असुरता का साम्राज्य प्रत्येक युग में रहा है और यह असुर ईश्वर से वरदान प्राप्त कर इतने शक्तिशाली हो जाते हैं कि फिर अपने साम्राज्य में ईश्वर को ही टिकने नहीं देते l इसका एक अर्थ यह भी है कि जिस भी क्षेत्र में असुरता का साम्राज्य होता है वहां के धार्मिक स्थलों में दैवीय ऊर्जा नहीं होती , वे केवल नाममात्र के होते हैं , ईश्वर उस स्थान को छोड़कर चले जाते हैं l असुर इतने अहंकारी होते हैं कि वे इसे भी स्वयं की ताकत ही कहते हैं कि उन्होंने भगवान को वह स्थान छोड़ने पर मजबूर कर दिया और अब वे वे स्वयं को भगवान कहते हैं , प्रजा को मजबूर करते हैं कि वे भी उन्हें भगवान समझकर पूजें , उनका गुणगान करे l शिवजी से वरदान प्राप्त कर रावण इतना शक्तिशाली हो गया था कि सम्पूर्ण धरती पर उसका आतंक था l अपनी मृत्यु के समय भी वह श्रीराम से कहता है --- मेरे जीते जी आप लंका में प्रवेश न कर सके लेकिन मैं तुम से पहले तुम्हारे धाम जा रहा हूँ l इसी तरह मथुरा के लिए कहा जाता है कि वहां भगवान कृष्ण को भी कारावास में डाल देने वाले लोग राज करते रहे l कंस का तो आतंक इतना था कि भगवान श्रीकृष्ण को जन्म लेते ही अँधेरी रात्रि में , इतनी वर्षा और आंधी -तूफान में मथुरा छोड़कर गोकुल जाना पड़ा l कलियुग का समय तो बहुत विकट है l भगवान श्रीराम को अयोध्या से वनवास मिला , रावण के रहते वे लंका में भी नहीं जा सके , तब उन्हें कम से कम वन में रहने का तो ठिकाना मिला l इसी तरह भगवान श्रीकृष्ण को मथुरा छोडनी पड़ी तो उन्हें कम से कम गोकुल में तो रहने की जगह मिली लेकिन इस कलियुग में असुरता इतनी प्रबल है कि सम्पूर्ण धरती , आकाश , पाताल , वन सब जगह असुरता का साम्राज्य है , भगवान को कहीं भी टिकने की जगह नहीं है जहाँ से वे स्वयं की सेना बनाकर असुरता पर आक्रमण कर उसे पराजित कर सकें l इसलिए अब भगवान ने मनुष्यों की चेतना में प्रवेश करने का निश्चय किया है ताकि प्रत्येक मनुष्य व्यक्तिगत रूप से जाग्रत हो , उसे सही -गलत की समझ हो , भेड़ -चाल न चले l निजी स्वार्थ के लिए असुरता का पोषण न करें l इस युग में असुरता को युद्ध कर के नहीं , अपनी बुद्धि और विवेक से और अपने ह्रदय में विराजमान ईश्वर के विश्वास से ही हराया जा सकता है l
Omkar....
