27 July 2024

WISDOM -----

  आज  मनुष्यों  के  जीवन  में   सबसे  बड़ी  समस्या  तनाव  की  है  l  यह  तनाव  ही  अनेक  समस्याओं  और  बीमारियों  को  जन्म  देता  है  l   यह  तनाव  कहीं  बाहर  से  नहीं  आया  है  ,  यह  व्यक्ति  की  स्वयं  के  जीवन  की  गलत  शैली   के  कारण  उत्पन्न  होता  है  l  लोगों  की  इच्छाएं , आवश्यकताएं  और  महत्वाकांक्षा  अनंत  है  ,  स्वयं  को  दूसरों  से  श्रेष्ठ  दिखाने  की  अंधी  दौड़  है  l   ये  सब  यदि  मर्यादित  हों  तो  व्यक्ति  के  , समाज  के  विकास  में  सहायक  होती  हैं   लेकिन  अनंत  हो  जाने  पर  सर्वप्रथम  व्यक्ति  को  ही '  तनाव  '  उपहार  में  देती  हैं  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----- "  व्यक्ति  की  इच्छाएं  जब  बहुत  बढ़   जाती  हैं   तो  उन्हें  पूरा  करने  के  लिए   वह  उन्ही  के  अनुरूप  भाग -दौड़  करता  है  l  चिंता  करते  हुए  तनाव  में  रहता  है  l  दुनिया  में  कुछ  ऐसे  लोग  होते  हैं   जिन्हें  चाहे  जितना  मिल  जाए   वो  उससे  कभी  संतुष्ट  नहीं  होते   और  इस  तरह  अपनी  इच्छाओं  को  बढ़ाने  के   साथ  अपनी  असंतुष्टि  का  दायरा  भी   वो  बढ़ाते  ही  रहते  हैं  l   आचार्य श्री  लिखते  हैं  --- ' सादगी  का  अर्थ  केवल  खान-पान   या  सरल  जीवन  शैली  नहीं  है   बल्कि  यह  वास्तव  में  एक  सोच  है  , क्योंकि  इस  सोच  के  कारण  हमारा  जीवन  को  देखने  का  नजरिया   बदल  जाता  है  l  यदि  यह  नजरिया  सीधा -सादा  होगा   तो  फिर  ज्यादा  झूठ  बोलने  की  जरुरत  नहीं  होगी  , झगड़ा  नहीं  होगा  , कुछ  चुराने , छिपाने  की  जरुरत  नहीं  होगी  , फिर  जीवन  में   दूसरों  से  आगे  निकलने   या  महत्वाकांक्षा वश  कुछ  पा  लेने  की   होड़  में  शामिल  होने  की  जरुरत  भी  महसूस  नहीं  होगी  l  संसार  में  बाहरी  आकर्षण  का  प्रभाव  इतना  अधिक  है  कि  लोग  सादगी  को   जीवन  में  उतार  ही  नहीं  पाते  l  आचार्य श्री  कहते  हैं --- सादगी  से  भरा  जीवन  जीने  वाले  लोग  अपनी  जरूरतें  नहीं  बढ़ाते   और  वही  खरीदते  हैं  जिसकी  उन्हें  जरुरत  होती  है   l  वे  भविष्य  की  परवाह  तो  करते  हैं   लेकिन  अपने  वर्तमान  को  भरपूर  आनंद  के  साथ  जीते  हैं  l  ऐसे  लोग  सच्चाई  के  करीब  होते  हैं   और  उनके  निर्णय  भी  समझदारी पूर्ण  होते  हैं   l  स्वयं  पर  महत्वाकांक्षाओं  को  हावी  नहीं  होने  देते  l  इस  तरह  सादा  जीवन  व्यक्ति  को  मानसिक  शांति  और  स्वास्थ्य   की  अमूल्य  संपदा  प्रदान  करता  है  l  

