आचार्य उपकौशल यात्रा पर निकले थे , रात हो जाने के कारण उन्हें वन में एक वृक्ष के नीचे रुकना पड़ा l सोने के कुछ देर बाद उन्हें किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी l उन्होंने लकड़ियाँ जलाकर देखा , पर कोई दिखाई नहीं दिया l तब उन्होंने कहा ---- "यहाँ कौन है ? सामने क्यों नहीं आते ? " उत्तर मिला ---- " मैं निकृष्ट प्रेत आपके ब्रह्मतेज के सामने कैसे प्रकट हो सकता हूँ ? कृपया मेरे उद्धार का मार्ग बताएं ? " आचार्य ने उसकी इस दशा का कारण पूछा , तो उसने कहा --- " भोगों को प्राप्त करने के लिए मैंने कभी भी कर्मों की नैतिकता की परवाह नहीं की और आजीवन ऐसा जीवन बिताने पर भी मेरी वासनाओं की संतुष्टि न हो सकी , इस कारण मृत्यु के उपरांत प्रेत योनि में भटक रहा हूँ l " आचार्य कहने लगे --- " यह मन ही अनियंत्रित होने पर पतन का कारण बनता है और यदि मन को साध लिया जाए तो यही मुक्ति का हेतु भी सिद्ध होता है l " आचार्य ने अपने तप , पुण्य का एक अंश देकर उसके कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया l इसके परिणामस्वरूप उस प्रेत का पुनर्जन्म हुआ और स्मृति रहने के कारण वह साधना और लोकसेवा करते हुए मुक्ति के पथ पर प्रशस्त हुआ l
9 August 2024
8 August 2024
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " संयम कर लेना मनुष्य जीवन की सफलता का एक कदम है और इस पर पूरी तरह से अपना नियंत्रण कर लेना ही योगमय जीवन की शुरुआत है l संयम के माध्यम से न केवल हमें शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है , बल्कि इसके द्वारा सदविवेक का जागरण होता है , जिससे हम अपनी ऊर्जाओं और क्षमताओं का सदुपयोग कर पाते हैं l " -------- भगवान बुद्ध के समय का प्रसंग है ----- एक सेठ जी अपने भारी -भरकम और बेडौल शरीर के कारण सेवकों की मदद से भगवान बुद्ध के दर्शन के लिए गए l शारीरिक स्थिति के कारण झुककर प्रणाम नहीं कर पा रहे थे , अत: खड़े -खड़े ही अभिवादन कर बोले ---- " भगवन ! मेरा शरीर अनेक व्याधियों का घर बन चुका है l रात को न नींद आती है और न ही दिन में चैन से बैठ पाता हूँ l मुझे रोग मुक्ति का साधन बताने की कृपा करें l ' भगवान बुद्ध ने उसे करुणा भरी द्रष्टि से देखा और बोले ------ " भंते ! प्रचुर भोजन करने से उत्पन्न आलस्य और निद्रा , भोग व अनंत इच्छाओं की कामना , शारीरिक श्रम का अभाव ---- ये सब रोग पनपने के कारण हैं l जीभ पर नियंत्रण रखने , संयमपूर्वक सादा भोजन करने , शारीरिक श्रम करने , सत्कर्म करने और अपनी इच्छाएं सीमित करने से ये रोग विदा होने लगते हैं l असीमित इच्छाएं और अपेक्षाएं शरीर को घुन की तरह जर्जर बना डालती हैं , इसलिए उन्हें त्यागो l " सेठ को भगवान बुद्ध की बातों का मर्म समझ में आया और उसने उनके वचनों को जीवन में धारण करने और संयमित जीवन अपनाने का संकल्प लिया l इसके परिणामस्वरूप सेठ के स्वास्थ्य में सुधार हुआ और अब वह सेवकों के सहारे के बिना अकेले ही भगवान बुद्ध से मिलने गया और वहां पहुंचकर उसने झुककर प्रणाम किया और कहा ---- " शरीर का रोग तो आपकी कृपा से दूर हो गया l अब चित्त का प्रबोधन कैसे हो ? " बुद्ध ने कहा ---- " अच्छा सोचो , अच्छा करो और अच्छे लोगों का संग करो l विचारों का संयम चित्त को शांति और संतोष देगा l " सेठ ने भगवान बुद्ध के बताए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सार्थक किया l श्रीमद् भगवद्गीता में 'शांति ' को मनुष्य जीवन का परम सुख कहा गया है l
7 August 2024
