15 August 2022

WISDOM -------

    सम्राट  चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य   के  समय  में   चीनी  यात्री  फाह्यान  भारत  आया  था  l  तीन  वर्ष  तक  वह  मगध  की  राजधानी  पाटलिपुत्र  में  रहा  l    चन्द्रगुप्त  विक्रमादित्य   की  महानता , कुशल  शासन  प्रबंध  और   भारतीय  जनता  की   उच्च  सामाजिक  और  मानवीय  चेतना  का   वृतान्त  उसने  चीन  में  अपने  मित्र   को  सुनाया  था   l  उसने  इस  वृतान्त  को   लिपिबद्ध  कर  लिया  था  l  जो  आज  उस  समय  की  हमारी   सभ्यता , संस्कृति , धर्म  और  सामाजिकता   की  उच्चता   का  प्रमाणिक  दस्तावेज  है   l   उसकी  कुछ  पंक्तियाँ  हैं -------- " अनेकों  बार   मैं  ऐसे  प्रदेशों  से  गुजरा  हूँ  ,  जहाँ  मुझे  अपने  लूटे  जाने   का  भय   उपजा  था    क्योंकि  मेरे  पास   सम्राट  और  अतिथि  सत्कार  प्रिय  नागरिकों  द्वारा   भेंट  किए  गए   बहुमूल्य  वस्त्र -आभूषण   और  मूल्यवान  पुस्तकें  थीं  l  अकेले  सुनसान  जंगलों  और   वीरान  सड़कों  से  गुजरते  हुए   मेरे  मन  में  ऐसी  आशंका  उत्पन्न  हो  जाती  थी   कि  कोई  मुझे  लूट  लेगा   l  लेकिन  जो  भी  मिला   उसने  सहायता  ही  की   l  किसी  ने  भी  मुझे  परेशान  नहीं  किया   और  विनम्र   शब्दों  में   अपना  आतिथ्य   स्वीकार  करने  का  आग्रह  किया   l  कितने  अच्छे  हैं  यहाँ  के  लोग --- सभी , सुसंस्कृत ,  शिष्ट  और  उदार  ,  तभी  तो   सम्रद्धि  इनके  चरण  चूमती  है  l   ------- संपन्न  होते  हुए  भी  ये  लोग  धन  को  नहीं , चरित्र  को  महत्त्व  देते  थे   l  सत्य  और  नैतिकता  पालने  वाला   व्यक्ति   ही  समाज  में  सम्मानित  माना   जाता  था    l  व्यक्ति  की   महत्ता  का  आधार   उसका  चरित्र  था ,  धन  नहीं   l   लोग  मांस , मदिरा  का  सेवन  नहीं  करते  थे   l  ------- "    फाह्यान  के  वर्णन  से  पता  चलता  है  कि  वो  काल   हमारी  सभ्यता  और  संस्कृति  के  चरम -उत्कर्ष  का  काल  था   l         आज  हमें  आत्म  अवलोकन  करने  की  जरुरत  है   कि  हम   कहाँ  थे   और   क्या     हो  गए  ?    किसी  भी  जाति  , धर्म   का  अस्तित्व  उसकी  संख्या  पर  नहीं ,  उसके  चरित्र  पर  निर्भर  करता  है   l     छल - कपट , धोखा , बेईमानी ,   षड्यंत्र  ,  दूसरों  का  हक   छीनना  ,  दूसरा   कोई  सुखी  न  रहे   इसलिए  उसके  परिवार  में  फूट  डलवा  देना ,   घरेलू  हिंसा  , शोषण  , अपहरण , बलात्कार ,  झूठ , बेईमानी  ,  भ्रष्टाचार    छोटे -बड़े  घोटाले   ,   कला  और  साहित्य  में  अश्लीलता  ,   विभिन्न   अपराधिक  कार्य  -------- किस  जाति  और  किस  धर्म  में  ज्यादा  हैं   ?    इसके  लिए  किन्ही  फाइलों  में  आंकड़ों  को  नहीं  तलाशना  है    l    हम  किसी  भी  जाति  या  धर्म  के  हों    हमें  अपने  ही  अंतर  को  टटोलने  की  ,  अपने  ही  ह्रदय  में  झाँकने  की  जरुरत  है   l    ----- अंत  में  एक  ही  सत्य  समझ  में  आएगा    कि  संसार  में  एक  ही  जाति  है ----- मानवीयता    और  एक  ही  धर्म   है ----- इंसानियत   l  l  जब  अति  हो  जाती  है    फिर  भगवान  का  डंडा  पड़ेगा   तो    , बस  !  यही  बचेगा   ' मानव  धर्म  '  l   हम  इनसान  बनें  ,  उसी  में  जीवन  की  सार्थकता  है   l