एक  से  बढ़कर  एक  धर्मात्माओं   गंगापुत्र  भीष्म ,  द्रोणाचार्य , कृपाचार्य  और  विदुर  की  छत्रछाया  में  था  ,  सूर्यपुत्र  कर्ण  उसका  मित्र  था   लेकिन  अधर्मी  और  अन्यायी  का  साथ  देने  के  कारण    उनका  कोई  ज्ञान  , धर्म  कुछ  काम  न  आया  l  उन  सबका  अंत  हुआ   और  दुर्योधन  तो  समूचे  कौरव  वंश  को  ही  ले  डूबा  l  

5 October 2025

WISDOM -----

   श्रीमद् भगवद्गीता  में  भगवान  कहते  हैं  कि   मनुष्य  कर्म  करने  को  स्वतंत्र  है   लेकिन  उस  कर्म  का  परिणाम  कब  और  कैसे  मिलेगा  यह  काल  निश्चित  करता  है  l  कलियुग  में  मनुष्य  बहुत  बुद्धिमान  हो  गया  है  ,  वह  अपनी  बुद्धि  लगाकर  इस  विधान  में  थोड़ी  बहुत  हेराफेरी  कर  ही  लेता  है  l  इसे  इस  तरह  समझ  सकते  हैं  ---- कहते  हैं  प्रत्येक  मनुष्य  के    दो  घड़े  --एक  पाप  का  और  एक  पुण्य  का  चित्रगुप्त जी  महाराज  के  पास  रखे  रहते  हैं  l  जब  कोई   निरंतर  पापकर्म  करता  रहता  है  तो  उसका  पाप  का  घड़ा  भरता  जाता  है  l  यदि  वह  कुछ  पुण्य  कर्म  भी  करता  है   तो  उन  पुण्यों  से  उसके  कुछ  पाप  कटते  जाते  हैं  लेकिन  यदि  पुण्यों  की  गति  बहुत  धीमी  है  तो  एक  न  एक  दिन  उसका  पाप  का  घड़ा  भर  जाता  है  l  जो  बहुत  होशियार  हैं  उन्हें    बीमारी , अशांति  , व्यापार  में  घाटा  आदि  अनेक  संकेतों  से   इस  बात  का  एहसास  होने  लगता  है  कि अब  उनके  पापों  का  फल  मिलने  का  समय  आ  रहा  है  l  ऐसे  में  वे  बड़ी  चतुराई  से  किसी  पुण्यात्मा  का  , किसी  साधु -संत  का  पल्ला  पकड़  लेते  हैं  l  उनके  चरण  स्पर्श  करना  ,  आशीर्वाद  लेना  ,  उन्हें  धन , यश , प्रतिष्ठा  का  प्रलोभन  देकर  उनसे  आशीर्वाद  के  रूप  में  उनके  संचित  पुण्य  भी  ले  लेते  हैं   l  सुख -वैभव , यश  की  चाह  किसे  नहीं  होती  ,  निरंतर  चरण  स्पर्श   कराने   और  आशीर्वाद  देते  रहने  से    उनकी  ऊर्जा  पुण्य  के  रूप  में   उस  व्यक्ति  की  ओर  ट्रान्सफर  होती  जाती  है  l  इसका  परिणाम  यह  होता  है  कि   उस  पापी  के  पुण्य  का  घड़ा  फिर  से  भरने  लगता  है   जिससे  उनके  पाप  कटने  लगते  हैं  और  साधु  महाराज  का  पुण्य  का  घड़ा  खाली  होने  लगता  है  l  अब  या  तो  वे  महाराज  तेजी  से  पुण्य  कार्य  करें  लेकिन  सुख -भोग  और  यश    मिल  जाने  से   अब  पुण्य  कर्म  करना  संभव  नहीं  हो  पाता  l  पुण्य  का  घड़ा  रिक्त  होते  ही   उन  महाराज  का  पतन  शुरू  होने  लगता  है  ,   कभी  एक  वक्त  था  जब  लोग  सिर  , आँखों  पर  बैठाए  रखते  थे    लेकिन  अब  -------- l    केवल  साधु  -संत  ही  नहीं  सामान्य  मनुष्यों  को  भी  प्रतिदिन  कुछ  -  कुछ  पुण्य  अवश्य  करते  रहना  चाहिए   ताकि  जाने -अनजाने  हम  से  जो  पाप  कर्म  हो  जाते  हैं  , उनसे  इस  पाप -पुण्य  का  संतुलन  बना  रहे  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  कहते  हैं  ---- हमें  पुण्य  का  कोई  भी  मौका  हाथ  से  जाने  नहीं  देना  चाहिए  l  पुण्यों  की  संचित  पूंजी  ही    हमारी   बड़ी -  बड़ी  मुसीबतों  से  रक्षा  करती  है  l  

