18 May 2024

WISDOM -----

   मानव  जीवन   समस्याओं  से  घिरा  हुआ  है  , हम  सब  के  जीवन  में   एक  न  एक  समस्या  निरंतर  बनी  रहती  है  l  स्थिति  विकट   तब  हो  जाती  है  जब  हम  निरंतर  समस्या  पर  ही  चिंतन करते  रहते  हैं  , उसी  की  चर्चा  करते  हैं  l  यदि  समस्याएं  हैं  तो  उनका  समाधान  भी  है  l  हम  समस्या  को  प्रश्न  समझें  और  समाधान  उस  प्रश्न  का  उत्तर  है  l  अब  हम  अपना  सारा  ध्यान  उस  उत्तर  को  खोजने  में  यानि  उस  समस्या  का  क्या  हल  हो  सकता  है , उसका  समाधान  क्या  है  , इस  पर   हर  पल  चिन्तन  करें ,  अपना  ध्यान  केन्द्रित  करें   तो  बड़ी  से  बड़ी  समस्या  का  हल  हमें  मिल  जाएगा   l  हमें  अपनी  समस्याओं  का  समाधान  ढूँढने  कहीं  बाहर  नहीं  भटकना  है  l  हर  समस्या  का  , हर  प्रश्न  का  उत्तर  हमारे  ही  भीतर  है   l  बस  , हमें  अपनी  अंतरात्मा  की  आवाज  को  सुनना  है   और  ईश्वर  से  प्रार्थना  करनी  है   कि  वे  हमें  इतनी  शक्ति  दें  कि  कुछ  समय  मौन  रहकर  हम  अपनी  अंतरात्मा  की  आवाज  को  सुन  सकें  l  --------------एक  जमीदार  का  घोड़ा  बूढ़ा  हो  गया  था  l  एक  दिन  घास  चरते  हुए  वह  सूखे  कुएं  में  गिर  गया  l  जमीदार  को  पता  चला  तो  उसने  सोचा  कि   अब  वह   घोड़ा  उसके  किसी  काम  का  नहीं  है    तो  उसने  उसे  कुएं  में  ही  दफ़नाने  के  लिए   मजदूरों  को  बुलाया   और  कहा  कि  वे  घोड़े  के  ऊपर  मिटटी  डालकर   उसे  वहीँ  मरने  के  लिए  छोड़  दें  l  जब  घोड़े  पर  मिटटी  पड़ने  लगी   तो  वह  अपने  मालिक  की  मंशा  को  समझ  गया    और  उसने  बचने  की  तरकीब  ढूंढ  ली  l  जब  भी  उस  पर  मिटटी  पड़ती  वह  उछल  पड़ता   इससे  मिटटी   उसके  नीचे  पहुँच  जाती  और  वह   मिटटी  के  ऊपर  l   उस  पर  मिटटी  पड़ती  रही  और  वह  उछल  कर  ऊपर  आता  रहा  l  अंततः  कुआं  मिटटी  से  भर  गया   और   घोड़ा  कुएं  से  बाहर  आ  गया  l  इस  कथा  से  हमें  यह  शिक्षा  मिलती  है   परिस्थितियां  चाहे  कितनी  भी  प्रतिकूल  हों  ,  हमेशा  उनसे  बचाव  का  कोई  न  कोई  उपाय  अवश्य  होता  है  ,  हमें  हिम्मत  नहीं  हारनी  चाहिए  l  

