कहते हैं जो भी महाभारत में है , वही इस धरती पर है l सब कुछ वैसा ही है , यह हमारा विवेक है कि हम क्या सीखते हैं l कौरवों के कुलगुरु थे --- कृपाचार्य l दुर्योधन ने जीवन भर जितने षडयंत्र किए , छल -कपट किया , कुलगुरु होने के नाते वे दुर्योधन को ऐसा करने से रोक सकते थे , धृतराष्ट्र को भी समझा सकते थे कि ऐसा अन्याय न करें , इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उन्हें राजसी सुख भोग की आदत हो गई थी और दुर्योधन के विरोध का मतलब था उन राजसी सुखों से वंचित हो जाना l ऐसे ही संत -महात्मा आज के समय में भी हैं , उन्हें अपनी दुकान की चिंता है , वे सब शक्ति और धन -वैभव संपन्न लोगों को खुश करने में लगे रहते हैं l इस युग में जिनके पास पद -प्रतिष्ठा है , धन संपन्न हैं वे भी सोचते हैं की जितनी चाहे मनमानी कर लो , पापकर्म कर लो फिर बड़े -बड़े संत -साधकों से पूजा - पाठ करा लेंगे जिससे सारे पाप धुल जाएंगे l मन्त्र की और विधि -विधान से पूजा -पाठ की ऐसी शक्ति भी है कि ऐसा होता भी है और ऐसे लोगों के सुख - वैभव में कहीं कोई कमी नहीं आती l लेकिन जो साधक - संत उनके लिए इतनी तपस्या करते हैं , इसके लिए उन्हें पर्याप्त धन -राशि , मान -सम्मान तो मिल जाता है लेकिन कहते हैं इसमें उनके पुण्यों का एक बड़ा हिस्सा भी चला जाता है l अब वे विभिन्न नेक कर्मों से इसकी क्षतिपूर्ति कर लें तो ठीक है अन्यथा उन संत -साधकों का पतन शुरू हो जाता है l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- अत्याचारी , अन्यायी और मर्यादाहीन आचरण करने वालों का कभी भी साथ न दें , ऐसे लोग स्वयं तो डूबेंगे और जो भी उनके साथ है , उन सब को ले डूबेंगे l महात्मा विदुर ने दुर्योधन के गलत कार्यों का कभी समर्थन नहीं किया राजमहल के सुख छोड़कर बहुत साधारण जीवन जिया l विदुर जी की सत्य -निष्ठा और सादगी की ऐसी ताकत थी कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के स्वादिष्ट पकवान त्याग दिए और विदुर जी के घर जाकर साग -रोटी खा कर ही तृप्त हो गए l
Omkar....
29 July 2026
27 July 2026
WISDOM ------
यदि जीवन में कुछ भी खोने का भय न हो और मृत्यु का भी भय न हो तो व्यक्ति निर्भय हो जाता है l वर्तमान युग का जो युवा वर्ग है , वह ऐसा ही निर्भय है l सामान्य वर्ग में हम देखें तो पुत्र के युवा होने पर , उसकी शिक्षा पर पर्याप्त धन खर्च करने के बाद माता -पिता उसकी ओर बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से देखने लगते हैं कि बेटा ! अब कुछ कमाने लगो , अपनी जिम्मेदारी समझो l इस उम्मीद में कई वर्ष बीत जाते हैं फिर भी नौकरी नहीं , कोई निश्चित आय का साधन नहीं तब उस युवक की स्थिति बहुत दयनीय हो जाती है , अड़ोसी -पडोसी , रिश्तेदार और माता -पिता भी ताने देने लगते हैं कि कुछ कमाता नहीं है , बैठा रहता है l अब वह युवक क्या करे ? बहुत मेहनत कर रहा है लेकिन सब व्यर्थ है l बिना कमाई के विवाह भी संभव नहीं है और यदि