पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- 'प्रत्येक व्यक्ति समाज पर अपना भला -बुरा प्रभाव छोड़ता है l किन्तु सुगंध की अपेक्षा दुर्गन्ध का विस्तार अधिक तेजी से होता है l पानी का नीचे गिरना बहुत आसान है किन्तु ऊपर चढ़ाने के लिए बहुत अधिक मेहनत की आवश्यकता है l ' आसुरी प्रवृत्ति के लोग इसी वजह से आसुरी तत्वों को संसार में फैलाने में सफल हो जाते हैं l जो असुर हैं जिन्हें हम राक्षस , दैत्य और नर भक्षी हों तो उन्हें नर पिशाच भी कहते हैं , ये सब मनुष्य शरीर में ही हैं लेकिन इनमे संवेदना , करुणा , दया , ममता , प्रेम , मानवीयता नहीं होती l इनमे अहंकार और उससे जुड़े सभी दुर्गुण होते हैं l आज कलियुग की स्थिति यह है कि असुरता सम्पूर्ण धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहती है , सब उसके गुलाम बने और देवत्व का नामोनिशान मिट जाए l उनका उदेश्य लोगों को मानसिक गुलाम बनाना है , भौगोलिक नहीं l अपने उदेश्य में उसे बहुत सफलता भी मिली लेकिन ऐसे देश जहाँ कि संस्कृति में चरित्र की श्रेष्ठता है जैसा कि हमारा देश भारत , ऐसे किसी भी देश में देवत्व को पूरी तरह मिटाना संभव नहीं है l इसलिए आसुरी तत्वों ने दूसरी चाल चली --- डंडे के जोर पर तो चारित्रिक पतन आसान नहीं होता इसलिए अब उन्होंने लोगों के मन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से आक्रमण शुरू किया l इसके लिए उन्होंने विज्ञान का सहारा लिया और संचार तथा प्रचार-प्रसार के साधनों से लोगों के मन को डांवाडोल करने , उनका नैतिक पतन करने और अश्लीलता को परोसने का सारा व्यापार शुरू कर दिया l बुराई में बड़ा आकर्षण होता है l सद्विचारों को तो दो -चार लोग पढ़ लें यही बहुत बड़ी बात है लेकिन अश्लील साहित्य , ऐसी ही फ़िल्में , गंदे विचार इन्हें पढने , सुनने व देखने के लिए लाखों , करोड़ों लोगों की भीड़ होती है l संसार में जो लोग श्रेष्ठ काम कर रहें हैं , उनके कार्यों को बड़ी मुश्किल से एक -दो लाइन में समाचारों में दिखा दिया जाता है लेकिन जो बहुत ही निम्न श्रेणी के , निकृष्ट कार्य हैं , उन्हें समाचारों में और विभिन्न तरीकों से विस्तार से सचित्र भी दिखाया जाता है ताकि लोगों का मन बहुत कमजोर हो जाए l इसके साथ ही ये आसुरी प्रवृति के लोग अप्रत्यक्ष तरीकों से नकारात्मक शक्तियों की मदद से , साइकिक अटैक आदि विभिन्न तरीकों मानवजाति पर सामूहिक रूप से आक्रमण कर उन्हें विभिन्न तरह की बीमारियाँ देते हैं ताकि व्यक्ति इतना कमजोर हो जाए कि उसमें विरोध करने की सामर्थ्य ही न रहे , फिर वे हमें जैसी शिक्षा दे , चिकित्सा दे , कृषि , साहित्य , कला , खाद्य पदार्थ , बीज , खेती आदि सब कुछ उनकी मरजी का हो , हमारी इच्छा , हमारा स्वास्थ्य , हमारी संस्कृति , हमारी मिटटी , इससे किसी को कोई मतलब नहीं l यही है मानसिक गुलामी l गुलाम का अपना कोई अस्तित्व नही होता , वह तो एक कठपुतली होता है l असुरता की कोई जाति , कोई धर्म , कोई विशेष भौगोलिक क्षेत्र नहीं होता , ये सब एक नाव में सवार होते हैं l इस नाव का आकार अब बढ़ता ही जा रहा है l बुराई में तत्काल लाभ होता है इसलिए सब लोग उसी नाव में बैठने को आतुर हैं l देवत्व को बचाने का , देवत्व की रक्षा का एक ही उपाय है ---- ' गायत्री मन्त्र ' l माँ आदि शक्ति को पुकारो और शक्ति के साथ शिव की उपासना करो l शिव और शक्ति के संतुलन से देवत्व की रक्षा संभव है l प्रत्येक व्यक्ति यह प्रयास करे तब उसका परिवार , समाज , राष्ट्र आसुरी आक्रमण से सुरक्षित रहेंगे l
Omkar....