17 May 2024

WISDOM ------

    पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- " संपदा  बाहर  भी  है  और   भीतर  भी  l   बाहर  की , द्रश्य , भौतिक  संपदा  मिलने  पर   उसका  खोना  सुनिश्चित  है  ,  लेकिन  भीतर  की  संपदा  मिल  जाने  पर  वह  सदा   बनी  रहती  है  l  उसे  पा  लेने  के  बाद   कुछ  और  पा  लेना  शेष  नहीं  रह  जाता  l  "  समय  कितना  बदल  गया   !   एक  समय  था  जब   ऋषि , मुनि   तपस्या , यम , नियम , साधना  आदि  के  द्वारा  आंतरिक  संपदा  के   धनी  थे , समृद्ध  थे  l  भौतिक  सुख -साधनों  की  उनकी  कोई  मांग  नहीं  थी  , उन्होंने  अपना  जीवन  संसार  के  कल्याण  में  और   मनुष्य  की  चेतना  को  कैसे  परिष्कृत  किया  जाए , इन  खोजों  में  व्यतीत  किया  था  l  लेकिन   अब  इस  वर्ग  के  लोग  केवल  बाना   पहनकर  स्वयं  को  आध्यात्मिक  दिखाते  हैं  , उनके  पास   आंतरिक    संपदा  नहीं   है  और  बाहरी  सुख - भोग  के  अपार  साधन  हैं  l  इसलिए  अब  वे  समाज  को  दिशा  नहीं  दे  पाते  बल्कि   शक्तिशाली  लोग  उन्हें  अपने  स्वार्थ  के  लिए  इस्तेमाल  कर  लेते  हैं  l  अपवाद  स्वरुप  प्राचीन  ऋषियों  की  श्रेणी  के  भी   हैं  लेकिन  उनकी  संख्या  बहुत  कम  है  l बुराई  ने  अच्छाई  को  ढक  दिया  है  l  ---- महर्षि  कणाद  केवल  अन्न  के  कण  बीनकर  अपनी  गुजर  कर  लेते  थे  l  राजा  को  जब  इस  बात  का  पता  चला  तो  उन्होंने  प्रचुत  धन सामग्री  उनके  पास  भेजी  l   मंत्री  सब  लेकर  पहुंचा  तो  महर्षि  ने  कहा --- "  मैं  सकुशल  हूँ  l  इस  धन  को  तुम  उन्हें  बाँट  दो  जिन्हें  इसकी  जरुरत  है  l "  ऐसा  तीन  बार  हुआ  , अंत  में  राजा  स्वयं  बहुत  सा  धनधन  लेकर  उनके  पास  पहुंचे  तो  महर्षि  ने  कहा ---- " देखो  मेरे  पास  तो  सब  कुछ  है  l  यह  धन  उन उन  लोगों  में  वितरित  कर  दो  जिनके  पास  कुछ  नहीं  है  l "   राजा  ने  चकित  होकर  महर्षि  को  देखा  कि  जिनके  तन  पर   केवल  एक  लंगोटी  है  और  कह  रहे  हैं  कि  उनके  पास  सब  कुछ  है  l  राजा  ने  महर्षि  से  कुछ  नहीं  कहा  लेकिन  महल  पहुंचकर  रानी  को   सब  कथा  कह  सुनाई  l  रानी  विवेकवान  थी  , उसने  कहा ---" आपने  भूल  की  l  जिनके  पास  भीतर  की  संपदा  है  ,  वे  ही  बाहर  की  संपदा   छोड़ने  में  समर्थ  होते  है  l  आप  महर्षि  को  कुछ  देने  नहीं , उनसे    अनमोल  ज्ञान  प्राप्त  करने  जाएँ  l"    रानी  की  बात  सुनकर   राजा  महर्षि  के  पास  गए  और  उनसे  ज्ञान  प्राप्त  कर  अपने  जीवन  को  सार्थक  किया   l   

16 May 2024

WISDOM -----

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- ' कथनी  और  करनी  का  अंतर   समाज  की  बहुत  बड़ी  विडंबना  है  l  इस  समय  ऐसे  बहुत  से  ऐसे   शूरवीर  मिलेंगे   जो  बातें  तो  बहुत  बढ़ -चढ़  कर  करते  हैं  ,  किन्तु  जब  कार्य  को   सिद्धांत  रूप  में  अपनाने   की  बात  आती  है   तो  पीछे  हट  जाते  हैं  l  महापुरुष  वही  होते  हैं   जो  कहने  से  पहले   किसी  भी  सिद्धांत  को   अपने  जीवन  में  उतारते  हैं  l  ऐसे  महामानवों  की  वाणी  में   वह  शक्ति  आ   जाती  है   कि  वह  दूसरों  को   जो  भी  उपदेश  देते  हैं  , जनता  उनकी  बात  मानती  है   l  '  पर  उपदेश  कुशल  बहुतेरे  '  के  अनुसार  दूसरों  को  उपदेश  देना  बहुत  सरल  है  ,  पर  उस  सिद्धांत  पर  आचरण  करना  बहुत  कठिन  है  l  --------- एक  बालक  मिठाई  बहुत  खाता  था  l  उसकी  यह  आदत  उसके  स्वास्थ्य  को  बिगाड़  रही  थी   l  बालक  मानता  ही  नहीं  था  l  उसकी  माता  उसे   रामकृष्ण  परमहंस  के  पास  ले  गई  l  उसे  विश्वास  था  कि  परमहंस जी  के  उपदेश  से  ,  उनकी  शिक्षा  से    बालक  की  आदत  सुधर  जाएगी  , उसके  जीवन  को  सही  दिशा  मिलेगी  l   परमहंस जी  ने  उसे  एक  सप्ताह  बाद  आने  को  कहा  l  महिला  चली  गई  l  एक  सप्ताह  बाद  वह  पुन: बालक  को  लेकर  उनके  पास  आई  l  परमहंस जी  ने  बालक  को  उपदेश  दिया  और  समझाया  तो  बालक  ने   मिठाई  छोड़  दी   l  महिला  ने  एक  सप्ताह  विलंब   लगाने  का  कारण  पूछा   तो  परमहंस जी  ने  कहा  --- तब  तो  मैं  स्वयं  मिठाई  खाता  था  l  जब  बालक  को  उपदेश  देना  आवश्यक  प्रतीत  हुआ  ,  तो  पहले  मैंने  स्वयं  मिठाई  छोड़ी   , तब  बालक  को  कहा  l  जो  स्वयं  करता  है , उसी  की  शिक्षा  का  प्रभाव  पड़ता  है  l 

