19 September 2026

WISDOM ------

 कहते  हैं  जो  कुछ  महाभारत  में  है  वही  इस  धरती  पर  भी  है   और  अहंकार  एक  ऐसा  रोग  है  जो  शक्ति  और  सम्पन्नता  के  साथ   रहने  वाला  असाध्य  रोग  है  l  इस  अहंकार  को  किसी  की  सलाह  पसंद  नहीं  है  , किसी  ने  भी  उनके  अहं    को  चुनौती  दी  तो  खैर  नहीं  !  यह  स्थिति   प्रत्येक  युग  में  रही  है  l  महाभारत  में  विदुर   नीति निपुण  , महाज्ञानी  थे  l  धृतराष्ट्र  को  राज-काज  संबंधी  सही  सलाह  देते  थे  , कभी  कुछ  ऐसी  सलाह  दी   जो  युवराज  दुर्योधन  को   सहन  न  हो  सकी  और  उसने  विदुर जी  को   राजमहल  से  , सभी  राज सुख  से  बाहर  कर  दिया   और  तब  विदुर जी  महल  से  बाहर  कुटिया  बनाकर  रहने  लगे  l  उस  समय  ऐसे  अपराध  का  यही  दंड  था  , जेल  या   किसी  प्रकार  का  उत्पीड़न  नहीं  था  l  ऐसी  परिस्थिति  में  रहने  पर  विदुर  जी  का  स्वाभिमान  से  जीवन  जीना  प्रेरणादायी  है  l  उनके  जीवन  की  श्रेष्ठता  ऐसी  थी  कि  उन्हें  ईश्वर  की  कृपा  मिल  गई  थी  और  जिसे  ईश्वर  की  कृपा  मिल  जाए  , उसके  लिए  सिंहासन , राजसुख  सब  मिटटी  के  समान  हैं  l  विदुर जी  के  सामने  दुर्योधन  की  सबसे  बड़ी  हार  यही  थी  कि  स्वयं  भगवान  कृष्ण   दुर्योधन  के  राजमहल  के  मेवा , पकवान  त्याग  कर  विदुर  जी  के  यहाँ  साग -रोटी  खाकर  तृप्त  हुए  l  सुख  कभी  स्थायी  नहीं  होता  , जिन्हें  राज सुख  का  लालच  था  , अत्याचार  और  अनीति  का  साथ  देने  के  कारण  दुर्योधन  के  साथ  उनका  भी  अंत  हुआ  l  

17 September 2026

WISDOM ----

 प्रकृति  में  क्षमा  का  प्रावधान  नहीं  है  l  जैसे  कर्म  किए हैं  वैसा  ही  फल  अवश्य  मिलेगा  लेकिन  यह  कब  और  किस  रूप में  मिलेगा  , इसे  काल  निश्चित  करता  है  l   अब  वर्तमान  समय  में  लालच , स्वार्थ  , अहंकार  , महत्वाकांक्षा  ----- आदि  बुराइयाँ  इतनी  बढ़  गईं  हैं  कि   किसी को  अपराधी  घोषित  करने  और  दंड  देने  से  पहले  अपना  स्वार्थ  आड़े  आ  जाता  है  l  सामान्य  जन  भी   अपने  स्वार्थ  और  डर  की  वजह  से  भी  अपने  परिवार  और  समाज  के  अपराधियों  को  सहर्ष  स्वीकार  करते   है  l  यह  सब  कुछ  नया  नहीं  है  , महाभारत  में  भी  धृतराष्ट्र   पुत्र  मोह  में  अंधे  थे  l  दुर्योधन  बाल्यकाल  से  ही  पांडवों  के  विरुद्ध  षडयंत्र करता  रहा   लेकिन  धृतराष्ट्र  ने  , भीष्म  पितामह  ने  उस  पर  कोई  नियंत्रण  नहीं  रखा   l  उसे  उसकी  गलतियों  की  कभी  कोई  सजा  नहीं  दी , उसकी  उद्दंडता  बढ़ती  ही  गई  l    लेकिन  ईश्वरीय  विधान  ऐसा  नहीं  है   l  ईश्वर  को  संसार  के  प्रत्येक  व्यक्ति  के  हर  पल  की , उसकी  उठती -गिरती  सांसों  की  जानकारी  है  l  सबका  लेखा -जोखा  ईश्वर  के  पास  है  l  संसार  के  नियम -कानून  अपराधी  को  दंड  दें  या  न  दें  ,  ईश्वर  की  लाठी  से  कोई  बच  नहीं  सकता  l  पुण्य  किए  हैं  तो  उनका  फल  सुख -वैभव   के  रूप  में  अवश्य  मिलता  है  l  जिस  स्तर  का  पाप  व्यक्ति  करता  है  , वैसा  ही  दंड  उसे  मिलता  है  l  छल , कपट  षड्यंत्र  , धोखा , लोगों  को  योजना  बनाकर  शारीरिक  और  मानसिक  रूप  से  उत्पीड़ित  करना  --ऐसे  अपराध  हैं   जिनकी  क्षमा  नहीं  होती  , ईश्वरीय  दंड  इतना  कठोर  होता  है  कि  देखने  वालों  की  रूह  काँप  जाए  l  ईश्वरीय  विधान  में  एक  विशेष  बात  यह  है  कि  हमारे  लिए  हमारा  यह  एक  जन्म  है   लेकिन  ईश्वरीय  विधान  में  यह  मनुष्य  की  एक  यात्रा  है  ,  यात्रा  के  किस  पड़ाव  पर   पाप  और  पुण्य  के  फल  मिलेंगे  ,  यह  मालूम  करना  मनुष्य  के  वश  में  नहीं  है  l  ऋषि  कहते  हैं  --होश  में  रह  कर  जीवन  जिओ  , किसी  का  अच्छा  नहीं  कर  सकते  तो  कोई  बात  नहीं  , किसी  का  बुरा  मत  करो  l  और  इस  सत्य  को  स्वीकार  करो  कि  जब  हम  किसी  का  बुरा  नहीं  कर  रहे  तो  हमारा  भी  बुरा  नहीं  होगा  l 