15 February 2026
10 February 2026
WISDOM ------
विधाता ने स्रष्टि की रचना की और अनेक प्राणियों , वनस्पति , पशु -पक्षी आदि सभी बनाए l इन सब में विधाता ने मनुष्य को ही बुद्धि दी कि वह सन्मार्ग पर चलकर , नैतिकता के नियमों का पालन कर अपनी चेतना को विकसित करे और बुद्धि का सदुपयोग कर सामान्य मनुष्य से ऊपर उठकर इनसान ., देवता और भगवान बने लेकिन मनुष्य ने ऐसा नहीं किया , मनुष्य में अहंकार है उसने ईश्वर के आदेश को भी नहीं माना l मनुष्य के अहंकार ने उसकी बुद्धि को दुर्बुद्धि में बदल दिया , उसने ईश्वर के बताए क्रम से विपरीत क्रम को चुना l बहुत समय तक उसने पशुओं जैसा जीवन जिया लेकिन यह जीवन भी उसे बहुत कठिन लगा क्योंकि पशु भी प्रकृति के नियमों के अनुसार चलते हैं l समय से उठाना , शाम होते ही अपने घोंसले में चले जाना l संतान उत्पत्ति के उनके नियम हैं , समूह के छोटे बच्चों पर उनकी कुद्रष्टि नहीं होती , जरुरत भर का उनका घोंसला होता है , संपत्ति , वैभव नहीं जोड़ते l मनुष्य को यह पशुओं जैसा जीवन बहुत कठिन लगा l मनुष्य ने अपनी बुद्धि को बेलगाम कर दिया l मनुष्य ने सोचा कि ऐसा कुछ किया जाए कि अपने समूह में उसे सबका सम्मान मिले और अपने भीतर की कालिख को वह सबसे छुपा ले l जैसी चाहत होती है वैसे रास्ते भी निकल आते हैं l मायावी शक्तियां तो शुरू से ही संसार में हैं l रावण मायावी था , हिरन्यकश्यप , बकासुर , भस्मासुर , अघासुर जैसे असंख्य असुर हैं l वे जीवित नहीं तो क्या , उनकी वाइब्रेशन तो ब्रह्माण्ड में हैं l जैसा जो चाहता है , वैसी ही वाइब्रेशन उसके पास आ जातीं हैं l अब मनुष्य को भी मायावी बनने का रास्ता मिल गया l फिर इन असुरों के अनेक सहयोगी ---भूत , प्रेत , जिन्न ,पिशाच आदि भी होते हैं , उन सबका मनुष्य को भरपूर सहयोग मिला l और मनुष्य को अपनी दुर्बुद्धि से उन्ही का जीवन बहुत पसंद आया , खाओ -पीओ मौज उड़ाओ , मारो -काटो , कोई नैतिकता नहीं , कोई नियम नहीं l मनुष्य युगों से इन्ही के जैसा जीवन जी रहा है , शरीर मनुष्य का है लेकिन अपने भीतर से वह -----है l यह कटु सत्य है , इसका प्रमाण भी है l संसार का इतिहास युद्धों का इतिहास है , बड़े भीषण युद्ध हुए हैं और आज भी हो रहें हैं , खून की नदियाँ बह गईं , अणुबम तो ऐसे गिरे कि सब कुछ राख हो गया l यदि मनुष्य ' इनसान ' होता तो इतने युद्ध नहीं होते , ये सारे शौक तो भूत , पिशाचों के ही हैं l आज स्थिति ये है कि संसार को नहीं सुधार सकते l अब सब व्यक्तिगत है , जो अच्छा व श्रेष्ठ जीवन जीना चाहे , वह इस कीचड़ में कमल की तरह रह सकता है l अपनी कम्युनिटी में खींचने के लिए भूत -पिशाच उस पर बहुत आक्रमण करेंगे , लेकिन यदि एक सच्चा और श्रेष्ठ इन्सान बनने का संकल्प लिया है तो ब्रह्माण्ड की दिव्य शक्तियां उसकी मदद अवश्य करेंगी l
7 February 2026
WISDOM ----
