5 June 2018

WISDOM ----- प्रकृति - पर्यावरण के साथ भावनात्मक साहचर्य ही इनसान को नई जिन्दगी दे सकता है l

 " प्रकृति   सीधी - सौम्य  गाय है   और  क्रुद्ध  सिंहनी  भी   l  यदि  उसके  साथ  अनर्गल   और  अनौचित्य पूर्ण  व्यवहार    न    किया  जाये  तो   अनन्त  काल  तक  अपने   दूध  रूपी  अनेक  तरह  की  संपदाओं  से   हमारा  पालन - पोषण  करती  रह  सकती  है  ,  पर  यदि  प्रदूषण - संदोहन  की   नोच - खसोट   और  छीना - झपटी  का   दुर्व्यवहार  किया  गया  तो   क्रुद्ध  सिंहनी  की  तरह    अंग - भंग  करने   में ,  चीरने - फाड़ने  में   कोई  कोर - कसर  नहीं  छोड़ेगी  l  अच्छा  यही  है  कि  हम  उसकी  गोद  में  फलें - फूलें  l  इसके  लिए  ध्यान  रखना  होगा  कि  हम  अपने  आस - पास  के   वातावरण  को   हरा - भरा  बनायें , प्रदूषण  मुक्त  रखें  l  "
                                                                        परम पूज्य  गुरुदेव  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  

4 June 2018

WISDOM ------ धन तथा शस्त्र की शक्तियां अध्यात्म के नियंत्रण में रहें तभी वे दुनिया के लिए हितकारी हो सकती हैं l

  धन    और  शस्त्र  की  शक्ति  तो  प्रत्यक्ष  ही  दिखाई  पड़ती  है   पर  अध्यात्म  की   शक्ति  अप्रत्यक्ष   होते  हुए  भी  उन  दोनों  से   बढ़कर  है   l  यह   -- विनोबा  भावे  और  महात्मा  गाँधी  जैसी  दैवी  विभूतियों  की  कार्य   प्रणाली  से   सत्य  सिद्ध  हो  जाता  है  l  l 
  विनोबा   भावे  ने   भूदान  के  लिए  पूरे  देश  का  भ्रमण  किया   l  वे  पीरपंजाल  को  पार  कर  के    कश्मीर  पहुंचे   तो  वहां  के  मुसलमान  निवासियों   ने  एक  गुरु  (पीर )  की  तरह  उनका  स्वागत  किया   l  वहां  से  चलते  समय  उनको  आगरा  के   प्रसिद्ध    डाकू   मानसिंह  के  पुत्र  का  पत्र  मिला  ,  जिसमे  लिखा  था --- " बाबा  !  मुझे  फांसी  की  सजा  मिली  है  l  मरने  से  पहले   मैं  आपके  दर्शन  कर  लेना  चाहता  हूँ   l "  लोगों  ने  उनसे  कहा  कि  हिंसा  से  डाकुओं  की  समस्या  नहीं  सुधरी,  पुलिस जितने  डाकुओं  को  पकड़ती  या मारती  है  ,  उतने  ही  फिर  नए  पैदा  हो  जाते  हैं   l  आप इस  समस्या  को  प्रेम  से  सुलझाने  का  प्रयत्न  करें   l   इन  सब  बातों  को  सुनकर  विनोबा   ने    इन  डाकुओं  को  अपना  जीवन  मार्ग  बदलने  का  सन्देश  देने  का  निश्चय  किया  l   8  मई  को  वे   आगरा    के  निकट  चम्ब्लों  के  बीहड़ों  में   पहुँच  गए   और  एक   महीने    तक  अपना  सन्देश  डाकुओं  तक  पहुंचाते  रहे  कि वे  ऐसा  गलत  काम  छोड़  दें  और  अपनी  जिन्दगी  सुधार  लें   l    इसका  नतीजा  यह  हुआ  कि  20  प्रसिद्ध  डाकुओं  से  विनोबा  के  सामने  अपने  हथियार  डाल  दिए  और  प्रतिज्ञा  की  कि  अब  वे  ऐसा  काम  नहीं  करेंगे 
 एक  डाकू  ने   बम्बई  में  अखबारमें  पढ़ा  कि  बाबा   विनोबा  चम्बल  के  बीहड़ों  में   घूम - घूम  कर  भूल  में  पड़े  भाइयों  को  समझा  रहें  हैं  ,  उसकी  भी  अंतरात्मा  जागी   और  उसने  भी  समर्पण  किया  l  विनोबा  ने  अपने  प्रवचन  में  कहा  --- "  आज  जो  भाई  आये  हैं  वे  परमेश्वर  के  भेजे  हुए  हैं  ,  हमारा  कोई  सा  थी  उनके   पास  नहीं  पहुंचा  था   l  ढाई  हजार  वर्षों  से  हम  भगवान  बुद्ध  और  अंगुलिमाल   की  कहानी     सुनते  आ  रहे  हैं  ,  आज  कलियुग  में  ऐसी कहानियां  बन  रहीं  हैं  l 
 जो  डाकू   पुलिस  और  फौज  वालों    की  मशीनगनों   और  रायफलों   से  नहीं  डरते  थे  ,  वे  एक   निहत्थे  और  बूढ़े  आदमी  के  सामने  नत मस्तक  हो  गये  ,  यह  अध्यात्म  की  शक्ति  का  ही  चमत्कार  है   l 

