इस संसार में धरती का कोई ऐसा कोना नहीं जहाँ जाति , धर्म , अमीर -गरीब , ऊँच -नीच , रंग -रूप आदि को लेकर भेदभाव न हो l केवल मृत्यु ही ऐसी है जो किसी से कोई भेदभाव नहीं करती , यमराज के सामने सब एक समान हैं l ईश्वर ने सब को गिनती की साँसे दी हैं , जिस पल वह पूरी हो गईं , फिर उसका धरती पर खेल खतम l l कहते हैं जब मनुष्य का जन्म होता है तब विधाता आते हैं , उसका भाग्य लिख देते हैं जिसमें यह भी लिखा होता है कि उसकी मृत्यु कब और कैसे होगी l एक कथा है ----- राजा विक्रमादित्य रात्रि को वेश बदल कर राज्य का भ्रमण करते थे l भ्रमण करते हुए वे बहुत दूर निकल गए l वहां उन्हें एक झोपड़ी से कुछ आवाज आ रही थी , उन्होंने वहीँ रुकने का निश्चय किया और उसका दरवाजा खटखटाया l किसान बाहर निकला , राजा ने कहा --मैं आज रात यहाँ विश्राम करना चाहता हूँ , सुबह चला जाऊँगा l किसान ने कहा ---मेरी झोपड़ी बहुत छोटी है और पत्नी को प्रसव पीड़ा हो रही है अत: आप बाहर विश्राम करे l राजा तो वेश बदले हुए थे बाहर विश्राम करने लगे l कुछ समय बाद शिशु के रोने की आवाज आई , किसान ने बताया कि पुत्र हुआ है l उस समय राजा विक्रमादित्य ने किसी को झोपड़ी में प्रवेश करते देखा , उन्होंने तुरंत उसे रोक लिया और कहा --कौन हो तुम ? इतनी रात्रि में यहाँ क्यों जा रहे है ? उसने कहा ---मैं विधाता हूँ , इस शिशु का भाग्य लिखने जा रहा हूँ l थोड़ी देर बाद जब विधाता लौटे तो राजा विक्रमादित्य ने तलवार निकलकर उनका रास्ता रोक लिया और कहा कि बताओ , तुमने उस बच्चे के भाग्य में क्या लिखा ? विधाता ने कहा --यह बताया नहीं जाता , तुम मुझे जाने दो l विक्रमादित्य बहुत वीर थे , वे टस से मस न हुए , उन्होंने विधाता से कहा --केवल इतना बता दो कि इसकी मृत्यु कैसे होगी l तब विधाता को बताना पड़ा कि अमुक तिथि को इसको शेर खा जायेगा l प्रात:काल होने पर राजा ने किसान को अपना परिचय दिया और कहा कि इस बच्चे को अब राजसी सुरक्षा में रखा जायेगा l राजा ने उसकी सुरक्षा के लिए बहुत मजबूत एक हॉल बनवा दिया , इतना मजबूत कि एक परिंदा तो क्या एक चींटी भी उसमे प्रवेश नहीं कर सकती थी l हजारों नौकर , सिपाही उसकी सुरक्षा में लगे थे l राजा को विधाता के लेख को मिटाना था l सुरक्षा के साथ उस बच्चे की शिक्षा व मनोरंजन के लिए सब व्यवस्था थी , दीवार पर विभिन्न जानवरों की तस्वीरें भी थीं l आखिर उसकी मृत्यु की घड़ी आ गई , अन्दर बाहर सब जगह उसकी सुरक्षा के लिए सैनिक तैयार थे , सब अपने हथियार लेकर देखते ही रह गए , दीवार पर शेर की भी तस्वीर थी , उसमें से शेर प्रगट हो गया और बच्चे को खा गया l तब राजा को समझ में आया कि कोई कितना भी वीर क्यों न हो , सुरक्षा के कितने ही साधन हों , मृत्यु को , विधाता के लेख को टाला नहीं जा सकता l
Omkar....