3 October 2025

WISDOM ----

  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- "  स्वार्थ  के  वशीभूत  मनुष्य  इतना  लालची  हो  जाता  है   कि  उसे  घ्रणित  कर्म  करने  में  भी  लज्जा   नहीं आती  l  तृष्णा  के  वशीभूत  हो  कर   लोग  अनीति  का  आचरण  करते  हैं   और  वह  अनीति  ही   अंततः  उनके  पतन  एवं  सर्वनाश  का  कारण  बनती  है  l   कोई  कितना  ही  शक्तिशाली  , बलवान  क्यों  न  हो  ,   स्वार्थपरता  एवं  दुष्टता  का  जीवन  बिताने  पर   उसे  नष्ट   होना   ही  पड़ता  है  l "         रावण  के  बराबर  पंडित , वैज्ञानिक , कुशल  प्रशासक , कूटनीतिज्ञ   कोई  भी  नहीं  था  ,  लेकिन  पर-स्त्री  अपहरण  , राक्षसी  आचार -विचार   एवं   दुष्टता  के  कारण  कुल  सहित  नष्ट  हो  गया  l  कंस  ने  अपने  राज्य  में     हा -हाकार  मचवा  दिया  l  अपनी  बहन  और  बहनोई  को  जेल  में  बंद  कर  दिया  ,  उनके  नवजात  शिशुओं   को  शिला  पर  पटक -पटक  मार  दिया  l  अपने  राज्य  में   छोटे -छोटे  बालकों  को  कत्ल  करा  दिया  l  लोगों  में  भय  और  आतंक  का  वातावरण  पैदा  किया  ,  लेकिन  वही  कंस   भगवान  कृष्ण   द्वारा  बड़ी  दुर्गति  से  मार  दिया  गया  l  दुष्ट  व्यक्ति  अपने  ही  दुष्कर्मों  द्वारा   मारा  जाता  है  l    -------  रावण  का  मृत  शरीर पड़ा  था   l   उसमें  सौ  स्थानों  पर  छिद्र  थे  l  सभी  से  लहु  बह  रहा  था  l  लक्ष्मण जी  ने   राम  से  पूछा  --- 'आपने  तो  एक  ही  बाण  मारा  था  l  फिर  इतने  छिद्र  कैसे  हुए  ? ' भगवान  श्रीराम  ने  कहा ---  मेरे  बाण  से  तो  एक  ही  छिद्र  हुआ  l  पर  इसके  कुकर्म   घाव  बनकर   अपने  आप  फूट  रहे  हैं  और  अपना  रक्त  स्वयं  बहा  रहे  हैं  l  