26 July 2024

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     लघु कथा ------- 1 .   मानसून  का  समय  आया  तो  एक  साल  भर  से  सुखी  नदी  उफान  के  साथ  बहने  लगी   l  गर्व  से  उन्मत  होकर  वह  समीप  बसे  गाँव   के  कुएं  से  बोली ---- " कुएं  भाई  !  जरा  मेरी  चौड़ाई  तो  देखो  l  मैं  एक  नहीं  दसियों  गाँव  को   अपने  अन्दर  समा  सकती  हूँ  l  तुम  तो  सहज  ही  मेरे  अन्दर  समा  जाओगे  l "  कुएं  ने  नदी  की  बात  का  कोई  उत्तर  नहीं  दिया  l  मौसम  बदला  तो  बरसाती  नदी    सूखकर   पतली  सी  धारा  में  बदल  गई  l   कुआं  उसे  संबोधित  करते  हुए  बोला ---- " बहन  !  जीवन  में  मात्र  विस्तार  ही  सब  कुछ  नहीं  होता  , गुणवत्ता  भी  आवश्यक  है  l  बिना  उदेश्य  के  बहुत  बढ़  जाने  से  भी  कोई  लक्ष्य  प्राप्त  नहीं  होता  l  जीवन  में  सफलता  तो  व्यक्तित्व  में  गहराई  लाने  से  ही  प्राप्त  होती  है   l "  

 2 .   एक   व्यापारी  रेगिस्तान  के   रास्ते  से    व्यापार  कर  के  लौट  रहा  था  l  उसने  अपनी  झोली  में  कई  कीमती  हीरे , जवाहरात   आदि  भर  रखे  थे   l  उसके  मित्रों  ने  समझाया  कि  कुछ  जवाहरात  छोड़  दे   और  उनके  बदले  पानी  की   चिश्तियां    बाँध  ले  ,  पर  उसने  उनकी  सलाह  को  दरकिनार  कर  अपनी  यात्रा  जारी  रखी  l  रास्ते  में  उसकी    भोजन  सामग्री  और  पानी  समाप्त  होने  पर   जब  वह  निढाल  हो  गया  ,  तब  उसे  एहसास  हुआ  कि   हीरे -जवाहरातों  से  पेट  नहीं  भरा  जा  सकता  l  मनुष्य  अपनी  कभी  न  समाप्त  होने  वाली  तृष्णा  के  कारण  धन- दौलत   के  पीछे  अंधाधुंध  भागकर   अपना   जीवन  बरबाद  कर  देता  है  l  