WISDOM ------
महर्षि व्यास के पुत्र शुकदेवजी परम वैरागी थे l जन्म लेते ही तप करने जंगल चल पड़े l पिता ने उन्हें आश्रम परंपरा समझाई l कहा ---- " यह जरुरी है l यह क्रम पूरा कर के ही तप करना l " शुकदेव पांच वर्ष तक गर्भ में रहे l l उन्होंने पिता व्यास जी से तर्क किया कि यदि ब्रह्मचर्य पालन से ही मुक्ति होती तो सभी अविवाहित रहते l यदि विवाह ही जरुरी था तो सभी गृहस्थों को मुक्ति मिलती l यदि वानप्रस्थ ही अनिवार्य था तो सारे पशु , बन्दर , भालू आदि मुक्त हो जाते l यह कहकर वे वन चले गए l व्यास जी ने ऋषियों से परामर्श लिया कि क्या करें , ताकि वह लौटे l सभी ने एक मत से कहा कि जहाँ शुकदेव तपस्या कर रहे हैं , वहां आपके शिष्य जाकर आपके ही द्वारा रचित भागवत कथा का कीर्तन करें l त्रिलोक की कोई भी चीज उनके मन को आकर्षित नहीं करेगी , उन्हें विराम मिलेगा तो भगवान की कथा से l शिष्यों ने मधुर गान किया तो उनकी समाधि टूटी l उन्होंने पूछा ---- " आप लोग कौन हैं और यह कथा किसने लिखी ? इसे सुनकर हमें समाधि से भी अधिक तृप्ति मिली l " शिष्यों ने कहा --- " हमारे गुरु ने ऐसे हजारों श्लोक रचे हैं l " ज्ञान प्राप्ति की इच्छा से वे वापस लौटे तो आश्रम कुछ जाना -पहचाना लगा l अपने पिता को देखा तो ज्ञान प्राप्ति की इच्छा सामने रखी और कहा पिताश्री --- " भागवत कथा सुनने के लिए पढ़ लेंगे लेकिन उसके बाद एक दिन भी नहीं रुकेंगे l ऐसा ही हुआ , शुकदेव जी पुन: जंगल चले गए l
WISDOM ------
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने प्रज्ञा पुराण में लिखा है -- " परोपकार रहित मनुष्य के जीवन को धिक्कार है उसकी तुलना में तो पशु श्रेष्ठ है , उसका कम से कम चमड़ा तो काम आ जायेगा , परन्तु मानवता रहित मनुष्य का जीवन तो किसी के भी उपयोग का नहीं रहता l हमें इंसानियत को ही अपना जीवन लक्ष्य मानकर जीवन जीना चाहिए l " -------- स्वर्ग में किसी की शोभा यात्रा निकल रही थी l किसी ने पूछा ---- " इस पालकी में कौन बैठा है ? " उत्तर मिला ---- " एक शेर बैठा है l " प्रश्न कर्ता ने पूछा ---- " शेर को स्वर्ग का वैभव कैसे प्राप्त हुआ ? " उत्तर मिला ---- " एक रात को बहुत आँधी , तूफान व बरसात होने लगी थी l शेर अपनी गुफा को लौट रहा है l उसे गंध से मालूम पड़ा कि उसकी अँधेरी गुफा में एक बकरी आकर बैठ गई है l " " शेर ने विचार किया कि यदि बकरी मुझे देख लेगी तो भयभीत हो जाएगी , इसलिए वह गुफा के बाहर ही बैठ गया l वह रात भर पानी में भीगता रहा ताकि बकरी को कष्ट न हो , इसलिए स्वयं कष्ट उठाता रहा l बकरी के प्राण बचाने के पुण्य के फलस्वरूप ही उसको स्वर्ग मिला है l " परोपकार कभी भी व्यर्थ नहीं जाता l
5 August 2024
WISDOM ------
उज्जयिनी नगर में एक निडर व साहसी युवक रहा करता था l उसे ज्ञात हुआ कि राज्य के राजा के नि:संतान मर जाने के कारण नए राजा की तलाश हो रही है l उस युवक ने उस हेतु स्वयं का नाम प्रस्तावित करने की सोची l राज्य के मंत्रियों ने उसे बताया कि तुमसे पहले भी अनेक लोग इस हेतु आए , परन्तु किसी शापवश उनमें से प्रत्येक का निधन राज्याभिषेक की रात्रि में ही हो गया l जीवन सुरक्षित चाहते हो तो ऐसा न करो l युवक निडर था l उसने बिना किसी भय के चुनौती स्वीकार कर ली l राज्याभिषेक होने के उपरांत उसने विचार किया कि अवश्य किसी देव या दानव का का रोष इस राज्य पर रहा होगा , उसे संतुष्ट कर देने से इस समस्या से बचा जा सकता है l उसने रात्रि में अपने कक्ष में अनेक व्यंजन बनवा कर रखे और