लालच और स्वार्थ ये ऐसे दुर्गुण हैं जिनकी प्रत्येक युग में निंदा की गई है l यदि ये दुर्गुण किसी साधारण व्यक्ति में होते हैं तो इससे उसकी स्वयं की और उसके परिवार एवं कुछ निकट के लोगों की ही हानि होती है लेकिन यदि ये दुर्गुण समाज को दिशा देने वाले किसी व्यक्ति हों , ऐसे व्यक्ति जो समाज के एक बहुत बड़े भाग को प्रभावित करते हैं तो ऐसे दुर्गुणों से सम्पूर्ण समाज की इतनी बड़ी हानि होती है जिसका आंकलन करना कठिन है l जैसे गुरु द्रोणाचार्य को शस्त्र और शास्त्र दोनों का ज्ञान था l वे प्रारम्भ में बहुत निर्धन थे लेकिन कौरव और पांडवों को शिक्षा देने के दौरान उन्हें राजसत्ता के निकट रहने का सुख मिला , राजमहल के सब सुख उन्हें मिले l इस सुख -वैभव में वे इतने बंध गए कि कौरवों और पांडवों की शिक्षा के बाद भी वे राजमहल से जा न सके l दुर्योधन युवराज था , सारा जीवन द्रोणाचार्य ने दुर्योधन का नमक खाया इसलिए यह जानते हुए भी कि दुर्योधन अनीति और अधर्म की राह पर है , वे उसका विरोध न कर सके , उसकी प्रत्येक अनीति पर वे मौन रहे अर्थात मौन रहकर दुर्योधन की अनीति , छल -कपट षडयंत्र का समर्थन किया l इतने महान , नीति और धर्म के ज्ञाता , शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता का समर्थन जब उसे मिला तब उसके अहंकार को और अधिक बल मिला , उसने पांडवों को सुई की नोक बराबर भूमि देने से मना कर दिया , इसका परिणाम महाभारत तो होना ही था l गुरु द्रोणाचार्य का सम्पूर्ण जीवन और उनका अंत आज के धर्म गुरुओं के लिए एक चेतावनी है कि जीवन की आवश्यकताओं के लिए धन जरुरी है लेकिन सुख -वैभव से बंध जाना गलत है l इस संसार में एक नहीं अनेक दुर्योधन और दु:शासन हैं जो अपने स्वार्थ के लिए उनका इस्तेमाल करते हैं l
Omkar....
3 September 2026
1 September 2026
WISDOM
कहते हैं जो कुछ महाभारत में है , वही इस धरती पर है और बहुत कुछ ऐसा भी है जिसके धरती पर होने के संकेत हैं l महाभारत के युद्ध के लिए कहा जाता है --' न भूतो , न भविष्यति ' l स्वयं भीष्म पितामह ने कहा था कि इस युद्ध के कारण यह धरती शूरवीरों से रहित हो जाएगी l-------------------- महाभारत के युद्ध में भीष्म जैसे महा योद्धा को पराजित करना किसी भी योद्धा के लिए संभव नहीं था लेकिन ईश्वर ने सब की मृत्यु का विधान रचा है l पांडवों के प्रार्थना करने पर उन्होंने स्वयं युधिष्ठिर को बताया कि अर्जुन के रथ पर यदि कोई स्त्री बैठी होगी तो वे वीरोचित प्रतिष्ठा के कारण अपना धनुष रख देंगे , और तब उन्हें पराजित करना संभव होगा l अर्जुन ने शिखंडी को अपने रथ में आगे बैठाया , तब भीष्म पितामह ने कोई बाण नहीं चलाया और अर्जुन के बाणों से घायल होकर धरती पर गिर पड़े l यह शिखंडी कौन थी ? इसी प्रश्न के उत्तर में इस युग के लिए कोई संकेत स्पष्ट होता है l शिखंडी , ' शिखंडी ' कैसे बन गई इसकी एक कथा है ---संक्षेप में काशिराज की तीन अति सुन्दर कन्याएं थी l भीष्म पितामह ने अपने भाई विचित्रवीर्य के विवाह