15 May 2024

WISDOM -------

  लघु -कथा ---- एक  बार  एक  बड़े  त्यागी  महात्मा   कहीं  धर्मोपदेश   करने  गए   और  वहां  से  एक  सोने  का  हार  चुरा  लाए  l  तीसरे  दिन   वे  बड़े  दुःखी  मन  से   वहां  पहुंचे   और  हार  लौटाते  हुए  क्षमा  मांगी  l  गृहस्थ  को  बड़ा  आश्चर्य  हुआ   कि  इतने  त्यागी  और  विद्वान  होते  हुए  भी   क्यों  इन्होने  हार  चुराया   और  क्यों  लौटाने  आए  ?  महात्मा जी  ने  बताया   कि  उस  दिन  उन्होंने   जिस  व्यक्ति  के  यहाँ  से  भिक्षा  ली  थी  ,  वह  चोर  था  l  उसका  अन्न  भी  चोरी  से  लाया  हुआ  था  l  उसे  खाने  से   मेरी  बुद्धि  में   चोरी  के  संस्कार  पैदा  हुए  l  इसके  बाद  पेट  खराब  हो  गया  ,  जब  वह  सारा  विकार , चोरी  का  अन्न  बाहर  निकल  गया   तब  सुबुद्धि  लौटी    तब  मैं  आपका  हार  लौटाने  आया  हूँ  l  

 ऋषि  कहते  हैं  --मनुष्य  की  सब  इन्द्रियों  में  जिह्वा  सबसे  महत्वपूर्ण  है   l  हाथ , पैर , आँख , कान   सभी  दो  हैं  ,  पर  उनका  काम  एक  ही  है   l  पर  जिह्वा  एक  है   पर  उसके  काम  दो  हैं  --- एक  भोजन  का  स्वाद  लेना  और  दूसरा  बोलना  l  इन  दोनों  का  संयम  मनुष्य  के  जीवन  को   प्रभावित  करने  वाला  है   l  भोजन  का  असंयम   शरीर  को  अस्वस्थ    बनाता  है  ,  तो  दूसरी  ओर  मन  के  विचार  को  भी  प्रभावित  करता  है  l  जैसा  होगा  अन्न , वैसा  होगा  मन  l  वर्तमान  समय  में   तो  स्थिति  अत्यंत  विकट  है  l  कृषि   उपज  में  इतनी  रासायनिक  खाद , रासायनिक उर्वरक , विशेष  किस्म  के  बीज  और   ऐसे  कीटनाशकों  का   प्रयोग  होता  है   कि  व्यक्ति  कितने  भी  नियम , संयम  से  रहे  ,  कोई  बुरी  लत  भी  न  हो  , तब  भी  कोई  न  कोई  बीमारी  घेरे  रहती  है  l  बड़े -छोटे  सभी  अस्पताल  बीमारों  से  भरे  हैं l  अब  सामान्य  मृत्यु  तो  बहुत  कम  होती  हैं ,  अधिकांश  बीमारी  से  मरते  हैं  l  इसके  साथ  संसार  में   अपराध , बेईमानी , भ्रष्टाचार  इतना  बढ़  गया  है   कि   हर  प्रकार  के  भोज्य  पदार्थ  में  सात्विकता  की  कल्पना  ही  नहीं  की  जा  सकती   l  वैचारिक   प्रदूषण    बढ़  गया  है   l   