वह स्वयं एक कोने में तलवार लेकर बैठ गया l रात को देवराज इंद्र का द्वारपाल , अग्निवेताल वहां आया और उन व्यंजनों के देखकर प्रसन्न हो गया l उन्हें ग्रहण कर के वह बोला ---- " राजन ! यदि तुम नित्य ऐसे व्यंजन का प्रबंध करो तो मैं तुम्हे अभयदान दूंगा l " राजा ने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और उससे कहा ---- " तुम देवराज इंद्र से पूछकर के बताओ कि मेरी उम्र कितनी है l " अगले दिन अग्निवेताल ने उसे बताया --- " उसकी उम्र सौ वर्ष है l " यह सुनते ही राजा ने तलवार अग्निवेताल के सिर पर रख दी और कहा ---- " इसका अर्थ है कि तुम मेरा अंत सौ वर्ष तक नहीं कर सकते l " अग्निवेताल राजा की बुद्धिमत्ता और निडरता से अत्यंत प्रसन्न हुआ और उन्हें अक्षुण्ण राज्य का वरदान दिया l वह राजा ही आगे चलकर सम्राट विक्रमादित्य के नाम से प्रसिद्ध हुए l
3 August 2024
WISDOM -----
जीवन के संघर्ष और समुद्री तूफ़ान की आँधियों से दुःखी एक नाविक जहाज से उतारकर आया तो द्वीप के किनारे खड़ी एक अविचलित , अडिग , चट्टान को देखकर बड़ी शांति को प्राप्त हुआ l स्वच्छ , सुन्दर सी उस चट्टान पर खड़े होकर , वह चारों ओर देखने लगा l उसने देखा कि द्वीप के एक कोने में स्थित उस चट्टान पर निरंतर समुद्र की उत्ताल तरंगों का आघात हो रहा है , तो भी चट्टान के मन में न कोई रोष है , न विद्वेष l l न कोई ऊब , न उत्तेजना l मरने की भी उसने कभी इच्छा नहीं की l नाविक का ह्रदय श्रद्धा से भर गया l उसने चट्टान से पूछा ----- " तुम पर चारों ओर से आघात लग रहे हैं , फिर भी तुम परेशान नहीं हो l तुम्हारी इस सहनशीलता का कारण क्या है ? क्या तुम इस स्थिति में स्वयं को निराश नहीं मानती l " चट्टान की आत्मा धीरे से बोली ---- " तात ! हम निराश हो गए होते तो एक क्षण ही सही दूर से आए आप जैसे अतिथियों को विश्राम देने , उनका स्वागत करने से वंचित रह जाते l संघर्षों से लड़ने में ही हमें आनंद आता है l " नाविक ने प्रेरक भाव भरकर स्वयं से कहा ----- " जीवन में कितने ही संघर्ष आएं , मैं भी अब इस चट्टान की तरह जिऊंगा , ताकि हमारी न सही , हमारी भावी पीढ़ी और मानवता के आदर्शों की रक्षा हो सके l
2 August 2024
WISDOM ------
सामान्य जन प्रेरणा तभी लेते हैं , जब आदर्शों की चर्चा करने वाले , नीतिवेत्ता , नियम बनाने वाले स्वयं भी उनका पालन करें l सम्राट बिम्बसार के शासन की घटना है ---- एक साल लू अधिक चली l मजबूत सामग्री उपलब्ध न होने के कारण प्रजा के झोंपड़े फूस के बने थे l न जाने लोग क्यों लापरवाह रहने लगे थे इसलिए आए दिन अग्निकांड की घटनाओं के समाचार दरबार में पहुँचते l बिम्बसार जैसे दयालु राजा के लिए यह स्वाभाविक था कि वह पीड़ितों की सहायता करें l बहुत अग्निकांड हुए तो सहायता राशि का खरच भी पहले की तुलना में बहुत बढ़ गया l लोगों की लापरवाही रोकने के लिए राजाज्ञा प्रसारित हुई कि जिसका घर जलेगा , उसको एक वर्ष श्मशान में रहने का दंड भुगतना पड़ेगा l सब लोग चौकन्ने हो गए l एक दिन राजा के भूसे के कोठे में आग लगी और देखते -देखते जल गया l समाचार मिलने पर दरबार से राजा को श्मशान में रहने की आज्ञा हुई l दरबारियों ने समझाया ---- " नियम तो प्रजा जनों के लिए होते हैं , राजा तो उन्हें बनाता है , इसलिए उस पर वो लागू नहीं होते l " परन्तु बिम्बसार ने किसी की नहीं मानी l वे फूस की झोंपड़ी बनाकर श्मशान में रहने लगे l समाचार फैला तो सतर्कता सभी ने अपनाई और अग्निकांड की दुर्घटनाओं का सिलसिला समाप्त हो गया l