25 July 2024

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  एक   साहूकार  भगवान  बिट्ठलनाथ  का  भक्त  था  l  उसे  पुत्र  हुआ  तो  उसने  भगवान  बिट्ठलनाथ   के  विग्रह  के  लिए  सोने  का  एक  कमरबंद  बनाने  का  संकल्प  किया  l  नगर  का  श्रेष्ठतम  सुनार  नरहरि  था  , सो  साहूकार  ने  नरहरि  सुनार  से  संपर्क  किया  l  नरहरि  सुनार  भगवान  शिव  का  अनन्य  भक्त  था   और  वह  कभी  भगवान  बिट्ठलनाथ जी  के  मंदिर  नहीं  गया  था   इसलिए  सुनार  ने  साहूकार  से  भगवान  की  कमर  का  नाप  लाने  को  कहा   l  साहूकार  द्वारा  दिए  गए  नाप  के  आधार  पर   नरहरि  ने  कमरबंद  बना  दिया  ,  पर  वह  कुछ  छोटा  रह  गया  l  तब  साहूकार   के  कहने  पर  नरहरि  सुनार  ने  उसे  कुछ  बड़ा  कर  दिया  l  इस  बार  वो  कुछ  ढीला  हो  गया  l  ऐसी  स्थिति  में  साहूकार  ने   नरहरि  से  स्वयं  मंदिर  चलकर  नाप  लेने  को  कहा   l  नरहरि  सुनार  ने  साहूकार  से  कहा  कि  वह  चलने  को  तैयार  है  ,  लेकिन  वह  केवल  शिवजी  के  मंदिर  ही  जाता  है   इसलिए  उसकी  आँखों  पर  पट्टी  बाँधकर   उसे  ले  जाया  जाए   l  साहूकार  ने  उसकी  बात  मान  ली  l  जब  नरहरि  सुनार  मंदिर  में  भगवान  बिट्ठलनाथ   की  मूर्ति  का  नाप   लेते  समय  उनके  पैरों  में  झुका   तो  उसे  लगा  कि   वहां  भगवान  शिव  नृत्य  कर  रहे  हैं    और  जब  उसने  कमर  को  छुआ  तो   उसे  लगा  कि  मूर्ति  की   कमर  में  सांप   लिपट  रहे  हैं  l  उसे  लगा कि  यह  तो  भगवान  शिव  की  पूर्ति  है   यह  सोचकर  उसने  आँखों  की  पट्टी  हटाई   तो  वहां  भगवान  बिट्ठलनाथ  खड़े  थे  l  उसने  फिर  पट्टी  बांधकर   नाप  लेने  का   प्रयास  किया  तो   उसे  भगवान  शिव  की  उपस्थिति  प्रतीत  हुई  l  तभी  आकाशवाणी  हुई   कि  --- सभी  भगवान  एक  हैं  नरहरि  ,  तू  भेद  क्यों  करता  है  ?   नरहरि  के  मन  का  भ्रम  दूर  हो  गया  और  उसने   भगवान  बिट्ठलनाथ  के  लिए   एक  सुन्दर  सा  कमरबंद  तैयार  कर  दिया   l  