कांची नरेश की राजकुमारी प्रेत बाधा से पीड़ित थी l भूत सामान्य नहीं था , वह ब्रह्म राक्षस था l राजा ने श्री रामानुज को बुलाया l रामानुज ने वहां जाकर जब राजकुमारी को देखा तब सब समझ गए और पूछा ---- " आपको यह योनि क्यों मिली l " ब्रह्मराक्षस रो -रोकर बोला ---- " मैं विद्वान था , किन्तु मैंने अपनी विद्या छिपाकर रखी l किसी को भी मैंने विद्यादान नहीं किया , इससे मैं ब्रह्मराक्षस हुआ l आप समर्थ हैं , मुझे इस प्रेतत्व से मुक्ति दिलाइये l " श्री रामानुज ने राजकुमारी के मस्तक पर हाथ रख कर जैसे ही भगवान का स्मरण किया , वैसे ही ब्रह्मराक्षस ने राजकुमारी को छोड़ दिया , क्योंकि वह स्वयं प्रेत योनि से मुक्त हो गया l उस दिन से श्री रामानुज ने प्रतिज्ञा की कि वह स्वाध्याय का लाभ अपने समाज को भी देते रहेंगे l
4 February 2026
WISDOM
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'किसी को भी असफलता मिलने पर निराश होकर नहीं बैठना चाहिए l प्रयासरत रहना चाहिए , किसी न किसी क्षेत्र में सफलता अवश्य मिलेगी l जिस तरह सीढ़ियाँ चढ़ने में सावधानी बरती जाती है , अतिशीघ्रता में कभी-कभी पाँव फिसलने व गिरने का भी डर रहता है , उसी तरह मंजिल तक पहुँचने के लिए बढ़ाये जाने वाले क़दमों में भी सावधानी का ध्यान रखना जरुरी है l मंजिल तक ले जाने वाला हमारा हर प्रयास महत्वपूर्ण होता है l " पंचतंत्र की एक कहानी है ---------------- एक जंगल में दो पक्षी रहते थे l उस जंगल में एक छोर पर एक वृक्ष था , जिसमें वर्ष में एक बार स्वादिष्ट फल लगते थे l जब फलों का मौसम आया , तो जंगल के दोनों पक्षियों ने वहां जाने की योजना बनाई l पहले पक्षी ने दूसरे पक्षी से कहा --- " वह वृक्ष यहाँ से बहुत दूर है , इसलिए मैं तो आराम से वहां पहुँच जाऊँगा l अभी फलों का मौसम दो माह रहेगा l " इस बात पर दूसरे पक्षी ने कहा ---- " नहीं मित्र ! मुझसे तो रहा नहीं जा रहा है l उन स्वादिष्ट फलों के बारे में सोचकर ही मेरे मुँह से पानी आ रहा है l इसलिए मैं तो एक ही उड़ान में वहां पहुंचकर मीठे फल खा लेना चाहता हूँ l " दूसरे दिन दोनों पक्षी अपने घोंसले से निकलकर उस वृक्ष की ओर उड़ चले l कुछ दूर जाने पर पहले पक्षी को थकान होने लगी , तो वह विश्राम करने के लिए एक वृक्ष की टहनी पर ठहर गया l वहीँ दूसरा पक्षी उसे ठहरा हुआ देखकर मुस्कराया और तेजी से फलों की ओर उड़ने लगा l थकान तो उसे भी थी लेकिन उसे फल खाने की जल्दी थी l अब उसे दूर से ही फलों वाला वृक्ष दिखाई देने लगा l फलों की सुगंध भी उसे आने लगी , लेकिन तभी उसके पंख लड़खड़ाए क्योंकि वह बुरी तरह थक चुका था l वह आसमान से जमीन पर जा गिरा l उसके पंख बिखर गए और वह उन फलों तक कभी नहीं पहुँच सका l दूसरी ओर पहला पक्षी जो रुक -रूककर आ रहा था , वह फलों तक आराम से पहुँच गया l और उसने जी भरकर स्वादिष्ट फल खाए l इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि एक -एक कदम चलकर ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं l साथ ही लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जितना महत्त्व श्रम व प्रयास का है , उतना ही महत्त्व विश्राम का भी है l विश्राम करने से ही हमें आगे बढ़ने के लिए ऊर्जा मिलती है l