10 July 2026
5 July 2026
WISDOM -----
महाभारत युद्ध समाप्त हुआ और अनेक वर्ष शासन करने के बाद पांडवों ने महाराज परीक्षित को राजगद्दी सौंप दी और वे वन में चले गए l महाराज परीक्षित के शासनकाल में ही कलियुग का धरती पर आगमन हुआ l कलियुग को सम्पूर्ण धरती पर उत्पात मचाते देख महाराज परीक्षित ने उसे आदेश दिया कि वह केवल पांच स्थानों पर ही रह सकता है , इनमे सबसे प्रमुख है --- स्वर्ण अर्थात धन -संपदा l धन -संपदा की अति होने पर वहां कलियुग रहता है जो मनुष्यों की बुद्धि भ्रष्ट कर देता है जिससे अन्य सभी बुराइयाँ वहां खिंची चली आती हैं और फिर वह व्यक्ति हो , परिवार हो , संस्था हो , सरकार हो --उसे पतन के गर्त में धकेल देती हैं l कलियुग में मनुष्यों के विकार , मानसिक विकृतियाँ अपने चरम पर होती हैं इसलिए प्रकृति की एक व्यवस्था समझ में आती है कि दाल में नमक के बराबर आप बेईमानी कर लो , अपनी इच्छाओं को पूरा कर लो और धन का एक भाग लोक कल्याण में लगाओ तो पाप -पुण्य का संतुलन बना रहेगा l आपका भी यश बढ़ता रहेगा और लोगों का भी हित होगा l लेकिन यदि दाल के नाम पर केवल नमक है , उसमे दाल नहीं है तब उसे प्रकृति बर्दाश्त नहीं करती l जैसे कोई एक बड़ी संस्था है उसको अपने उद्देश्य के लिए अपार धन दिया जाता है l अब उसके कार्यकर्त्ता उस धन में से किसी भी तरीके से अपनी भी इच्छाएं पूरी कर लेते हैं और अपने उद्देश्य के अनुसार शेष धन से प्रजा के कल्याण के लिए स्कूल , अस्पताल , धर्मशाला आदि का निर्माण करते हैं , निर्धनों और निम्न वर्ग के लोगों को सिर उठाकर जीने का मौका भी देते हैं , पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिए पेड़ -पौधे लगाना , सामाजिक कुरीतियों को दूर करना आदि कार्य भी करते हैं तो यह मानव धर्म कहलाया , इससे उनका विस्तार होगा और यश भी बढ़ेगा l अब कलियुग तो है ही , हमें अपने जीवन में संतुलन बनाकर चलना होगा l
3 July 2026
WISDOM -------
विधाता ने स्रष्टि की रचना की l अनेक प्राणी पशु -पक्षी - वनस्पति आदि सभी कुछ बना दिया और अंत में अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति ' मनुष्य ' की रचना की l यहाँ व्यवस्था इस तरह की कि जब तक मनुष्य शिशु है वह निर्मल है और ईश्वर का ही रूप है लेकिन जैसे जैसे वह अपनी आयु के अगले चरणों की ओर बढ़ता जायेगा काम , क्रोध ,लोभ , मोह , अहंकार , कामना , वासना , तृष्णा आदि विकार उसे घेर लेंगे और वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ , ईश्वर का राजकुमार तभी सिद्ध कर सकेगा जब वह इन विकारों पर विजय प्राप्त कर लेगा l जो इन विकारों से ग्रस्त है वह असुर कहलायेगा l इन विकारों पर विजय प्राप्त करना , अपने मन के घोड़े की लगाम अपने हाथ में रखना बड़ा कठिन है l मनुष्य को असुर बनना अधिक सरल लगा l इसलिए प्रत्येक युग में असुरों के उत्पात से धरती त्रस्त रही l अत्याचार , अन्याय , प्रजा का शोषण , उत्पीड़न असुरों का प्रमुख कार्य है और इसी तरीके से रावण ने सोने की लंका , अपार धन -वैभव प्राप्त किया l यह स्थिति आज भी है , असुरों के पास अपार धन -संपदा होती है , इस धन के बल पर वे असीमित शक्ति अर्जित कर लेते हैं और युग चाहे कोई सा भी हो वे स्वयं को भगवान समझाते हैं l रावण ने स्वयं को ही ईश्वर समझा , यदि वह श्रीराम को भगवान मानता तो सीताजी का