3 June 2018

जब तक मानसिकता नहीं बदलती , सामाजिक बुराइयाँ समाप्त नहीं होतीं , ऐसे जातिगत भेदभाव करने वाले चेहरे बदल जाते हैं

    अंग्रेजों  के  जमाने  में   जातीय  पक्षपात   के  शिकार  होने  वाले  सर्व  प्रथम   भारतीय   उच्च  पदाधिकारी  श्री  सुरेन्द्रनाथ  बनर्जी  थे  ,  जिसकी  चर्चा   आज  से  लगभग  सवा  सौ  वर्ष  पूर्व   बहुत  दिनों  तक  देश - विदेश  में  सुनाई  पड़ती  रही   l 
  यद्दपि  सुरेन्द्रनाथ  बनर्जी  का  जन्म    बंगाल  के  एक  प्रसिद्ध  ब्राह्मण  परिवार  में  हुआ  था  ,  लेकिन  अंग्रेजों  की  निगाह  में  वे  एक  भारतीय  थे   और  भारतीयों  को  नीचा  समझकर  वे   आगे  बढ़ने  देना  नहीं  चाहते  थे   l   उस  समय  में  वे  आई. सी. एस.  की  परीक्षा  पास  कर  के    सिलहट ( आसाम )  में   असिस्टेंट  डिस्ट्रिक्ट  मजिस्ट्रेट     नियुक्त  हुए  l  भारतीयों  के  लिए  यह  गर्व  की  बात    थी    लेकिन   अंग्रेज  भारतीयों  को  हीनता   की  द्रष्टि  से  देखते  थे  , इस  कारण   सुरेन्द्रनाथ  बनर्जी  के  साथ  रुखा   व्यवहार  करने  लगे   l  श्री  बनर्जी  बहुत  योग्य  थे   लेकिन  उच्च  अधिकारी  बात - बात  में  उनकी  गलती  निकालने  लगे   l  उच्च  अधिकारी  से   वैमनस्य  रहने  के  कारण  दो  वर्ष  के  भीतर  ही  वे  सरकारी  नौकरी  से  हटा  दिए  गए   l 
  इस  अन्याय  की  शिकायत  करने  के  लिए  श्री  बनर्जी  इंगलैंड  गए    लेकिन  जातीयता  के  आधार  पर  वहां  भी   गोरे  लोगों  का  ही  पक्ष  लिया  गया  l    अब  उन्होंने  अपना  लक्ष्य  देश  में  शिक्षा  का  प्रसार  और  शासन  में  सुधार  का  बना  लिया  l  एक  कार्यक्रम  में  उन्होंने  कहा ----- "  जो  अन्याय  मेरे  साथ  किया  गया   वह  हमारे  समाज  और  देशवासियों  की   नितान्त  शक्तिहीनता    का  द्दोतक   है  l  यह  अन्याय  मुझे  केवल  इसलिए  सहना  पड़ा  क्योंकि  मैं  भारतीय  हूँ  ,  एक  ऐसे  समाज  का  सदस्य  जिसमे  कोई  संगठन  नहीं  है ,  जिसका  एक  सार्वजनिक  मत  नहीं  है   l 
  उनकी  मान्यता  थी  कि  अच्छी  शिक्षा  देशोन्नति  की  पहली  सीढ़ी  है   l 