विवाह हो गया है तो बिना कमाई के परिवार में कोई इज्जत नहीं है l परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत साधारण है तब रोजगार के बिना युवा का जीवन बहुत कठिन है l ऐसे में कुछ निराश होकर आत्महत्या कर लेते हैं , कुछ पलायन कर साधु बन जाते हैं l कोई बहकाने वाला मिल जाये तो उनके कदम अपराध की ओर बढ़ जाते हैं लेकिन जो जागरूक हैं और आशावादी हैं , उन्हें यदि तिनके का भी सहारा मिल जाए तो वे अपने नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूक होकर ' करो या मरो ' पर उतारू हो हो जाते हैं l उनके जोश को देखकर जो युवा निराश हो चुके हैं , उनमे भी ऊर्जा का संचार हो जाता है l संसार के कई देशों में युवाओं के जोश को देखकर ऐसा लगता है जैसे कार्ल मार्क्स की आत्मा ऊर्जा बनकर इन सबके भीतर समां गई है , उन्होंने कहा था --- संसार के मजदूरों एक हो जाओ , तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है ------------' आज का युवा बहुत बुद्धिमान है और संचार के आधुनिक साधनों ने उनकी ऊर्जा को और अधिक शक्तिशाली बना दिया है l अब यह ऊर्जा क्या गजब करेगी यह तो आने वाला समय बताएगा l
26 July 2026
WISDOM ------
महाभारत के विभिन्न प्रसंग हमें शिक्षा देते हैं , सिखाते हैं कि कैसे हमें होश में रहकर जीवन जीना चाहिए l छोटी सी चूक से बहुत बड़ा नुकसान हो जाता है l --महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था l दुर्योधन ने 18 दिन चले इस युद्ध में अश्वत्थामा को सेनापति नहीं बनाया था , संभवतः यह ईश्वर का ही कोई विधान होगा l अब दुर्योधन युद्ध भूमि में घायल पड़ा था l दुर्योधन के मरणासन्न होते ही युद्ध तो समाप्त हो गया था लेकिन उसकी सेना के अश्वत्थामा और कृपाचार्य तो जीवित थे l इधर पांडव विजय का जश्न मनाकर शिविर में निश्चिन्त होकर सो रहे थे l वे भगवान श्रीकृष्ण की शरण में थे इसलिए निश्चिन्त थे l उस समय श्रीकृष्ण ने शिविर में प्रवेश किया और पांचों पांडवों को अपने साथ शिविर से बाहर नदी किनारे चलने को कहा l पांडव आज्ञाकारी थे इसलिए बिना किसी तर्क के वे श्रीकृष्ण के साथ बाहर निकल गए l पांडवों के पाँचों पुत्र वहीँ सो रहे थे , उन्होंने चलने से मना कर दिया l युद्ध भूमि में दुर्योधन की पराजय देखकर अश्वत्थामा क्रोध के कारण अपना विवेक खो बैठा और अर्धरात्रि में उसने पांडवों के शिविर में प्रवेश कर बहुत उत्पात मचाया , कुछ का क़त्ल किया और पांडवों के पांच पुत्र सो रहे थे , उन्हें अँधेरे में पांच पांडव समझ कर उसने उनके सिर काट दिए l अपना विवेक खो देने के कारण उसके भीतर की आसुरी प्रवृत्ति जाग गई थी , उसने पांडवों के वंश का अंत करने के लिए उसने अभिमन्यु की पत्नी उत्तर के गर्भ को लक्ष्य कर ब्रह्मास्त्र चला दिया था ताकि गर्भ में स्थित पुत्र का अंत हो जाये l अश्वत्थामा के इन सब कृत्यों का क्या परिणाम हुआ , इसकी एक पूरी कथा है लेकिन यह प्रसंग हमें शिक्षा देता है कि --- शत्रु को कभी भी कमजोर मत समझो , घायल शत्रु और भी खतरनाक होता है और वह कैसी भी रणनीति बनाकर फिर से आक्रमण कर सकता है l युद्ध में कौरव वंश , उनकी विशाल सेना सभी का अंत हो गया था लेकिन पांडव यह भूल गए कि अभी अश्वत्थामा और कृपाचार्य जीवित हैं l पांडवों की इस भूल ने उन्हें ऐसा दुःख दिया जिसकी भरपाई अब संभव नहीं थी l इसलिए शत्रु से हमेशा सतर्क और सावधान रहना चाहिए l