के लिए स्वयंवर मंडप से उन तीनो का हरण कर लिया l उनमें से दो का विवाह तो विचित्रवीर्य के साथ हो गया लेकिन तीसरी कन्या जिसका नाम अम्बा था वह राजा शाल्व को अपना पति मान चुकी थी इसलिए पितामह ने उसे राजा शाल्व के पास भेज दिया l लेकिन अब राजा शाल्व ने दूसरे की जीती हुई कन्या से विवाह करने को मना कर दिया l बेचारी अम्बा छ वर्ष तक राजा शाल्व और हस्तिनापुर के बीच ठोकरें खाती रही , रो -रोकर उसके आँसू सूख गए राजा शाल्व और विचित्रवीर्य , किसी ने भी उससे विवाह नहीं किया l अब वह भीष्म पितामह को अपने दुःख का कारण मान कर उनसे बदला लेने के लिए अनेक राजाओं के पास मदद के लिए गई लेकिन भीष्म जैसे वीर और महान योद्धा से टक्कर लेने की हिम्मत किसी में न थी l सब तरफ से निराश होकर उसने भगवान शिव की तपस्या की l प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे वरदान दिया कि इस जन्म में तो नहीं , अगले जन्म में तुम्हारे हाथों भीष्म की मृत्यु होगी l अम्बा में अब इतना धैर्य नहीं था कि वह मृत्यु का इंतजार करे , उसने धधकती हुई आग में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी और अगले जन्म में उसने महाराज द्रुपद के यहाँ कन्या रूप में जन्म लिया , उसे पिछले जन्म की सब बातें याद थीं l उसने वन में पुन : कठोर तपस्या की और अपने तपोबल से वह पुरुष बन गई और उसने अपना नाम शिखंडी रख लिया l भीष्म पितामह इस सत्य को जानते थे इसलिए उन्होंने शिखंडी को देखकर अपने सब अस्त्र -शस्त्र नीचे रख दिए l भीष्म पितामह के गिरते ही यह निश्चित हो गया कि दुर्योधन के अत्याचार और अन्याय का अंत निकट है l ----इस प्रसंग से इस युग के लिए यही संकेत मिलता है कि अत्याचार , अन्याय के अंत के लिए शिखंडी को ही आगे आना पड़ेगा l पुरुष वर्ग अपने विकारों से ग्रस्त है, उनमें सुधार संभव नहीं दीखता l महिलाओं को स्वतंत्रता मिली , लेकिन महिलाओं के एक बड़े भाग ने अपनी स्वतंत्रता का सदुपयोग नहीं किया , अपने कर्तव्यों से विमुख हो गईं l स्वतंत्रता में स्वछंदता का जो थोड़ा भी अंश आ गया तो नवयुग के निर्माण में उसका योगदान कैसे संभव होगा ? महाभारत सत्य है तो एक नए नए युग के निर्माण में शिखंडियों की भूमिका सराही जाएगी l
31 August 2026
WISDOM -------
इस परिवर्तनशील संसार में एक ही अटल सत्य है और वह है -' मृत्यु ' l जो भी इस धरती पर आया है उसे एक दिन जाना ही है और यह कब और कैसे जाना है , यह सब पहले से ही निश्चित है l किसी प्राणी की मृत्यु जहाँ भी होनी है वह स्वयं ही उस स्थान पर पहुँच जाता है ---' तुलसी जसी तस भव्यता तैसी मिले सहाय , आप न आवे ताहि पे , ताहि तहां ले जाए l " आचार्य श्री कहते हैं ---- जीवन को ऐसे जिओ कि मृत्यु भी एक उत्सव बन जाए l मृत्यु के बाद क्या होगा , कोई नहीं जानता लेकिन हमारे महाकाव्यों के अध्ययन से एक बात समझ में आती है कि यदि मृत्यु के समय ईश्वर हमारे सामने हों या ईश्वर का नाम हमारी जुबां पर हो तो मुक्ति मिल जाती है जैसे रावण को