1 October 2025

WISDOM -----

 अहंकार  एक  ऐसा  दुर्गुण  है  जो  व्यक्ति  के  सद्गुणों  पर  पानी  फेर  देता  है  और  अनेक  अन्य  दुर्गुणों  को  अपनी  ओर  आकर्षित  कर  लेता  है  l   रावण  महापंडित , महाज्ञानी  और  परम  शिव  भक्त  था   लेकिन  बहुत  अहंकारी  था  l  उसमें  गुण  तो  इतने  थे  कि  उसकी  मृत्यु  के  समय   भगवान  राम  ने  भी  लक्ष्मण  को  उसके  पास  ज्ञान  प्राप्त  करने  के  लिए  भेजा  l  लेकिन  उसके  अहंकार  ने   उसके  सारे  गुणों  पर  परदा  डाल  दिया  ,  उसके  अहंकार  को  मिटाने  के  लिए  स्वयं  ईश्वर  को  अवतार  लेना  पड़ा  l  रावण  स्वयं  को  असुरराज  कहने  में  ही  गर्व  महसूस  करता  था  l  सम्पूर्ण  धरती  पर  उसका  आतंक  था  l  अनेक  छोटे -बड़े  और  सामान्य  असुर  ऋषियों  को  सताते  थे , उनके  यज्ञ  और  धार्मिक  अनुष्ठानों  का  विध्वंस  करते  थे  l   रावण  सभी  असुरों  का  प्रमुख  था    जिसे  वर्तमान  की  भाषा  में  ' डॉन '  कहते  हैं   l      माता  सीता  का  हरण  कर   उसने  स्वयं  ही  अपना  स्तर  गिरा  लिया  l  वह  ज्ञानी  था  और  जानता   था  कि   ऐसे  कार्य  से  उसका  समाज  में  सम्मान  कम  हो  जायेगा   इसलिए  वह  वेश  बदलकर  भिक्षा  का  कटोरा  लेकर  सीताजी  के  पास  गया  l   रावण  वध   यही  संदेश  देता  है  कि    छोटे और  साधारण  असुरों  को  मारने  से , उनका  अंत  करने  से  असुरता  के  साम्राज्य  का  अंत  नहीं  होगा   क्योंकि  वे  तो  रावण  के  टुकड़ों  पर  पलने  वाले , अपना   जीविकापार्जन  करने  वाले  थे  l  इन  सबके  मुखिया  रावण  का  अंत  करो  तभी  इस  धरती  से  अधर्म  और  अन्याय  के  साम्राज्य  का  अंत  होगा  l  इसी  उदेश्य  को  ध्यान  में  रखकर  यह  ईश्वरीय  विधान  रचा  गया  l  ईश्वर  चाहते  हैं  कि  धरती  पर  सभी  प्राणी  शांति  और  सुकून  से  रहें  लेकिन  जब  मनुष्यों  की  आसुरी  प्रवृत्ति  प्रबल  हो  जाती  है   तब  ईश्वर  कोई  विधान  अवश्य  रचते  हैं  l  