हरण क्यों करता l कहते हैं त्रेतायुग में संभवतः केवल दो ही ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ईश्वर को पहचाना l इसी तरह द्वापर युग में केवल भीष्म पितामह , विदुर ने भगवान श्रीकृष्ण के ईश्वर तत्व को समझा , फिर भी दुर्योधन का साथ दिया l विशाल हिंदुस्तान के लगभग सभी राजा दुर्योधन के ही पक्ष में थे l पांडवों के साथ भगवान श्रीकृष्ण थे लेकिन किसी राजा ने उनका साथ नहीं दिया l यही हाल कलियुग में है l भगवान श्रीराम और श्री कृष्ण को कोई सच्चे ह्रदय से भगवान नहीं मानता , उनके नाम पर लूटते हैं l धर्म चाहे कोई भी हो , सभी में ईश्वर केवल दिखावे के लिए हैं , कुछ क्षण उनकी पूजा कर ली फिर पाप , अत्याचार में मगन हो गए l ईश्वर को ईश्वर मानने वाले , सन्मार्ग पर चलने वाले बहुत कम हैं , लेकिन उन्ही के पुण्यों के बल पर यह धरती टिकी हुई है l कलियुग की समस्या बड़ी विकट है , ईश्वर भी सोचते हैं कि असुरता का अंत करने के लिए धरती पर अवतार लें भी तो एक तो ये अहंकारी मनुष्य उन्हें भगवान नहीं मानता और असुर इतने ज्यादा हैं कि उन सभी को समाप्त कर दें तो यह धरती वीरान हो जाएगी , संसार कैसे चलेगा l इसलिए अब ईश्वर का निर्णय एक अलग रूप में दिखाई देता है ---- अब असुर आपस में ही लड़ -भिड़कर मरेंगे , प्राकृतिक प्रकोपों से नष्ट होंगे , लाइलाज बीमारियाँ होंगी , प्रकृति ही असुरता को कमजोर कर देगी l जो असुर प्रकृति के इन प्रकोपों से बच जाएंगे , तो प्रकृति के नियमानुसार बूढ़े हो जाएंगे , गर्दन हिलने लगेगी , हाथ -पैर ये शरीर कमजोर हो जायेगा लेकिन उनका मन बूढ़ा नहीं होगा , वह तो कुलांचे भरता ही रहेगा l यह स्थिति बड़ी विकट होगी , सुख -वैभव सब है लेकिन उसका उपभोग करने की सामर्थ्य नहीं है l इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में जो भी मनुष्य सन्मार्ग पर है , किसी का अहित नहीं करता उसकी ईश्वर हर पल रक्षा करते हैं ताकि उनके प्रकाश से इस संसार का अँधेरा धीरे -धीरे ही सही दूर तो होगा , एक नई सुबह होगी l
30 June 2026
WISDOM ------
आज संसार में इतनी अशांति , इतनी उथल -पुथल क्यों हैं ? इसका एक ही कारण समझ में आता है कि अब लोग नास्तिक हो गए हैं l l अब मनुष्य ईश्वर से दूर हो गया है , जिसके पास थोड़ी भी शक्ति है , वह स्वयं को ही ईश्वर समझने लगा है l यदि व्यक्ति को ईश्वर की सत्ता में विश्वास हो तो वह ईश्वर से डरे , प्रत्येक कदम फूंक -फूंक कर रखे , कहीं कोई गलती न हो जाए ईश्वर हमें सहस्त्र आँखों से देख रहे हैं , वे हमारे प्रत्येक कर्म को , उसके पीछे छुपे भाव को , हमारे मन की गहराई में जो सच छुपा है उसे भी देख रहे हैं l लेकिन जब स्वयं को ही भगवान समझना है तो फिर डर किस बात का l जब पाप का घड़ा फूटता है , जीवन में कोई भयंकर परेशानी आती है तब भी व्यक्ति सुधरता नहीं है l वह धन खर्च कर के उस फूटे घड़े को जोड़ने का प्रयास करता है और अपने विभिन्न तरीकों से इस बात की जी -तोड़ कोशिश करता है कि घड़े के फूटने से जो पाप बिखर कर दुनिया के सामने आ गए , उन्हें किसी तरह दूसरे पर उड़ेल दे और फिर से भोग -विलास में मगन हो जाये l इसी का नाम संसार है l दुर्योधन के सामने तो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे , उसने उन्हें माना नहीं , उन्हें ग्वाला और मायावी कहता था , वह तो उन्हें ही