1 August 2026
30 July 2026
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ' महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग ' में लिखते हैं ----- " वास्तव में अधिकार पद बड़ा विडम्बनापूर्ण होता है l जब तक वह सक्षम और समर्थ है , लोग उसकी झूठी चाटुकारी किया करते हैं और जब वह असहाय और विवश होता है तो तुरंत आँखे ही नहीं फेर लेते बल्कि न उठने देने के लिए दो धक्के और दे देते हैं l " --- विश्व विजय की कामना लिए हुए जब सिकंदर फारस देश पर आक्रमण करने जा रहा था l सहसा एक स्थान पर उसकी तबियत ख़राब होने लगी , तुरंत तम्बू लगा दिया गया l सिकंदर पेट और ह्रदय-स्थल की पीड़ा से छटपटाने लगा l सिकंदर के साथ यूनान के कई सुयोग्य हकीम आए हुए थे , उन्होंने सिकंदर के शरीर और नाड़ी की परीक्षा की और वे हताश हो गए l उन्हें विश्वास हो गया कि सिकंदर चन्द मिनटों का मेहमान है l सिकंदर असहाय सा हकीमों और सरदारों की ओर सहायता के लिए देख रहा था l इधर सरदार सहायता से यह सोचकर मुँह छिपा रहे थे कि शायद इसकी मृत्यु के बाद यह अधिकार हमें मिल जाए और हकीम सोच रहे थे कि यदि मेरी दवा लेने के बाद मर गया तो लोग यह संदेह करेंगे कि इसे मैंने जानबूझ कर मार डाला , तब बेकार में जान आफत में फंसेगी l उन सब का स्वामी सिकंदर मर रहा था और उसकी मृत्यु की घड़ी देखकर सब अपने -अपने हित की सोच रहे थे l l आचार्य श्री आगे लिखते हैं ---- " जब तक शक्तिमंतों की भुजा में बल , वाणी में प्रभाव और विस्तार पर नियंत्रण रहता है , सभी उसे नमन करते हैं , उसके अत्याचार को वीरता , अनीति को चातुर्य और शोषण को आवश्यकता मानते हैं किन्तु ज्यों ही उसकी ये विशेषताएं समय पाकर क्षीण हो जाती हैं त्यों ही लोगों के मन और द्रष्टिकोण बदल जाते हैं l लोग निर्णायक की तरह उसके जीवन तथा कृत्यों का लेखा -जोखा करने लगते हैं , उसके गुण नीचे पड़ जाते हैं और सारे दोष उभर आते हैं l " आचार्य श्री लिखते हैं ---"सिकंदर का जीवन इस सत्य को सिद्ध करता है , सिखाता है कि बड़े आदमी बनने की अपेक्षा महान कार्य करने की कामना हजार गुनी श्रेष्ठ है l "
29 July 2026
WISDOM -----
कहते हैं जो भी महाभारत में है , वही इस धरती पर है l सब कुछ वैसा ही है , यह हमारा विवेक है कि हम क्या सीखते हैं l कौरवों के कुलगुरु थे --- कृपाचार्य l दुर्योधन ने जीवन भर जितने षडयंत्र किए , छल -कपट किया , कुलगुरु होने के नाते वे दुर्योधन को ऐसा करने से रोक सकते थे , धृतराष्ट्र को भी समझा सकते थे कि ऐसा अन्याय न करें , इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उन्हें राजसी सुख भोग की आदत हो गई थी और दुर्योधन के विरोध का मतलब था उन राजसी सुखों से वंचित हो जाना l ऐसे ही संत -महात्मा आज के समय में भी हैं , उन्हें अपनी दुकान की चिंता है , वे सब शक्ति और धन -वैभव संपन्न लोगों को खुश करने में लगे रहते हैं l इस युग में जिनके पास पद -प्रतिष्ठा है , धन संपन्न हैं वे भी सोचते हैं की जितनी चाहे मनमानी कर लो , पापकर्म कर लो फिर बड़े -बड़े संत -साधकों से पूजा - पाठ करा लेंगे जिससे सारे पाप धुल जाएंगे l मन्त्र की और विधि -विधान से पूजा -पाठ की ऐसी शक्ति भी है कि ऐसा होता भी है और ऐसे लोगों के सुख - वैभव में कहीं कोई कमी नहीं आती l लेकिन जो साधक - संत उनके लिए इतनी तपस्या करते हैं , इसके लिए उन्हें पर्याप्त धन -राशि , मान -सम्मान तो मिल जाता है लेकिन कहते हैं इसमें उनके पुण्यों का एक बड़ा हिस्सा भी चला जाता है l अब वे विभिन्न नेक कर्मों से इसकी क्षतिपूर्ति कर लें तो ठीक है अन्यथा उन संत -साधकों का पतन शुरू हो जाता है l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- अत्याचारी , अन्यायी और मर्यादाहीन आचरण करने वालों का कभी भी साथ न दें , ऐसे लोग स्वयं तो डूबेंगे और जो भी उनके साथ है , उन सब को ले डूबेंगे l महात्मा विदुर ने दुर्योधन के गलत कार्यों का कभी समर्थन नहीं किया राजमहल के सुख छोड़कर बहुत साधारण जीवन जिया l विदुर जी की सत्य -निष्ठा और सादगी की ऐसी ताकत थी कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के स्वादिष्ट पकवान त्याग दिए और विदुर जी के घर जाकर साग -रोटी खा कर ही तृप्त हो गए l