9 September 2026

WISDOM -----

   मनुष्य  के  जीवन  में  सुख -दुःख  दिन  और  रात की  तरह  आते -जाते  रहते  हैं  l  सुख  का  समय  तो बहुत  जल्दी  बीत  जाता  है   लेकिन  दुःख  और  कष्ट  का  समय   , मन  को  शांत  रखते  हुए   व्यतीत  करना  बहुत  कठिन  होता  है  l  ऐसे  में  हमारे  ऋषियों  ने , संतों  ने  ईश्वर  विश्वास  और  ईश्वर  शरणागति  की  सलाह  दी  है  l   गीता  में  भी  भगवान  ने  अंत  में  यही  कहा  है  कि   ईश्वर  की  शरण  में  जाओ  l   ईश्वर  विश्वास  और  ईश्वर  शरणागति  कब  काम  करती  है  ,  इसे  स्वयं  ईश्वर  ने  ही  महाभारत  और  रामायण   और  अन्य  पुराणों  में  विभिन्न  प्रसंग  और   कथाओं  के  माध्यम  से  स्पष्ट  किया  है  l    ---- महाभारत  का  ही  प्रसंग  है  ---- जब  दु:शासन   महारानी  द्रोपदी  को  उनके  केश  खींचते  हुए    भरी  सभा  में   घसीटता  हुआ  लाया  l  उसकी  मंशा  उनके  चीर-हरण   की  थी  l  पांचाली  ने  सभा  में  बैठे  हुए   भीष्म पितामह , गुरु द्रोणाचार्य , धृतराष्ट्र  और  कुलगुरु  आदि  सभी  को  पुकारा  l  अपने  पांचों  पतियों  को  पुकारा   लेकिन  पासे  के  खेल  में  हार  जाने  के  कारण  वे  सभी  सिर  झुका  कर  चुप  थे , चारों  तरफ  सन्नाटा  था  l  कोई  भी  पांचाली  की  मदद  को  आगे  नहीं आया  l  सब  ओर  से  निराश  होने  पर  द्रोपदी  ने  श्रीकृष्ण  को  पुकारा  l   कहते  हैं  नारद  जी  भगवान  श्रीकृष्ण  के  पास  गए  और  कहा  --- हस्तिनापुर  की  राजसभा  में  यह  कैसा  अनर्थ  हो  रहा  है  , पांचाली  आपको  पुकार  रही  है  , आप   कृपा  कर  के   उसकी  रक्षा  के  लिए   जाएँ  ----- l  भगवान  श्रीकृष्ण  नारद जी  से  कहते  हैं  ---  देखो  नारद  , मैं  स्वयं   कर्मों  के  विधि -विधान  से  बंधा  हुआ  हूँ  ,  पांचाली  का  बहीखाता  देखो  ,  उसने  ऐसा  कोई  पुण्य   कर्म  किया  है   कि  मैं  उसकी  रक्षा  के  लिए  जाऊं  l  नारद जी  कहते  हैं  --- मैं  भूला  नहीं  हूँ  l  भगवान  !   जब  आपने  सुदर्शन  चक्र  से  शिशुपाल  का  वध  किया  था  , तब  आपकी  अंगुली  से  रक्त  बहने लगा  था  l  सब  रानी -महारानी  उस  सभा  में  थीं  , उन्हें  समझ  नहीं  आ  रहा  था  कि  क्या  करें   तब  महारानी  द्रोपदी  ने  अपनी  कीमती  साड़ी  फाड़कर  आपकी  अंगुली  में  पट्टी  बाँधी  थी  l '   उसी  एक  चीर   के  बदले  भगवान  ने  द्रोपदी  का  चीर  अनंत  कर  दिया  l  दु:शासन  का  दस  हजार   हाथियों  का  बल  भी  द्रोपदी  का  कुछ  नहीं  बिगाड़  सका  l  वह  थक -हारकर  जमीन  पर  गिर  गया  l  ----- पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  --- "  सत्कर्म  का  कोई  भी  मौका  हाथ  से  न  जाने  दो  l  सत्कर्मों  की  पूंजी   ही   विभिन्न  विपदाओं  से  हमारी  रक्षा  करती  l  आचार्य श्री  ने  बहुत  ही  सरल  ढंग  से  समझाया  है  कि  यदि   हम  ऐसी  जगह  पर  या  ऐसी  परिस्थिति  में  हैं  जहाँ  सत्कर्म  का  कोई  भी  अवसर  हमें  नहीं  मिलता   तो  हम  मन में  ही  गायत्री  मंत्र  और  महामृत्युंजय  मंत्र  का  जप  करें    , इससे  प्रकृति  को  पोषण  मिलता  है  , वातावरण  में  फैली  हुई  नकारात्मकता  दूर  होती  है  l  प्रकृति  ही  ईश्वर  है  ,  जब  ईश्वर  प्रसन्न  हों  , उनकी  कृपा  मिले   तब  तो  असंभव  भी  संभव  है  l  