जंजीरों से बाँधने चला l शिशुपाल ने तो भरी सभा में श्रीकृष्ण को सौ गालियाँ दीं l जब भगवान का सुदर्शन चक्र उसका गला काटने आ गया , तब भागा , बचाओ -बचाओ l तब कोई नहीं बचाता l चाहें कितनी ही बड़ी रियासत के मालिक हो , अपार धन -संपदा हो , अपने कष्ट तो स्वयं ही भोगने पड़ते हैं , उसमें कोई भी साझेदार नहीं होता l जब मनुष्य अनैतिक और मर्यादाहीन आचरण करता है , ईश्वर की सत्ता को चुनौती देता है तब प्रकृति स्वयं न्याय करती है ताकि संसार में संतुलन बना रहे l संसार तो इसी तरह चलता रहता है , मनुष्य व्यक्तिगत स्तर पर ईश्वर की सत्ता की स्वीकार कर अपने जीवन को सार्थक करना चाहे तो उसके लिए ईश्वर हैं और वो हर पल उसके साथ हैं l
28 June 2026
WISDOM -----
भगवान श्रीराम के नाम की इतनी महिमा है कि उसे कुछ शब्दों में नहीं समझाया जा सकता है l ऋषियों ने बड़े विस्तार से 'राम ' नाम की महिमा का गान किया है l कहते हैं यदि श्रद्धा से एक बार ही 'राम 'नाम ले लिया जाए तो भवसागर पार हो जाता है l छोटे बच्चे भी जब अन्ताक्षरी खेलते हैं तो उसकी शुरुआत राम नाम से करते हैं l एक बच्चा शुरू करता है ---' राम नाम की लूट है , लूट सके तो लूट , अंत काल पछताएगा , प्राण जाएंगे छूट l ' उठते , बैठते , चलते -फिरते हम राम -राम करते ही हैं l कहते हैं इस संसार में कुछ भी अकारण नहीं होता , एक पत्ता भी हिलता है तो वह ईश्वर की मरजी से l यदि हमारी सोच सकारात्मक हो तो नकारात्मक घटनाओं के पीछे छुपी सकारात्मकता को आसानी से समझा जा सकता है l कलियुग में राम का नाम लेना बहुत जरुरी है , फिर चाहे वह किसी भी ढंग से , किसी भी उदेश्य से लिया जाये l जब एक व्यक्ति राम नाम लेकर अपना कल्याण कर सकता है तो वर्तमान में उदय हुई परिस्थितियों में लाखों - करोड़ों लोग ' राम ' नाम ले रहे हैं ---राम के गहने , राम के खडाऊं , राम के ---, राम के ---- -- लाखों , करोड़ों लोग किसी न किसी बहाने ' राम ' का नाम ले रहे हैं , इससे सामूहिक कल्याण होगा , प्रकृति का पोषण होगा l l सामूहिक नाम जप की महिमा को ज्ञानी संत विस्तार से समझा सकते है ' कलियुग केवल नाम अधारा ' l कोई भी घटना भौतिक जगत में जैसी दिखाई पड़ती है , आध्यात्मिक जगत में उसके पीछे कोई बड़ा उद्देश्य होता है l
26 June 2026
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' पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- ' भक्ति से जीवन रूपांतरित होता है l ईश्वर को फूल माला , मिष्ठान , धूप -दीप , बहुमूल्य धातुएं ये सब चढ़ाना भक्ति नहीं है l ईश्वर तो सर्व समर्थ हैं , वे इन सब आडम्बर से प्रसन्न नहीं होते l उन्हें तो चाहिए कि मनुष्य अपने विकारों को दूर करे , सद्गुणों को जीवन में अपनाएं और सन्मार्ग पर चले l ' आचार्य जी ने अपने साहित्य में इसे साधना , उपासना और आराधना से विस्तार से समझाया है l ' हमें भक्ति सीखनी है तो भक्त प्रह्लाद जैसे भक्त बने जिन्होंने निरंतर ईश्वर का नाम स्मरण करते हुए ईमानदारी और कुशलता से शासन किया l श्री हनुमान जी जैसे भक्त बनो l इस कलियुग में जहाँ देवता और आसुरी प्रवृति के लोग एक साथ समाज में घुलमिलकर रहते हैं , वहां हमें विभीषण से भक्ति सीखनी चाहिए l असुर परिवार में ही पैदा होते हैं , परिवार से ही समाज बनता है l विभीषण ने जब समझा कि रावण का आचरण मर्यादाहीन है , अनैतिक