27 July 2026
WISDOM ------
यदि जीवन में कुछ भी खोने का भय न हो और मृत्यु का भी भय न हो तो व्यक्ति निर्भय हो जाता है l वर्तमान युग का जो युवा वर्ग है , वह ऐसा ही निर्भय है l सामान्य वर्ग में हम देखें तो पुत्र के युवा होने पर , उसकी शिक्षा पर पर्याप्त धन खर्च करने के बाद माता -पिता उसकी ओर बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से देखने लगते हैं कि बेटा ! अब कुछ कमाने लगो , अपनी जिम्मेदारी समझो l इस उम्मीद में कई वर्ष बीत जाते हैं फिर भी नौकरी नहीं , कोई निश्चित आय का साधन नहीं तब उस युवक की स्थिति बहुत दयनीय हो जाती है , अड़ोसी -पडोसी , रिश्तेदार और माता -पिता भी ताने देने लगते हैं कि कुछ कमाता नहीं है , बैठा रहता है l अब वह युवक क्या करे ? बहुत मेहनत कर रहा है लेकिन सब व्यर्थ है l बिना कमाई के विवाह भी संभव नहीं है और यदि विवाह हो गया है तो बिना कमाई के परिवार में कोई इज्जत नहीं है l परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत साधारण है तब रोजगार के बिना युवा का जीवन बहुत कठिन है l ऐसे में कुछ निराश होकर आत्महत्या कर लेते हैं , कुछ पलायन कर साधु बन जाते हैं l कोई बहकाने वाला मिल जाये तो उनके कदम अपराध की ओर बढ़ जाते हैं लेकिन जो जागरूक हैं और आशावादी हैं , उन्हें यदि तिनके का भी सहारा मिल जाए तो वे अपने नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूक होकर ' करो या मरो ' पर उतारू हो हो जाते हैं l उनके जोश को देखकर जो युवा निराश हो चुके हैं , उनमे भी ऊर्जा का संचार हो जाता है l संसार के कई देशों में युवाओं के जोश को देखकर ऐसा लगता है जैसे कार्ल मार्क्स की आत्मा ऊर्जा बनकर इन सबके भीतर समां गई है , उन्होंने कहा था --- संसार के मजदूरों एक हो जाओ , तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है ------------' आज का युवा बहुत बुद्धिमान है और संचार के आधुनिक साधनों ने उनकी ऊर्जा को और अधिक शक्तिशाली बना दिया है l अब यह ऊर्जा क्या गजब करेगी यह तो आने वाला समय बताएगा l
26 July 2026
WISDOM ------
महाभारत के विभिन्न प्रसंग हमें शिक्षा देते हैं , सिखाते हैं कि कैसे हमें होश में रहकर जीवन जीना चाहिए l छोटी सी चूक से बहुत बड़ा नुकसान हो जाता है l --महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था l दुर्योधन ने 18 दिन चले इस युद्ध में अश्वत्थामा को सेनापति नहीं बनाया था , संभवतः यह ईश्वर का ही कोई विधान होगा l अब दुर्योधन युद्ध भूमि में घायल पड़ा था l दुर्योधन के मरणासन्न होते ही युद्ध तो समाप्त हो गया था लेकिन उसकी सेना के अश्वत्थामा और कृपाचार्य तो जीवित थे l इधर पांडव विजय का जश्न मनाकर शिविर में निश्चिन्त होकर सो रहे थे l वे भगवान श्रीकृष्ण की शरण में थे इसलिए निश्चिन्त थे l उस समय श्रीकृष्ण ने शिविर में प्रवेश किया और पांचों पांडवों को अपने साथ शिविर से बाहर नदी किनारे चलने को कहा l पांडव आज्ञाकारी थे इसलिए बिना किसी तर्क के वे श्रीकृष्ण के साथ बाहर निकल गए l पांडवों के पाँचों पुत्र वहीँ सो रहे थे , उन्होंने चलने से मना कर दिया l युद्ध भूमि में दुर्योधन की पराजय देखकर अश्वत्थामा क्रोध के कारण अपना विवेक खो बैठा और अर्धरात्रि में उसने पांडवों के शिविर में प्रवेश कर बहुत उत्पात