8 September 2026

WISDOM -------

     पुराणों   की  कथाएं   मनुष्य  को  जीवन  जीना  सिखाती  हैं  l  मनुष्यों  के  विवेक  को  जाग्रत  करने  के  लिए  ये  कथाएं  हैं  l   एक  कथा  है  ---- समुद्र  मंथन  में  जब  हलाहल  विष  निकला   तो   देवता  और  दानव  सब  के  सामने  यह  बड़ी  समस्या  थी  कि  इस  विष  का  क्या  करें  तब  भगवान  शिव  ने  संसार  के  कल्याण  के  लिए  इस  हलाहल  विष  को  अपने  गले  में धारण  किया  ,  न  उगला  , न  पिया  l  यह  विष  उनके  गले  में  ही  रहा  और  वे  नीलकंठ   कहलाए  l  इस  कथा  का  शिक्षण  यही  है  कि   विषाक्तता  को   न  तो  आत्मसात  करें   और  न  ही  उसे  विक्षुब्ध   होकर  उछालें  l  इसे  हम  सरल  ढंग  से  इस  तरीके  से   समझा  सकते  हैं  कि  जो  कुछ  भी  नकारात्मक  है  उसकी  बार -बार  चर्चा  न  करें   क्योंकि  बुराई  में  आकर्षण  होता  है  इसे  लोग  बहुत  जल्दी  सीख  जाते  हैं  l  आज  संसार  में  इतनी  अशांति , अपराध  , क्रूरता   क्यों  है  ?   क्योंकि  हमने   प्रति  वर्ष  रावण  को  जीवित  किया   l  रावण  के  गुणों  की  , उसकी  विद्वता  की  चर्चा  नहीं  की  ,  उसके  नकारात्मक  पक्ष  की  बार -बार  चर्चा  कर  उसे  जलाने का  नाटक  किया   l  यही  कारण  है  कि  आज  रावण  सारे  संसार  में  लोगों  के  विचारों  में  जीवित  हो  गया  l  रावण  अपने  राक्षसों  को    धरती  के  कोने -कोने  में  आतंक  मचाने  भेजा  करता  था  ,   ये  राक्षस  आतंक  मचाते , लोगों  को  सताते , ऋषियों  के  यज्ञ   आदि  पवित्र  कार्यों  को  नष्ट  कर  देते  थे  l   वही स्थिति  आज  भी  है    , अंतर  केवल  इतना  है  कि  पहले  एक  रावण  था  , अब  बहुत  हैं  l  क्रूरता  भरी  , संवेदनहीन  जितनी  भी  घटनाएँ  संसार  में  घट रहीं  हैं  उनके  पीछे  कोई  न  कोई  रावण  अवश्य  है  l  नकारात्मक विचारों  को  सकारात्मक  विचारों  से  ही  समाप्त  किया  जा  सकता  है  l  जागरूकता  की  जरुरत  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  --- ' विचार  एक  संसाधन  है   जिसे  नियंत्रित  , संयमित  और  उपयोगी  बनाकर   अनेक  चमत्कार  और    आश्चर्यजनक  परिणाम   उत्पन्न  किए  जा  सकते  हैं  l '                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  