है तब उसने रावण को बहुत समझाया लेकिन रावण अहंकारी था , वह विभीषण पर ही दोष लगाने लगा कि उसकी नियत ख़राब है l तब विभीषण ने उससे बहस करना उचित नहीं समझा और उसने रावण को त्याग दिया और भगवान श्रीराम की शरण में चला गया l संसार विभीषण को चाहे जो कहे लेकिन विभीषण ने इस सत्य को समझाया कि एक साथ दो नाव की सवारी संभव नहीं है कि आप भगवान के भक्त होने का भी नाटक करें और पापी , अत्याचारी मर्यादाहीन आचरण करने वाले का भी साथ दें l कोई एक मार्ग चुनना होगा l यदि ईश्वर की शरण में जाते हैं तो लाभ ही लाभ है लेकिन यदि किसी पापी , आततायी का सहारा लेते हैं तो जीते जी स्वयं का और परिवार का शोषण है और सर्वनाश तो निश्चित है l विभीषण का चरित्र हमें यह भी सिखाता है कि मोह के धागे को तोड़ना जरुरी है l यदि आप रिश्ते -नातों के मोह में फंसे रहेंगे , अपने ही परिवार के पापियों का समर्थन करेंगे , उनकी गलतियों पर परदा डालेंगे तो असुरता का अंत कभी नहीं होगा l ऐसे लोगों को त्याग दो और ईश्वर की शरण में रहो भगवान कभी किसी को निराश नहीं करते l
25 June 2026
WISDOM -------
हमारे पुराणों की कथाएं केवल मनोरंजन के लिए नहीं हैं , उनके भीतर प्रत्येक युग के अनुरूप ज्ञान है , महत्वपूर्ण संकेत हैं l एक कथा है ---महाराज ययाति की ----ययाति की मृत्यु का समय आया तो यमराज उन्हें लेने गए l अब तो ययाति बहुत रोए , गिडगिडाए कि अभी तो मेरी कामनाएं , वासनाएं ही पूरी नहीं हुईं , मुझे कुछ समय और दो l यमराज को दया आ गई , उन्होंने कहा ---यदि तुम्हारा कोई पुत्र तुम्हे अपना यौवन दे दे तो तुम्हे उतने वर्ष का जीवन मिल जायेगा l महाराज ययाति अपने सभी पुत्रों के पास गए , उनसे याचना की l सभी ने उन्हें अपना यौवन देने से इनकार कर दिया लेकिन ' छोटे पुत्र ' को दया आ गई , उसने अपना यौवन उन्हें दे दिया l ययाति को पुत्र की परवाह नहीं थी वे तो भोग -विलास में मगन हो गए l कहते हैं ऐसा दस बार हुआ , ययाति ने हजारों वर्षों तक सुख भोगा लेकिन इच्छाएं शांत नहीं हुईं l मृत्यु तो आखिर होनी ही थी , उन्हें गिरगिट की योनि मिली l इस कथा का संकेत यही है की यह 'छोटा पुत्र ' जागरूक नहीं था , पिता के प्रति कर्तव्यपालन तो उचित है लेकिन उसकी अंध भक्ति से पिता का ही पतन हो गया , वे गिरगिट की योनि में न जाने कितने वर्षों तक रहे l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' वासना कभी समाप्त नहीं होती , देह पर देह बदलती है लेकिन वासना समाप्त नहीं होती l आचार्य जी कहते हैं ---- वासना का रूपांतरण संभव है और भक्ति वासना का दिव्य रूपांतरण है l ' इस ज्ञान की कलियुग में सबसे ज्यादा जरुरत है , संसार में हजारों , लाखों की संख्या में यायाति भर गए हैं जिनकी इच्छाएं किसी तरह पूरी ही नहीं हो रही हैं l कलियुग की मार ऐसी है कि लोग विवेकशून्य हैं , उनमें जागरूकता नहीं है , वे स्वयं ही यायातियों का पोषण करते हैं l सतयुग इतनी आसानी से नहीं आता , या तो ययातियों में विवेक जागे या पुत्रों में विवेक जागे तभी संसार में सुख -शांति होगी l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने ' गायत्री मन्त्र ' को संसार के लिए ही सरल ढंग से समझा दिया l केवल यही एक रास्ता है l गायत्री मन्त्र सद्बुद्धि का ही मन्त्र है , इससे विवेक जाग्रत होगा तभी संसार में सुख-शांति होगी l