31 January 2026
WISDOM ------
वर्तमान समय में प्राकृतिक आपदाएं , आकस्मिक मृत्यु , दुर्घटनाएं ---प्रकृति की नाराजगी और चेतावनी का संकेत है l प्रत्यक्ष रूप में इसके अनेक कारण हो सकते हैं लेकिन कुछ कारण ऐसे भी होते हैं जो दिखाई नहीं देते l अनेक लोग गुप्त रूप से अपने स्वार्थ की पूर्ति और ईर्ष्या द्वेष के कारण दूसरों को नुकसान पहुँचाने के लिए नकारात्मक शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं l ऐसी नकारात्मक शक्तियां वायुमंडल में ही विचरण करती हैं l जिस किसी की ओर लक्ष्य कर के इन्हें भेजा जाता है , उसका तो ये नुकसान करती ही हैं , इसके साथ ही वे पूरे वायुमंडल को भी प्रदूषित करती हैं जैसे कोई बड़ी बदबूदार चीज एक स्थान से दूसरे स्थान जाएगी तो वह पूरा रास्ता बदबू से भर जायेगा और उसका असर सभी पर किसी न किसी रूप में अवश्य होगा l इस समय में धन और महत्वाकांक्षा की अंधी दौड़ है l लोगों का कितना अहित होता है , इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता l अनेक प्रकार की बीमारियाँ लोग झेल रहे हैं l जिनका जीवन स्तर अच्छा है , पौष्टिक भोजन है फिर भी बीमारी है , पीठ में दर्द , घुटने में दर्द , पैरों में दर्द यह तो आम बात है इसके लिए बुढ़ापा या कमजोरी ही कारण नहीं है l बड़ी मात्रा में तंत्र -मन्त्र , नकारात्मक शक्तियों के प्रयोग , साइकिक अटैक , विभिन्न तरीके के तांत्रिक प्रयोग ---ऐसी सभी बीमारियों के कारण हैं जो महँगी दवाई खाने और आपरेशन के बाद भी ठीक नहीं होतीं l जो लोग भी गुप्त रूप से इन कार्यों में लगे हैं , उनका परिवार भी सुरक्षित नहीं होता , बड़ी बीमारियों को झेलता है और अपने ही हाथों अपनी पीढ़ियों की बर्बादी लिख लेता है l जो लोग किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए ऐसी नकारात्मक शक्तियों का इस्तेमाल स्वयं करते हैं या किसी को प्रचुर धन देकर ऐसा कराते हैं वे मानसिक रूप से विकृत होते हैं , जिन्हें लोगों को कष्ट में देखने से आनंद मिलता है l पागल तो क़ानूनी दंड से भी बच जाता है , फिर ये तो छिपे हुए अपराधी हैं , इन्हें तो केवल भगवान ही देख सकते हैं , प्रत्यक्ष में तो कोई सबूत नहीं है l
29 January 2026
WISDOM -----
मनुष्य के जीवन में सुख और दुःख , धूप -छाँव की तरह आते जाते रहते हैं l जब दुःख जीवन में आता है तब मनुष्य उसे अपना दुर्भाग्य समझता है l यही व्यक्ति की सबसे बड़ी भूल है l प्रत्येक दुःख का कारण दुर्भाग्य या प्रारब्ध नहीं होता l अनेकों बार जागरूकता की कमी की वजह से हमें दुःख के बोझ को उठाना पड़ता है l यह संसार ऐसा ही है , लोग हमारी सरलता और अज्ञानता के कारण ही फायदा उठाते हैं l