30 September 2025

WISDOM ------

   प्राचीन  काल  के  हमारे  ऋषि  त्रिकालदर्शी  थे  l  उन्होंने  जो   रचनाएँ  की  उन  का    प्रत्येक  युग  के  अनुरूप   भिन्न -भिन्न  अर्थ  था  l  जैसे  हमारे  महाकाव्य  हैं  --रामायण  और  महाभारत  l  इनके  विभिन्न  प्रसंगों  में   कलियुग  की  भयावह  परिस्थितियों  में  स्वयं  के  व्यक्तित्व  को   सुरक्षित  और  विकसित   करने    के  लिए   उचित  मार्ग  क्या  है  ,  इसे  गूढ़  अर्थ  में  समझाया  गया  है  l    रामायण  का  एक  प्रसंग  है  ----- बाली  और  सुग्रीव  दो  भाई  थे  ,  दोनों  ही  बहुत  वीर  थे  लेकिन  बाली  को  यह  वरदान  प्राप्त  था  कि  कोई  भी  उसके  सामने  आकर  उससे  युद्ध  करेगा  तो  उसकी  आधी  शक्ति  बाली  को  मिल  जाएगी  l  इस  कारण  किसी  से  भी  युद्ध  हो  बाली  की  ही  विजय  होती  थी  l  किसी  कारण  से  बाली  और  सुग्रीव  दोनों  भाइयों  में  विवाद हो  गया  ,  युद्ध  की  नौबत  आ  गई  l  बाली  को   जीतना    असंभव  था  , अत:  सुग्रीव  पराजित  होकर  ऋष्यमूक  पर्वत  पर  छिपकर  रहने  लगा  l  बाली  की  यह  विशेष  योग्यता  त्रेतायुग  में  उसका  वरदान  थी  लेकिन  इस  कलियुग  में  जब  कायरता   और  मानसिक  विकृतियाँ  अपने  चरम  पर  हैं  ,  तब  ऐसी  विशेष  योग्यता  प्राप्त  लोग  अपनी  शक्ति  का  दुरूपयोग  कर  रहे  हैं  l  शक्ति  के  दुरूपयोग  के  कारण  यह  वरदान  नहीं  ,  समाज  के  लिए  अभिशाप  है  और  इस  युग  में  इन्हें  कहते  हैं '  एनर्जी  वैम्पायर  "  l  हमारे  जीवन  में  अनेकों  बार  हमारा  सामना  ऐसे  लोगों  से  होता  है   , जिनसे  बात  करके  भी  ऐसा  महसूस  होता  है   जैसे  बिलकुल  थक  गए  ,  शरीर  में  कोई  शक्ति  नहीं  रही  ,  निराशा  सी  आने  लगती  है  l  ऐसे  ही  लोग  एनर्जी  वैम्पायर  होते  हैं   जो  अपनी  बातों  से  या  किन्ही  अद्रश्य  शक्तियों  की  मदद  से   अपने  विरोधियों  को   या  जिससे  वे  ईर्ष्या  और  प्रतियोगिता  रखते  हैं   उसे  विभिन्न  तरीके  से  कष्ट  देते  हैं  , परेशान  करते  हैं  और  उसकी  एनर्जी  को  खींचकर  स्वयं  बड़ी  उम्र  तक  भी  भोग विलास  का  जीवन  जीते  हैं  l  इस  युग  में  तंत्र -मन्त्र   विज्ञान  के  साथ  मिलकर   इतना  शक्तिशाली   हो  गया  है    की  अद्रश्य  शक्तियों  की  मदद  से   एनर्जी  की  सप्लाई  और  व्यापार  भी  संभव  है  l  ऐसे  वैम्पायर  समाज  में  सभ्रांत  लोगों  की  तरह  शान  से  रहते  हैं  l  जिसकी  एनर्जी  को  वे  खींच  लेते  हैं   उसका  शरीर  बिना  किसी  बीमारी  के  सूख  जाता  है  ,  उम्र  से  पहले  बुढ़ापा  दीखने  लगता  है  ,  कोई  दवा  फायदा  नहीं  करती  l  ये  एनर्जी  वैम्पायर   अपने  धन  और  शक्ति  के  बल  पर   अमर  रहना  चाहते  हैं  l  ऐसे  लोगों  को  कोई  सुधार  नहीं  सकता  l  इस  कथा   की  यही  शिक्षा  है  कि   जब  इन्हें  पहचान  लें  तो  ऐसे  लोगों  से  सुग्रीव  की  तरह  दूर  रहे  ,  ईश्वर  की  शरण  में  रहें  l  शक्ति  का  दुरूपयोग  करने  वालों  का  न्याय  ईश्वर  ही  करते  हैं  l  