3 September 2026

WISDOM ------

 लालच   और  स्वार्थ  ये  ऐसे  दुर्गुण  हैं  जिनकी  प्रत्येक  युग  में  निंदा  की  गई  है  l  यदि  ये  दुर्गुण  किसी  साधारण  व्यक्ति  में  होते  हैं   तो  इससे  उसकी  स्वयं  की   और  उसके  परिवार  एवं  कुछ  निकट  के  लोगों  की  ही  हानि  होती  है  लेकिन  यदि  ये  दुर्गुण   समाज  को  दिशा  देने  वाले  किसी  व्यक्ति  हों  ,  ऐसे  व्यक्ति  जो  समाज  के  एक  बहुत  बड़े  भाग को  प्रभावित  करते  हैं   तो  ऐसे  दुर्गुणों  से   सम्पूर्ण  समाज  की  इतनी  बड़ी  हानि  होती  है  जिसका  आंकलन  करना  कठिन  है   l  जैसे  गुरु  द्रोणाचार्य  को  शस्त्र  और  शास्त्र  दोनों  का  ज्ञान  था  l  वे  प्रारम्भ  में  बहुत  निर्धन  थे  लेकिन  कौरव  और  पांडवों  को  शिक्षा  देने  के  दौरान  उन्हें   राजसत्ता  के  निकट  रहने  का  सुख  मिला  , राजमहल  के  सब  सुख  उन्हें  मिले  l    इस  सुख -वैभव  में  वे  इतने  बंध  गए  कि  कौरवों  और  पांडवों  की  शिक्षा  के  बाद  भी  वे  राजमहल  से  जा  न  सके  l  दुर्योधन  युवराज  था  , सारा  जीवन  द्रोणाचार्य  ने  दुर्योधन  का  नमक  खाया   इसलिए  यह  जानते  हुए  भी  कि  दुर्योधन  अनीति  और  अधर्म  की  राह  पर  है  , वे  उसका  विरोध  न  कर  सके  , उसकी प्रत्येक  अनीति  पर  वे  मौन  रहे   अर्थात  मौन  रहकर   दुर्योधन  की  अनीति ,  छल -कपट  षडयंत्र  का समर्थन  किया   l   इतने  महान  , नीति  और  धर्म  के  ज्ञाता  , शस्त्र और  शास्त्र  के  ज्ञाता  का  समर्थन  जब  उसे  मिला   तब  उसके  अहंकार  को  और  अधिक  बल  मिला  , उसने  पांडवों  को  सुई  की  नोक  बराबर  भूमि  देने  से  मना  कर  दिया  , इसका  परिणाम  महाभारत  तो  होना  ही  था  l  गुरु  द्रोणाचार्य  का  सम्पूर्ण  जीवन  और  उनका  अंत    आज    के  धर्म  गुरुओं  के  लिए  एक  चेतावनी    है    कि  जीवन  की  आवश्यकताओं  के  लिए  धन  जरुरी  है   लेकिन  सुख -वैभव  से  बंध  जाना   गलत  है  l  इस  संसार  में  एक  नहीं  अनेक   दुर्योधन   और  दु:शासन  हैं   जो  अपने  स्वार्थ  के  लिए   उनका  इस्तेमाल  करते  हैं  l  