युग के साथ लोगों की सोच भी बदल जाती है l त्रेतायुग में यह सबके सामने था कि मंत्र ने महारानी कैकेयी के कान भरे और भगवान श्रीराम को राजतिलक के स्थान पर वनवास हुआ l द्वापर युग में भी कौरवों का पांडवों के प्रति ईर्ष्या -द्वेष संसार के सामने स्पष्ट था , महाभारत हुआ l लेकिन कलियुग की स्थिति बहुत विकट है l अब मनोविकार तो अपने चरम पर हैं , लेकिन अब व्यक्ति दोगला है l वह समाज के सामने स्वयं को बहुत सभ्य , संस्कारी और परिवार के प्रति बहुत जिम्मेदार स्वयं को दिखाना चाहता है , लेकिन वह अपनी मानसिक विकृतियों से विवश है l धन -संपत्ति का लालच , कामना , वासना के वशीभूत वह अपने ही रिश्ते -नातों पर पीठ पीछे प्रहार करता है l धन संपत्ति के विवाद तो प्रत्यक्ष भी है जिनसे सारी अदालतें भरी हैं लेकिन जिनकी मानसिकता निकृष्ट है वे तंत्र -मन्त्र , ब्लैक मैजिक , भूत , पिशाच आदि अनेक नकारात्मक शक्तियों की मदद लेकर अपनों पर ही प्रहार करते हैं l ये सब नकारात्मक कार्य अपने ही करते हैं , गैरों की मदद लेकर l और जो इन सबको भुगतता है , वह जागरूक न होने के कारण इसे अपना दुर्भाग्य कहता है और ऐसे ' अपनों ' के साथ बातचीत , स्वागत , सत्कार , रिश्ता निभाने में उलझा रहता है और फायदा उठाने वाले अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं l लोग कहते हैं ईश्वर ऐसे दोगले लोगों को सजा क्यों नहीं दे रहे ? तो ईश्वर क्या करे ? जब व्यक्ति जागरूक नहीं है , अपने को सताने वालों के साथ चाय -नाश्ता कर रहा है , हँस -बोल रहा है , उनके स्वागत -सम्मान में अपनी ऊर्जा कर रहा खर्च कर रहा है l ईश्वर के पास सन्देश तो यही गया कि आप उसके द्वारा स्वयं को सताए जाने पर भी खुश हैं l जब व्यक्ति अपनी आँखें खुली रखेगा , जागरूक रहेगा तभी वह नाजायज शोषण व अत्याचार से बच सकेगा l
WISDOM ------
लघु कथा ------ एक महात्मा के पास तीन मित्र गुरु -दीक्षा लेने गए l तीनों ने बड़े भक्तिभाव से प्रणाम कर के अपनी जिज्ञासा प्रकट की l महात्मा ने उनको शिष्य बनाने से पूर्व पात्रता की परीक्षा कर लेने के उदेश्य से पूछा ---- " बताओ कान और आँख में कितना अंतर है ? ' एक ने उत्तर दिया ---- ' केवल पांच अंगुल का भगवन l ' महात्मा ने उसे एक ओर खड़ा कर के दूसरे से उत्तर के लिए कहा l दूसरे ने उत्तर दिया --- " महाराज ! आँख देखती है और कान सुनते हैं , इसलिए किसी बात की प्रमाणिकता के विषय में आँख का महत्त्व अधिक है l " महात्मा ने उसको भी एक ओर खड़ा कर के तीसरे से उत्तर देने के लिए कहा l तीसरे ने कहा --- ' भगवान् ! कान का महत्त्व आँख से अधिक है l आँख केवल लौकिक एवं द्रश्यमान जगत को ही देख पाती है , किन्तु कान को परलौकिक एवं पारमार्थिक विषय का पान करने का सौभाग्य प्राप्त है l " महात्मा ने तीसरे को अपने पास रोक लिया l पहले दोनों को कर्म एवं उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिए , विदा कर दिया l