24 July 2024

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   कहते  हैं  जो  धर्म  की  रक्षा  करता  है  , धर्म  भी  उसकी  रक्षा  करता  है   l  महाभारत  में  अर्जुन  के  चरित्र  से  इस  सत्य  को  बताया  गया  है   l  ---अर्जुन  महाभारत  के  मुख्य    पात्रों    में  से  एक  थे  l अपनी  निश्छल  भक्ति  और  विनम्रता  के  कारण  वे  श्रीकृष्ण  को  प्रिय  थे  l  अर्जुन  के  जीवन  में  संयम  और  इन्द्रिय  संयम  अपने  चरम शिखर  पर  थे   l   जुए  में  हार  जाने  के  कारण  जब  पांडवों  को  वनवास  हुआ   तब  महर्षि  व्यास  की  आज्ञा  से   दिव्यास्त्रों  को  प्राप्त  करने  के  लिए   अर्जुन  ने  कठोर  तप  किया   और   भगवन  शिवजी  को  प्रसन्न  कर  ' पाशुपत अस्त्र  '  प्राप्त  किया  l  अन्य  देवताओं  ने  भी  उनके  तप  से  प्रसन्न  होकर  उन्हें  दिव्य  अस्त्र  प्रदान   किए   l   देवराज  इंद्र  अर्जुन  के  पिता  थे  उन्होंने  प्रसन्न  होकर   उन्हें  कुछ  समय  के  लिए  स्वर्ग  में  रहने  के  लिए  अपने  सारथि  मातलि  को   रथ  लेकर  भेजा  l  अर्जुन  उसके  साथ  रथ  पर  बैठकर  स्वर्ग  पहुंचे  l   वहां  पहुंचकर  वे  स्वर्ग  के  वैभव  में  खोए  नहीं  , उन्होंने   वहां  चित्रसेन  गन्धर्व  से   नृत्य -गान -वाद्य  आदि  का  ज्ञान  प्राप्त  किया  l  एक  दिन  अर्जुन  भी  इंद्र  की  सभा  में  बैठे  थे   l  उस  सभा  में  उर्वशी , रम्भा   आदि  अप्सराएँ  बड़ा  सुन्दर  नृत्य   कर  रहीं  थीं   l   देवराज  ने  देखा  कि  उर्वशी  की  द्रष्टि  अर्जुन   पर  टिकी  है  l  उन्होंने  अर्जुन  के  इन्द्रिय  संयम  की  परीक्षा  लेनी  चाही    और  चित्रसेन  गन्धर्व  के  द्वारा   उर्वशी  को  रात्रि  में   अर्जुन  के  शयन  कक्ष  में  भेजा   l   तपस्वियों  के  तप  को    भंग  करने  के  लिए  वे  उर्वशी , मेनका  आदि  अप्सराओं  को  भेजते  थे    और  वे  अपने  उदेश्य  में  सफल  भी  होती  थीं   l  उर्वशी  बहुत  प्रसन्न  थी   l  कहते  हैं  अप्सराएँ  इतनी   खूबसूरत   हैं  कि  उनके  कटाक्ष  से  ही  बड़े -बड़े  तपस्वी , धर्म धुरंधर   ध्वस्त  हो  जाते  हैं  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- सभाओं  में  ज्ञान -विज्ञानं , धर्म , अध्यात्म   , संयम  की  चर्चा  करना , बड़ी -बड़ी  बातें  करना  बहुत  सरल  है  ,  पर  उन्हें  अपने  जीवन  से ,  आचरण  से  प्रस्तुत  करना   और  बात  है  l  ऐसे  समय  में  ही  साधकों  के  संयम  की  परीक्षा  होती  है  l  आज  अर्जुन  की  अग्नि परीक्षा  थी  l   उर्वशी  को  अपने  शयन  कक्ष  में  देखकर  अर्जुन  तुरंत  अपने  बिस्तर  से  उठ  खड़े  हुए  और  बोले ---- " माते  !  आपने  यहाँ  आने  का  कष्ट  क्यों  किया  ? "   उर्वशी  ने  अपनी  कामना  अर्जुन  के  सामने  प्रकट  की   और  अपने  पक्ष  में   अनेक  दलीलें   दीं , निवेदन  किया  किन्तु  अर्जुन  अविचलित , अविकारी  रहे  , उन्होंने  कहा  ---मेरी  द्रष्टि  में   कुंती , माद्री  और  शची  का  जो  स्थान  है  , वही  आपका  भी  है   l  आप  मेरी  माता  के  समान  हैं  , पूजनीय  हैं , आप  लौट  जाएँ  l   गीता  में  भगवान  ने  कहा  है , कामना पूर्ति  में  बाधा  आने  से  क्रोध  उत्पन्न  होता  है   l  अपनी  कामना पूर्ति   में  विफल  होने  से  उर्वशी  बहुत  क्रोधित  हुई  और  उसने  अर्जुन  को  एक  वर्ष  तक  नपुंसक  होने  का  शाप  दे  दिया  l  अर्जुन  ने  उर्वशी  से  शापित  होना  स्वीकार  किया  लेकिन   अपने  दृढ   संयम  को  नहीं  तोड़ा  l  l  जब  इंद्र  को  यह  बात     ज्ञात  हुई   तो  उन्होंने  अर्जुन  से  कहा ---- " पुत्र  !   तुमने  तो  इन्द्रिय  संयम  के  द्वारा  ऋषियों  को  भी   पराजित  कर  दिया   l  उर्वशी  का  यह  शाप  तुम्हारे  लिए  वरदान  बन  जायेगा  l  वनवास  के  तेरहवें  वर्ष  में  जब   तुम्हे  अज्ञातवास  में  रहना   होगा  , उस  समय   यह  शाप  तुम्हारे  लिए  सहायक  होगा , वरदान  सिद्ध  होगा  l "    अज्ञातवास  के  समय  अर्जुन  ने   ब्रह्न्ल्ला  नम्म से  नर्तक वेश  में  रहकर  विरत  की  राजकुमारी  उत्तरा  को   संगीत  और  नृत्य   की  विद्या  सिखाई  और  एक  वर्ष  बाद  वे  शापमुक्त  हो  गए   l 