मचाया , कुछ का क़त्ल किया और पांडवों के पांच पुत्र सो रहे थे , उन्हें अँधेरे में पांच पांडव समझ कर उसने उनके सिर काट दिए l अपना विवेक खो देने के कारण उसके भीतर की आसुरी प्रवृत्ति जाग गई थी , उसने पांडवों के वंश का अंत करने के लिए उसने अभिमन्यु की पत्नी उत्तर के गर्भ को लक्ष्य कर ब्रह्मास्त्र चला दिया था ताकि गर्भ में स्थित पुत्र का अंत हो जाये l अश्वत्थामा के इन सब कृत्यों का क्या परिणाम हुआ , इसकी एक पूरी कथा है लेकिन यह प्रसंग हमें शिक्षा देता है कि --- शत्रु को कभी भी कमजोर मत समझो , घायल शत्रु और भी खतरनाक होता है और वह कैसी भी रणनीति बनाकर फिर से आक्रमण कर सकता है l युद्ध में कौरव वंश , उनकी विशाल सेना सभी का अंत हो गया था लेकिन पांडव यह भूल गए कि अभी अश्वत्थामा और कृपाचार्य जीवित हैं l पांडवों की इस भूल ने उन्हें ऐसा दुःख दिया जिसकी भरपाई अब संभव नहीं थी l इसलिए शत्रु से हमेशा सतर्क और सावधान रहना चाहिए l
24 July 2026
WISDOM -----
इस धरती पर जब भी अत्याचार , अन्याय की अति हुई है , ईश्वर ने किसी न किसी रूप में यहाँ अवतार लिया है l संसार के सभी धर्मों में अनेक महान आत्माओं ने जन्म लिया और पूरा प्रयास किया कि असुरता का अंत हो और धरती पर सुख-शांति हो , मनुष्य देवत्व की ओर आगे बढ़ने का प्रयास करे , मनुष्यता से नीचे न गिरे l इन विभिन्न प्रयासों के बावजूद असुरता का अंत नहीं हुआ l अब कहते हैं भगवान कलिक का अवतार होगा l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा है --- अब भगवान का अंशावतार होगा , ईश्वर लोगों की चेतना में प्रवेश करेंगे l उनका कहना है कि असुरों को मारने से असुरता समाप्त नहीं होगी , उनके विचारों में परिवर्तन जरुरी है l ' असुर कहीं आकाश से यहाँ नहीं आए , वे सब परिवार से ही हैं , धन -सम्पन्नता , शक्ति प्राप्त कर वे अहंकारी हो गए , अत्याचारी हो गए और अपनों को ही सताने लगे l अब साम्राज्यवाद नहीं है , कोई बाहर से आकर हम पर अत्याचार नहीं कर रहा l आज अपने ही अपनों को सता रहे हैं l यह अलग बात है कि मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण चाहे परिवार हो या राष्ट्र हो , अपनों को सताने के लिए गैरों से भी सांठ -गाँठ कर लेता है , मनुष्यता के स्तर से नीचे गिर जाता है l ईश्वर विभिन्न घटनाओं के माध्यम से मनुष्य के अहंकार को मिटाने का और उसकी सोई हुई चेतना को जगाने का प्रयास करते हैं l
21 July 2026
WISDOM ----
देवता और असुर तो प्रत्येक युग में रहे हैं लेकिन कलियुग में एक विशेष बात यह है कि असुर समाज में घुल-मिलकर रहते हैं , उन्हें अलग से पहचानना कठिन है l व्यक्ति के काम करने के तरीके , बोलचाल और उसके स्वभाव से ही समझा जा सकता है कि वे किस श्रेणी के असुर हैं l ऐसे व्यक्तियों में करुणा , संवेदना , दया , प्रेम जैसी कोई भावना नहीं होती , ये बहुत निर्दयी होते हैं l उनका यह निर्दयता का व्यवहार उन सभी के साथ होता है जिसने उनके अहंकार को चोट पहुंचाई है , उनकी निरंकुशता में रहने से इनकार कर दिया l रिश्ते -नातों से भी वे ऐसा कठोरता का व्यवहार करने से नहीं चूकते l हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को सताने में कोई कोर -कसर नहीं छोड़ी असुरों के पास धन -वैभव और इसके बल पर प्राप्त शक्ति की कोई कमी नहीं होती है l कलियुग में यह असुरता इतनी दुखदायी इसलिए हो जाती है क्योंकि सामान्य जन अपने हितों को पूरा करने के लिए इस असुरो के अहंकार को पोषित करते हैं , उनकी चापलूसी कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और उनकी कमजोरियों का पता लगाकर उन की कमजोर नस भी दबाकर रखते हैं इसलिए असुरता एक श्रंखलाबद्ध तरीके से बढ़ती जाती है l इसका अंत कौन करे ? यह बहुत बड़ी समस्या है l