राम ने ही मारा , ईश्वर उसके सामने थे , वह सीधा भगवान के धाम ही गया l महाभारत का युद्ध हुआ l दुर्योधन आदि कौरवों ने कितने छल -कपट , षडयंत्र किए लेकिन युद्ध भूमि में उस समय स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उपस्थित थे , सभी को अपने अंतिम समय में उनके दर्शन हुए इसलिए वे सब स्वर्ग के अधिकारी हुए लेकिन इस कलियुग में ईश्वर के दर्शन संभव नहीं हैं इसलिए ऋषियों ने कहा है कि हर पल ईश्वर का नाम -स्मरण करो l अंतिम समय में भी ईश्वर का नाम मन में गूंजेगा तो मृत्यु का कष्ट भी कम होगा और मुक्ति भी मिलेगी l ऋषि कहते हैं ---' भज ले हरि नाम अरे रसना , फिर अंत समय में हिली न हिली l ' अंत समय में तो जीवन में किए गए सारे भले -बुरे कर्म आँखों के सामने एक फिल्म की तरह चलते हैं इसलिए ईश्वर के 'नाम -स्मरण ' की प्रैक्टिस शुरू से ही करनी चाहिए जैसे महात्मा गाँधी ने जीवन भर राम का नाम लिया तो अंत समय में भी उन्होंने ' हे राम ! ' कहा और हाथ जोड़कर मृत्यु को स्वीकार किया l
28 August 2026
WISDOM -----
विधाता ने स्रष्टि की रचना की l पशु -पक्षी , पौधे -वनस्पति और अंत में मनुष्य की रचना की l विधाता ने केवल मनुष्यों में ही ऐसी विशेषता दी , बुद्धि दी कि वे सन्मार्ग पर चलकर , सत्कर्म कर के अपनी चेतना के उच्च से उच्चतम स्तर तक पहुँच सकते हैं l लेकिन विधाता ने इस मार्ग को इतना आसान नहीं बनाया l इस मार्ग में अनेक बाधाएं उपस्थित कर दीं l ये बाधाएं कोई बाहरी नहीं हैं , ये मनुष्य के भीतर छुपे विकार हैं l जब भी कोई व्यक्ति सन्मार्ग पर चलता है , अपने इष्ट को प्रसन्न करने के लिए मंत्र जप करता है , सत्कर्म कर के अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाना चाहता है , या कहें कि श्रेष्ठता के पथ पर चलकर ईश्वर का अनुभव करना चाहता है तो उसके भीतर के विकार --काम , क्रोध , लोभ ,मोह , अहंकार , स्वार्थ उसके सामने मजबूती से खड़े हो जाते हैं l व्यक्ति में जो कमजोरी सबसे ज्यादा है , उसी का आक्रमण तीव्र गति से होता है जैसे किसी में लोभ लालच है और वह मन्त्र जप आदि श्रेष्ठ कार्यों से अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना चाहता है , तब उसके सामने ऐसे अधिकाधिक धन कमाने के प्रस्ताव आ जाएंगे , जिसका परिणाम वह जानता होगा कि गलत होगा लेकिन लालच ऐसा सिर पर चढ़ जायेगा कि वह भटक जायेगा l इसी तरह जिसमें काम वासना अधिक है , उसे लुभाने के , भटकाने के अनेकों वार उस पर होंगे l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं --- यह आग का दरिया है , गुरु कृपा से ही इस दरिया से पार पाना संभव है और जो इस दरिया को पार कर लेता है वह कुंदन की भांति चमकने लगता है l ' विकारों के यह आक्रमण एक बार नहीं होते , बार -बार ईश्वर परीक्षा लेते है l अध्यात्म -पथ की राह बहुत कठिन है l मनुष्य अपने ही मन का गुलाम है , अपने ही विकार , मानसिक विकृतियों की वजह से वह इस शरीर रूपी मंदिर से अनेक पापकर्म करता है l जन्म -जन्मांतर के पापकर्म इकट्ठे होते जाते हैं l अनेक पाप कर्म सामूहिक होते हैं , सोच -समझ कर योजना बना कर पाप , अपराध युगों से इस धरती पर हो रहे हैं l मनुष्य पशु और पिशाच तुल्य पापकर्म करता है l जब धरती पर इन पापों का बोझ बहुत बढ़ जाता है , तब प्रकृति का दंड विधान शुरू हो जाता है , ईश्वर का न्याय होता है l व्यक्तिगत स्तर पर भी लोगों को उनके पाप का दंड मिलता है और सामूहिक दंड विधान के अंतर्गत बाढ़ , भूकंप , सुनामी , युद्ध आदि तबाही के अनेक रूपों में प्रकृति का क्रोध , उसका विकराल रूप हमें देखने को मिलता है l मनुष्य ने ईश्वरीय विधान के अनुरूप अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाने का कोई प्रयास नहीं किया l पशु और पशु स्तर से भी नीचे गिरकर पिशाचों की भांति कुकृत्य किए हैं , इन्ही सब का परिणाम हुआ कि अनेक सभ्यताओं का अंत हो गया , उनका नामोनिशान मिट गया , राजे -महाराजे , महान कुल -वंश न जाने कहाँ काल के गर्त में समा गए l प्रकृति हमें बार -बार चेतावनी देती है l स्वयं को बनाना और मिटाना मनुष्य के ही हाथ में है l ' जिओ और जीने दो ' l विकारों का अंत तो संभव नहीं है लेकिन उनको मर्यादित कर के मानव जाति और इस सभ्यता की रक्षा संभव है l
22 August 2026
WISDOM -----
हमारे महाकाव्य हमें बहुत कुछ सिखाते हैं l महाभारत की कथा महर्षि व्यास की ओजपूर्ण वाणी से प्रवाहित हुई और गणेश जी की अथक लेखनी ने उसे लिपिबद्ध किया l महाभारत के विभिन्न प्रसंग इस युग में , इस धरती पर वैसे ही हैं जैसे उस युग में थे l छल , कपट , षड्यंत्र , धोखा , अहंकार ---सब कुछ वैसा ही है , केवल पात्र बदल गए l कुछ घटनाएँ ऐसी हैं , उनमे छिपे हुए संकेतों को समझा जा सकता है जैसे ----गुरु द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की l उस काल के सब गणमान्य , विचारवान , नीति , अनीति को समझने वाले , महानुभाव सब इस में सम्मिलित थे l कुटिलता से उन्होंने अर्जुन को संशप्तकों के साथ युद्ध में उलझा दिया l अब इस पक्ष में केवल अभिमन्यु ही था , जिसे चक्रव्यूह का ज्ञान था , यह उसने अपनी माँ के गर्भ में था तभी सीख लिया था l यह कैसा युद्ध था , एक ओर 17 -18 वर्ष का युवा अभिमन्यु अकेला था और दूसरी ओर उससे आयु में दुगुने -तिगुने , शक्तिशाली सब एक समूह में थे l द्रोणाचार्य , अश्वत्थामा , कर्ण , जयद्रथ , शकुनि आदि सात महारथी अपने -अपने स्वार्थवश दुर्योधन के साथ थे और सब ने मिलकर अभिमन्यु का वध कर दिया l यह स्थिति आज भी है , चाहे परिवार हो , कोई संस्था हो राष्ट्र हो या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति हो , चक्रव्यूह आज भी रचे जा रहे हैं l उम्र के बढ़ने के साथ कामनाएं , वासनाएं बढ़ती ही जा रही हैं , त्याग का तो नाम ही नहीं है l अभिमन्यु का जब वध हुआ तब वह समय भी युग परिवर्तन का था और कलियुग के इस धरती पर आने की आहट थी , इसलिए ऐसा अनर्थ हुआ l आज का समय भी युग परिवर्तन का है लेकिन अब कलियुग का अंत और