1 September 2026

WISDOM

 कहते  हैं  जो  कुछ  महाभारत  में  है  , वही  इस  धरती  पर  है   और  बहुत  कुछ  ऐसा  भी  है   जिसके  धरती  पर  होने  के  संकेत  हैं  l  महाभारत  के  युद्ध  के  लिए  कहा  जाता  है  --' न  भूतो , न  भविष्यति  ' l  स्वयं  भीष्म  पितामह  ने  कहा  था  कि  इस  युद्ध  के  कारण  यह  धरती  शूरवीरों  से  रहित  हो  जाएगी  l-------------------- महाभारत  के  युद्ध  में  भीष्म  जैसे  महा योद्धा  को  पराजित  करना  किसी  भी  योद्धा  के  लिए  संभव  नहीं  था  लेकिन  ईश्वर  ने  सब  की  मृत्यु  का  विधान  रचा  है  l  पांडवों  के  प्रार्थना  करने  पर   उन्होंने  स्वयं  युधिष्ठिर  को  बताया  कि  अर्जुन  के  रथ  पर  यदि  कोई   स्त्री  बैठी  होगी  तो वे   वीरोचित  प्रतिष्ठा  के  कारण  अपना  धनुष  रख  देंगे  ,  और  तब  उन्हें  पराजित  करना  संभव  होगा  l  अर्जुन  ने  शिखंडी   को  अपने  रथ  में  आगे  बैठाया  ,  तब  भीष्म  पितामह  ने  कोई  बाण  नहीं  चलाया  और  अर्जुन  के  बाणों  से  घायल  होकर  धरती  पर  गिर  पड़े  l  यह  शिखंडी  कौन  थी  ?   इसी  प्रश्न  के  उत्तर  में  इस  युग  के  लिए  कोई  संकेत  स्पष्ट  होता  है  l   शिखंडी  ,                '  शिखंडी  '  कैसे  बन  गई  इसकी  एक  कथा  है  ---संक्षेप  में  काशिराज  की  तीन  अति  सुन्दर   कन्याएं  थी  l  भीष्म  पितामह  ने  अपने  भाई  विचित्रवीर्य  के  विवाह  के  लिए  स्वयंवर  मंडप  से  उन  तीनो  का  हरण  कर  लिया  l   उनमें  से  दो  का  विवाह  तो  विचित्रवीर्य  के  साथ  हो  गया  लेकिन  तीसरी  कन्या  जिसका  नाम  अम्बा  था  वह   राजा  शाल्व  को  अपना  पति  मान  चुकी  थी  इसलिए  पितामह  ने  उसे  राजा  शाल्व  के  पास  भेज  दिया  l  लेकिन  अब  राजा  शाल्व  ने  दूसरे  की  जीती  हुई  कन्या  से  विवाह  करने  को  मना    कर  दिया  l  बेचारी  अम्बा  छ  वर्ष  तक  राजा  शाल्व  और  हस्तिनापुर  के  बीच  ठोकरें  खाती  रही  ,  रो -रोकर  उसके  आँसू  सूख गए  राजा  शाल्व  और  विचित्रवीर्य  , किसी  ने  भी  उससे  विवाह  नहीं  किया  l  अब  वह   भीष्म   पितामह  को  अपने  दुःख  का  कारण  मान  कर  उनसे  बदला  लेने  के  लिए  अनेक  राजाओं  के  पास  मदद  के  लिए  गई  लेकिन  भीष्म  जैसे  वीर   और  महान  योद्धा  से  टक्कर  लेने  की  हिम्मत  किसी  में  न  थी  l  सब  तरफ  से  निराश  होकर  उसने  भगवान  शिव  की  तपस्या  की  l  प्रसन्न  होकर  शिवजी  ने  उसे  वरदान  दिया  कि  इस  जन्म  में  तो  नहीं  , अगले  जन्म  में  तुम्हारे  हाथों  भीष्म  की  मृत्यु  होगी  l  अम्बा    में  अब  इतना  धैर्य  नहीं  था  कि  वह  मृत्यु  का  इंतजार  करे  ,  उसने  धधकती  हुई  आग  में  कूदकर  अपने  प्राणों  की  आहुति  दे  दी   और  अगले  जन्म  में  उसने  महाराज  द्रुपद  के  यहाँ  कन्या  रूप  में  जन्म  लिया  , उसे  पिछले  जन्म  की  सब  बातें  याद  थीं  l  उसने  वन  में  पुन :  कठोर  तपस्या  की  और  अपने  तपोबल  से  वह  पुरुष  बन  गई  और  उसने  अपना  नाम  शिखंडी  रख  लिया  l  भीष्म  पितामह  इस  सत्य  को  जानते  थे  इसलिए  उन्होंने  शिखंडी  को  देखकर  अपने  सब  अस्त्र -शस्त्र  नीचे  रख  दिए  l  भीष्म  पितामह  के  गिरते  ही  यह  निश्चित  हो  गया  कि  दुर्योधन  के  अत्याचार  और  अन्याय  का  अंत  निकट  है  l    ----इस  प्रसंग  से  इस  युग  के  लिए  यही  संकेत  मिलता  है  कि  अत्याचार  ,   अन्याय  के  अंत  के  लिए  शिखंडी  को  ही  आगे  आना  पड़ेगा  l  पुरुष  वर्ग  अपने  विकारों  से  ग्रस्त  है,    उनमें  सुधार  संभव  नहीं  दीखता  l  महिलाओं  को  स्वतंत्रता  मिली  , लेकिन  महिलाओं  के  एक  बड़े  भाग  ने  अपनी  स्वतंत्रता  का  सदुपयोग  नहीं  किया  , अपने  कर्तव्यों  से  विमुख  हो  गईं   l  स्वतंत्रता  में   स्वछंदता  का  जो  थोड़ा  भी  अंश  आ  गया   तो    नवयुग  के  निर्माण  में  उसका  योगदान  कैसे  संभव  होगा  ?  महाभारत  सत्य  है  तो   एक नए नए  युग  के  निर्माण  में  शिखंडियों  की  भूमिका  सराही   जाएगी  l  