29 September 2025

WISDOM ------

   हमारे  पुराणों  की कथाएं   मात्र  मनोरंजन  नहीं  हैं  , उनमें  गूढ़  अर्थ  छिपा  रहता  है  l  उस  अर्थ  को  समझ  कर  ,  उसके  अनुसार  आचरण  कर  पारिवारिक , सामाजिक , राजनीतिक  सभी  क्षेत्रों  में  सुधार  संभव  है  ----  एक  कथा  है  ----- पांडवों  ने    अभिमन्यु  के  पुत्र  परीक्षित  को  राजगद्दी  सौंपकर  वनगमन  किया  l  महाराज  परीक्षित  के  काल  में  ही  धरती  पर  कलियुग  का  आगमन  हुआ  l  एक  बार  महाराज  परीक्षित  शिकार  खेलने  वन  में  गए  , राह  भटक  गए  ,  उन्हें  बहुत  प्यास  लगी  l   वहां  एक  आश्रम  था  l  राजा  बड़ी  तेजी  से  आश्रम  गए  और  ऋषि  ने  पानी  माँगा  l  ऋषि  समाधि  में  थे  , उन्होंने  सुना  नहीं  l  कलियुग  के  प्रभाव  के  कारण  राजा  की  भी  बुद्धि  भ्रष्ट  हो  गई   और  उन्होंने  ऋषि  के  गले  में  एक  मृत  सांप  डाल  दिया  ,  और  महल  वापस  लौट  आए  l  ऋषि  का  पुत्र  जब  आश्रम   में  आया  तो  उसने  अपने  पिता  के  गले  में  मृत  सांप  देखा  तो  उसे  बहुत  क्रोध  आया  l  कलियुग  सभी  की  बुद्धि  भ्रष्ट  कर  देता  है  ,  ऋषि  पुत्र  ने  बिना  सोचे -समझे   हाथ  में  जल  लेकर   यह  श्राप  दिया  कि  जिसने  भी  मेरे  पिता  के  गले  में  मृत  सर्प  डाला  है  , उसे  आज  से  सांतवें  दिन  तक्षक  नाग  डस   लेगा  l  श्राप  कभी  विफल  नहीं  होता  समाधि  से  जागने  पर  ऋषि  ने  ही  राजा  को  सलाह  दी  कि  वे  शुकदेव  मुनि   से  भागवत  कथा  सुने  , इससे  उन्हें  मोक्ष  प्राप्त  होगा  l  ऐसा  ही  हुआ  और  सांतवे  दिन   महाराज  परीक्षित  को  मोक्ष  मिलने  के  बाद  उनके  पुत्र  जनमेजय  सिंहासन  पर  बैठे  l  उन्हें  जब  यह  सब  मालूम  हुआ  कि  तक्षक  नाग  के  डसने  से  उनके  पिता  की  मृत्यु  हुई  है  , तो  उन्हें  बहुत  क्रोध  आया  और  उन्होंने   ऋषि -मुनियों  की  मदद  से  ' सर्पयज्ञ  '  का  आयोजन  किया  , जिससे  उस  यज्ञ  में  सब  सर्पों  की  आहुति  दी  जाए  ,  और  इस  तरह  से  संसार  से  यह  प्रजाति  ही  समाप्त  हो  जाए  l  यज्ञ  शुरू  हुआ   और  मन्त्रों  के  साथ   आहुती  में  दूर -दूर  से  सर्प  आकर  उस  हवन  कुंड  में  गिरने  लगे  l  चारों  ओर  हाहाकार  मच  गया  ,  जब  तक्षक  को  पता  चला   तब  वह  भाग  कर  स्वर्ग  के  राजा  इंद्र  की  शरण  में  गया ,  इंद्र  ने  उसको  शरण  दी   और  वह  उनके  सिंहासन  से  लिपट  गया  l  इधर  जब  तक्षक  के  नाम  से  आहुति  के  लिए  मन्त्र  उच्चारण  किया  गया  तब  वह  मन्त्र  इतना  शक्तिशाली  था  कि  इंद्र  के  साथ  ही   सिंहासन  समेत  तक्षक  नाग  यज्ञ  मंडप  की  ओर  जाने  लगा  l  सारे  देवता  वहां  एकत्रित  हो  गए  , जन्मेजय  को  बहुत  समझाया  कि  जो  हुआ  वह  विधि  का  विधान था  ,  यह  यज्ञ  बंद  करो  ,  देवराज  इंद्र  ने  उसे  शरण  दी  है  l  इस  तरह  इंद्र  की  शरण  लेने  से  तक्षक  नाग  की  रक्षा  हुई  l   ------यह  कथा  स्पष्ट  रूप  से  इस  बात  का  संकेत  करती  है   कि  परिवार  और  समाज  के  जहरीले  ,  अपराधी   इसी  तरह  किसी  शक्तिशाली   का   संरक्षण  पाकर   पलते  हैं  और   अपने  जहर  से  परिवार  को  समाज  को  दूषित  करते  हैं   और   अपने  को  संरक्षण  देने  वाले  का  जीवन  भी  संकट  में  डाल  देते  हैं   l  शक्तिशाली  और  पद -प्रतिष्ठा  वालों  के  लिए  भी  संकेत  है   कि  अपनी  गलत  इच्छाओं  के  लिए  ऐसे  जहरीले  लोगों  से  मित्रता  न  करें  ,  वे  तो  डूबेंगे  ही  साथ  में  उन्हें  भी  ले  डूबेंगे ,  अब  देवता  नहीं  आएंगे  बचाने  के  लिए   l  