24 July 2026
WISDOM -----
इस धरती पर जब भी अत्याचार , अन्याय की अति हुई है , ईश्वर ने किसी न किसी रूप में यहाँ अवतार लिया है l संसार के सभी धर्मों में अनेक महान आत्माओं ने जन्म लिया और पूरा प्रयास किया कि असुरता का अंत हो और धरती पर सुख-शांति हो , मनुष्य देवत्व की ओर आगे बढ़ने का प्रयास करे , मनुष्यता से नीचे न गिरे l इन विभिन्न प्रयासों के बावजूद असुरता का अंत नहीं हुआ l अब कहते हैं भगवान कलिक का अवतार होगा l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा है --- अब भगवान का अंशावतार होगा , ईश्वर लोगों की चेतना में प्रवेश करेंगे l उनका कहना है कि असुरों को मारने से असुरता समाप्त नहीं होगी , उनके विचारों में परिवर्तन जरुरी है l ' असुर कहीं आकाश से यहाँ नहीं आए , वे सब परिवार से ही हैं , धन -सम्पन्नता , शक्ति प्राप्त कर वे अहंकारी हो गए , अत्याचारी हो गए और अपनों को ही सताने लगे l अब साम्राज्यवाद नहीं है , कोई बाहर से आकर हम पर अत्याचार नहीं कर रहा l आज अपने ही अपनों को सता रहे हैं l यह अलग बात है कि मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण चाहे परिवार हो या राष्ट्र हो , अपनों को सताने के लिए गैरों से भी सांठ -गाँठ कर लेता है , मनुष्यता के स्तर से नीचे गिर जाता है l ईश्वर विभिन्न घटनाओं के माध्यम से मनुष्य के अहंकार को मिटाने का और उसकी सोई हुई चेतना को जगाने का प्रयास करते हैं l
21 July 2026
WISDOM ----
देवता और असुर तो प्रत्येक युग में रहे हैं लेकिन कलियुग में एक विशेष बात यह है कि असुर समाज में घुल-मिलकर रहते हैं , उन्हें अलग से पहचानना कठिन है l व्यक्ति के काम करने के तरीके , बोलचाल और उसके स्वभाव से ही समझा जा सकता है कि वे किस श्रेणी के असुर हैं l ऐसे व्यक्तियों में करुणा , संवेदना , दया , प्रेम जैसी कोई भावना नहीं होती , ये बहुत निर्दयी होते हैं l उनका यह निर्दयता का व्यवहार उन सभी के साथ होता है जिसने उनके अहंकार को चोट पहुंचाई है , उनकी निरंकुशता में रहने से इनकार कर दिया l रिश्ते -नातों से भी वे ऐसा कठोरता का व्यवहार करने से नहीं चूकते l हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को सताने में कोई कोर -कसर नहीं छोड़ी असुरों के पास धन -वैभव और इसके बल पर प्राप्त शक्ति की कोई कमी नहीं होती है l कलियुग में यह असुरता इतनी दुखदायी इसलिए हो जाती है क्योंकि सामान्य जन अपने हितों को पूरा करने के लिए इस असुरो के अहंकार को पोषित करते हैं , उनकी चापलूसी कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और उनकी कमजोरियों का पता लगाकर उन की कमजोर नस भी दबाकर रखते हैं इसलिए असुरता एक श्रंखलाबद्ध तरीके से बढ़ती जाती है l इसका अंत कौन करे ? यह बहुत बड़ी समस्या है l