2 June 2018

भारतीय किसान

   अंग्रेजी  के  सुप्रसिद्ध  साहित्यकार  सामरसेट  माम   1938  में  प्रथम  बार  भारत  आये   l  यहाँ  से  विदा  होने  पर  जब  उनसे  पूछा  गया   कई  भारत  की  कौन  सी  वस्तु  ने  आपको  सबसे  ज्यादा  प्रभावित  किया   तो  उन्होंने  कहा  ---- "  मुझे  आगरा  के  ताजमहल ,  बनारस  के  घाट,  मथुरा  के  मंदिर   और  त्रावनकोर  के  पर्वतों  ने  बिलकुल  भी  प्रभावित  नहीं  किया   l  मैंने  भारत  के  गरीब  किसानों  को  , लंगोटी  लगाये , भूखे  पेट  काम  करते  देखा   l  वह  सूर्योदय  से  पूर्व  की   कड़कड़ाती  ठण्ड  में  काम  करता  है  ,  दोपहरी  की  तपती  धूप  उसे  पसीने  से  लथपथ  कर  देती  है   और  सूर्यास्त  तक  अपना  खेत  जोतता   है , मेहनत  करता  है  l   वह  गत  300  वर्षों  से  इसी  प्रकार   धरती  माता  के  लिए  अपना  पसीना  बहाता  आ  रहा  है   और  इसके  बदले  में  उसे   अल्प  मात्र  में   निर्वाह  सामग्री  प्राप्त  हो  जाती  है   l  भारतीय  कृषकों  की  स्थिति  देखकर मेरे  ह्रदय  में  हलचल  उत्पन्न  हो  गई  l  " 
  भारत  यात्रा  के   ऐसे  तीखे  संस्मरण   उन्होंने  अपने  देश  लौटकर  '  एक  लेखक  की  नोटबुक '  में  लिखे  l  

1 June 2018

WISDOM ----- मनुष्य यदि सुख - शान्ति से रहना चाहता है तो मानव - मानव के बीच धर्म , जाति और सम्प्रदाय की भेद की रेखाओं को मिटाना होगा ----- बंट्रेन्ड रसेल

 ब्रिटेन  की  धरती  पर  जन्म  लेकर  भी    वे    किसी  एक  देश  के  होकर  न  रहे   l  समग्र  मानवता  की  पीड़ा  को   हरना  उनका  उद्देश्य  था  l   जब  प्रथम  महायुद्ध  छिड़ा  तो  उन्हें  बहुत  दुःख  हुआ , सोचने  लगे  कि  कितने  ही  नवयुवक  जो  देश  की  रचनात्मक  गतिविधियों  में  सक्रिय  सहयोग  दे  सकते  हैं  ,  युद्ध  की  भेंट  चढ़  जायेंगे  l    1915  में  उन्होंने  एक  पुस्तक  प्रकाशित  कराई -- ' व्हाई  मैन  फाइट '  l  इसका  समाज  पर  प्रभाव  पड़ा ,  प्रत्येक  युवक  के  हाथ  में  यह  पुस्तक  दिखाई  पड़ने  लगी  l  जो  शान्ति  में  विश्वास  करते  थे   उन्होंने  सेना  में  भर्ती  होने  से  इनकार  कर  दिया  l   अनिवार्य  भर्ती  कानून  का  विरोध  होने   लगा  और  लार्ड  रसेल  को  भी  बंदी  बना  लिया  गया  l  E
  1945  में  हिरोशिमा  और  नागासाकी  पर  परमाणु  हमले  ने  उनकी  आत्मा  को  झकझोर   दिया  ,  वे  एक  बार  फिर  रो   पड़े  l   लार्ड  रसेल  परमाणु  युद्ध  के  विरुद्ध  जनमत  जाग्रत  करना  चाहते  थे  ,  वे  हर  मानव  को  युद्ध  की  पीड़ा  से  परिचित  कराना  चाहते  थे   l    वे  अंत  तक  मानव  को    प्रेम   का    सन्देश  देते  रहे  l 
 भेदभाव  की  जो  रेखाएं  जमीन  पर  कहीं  भी  अंकित  दिखाई  नहीं  देती  हैं   उन्हें  वह  व्यक्ति  के  मन  से  भी    मिटाना   चाहते  थे  