14 May 2024

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  लघु कथा ----- चारुदत्त  एक  सज्जन  व्यक्ति  था , जिसकी  ईमानदारी एवं  सत्यता  पर  हर  एक  को  विश्वास  था  l उसकी  प्रमाणिकता   की  कथाएं  पूरे  नगर  में  विख्यात  थीं  l  एक  बार  इसी  विश्वास  के  आधार  पर   एक  व्यक्ति   अपने  बहुमूल्य   रत्न  उसके  पास  धरोहर  के  रूप  में   रख  गया  l  दुर्भाग्यवश  चारुदत्त  के  घर  चोरी  हो  गई    और  वे  रत्न  चोरी  चले  गए  l  चोर  बहुत  सा  सामान  चारुदत्त  का  भी  ले  गया  था  ,  पर  उसके  जाने  से  ज्यादा  दुःख   चारुदत्त  को   उन  रत्नों  के  चोरी  होने  का  था  l  उसने  अपना  दुःख  अपने  मित्र  से  साझा  किया    तो  उसके  मित्र  ने  उससे  पूछा  ---- '  जब  वह  व्यक्ति  जो  रत्नों  का  मालिक  था  ,  अपने  रत्न  तुम्हारे  पास  रखकर  गया    तो  उसका  साक्षी  कौन  था  ? "  चारुदत्त  ने  उत्तर  दिया  --- " साक्षी  तो  कोई  नहीं  था  ,  वह  तो  मात्र  विश्वास  के  आधार  पर   ही  मेरे  यहाँ  रत्न  रख  गया  l "  चारुदत्त  के  मित्र  ने  कहा ---- "  तो  फिर  इतना  परेशान  होने  की  क्या  बात  है  ?  जब  वह  पूछने  आए   तो  मुकर  जाना   और  कह  देना   कि  तुमने  मेरे  पास  कोई  रत्न  नहीं  रखे  थे  l  "  यह  सुनकर  चारुदत्त  ने  उत्तर  दिया  ---- "  चाहे  मुझे  भीख  मांगनी  पड़े  ,  पर  मैं   धरोहर  के  रत्नों  के  बराबर   धन  उत्पन्न  कर  के   उसे  लौटा  दूंगा  ,  किसी  भी  स्थिति  में   चरित्र  को  कलंकित  करने  वाले  असत्य  का  प्रयोग  नहीं  करूँगा  ,  झूठ  नहीं  बोलूँगा  l "   चारुदत्त  के  इस  वार्तालाप  को  जिसने  भी  सुना  सब  उसकी  ईमानदारी  और  सत्यता  से  बहुत  प्रभावित  हुए  l   व्यक्ति  की  प्रमाणिकता  ऐसे   विषम  समय  में  ही   सिद्ध  होती  है  l  

13 May 2024

WISDOM -----

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- ' भागवत पुराण  की  कथा , सत्य नारायण कथा , एकादशी  कथा  आदि  धार्मिक  कथाएं  इस  उदेश्य  से  लिखी  गईं  हैं   कि  उन  कथाओं  की  शिक्षा  को  व्यक्ति  अपने  जीवन  में  उतार  कर    श्रेय   पथ  पर   चले  ,  ईश्वर  ने  जो  शक्तियां  दीं  हैं  उनका  सदुपयोग  करे  l   किन्तु  आज  कथा  को  लोग   मनोरंजन  के  लिए  अथवा  धर्म लाभ  के  लिए  सुनते  हैं  l  "  ------------- एक  बार  संत  ज्ञानेश्वर  कथा  सुना  रहे  थे   कि  ज्ञान , भक्ति  , विवेक  और  शक्ति   परमात्मा  सत्पात्रों  को  देता  है  l  संत  ज्ञानेश्वर  के  ऐसा  कहने  पर  एक  महिला  नाराज  हो  उठी   और  बोली  ----- " तो  इसमें  भगवान  की  क्या  विशेषता   ?  उन्हें  तो  सबको  समान  अनुदान  देने   चाहिएं  l '  संत  उस  समय  तो  चुप  हो  गए  l  दूसरे  दिन  प्रात:काल  संत  ने  मोहल्ले  के  एक  मूर्ख   व्यक्ति  को   बुलाकर  कहा  कि   अमुक  स्त्री  से  जाकर   आभूषण  मांग  लाओ  l  मूर्ख  व्यक्ति  गया   और  आभूषण  मांगे  तो  उस  स्त्री  ने  उसे  झिड़क  कर  भगा  दिया  ,  उसे  कुछ  न  दिया  l  थोड़ी  देर  बाद  संत   ज्ञानेश्वर  स्वयं   उस  महिला  के  यहाँ  पहुंचे   और  बोले  ---- '  आप  एक  दिन  के  लिए  अपने  आभूषण   दे  दें  l  आवश्यक  काम  कर  के  लौटा  देंगे   l "  महिला  ने  बिना  कोई  प्रश्न   पूछे   संदूक  खोला   और  सहर्ष  आभूषण  सौंप  दिए  l  आभूषण  हाथ  में  लिए  संत  ज्ञानेश्वर  ने  उस  महिला  से  पूछा  ---- " अभी -अभी  दूसरा  व्यक्ति   आया  था  आपने  उसे  आभूषण   क्यों  नहीं  दिए  ?  '  महिला  बोली ---- "  उस  मूर्ख  को   कैसे  अपने  मूल्यवान  आभूषण  दे  देती   l "   संत  ज्ञानेश्वर  ने  कहा ---- "  बहन  !  जब  आप  अपने  सामान्य  से  आभूषण  बिना  सोचे -विचारे   कुपात्र  को  नहीं  दे  सकतीं  , तो  फिर  परमात्मा   अपने  दिव्य  अनुदानों  को   कुपात्रों  को  कैसे  सौंप  सकता  है  ?  वह  तो  बारंबार  इस  बात  की  परीक्षा  करता  है  कि   जिसको  अनुदान  दिया  जा  रहा  है  ,  उसमें  पात्रता  है  अथवा  नहीं  ,  वह  इस  अनुदान  का  सदुपयोग  कर  रहा  है  अथवा  नहीं  l '  