26 September 2025

WISDOM ------

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- "  ज्ञान  चक्षुओं  के  आभाव  में   हम  परमात्मा  के  अपार  दान  को  देख  और  समझ  नहीं  पाते   और  सदा  यही  कहते   रहते  हैं  हमारे  पास   कुछ  नहीं  है  l  पर  यदि  जो  नहीं  मिला  है   उसकी  शिकायत  करना  छोड़कर   जो  मिला  है  ,  उसकी  महत्ता  को  समझें   तो  मालूम  होगा  कि  जो  मिला  है   वह  अद्भुत  है  l  "    ईश्वर  ने  जो  दिया  है   उसे  न  देख  पाने  के  कारण  ही  व्यक्ति  के  मन  में  दूसरों  के  प्रति  ईर्ष्या -द्वेष  का  भाव  पनपता  है   प्रत्येक  व्यक्ति  की  मानसिक  स्थिति  भिन्न -भिन्न  होती  है  l  कोई  ईर्ष्या -द्वेष  के  कारण   छल , कपट , षड्यंत्र , धोखा  जैसे  कायरतापूर्ण  अपराधिक  कार्यों  में  संलग्न  हो  जाता  है  l  कहीं  कोई  डिप्रेशन  में  चला  जाता  है , इतनी  निराशा  कि  आत्महत्या  को  तत्पर  हो  जाता  है  क  जीवन  जीने  की  कला  का  ज्ञान  न  होने  के  कारण  ही   ऐसी  स्थिति  निर्मित  होती  है  l  प्राचीन  काल  में  हमारे  गुरुकुल  थे  , वहां  कोई  राजकुमार  हो  या  गरीब  सबको  ज्ञान -अर्जन  के  साथ    जीवन  कैसे  जिया  जाता  है  यह  भी  सिखाया  जाता  था  l  वहां  से  अध्ययन  के  उपरांत  वे  विद्यार्थी   शारीरिक  और  मानसिक  रूप  से  इतने  मजबूत  , इतने  सक्षम  हो  जाते  थे  कि  बड़ी  से  बड़ी  विपरीत  परिस्थिति  उन्हें  विचलित  नहीं  कर  सकती  थी  l  लेकिन  अब  केवल  पुस्तकीय  ज्ञान  है  ,  इससे  विवेक  जागृत   नहीं  होता  l  इस  कलियुग  में  अजीबोगरीब  स्थिति  है  --- कहीं  स्वार्थी  तत्व    युवा  पीढ़ी  की   ऊर्जा  का  उपयोग  अपने  स्वार्थ  के  लिए  करते  हैं  ,  एक  तरीके  से  अपना  गुलाम  बना  लेते  हैं  l  ऐसी  भी  स्थिति  है  कि  शिक्षा  ही  कुछ  ऐसी  दो  कि  वे  यही  न  समझ  पायें  कि  जागरूकता  क्या  होती  है  ,  दिशाहीन  कर्म  करते   रहो  l  वर्तमान  स्थिति  में  न  केवल  युवा   बल्कि  प्रौढ़  और  वृद्ध  व्यक्तियों  को  भी   सही  दिशा  की  जरुरत  है   क्योंकि  ईश्वर  के  दरबार  में  पेशी  तो  अवश्य  होगी  कि  परमात्मा  ने  उन्हें   जो  विशेष  योग्यता  दी  थी    ,  उसका  उन्होंने  लोक कल्याण  के  लिए  क्या  उपयोग  किया  ?  और  इस  धरती  रूपी  बगिया  को  सुन्दर   बनाए  रखने  के  लिए  युवा  पीढ़ी  को  क्या  सिखा  कर  आए  ?