22 July 2024

WISDOM -------

   सम्राट  अशोक  मृत्युशय्या  पर  थे   l  अपनी  समस्त  संपदा  दान  देने  के  बाद  भी   उनके  मन  में  असंतोष  का  भाव  बना  हुआ  था  l  करोड़ों  मुद्राएँ  दान  देने  के  बाद  भी  वे   बीमार  व  असंतुष्ट  थे  l  एक  दिन  उनके  पास   संघ  से  एक  भिक्षु  आया  l  उस  दिन  सम्राट  के  पास  दान  देने  हेतु  कोई  निज  की  वस्तु  भी  नहीं  थी  , वे  सब  पहले  ही  दान  कर  चुके  थे  l  क्षुब्ध  ह्रदय  से  उन्होंने  पास  रखा  आंवला  उठाया   और  उसे  भिक्षु  को  दे  दिया   और  उससे  बोले  --- " बंधु  !  अब  मेरे  पास  दान  देने  को  ज्यादा  कुछ  नहीं  है  ,  आप  इसी  फल  को  स्वीकार  करें  l "  भिक्षु  ने  आंवले  का  चूर्ण  बनाकर   प्रसाद  में  मिलाया   और  वह  प्रसाद   संघ  के  समस्त  भिक्षुओं   को  बँट  गया  l  हजारों  भिक्षुओं  की  तृप्ति  का  समाचार   सम्राट  अशोक  को  मिला  l   उसे  सुनकर  उनके  अंतर्मन  में  तृप्ति  का  वह  भाव  जागा  ,  जो  सहस्त्रों  स्वर्ण  मुद्राएँ  दान  देकर  भी  नहीं  प्राप्त  हुआ  था   l  उन्हें  अनुभव  हुआ  कि  दिए  गए  दान  का  संतोष   उसमें  निहित  परिस्थितियों  के   आधार  पर  मिलता  है  ,  न  कि  उसकी  विशालता  के  आधार  पर   l  

21 July 2024

WISDOM -----

   ' सच्चे  गुरु  के  लिए  सैकड़ों  जन्म  समर्पित  किए  जा  सकते  हैं  l  सच्चा  गुरु  वहां  पहुंचा  देता  है   जहाँ  शिष्य  अपने  पुरुषार्थ  से   कभी  नहीं  पहुँच  सकता  है  l " --------      गुरु -कृपा   से  असंभव  भी  संभव  है  l  श्रद्धा  और  विश्वास  जरुरी  है  l  कोई  तर्क  नहीं  , कोई  संशय  नहीं  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने   गायत्री  मन्त्र  के  माध्यम  से   हमें  जीवन  में  सफलता  की  राह  को  बताया  l  उन्होंने  बताया   कि  अनेक  देवी -देवता  हैं  , अनेक  विधियाँ  हैं   जिनसे  हम  मन  चाही  मुराद  पूरी  कर  सकते  हैं  , लेकिन  वह  स्थायी  नहीं  होगी  , भाग्य  को  बदला  नहीं  जा  सकता   लेकिन  ' गायत्री मन्त्र ' में  वह  शक्ति  है  जो  प्रारब्ध  को  बदल  दे  l ' गायत्री   महाविज्ञान ' में  उन्होंने  इसे  विस्तार  से  समझाया  है  l  वे  कहते  हैं   कि  श्रद्धा  और  विश्वास  से  आप  गायत्री  मन्त्र  की   शुरुआत  तो  करो   , शेष  सब  ' माँ '  स्वयं  करा  लेंगी  l  आचार्य जी  ने  अपने  विचारों  से  हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाई  है   जिसकी  आज  के  युग  में  सबसे  ज्यादा  जरुरत  है  l   आचार्य जी  के  अनमोल वचन ---------------------1 . l   भगवत कार्य  में  कोई  भी  कर्ता  नहीं  मात्र  निमित्त  ही  होता  है  l  अपने  से  कितना  भी  बड़ा   एवं  विशिष्ट  कार्य   संपन्न  हो  जाने  पर  भी   यदि  स्वयं  को  निमित्त  मात्र  ही  माना  जाये  तो  अहंकार  नहीं  होता  l "                  2 असीम  सत्ता  पर  गहरी  आस्था  और  विश्वास  से  हमें  ऊर्जा  मिलती  है  ,  यदि  आस्था  गहरी  हो  तो   सफलता  में  उन्माद  नहीं  होता   और  असफलता  में   अवसाद  नहीं  होता   l                                                                          3 ' अपने  चिन्तन  , चरित्र  एवं  व्यवहार  के   हर  कोने  के  परिष्कार  के  लिए  जुट  जाएँ  l  हर  घड़ी  हर  पल   स्वयं  को  इतना  धो  डालें  कि  जन्म जन्मान्तर  के  दाग  भी   छूट  जाएँ  l  हमारी  जीवन  साधना  ऐसी  हो   जो  विचारों  को  ही  नहीं   , संस्कारों   को  भी  धो  डालें  l  '