17 July 2026
WISDOM -----
कभी -कभी ऐसा वक्त आता है कि दो पक्षों में युद्ध जैसी स्थिति होती है l एक पक्ष आक्रमण पर आक्रमण करता जाता है लेकिन दूसरा पक्ष वार नहीं करता , केवल अपनी सुरक्षा का ही प्रयास करता है l जैसे मथुरा का राजा कंस कितना शक्तिशाली था , उसके पास सब कुछ था लेकिन वह भयभीत था और भयभीत भी था तो छोटे से दूध पीते बच्चे कृष्ण से l मृत्यु का भय , सत्ता को खोने का भय ऐसा ही होता है l कंस आयु में कृष्ण से कितना बड़ा था , उसके पास विशाल सेना थी , अनेक मायावी राक्षस थे , अनेक शक्तिशाली राजा उसके मित्र , संबंधी थे l क्या आश्चर्य है कि फिर भी वह डरता था l उसने पूतना को और अनेक राक्षसों को भेजा कि वे किसी तरह कृष्ण का अंत कर दें l श्रीकृष्ण तो स्वयं ईश्वर थे , वे बाल रूप में थे तो क्या , उन्हें पता था कि ये सब राक्षस कंस के भेजे हुए हैं , उन्होंने केवल अपनी सुरक्षा के लिए उन राक्षसों को मारा , उन्होंने कंस को मारने का कोई प्रयास नहीं किया l कंस के सिर पर जब मृत्यु का साया मंडराने लगा तब उसने स्वयं ही कृष्ण और बलराम को मथुरा बुला लिया , अपनी मृत्यु की व्यवस्था स्वयं ही कर ली l इस प्रसंग का अर्थ यही है कि इस संसार में सभी के जन्म , मृत्यु , सत्ता , प्रतिष्ठा , धन-वैभव , सुख --- आदि प्रत्येक घटना का समय निश्चित है , इन सब को खोने के भय से किसी को सताना , उसको मारने का प्रयास करना व्यर्थ है l लोग इसी भय से न तो स्वयं चैन से रहते हैं और न ही दूसरे को चैन से रहने देते हैं l कंस ने काल को समझा नहीं , स्वयं को ही भगवान समझा , समय रहते चेता नहीं इसलिए काल ने उसे पटक -पटक कर मारा l
WISDOM -----
श्रीमद भगवद्गीता संन्यास की पाठ्य -पुस्तक नहीं , यह हमें जीवन जीने की कला सिखाती है l जीवन समर में सभी प्रकार की उथल -पुथल का सामना करते हुए जीना , सक्रिय हो उद्यमी बने रहना ही मनुष्य को शोभा देता है l कर्म करो , सक्रिय होकर जियो एवं निर्भय होकर रहो , परिश्रम से मत डरो l निराशाओं का सामना करने से हिचकिचाओ मत l जब तक जीवित हो , वास्तव में जीवन का एक -एक पल जिओ l कर्मों द्वारा ऊँचे उठो , कर्मों द्वारा ही उन्नति करो , कर्मों से ही अपना विस्तार करो l जीवन को कलाकार की तरह जीने का , हँसती -हँसाती , खिलती -खिलखिलाती , मस्ती भरी जिन्दगी जीने का संदेश गीता हमें देती है l गीता का संदेश बड़ा स्पष्ट है ---- कभी भी कर्म किए बिना न रहो l जीते हुए धरना देना , धीमे काम करना , हड़ताल करना , भाग खड़े होना , कर्तव्य त्याग देना , अनुपस्थित रहना , यह सब उपाय जीवन को धीमी मृत्यु की ओर ले जाते हैं , सौन्दर्य छीन लेते हैं और जीवन का क्षरण कर डालते हैं l जो कर्म किए बिना जीता है , वह अपने अस्तित्व को खो बैठता है l