31 August 2026

WISDOM -------

   इस  परिवर्तनशील  संसार  में  एक  ही  अटल  सत्य  है  और  वह  है  -' मृत्यु  '  l  जो  भी  इस  धरती  पर  आया  है  उसे  एक  दिन  जाना  ही  है  और  यह  कब  और  कैसे  जाना  है ,   यह  सब  पहले  से  ही  निश्चित  है  l  किसी  प्राणी  की  मृत्यु   जहाँ  भी  होनी  है  वह  स्वयं  ही  उस  स्थान  पर  पहुँच  जाता  है  ---' तुलसी  जसी  तस  भव्यता  तैसी  मिले  सहाय  ,  आप  न  आवे  ताहि  पे  , ताहि  तहां  ले  जाए  l  "   आचार्य  श्री  कहते  हैं  ---- जीवन  को  ऐसे  जिओ  कि  मृत्यु  भी  एक  उत्सव  बन  जाए  l  मृत्यु  के  बाद  क्या  होगा  , कोई  नहीं  जानता  लेकिन  हमारे  महाकाव्यों  के  अध्ययन  से  एक  बात  समझ  में  आती  है  कि  यदि  मृत्यु  के  समय  ईश्वर  हमारे  सामने  हों   या  ईश्वर  का  नाम  हमारी  जुबां  पर हो   तो   मुक्ति  मिल  जाती  है जैसे  रावण  को  राम  ने  ही  मारा  ,  ईश्वर  उसके  सामने  थे  ,  वह  सीधा  भगवान  के  धाम  ही  गया  l  महाभारत  का  युद्ध  हुआ  l  दुर्योधन  आदि  कौरवों  ने  कितने  छल -कपट  , षडयंत्र  किए   लेकिन  युद्ध  भूमि  में  उस  समय  स्वयं  भगवान  श्रीकृष्ण  उपस्थित  थे  ,  सभी  को   अपने  अंतिम  समय  में  उनके  दर्शन  हुए   इसलिए  वे  सब  स्वर्ग  के  अधिकारी  हुए   लेकिन  इस  कलियुग  में  ईश्वर  के  दर्शन  संभव  नहीं  हैं   इसलिए  ऋषियों  ने  कहा  है    कि  हर  पल  ईश्वर  का  नाम -स्मरण  करो  l  अंतिम  समय  में  भी  ईश्वर  का  नाम  मन  में  गूंजेगा  तो  मृत्यु  का  कष्ट  भी  कम  होगा  और  मुक्ति  भी  मिलेगी  l  ऋषि   कहते  हैं  ---'  भज  ले  हरि  नाम  अरे  रसना  , फिर  अंत  समय  में  हिली  न  हिली  l  '  अंत  समय  में  तो  जीवन   में  किए  गए  सारे  भले  -बुरे  कर्म  आँखों  के सामने  एक  फिल्म  की  तरह  चलते  हैं   इसलिए  ईश्वर  के  'नाम -स्मरण '  की  प्रैक्टिस   शुरू  से  ही  करनी  चाहिए   जैसे  महात्मा  गाँधी  ने  जीवन  भर  राम  का  नाम  लिया  तो  अंत  समय  में  भी  उन्होंने  ' हे राम !  '   कहा   और  हाथ  जोड़कर  मृत्यु  को  स्वीकार  किया  l