19 July 2024

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   प्रसिद्ध  संत   श्री किंकर जी  महाराज   गुजरात  के  एक  गाँव  में  पहुंचे  l  वहां  अनेक  लोग  उन्हें  अपने  घर  चलने  की  जिद  करने  लगे  l  कई  सेठ -सहकर  उन्हें  अपने  साथ  ले  जाना  चाहते  थे  , परन्तु  उन्हें  छोड़कर  श्री किंकर जी  महाराज   ने  एक  कुम्भकार  के  घर  जाना  स्वीकार  किया  l  वह  भक्त  कुम्भकार  उन्हें  बड़े  आदर  के  साथ  अपने  घर  ले  गया   और  उनको  भोजन  परोसने  लगा  l  उसकी  पत्नी  संत  के  पास  बैठकर   उन्हें  पंखा  झलने  लगी  l  संत  की  द्रष्टि  महिला  के  पैरों  पर  पड़ी   तो  वे  समझ  गए  कि   कुम्भकार  की  गृहिणी  अपंग  है  l  उन्होंने  प्रेम  से  पूछा --- " बेटी  !  अपंगता  के  कारण  घर  के  कार्यों  को  करने  में  कठिनाई  होती  होगी  ? "  वह  बोलो ---- " नहीं  महाराज  !  मैं  बैठे -बैठे  भोजन  बनाती  हूँ  , बरतन  मांजती  हूँ , घर  का  आंगन  लीपती  हूँ   और  भगवान  की  पूजा  करती  हूँ  l  इन्हें  केवल  पानी  भरना  होता  है  l "  संत किंकर जी  महाराज  ने   उसके  पति  से  पूछा  ---- "  तुमने  इससे  क्यों  विवाह  किया  था   ? "  वह  बोला  ---- " महाराज  ! मैंने  सोचा  कि  जीवन  सेवा  में  लगाना  चाहिए   तो  मैंने  इससे  विवाह  करने  का  निश्चय  किया  l  मैंने  इसे  कभी  दुःख  नहीं  दिया  ,  हमेशा  हर  कार्य  में   सहयोग  देता  हूँ  l  मैंने  इसे  तीर्थयात्रा  कराई  है  नल  पालीताना  के  मंदिरों  में  दर्शन   कराने  ले  गया  तो   कंधे  पर  बिठाकर  पहाड़ी  तक  पहुँचाया  l  हम  दोनों  एक  दूसरे  के  सहयोग  से   जीविकोपार्जन   व  भगवान  की  भक्ति  में  लगे  हैं  l "   संत  श्री  किंकर जी  महाराज   उन  दोनों  आदर्श  पति -पत्नी   को  देखकर  उनके  सम्मुख  नत मस्तक  हो  गए   और  बोले  ---- "  जहाँ  तुम  दोनों  जैसे  पति -पत्नी  होते  हैं  , वहां  गृहस्थी  सदा  सुखमय  होती  है   l "