सतयुग के आरम्भ होने का समय है इसलिए अब कोई अभिमन्यु नहीं मारा जायेगा , अब आसुरी शक्तियों का अंत होगा l बड़े -बड़े चक्रव्यूह रचने वालों के राज बाहर आयेंगे , अब अभिमन्यु विजयी होगा और चक्रव्यूह में सम्मिलित जयद्रथ , द्रोणाचार्य -----आदि सभी का एक -एक कर के अंत होगा l ईश्वरीय विधान कुछ ऐसा है कि वे बड़े से बड़े महापपियों को भी सुधरने का पूरा मौका देते हैं , विभिन्न संकेतों से उन्हें समझाते भी हैं कि अनीति , अत्याचार का साथ मत दो वरना अंत बहुत बुरा होगा l जो इन संकेतों को समझ जाये तो ठीक है अन्यथा यम के दूत तो तैयार हैं l कर्म का फल तो भोगना ही पड़ता है चाहे हँसकर भोगो या रो -रोकर भोगो l
19 August 2026
WISDOM -----
संसार में बहुत लम्बे समय से धर्म पर चर्चाएँ होती रही हैं l कौन सा धर्म सर्वश्रेष्ठ है , किसका वर्चस्व रहेगा यह सब विवाद बहुत सामान्य हो गया है लेकिन सर्वश्रेष्ठता का पैमाना क्या होगा ? संख्यात्मक वृद्धि या गुणात्मक वृद्धि ? किसे आधार माना जाए l पं . श्रीराम शर्मा जी ने अपने प्रवचनों में बहुत सरल ढंग से समझाया है l आचार्य श्री कहते हैं ---"भगवान को समीप बुलाने का एक ही मार्ग है कि हम ' धर्म पथ ' पर अग्रसर रहें और पात्रता विकसित करें l सत्पात्र की दो ही निशानियाँ हैं ---1 .उसका चरित्र पवित्र और पारदर्शी हो l 2 . उसके ह्रदय में करुणा हो , संवेदना हो l जिस व्यक्ति का व्यक्तित्व ऐसा शानदार और मजबूत होगा भगवान उसके पास खिंचे चले आते हैं l " उनके इन वचनों से यही स्पष्ट होता है कि सद्गुणों से युक्त व्यक्ति जिस भी धर्म में अधिक होंगे वही धर्म सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा और वही चिरकाल तक कायम रहेगा l अब समस्या यही है कि कलियुग में पाप , अनीति , अपराध , अत्याचार आदि दुर्गुणों की बाढ़ आ गई है , तो सद्गुण कैसे स्थापित हों ? समाज को दिशा देने वाले ही दिशाभ्रमित हैं , उनके कोरे उपदेशों का कोई असर नहीं होता l आचरण से ही शिक्षा दी जा सकती है लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं जिनके आचरण और व्यवहार में एकरूपता हो l आज की युवा पीढ़ी तो इतनी बुद्धिमान है कि समाज के बड़े -बड़े और जिम्मेदार लोगों का भूत , वर्तमान सब खोज लेती है l बुराई का मार्ग बहुत सरल होता है , पानी नीचे की ओर बड़ी तेजी से गिरता है इसलिए युवा पीढ़ी का भटकना स्वाभाविक है l आज संसार पतन और पराभव की ओर जा रहा है , इस स्थिति को पलटने का और अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाने का एक ही मार्ग आचार्य श्री ने संसार को बताया और वह है ---- ' गायत्री मंत्र ' l यदि संसार में सभी लोग इस मन्त्र को अपनी पूजा का अभिन्न अंग बना लें तो नकारात्मकता दूर होगी l व्यक्ति के जीवन में , वातावरण में सकारात्मकता आएगी l आचार्य श्री कहते हैं --- हम मंत्र का अर्थ जाने या न जाने , यदि हम श्रद्धा और विश्वास से मंत्र जप करते हैं तो मंत्र के देवता अवश्य आते हैं और आशीर्वाद देते हैं l '