WISDOM -----

   पुराण  की  कथा  है  ---- वृत्रासुर  ने  तपस्या  करके  अनेकों  वर  प्राप्त  किए  और  वह  बहुत  शक्तिशाली  हो  गया  था  l  कोई भी  तपस्या  कर  के  बहुत  शक्तिशाली  हो  जाये   तो   वह  देवराज  इंद्र  के  लिए  बहुत  बड़ा  खतरा  बन  जाता  था   और  तब  इंद्र  के  लिए  अपना  सिंहासन  बचाने  हेतु  उसका  अंत  करना  अनिवार्य  हो  जाता  था   लेकिन  वृत्रासुर  को  पराजित  करना  इतना  आसान  नहीं  था  l  महान  तपस्वी  महर्षि   दधीची  की  हड्डियों  से  बने  वज्र  से  ही   वृत्रासुर  का  अंत  हो  सकता  था   लेकिन  जब  तक  महर्षि  दधीची  की  धर्मपत्नी   भगवती  वेदवती  उपस्थित  थीं  ,  तब  तक  उनके  आश्रम  में  प्रवेश  करना   देवराज  इंद्र  के  लिए  भी  असंभव  था  l  इंद्र  सबसे  छिप  सकते  थे  , पर  सती  के  अपूर्व  तेज  के  समक्ष   छद्दम वेष  छिपा  सकना   उनके  लिए  संभव  नहीं  था  l  इसलिए  जव  वेदवती  जल  भरने  के  लिए  आश्रम  से  बाहर  निकलीं   तब  इंद्र  ने  आश्रम  में  प्रवेश  किया   और   संसार  के  कल्याण  के  लिए  महर्षि  से  अस्थिदान  का  निवेदन  किया  l  असुरों  के  अंत  और  लोक कल्याण  के  लिए  महर्षि  दधीची  ने  तुरंत  प्राण त्याग  कर  अस्थिदान  कर  दिया  l  वेदवती  जल  भरकर  लौटीं  तो  एक  क्षण  में  ही  सारी  स्थिति  को  समझ  गईं  l  वे  इंद्र  को  शाप  देने  ही  जा  रहीं  थीं   कि  दिव्य  देहधारी  महर्षि  ने  परावाणी  में  उन्हें  समझाया  ---- " भद्रे  !   देवत्व  की  रक्षा  के  लिए   यह  दान  मैंने  स्वेच्छा  से  किया  है   इसलिए  शाप  देना  उचित  नहीं  है  l  अब  तुम  अपने  गर्भस्थ  शिशु    का  ऐसा  निर्माण  करो   कि           ' तत्वशोध  '   की     हमारी  साधना  अधूरी  न  रह  जाये  l  "   वेदवती  ने  महर्षि  की  आज्ञा  को  स्वीकार  किया  और  इतिहास  साक्षी  है   कि  वेदवती  की  तपस्या  से  उनके  गर्भ  से    पिप्पलाद  जैसे  महान  ऋषि  का  जन्म  हुआ  और  उनके  तपस्वी  पति  महर्षि  दधीची  की  अंतिम  कामना  पूर्ण  हुई  l