31 May 2018

WISDOM ----

 '   इस  जगत  में   छोटे  से  छोटे  काम  की  भी  प्रतिक्रिया  अवश्य  होती  है   l  तब  कोई  महान  त्याग   अथवा  निस्स्वार्थ  बलिदान  व्यर्थ  चला  जाये   यह  प्रकृति  के  नियमों  के  विरुद्ध  बात  है   l 
  महाराणा  प्रताप  ने  राजा  होते  हुए  भी  देश  के  लिए  त्यागी   और  तपस्वी  का  जीवन  बिताया   और  दिल्ली  के  बादशाहत  के  सुख - सम्पति  के  भारी  प्रलोभनों  को  ठुकरा  दिया   l  ऐसा  त्याग  कभी  व्यर्थ  नहीं  जा  सकता   l  जनमानस  पर  उसका  प्रभाव  स्वयमेव  पड़ता  है    और  वह  अज्ञात  रूप  से  लाखों  को   अपना  अनुयायी  बना  लेता  है  l 
  महाराणा  प्रताप  यदि  चाहते  तो   बादशाह  अकबर  से  साधारण  संधि  कर   आराम  की  जिन्दगी  बिता  सकते  थे   पर  उन्होंने  अपने  सुख  या  आराम  की  परवाह  न  कर  के   भारतवर्ष  और  राजपूत  जाति  के  गौरव  को  स्थिर  रखने  के  लिए  संघर्ष  के  मार्ग  को  अपनाया   l  सैकड़ों  वर्ष  बीत  जाने  पर  भी   हम  उनका  गुणगान  करते  हैं   और  उनके  जीवन  से  प्रेरणा  ग्रहण  करते  हैं    l  

30 May 2018

WISDOM ---- व्यक्ति के लिए अपनी प्रशंसा से बच पाना मुश्किल है

     प्रशंसा  झूठी  हो  तब  भी  अच्छी  लगती  है   क्योंकि  प्रशंसा  अहंकार  को  फुसलाती  है , प्रसन्न  करती  है  l  मूढ़ - से - मूढ़  आदमी  को  बुद्धिमान  कहो  तो  उसकी  प्रसन्नता  का  ठिकाना  नहीं  रहता  l   प्रशंसा  जितनी  झूठ  के  करीब  होती  है  उतना  ही  सुख  देती  है , इसलिए  जो  व्यक्ति  अहंकारी  होते  हैं  वे  हमेशा  चिंतित  रहते  हैं  ,  उन्हें  हमेशा  यही  परेशानी  बनी  रहती  है  कि  कौन  क्या  कह  रहा  है  ?  कौन  सम्मान  कर  रहा  है  ?  कौन  अपमान  कर  रहा  है  ?  कौन  उनकी  बात  को  आँखें  मूँद  कर  मान  रहा  है  ?  कौन  सही - गलत  के  आधार  पर  तर्क  प्रस्तुत  कर  रहा  है  ?   अहंकारी  का  व्यक्तित्व  हमेशा  दूसरों  पर  निर्भर  रहता  है   l   अहंकार  औरों  पर  निर्भर  होता  है  l
  लेकिन  जो  ईश्वर  का  भक्त  है  , भगवान  की  शरण  में  श्रद्धा भाव  से  रहता  है   उसे  इस  बात  की  चिंता  या  परवाह  नहीं  होती  कि  लोग  क्या  कहते  है   l 
 लोग  कुछ  भी  कहें , कहते  रहें   वह  निंदा  और  प्रशंसा  के  प्रति  तटस्थ  रहता  है  l  ईश्वर   के   विश्वास  और  उनकी  शरण  में  रहता  है  l
 अहंकारी  के  लिए  भी  यही  उचित  है  कि  वह  अपना  अहंकार  छोड़कर   वास्तविकता  के  धरातल  पर  रहे  l  यद्दपि  यह  कार्य  बहुत  कठिन  है  लेकिन  जरुरी  है  l   अहंकारी  व्यक्ति  समाज  के  लिए  तो  कष्टकारक  है  ही  ,   इसके  साथ  वह  स्वयं  अपने  लिए   भी  हानिकारक  है    क्योंकि    यह  संसार  बहुत  स्वार्थी  है  ,  लोग  अहंकारी  की  इस   कमजोरी  का  फायदा  उठाकर  ,  उसकी  झूठी  तारीफ  कर  के , चापलूसी  कर  के  अपना  मतलब  सिद्ध  करते  हैं  l  समाज  में  ऐसे  अनेकों  महामानव  हैं  , जिन्हें  कल  पूजा  जा  रहा  था ,  आज  वे  जेल  में  बंद  हैं  ,  लोग  उन्हें  गाली  देते  हैं  ,  उनके  ऊपर  जूते  फेंकते  हैं   l
  मनुष्य  का  सच्चा  हित  निष्काम  कर्म  में  है ,  अहंकार    में    नहीं   l