28 October 2026

WISDOM -----

   पुराण  में  अनेक  कथाएं  हैं  l  इन  कथाओं  में  प्रत्येक  युग  की  परिस्थितियों  के  अनुरूप  मार्गदर्शन  है  l  इस  कलियुग  में   वर्तमान  में  संसार  में  युवा  वर्ग  में  बहुत  असंतोष  है  l  इस  असंतोष  का  कारण  और  उसका  समाधान  समझने  के  लिए  हमें  भक्त  प्रह्लाद  की  कथा  को  समझना  होगा  l  ----प्रह्लाद  के  पिता  थे  हिरण्यकश्यप  l  वे  स्वयं  को  भगवान  समझते  थे   और  उनका  सख्त  आदेश  था  कि  सम्पूर्ण  प्रजा  उन्हें  ईश्वर  मानकर   उनकी  पूजा   करे  l    अपने  इस   आदेश  को  वे  अपने  पुत्र  प्रह्लाद  पर  भी  सख्ती  से  लागू  करना  चाहते  थे  l  लेकिन  प्रह्लाद  का  कहना  था   कि  आप  मेरे  पिता  हैं  ,मैं  आपका  सम्मान  करता  हूँ  लेकिन  मैं  आपको  ईश्वर   नहीं  मान  सकता  l  हिरण्यकश्यप   का  अहंकार   बोल  उठा  --मेरे  आदेश  को  कैसे  नहीं  मानोगे  ?    उसके  पास  जितने  भी  साधन  थे  , जितना  भी  बल  था  , उससे  उसने  प्रह्लाद  को  सताना  शुरू कर  दिया  , प्रह्लाद  को मारने  का  हर  संभव  प्रयास  किया  l  लेकिन  अंत में  जीत  किसकी  हुई   ?  प्रह्लाद  की  l  हिरण्यकश्यप  को  नृसिंह  भगवान  ने  उसका  पेट  फाड़कर  मार  डाला  l    इस  कथा  में  यही  संकेत  छिपा  हुआ  है    कि आज  जो  पिता  तुल्य    आयु  के  लोग  हैं  , उनका अहंकार  उनके  सिर  पर  चढ़  गया  है  l  इस  आयु वर्ग  के  लोग  परिवार  में  हैं , संस्था  में  , विभिन्न  सरकारों  में  ,  जीवन  के    प्रत्येक  क्षेत्र  में  हैं  l   समस्या  इसीलिए  है   कि  नई  पीढ़ी  की  भावनाओं  को  समझने  वाला ,  उनकी  समस्या  को  सुनने  वाला  कोई  नहीं  है  l  कहीं  कोई समाज  में  अपने  स्टेटस  के  लिए  , अपनी  अधूरी  इच्छा  को  पूरा  करने के  लिए  युवा  वर्ग पर  अपना  नियंत्रण  करना  चाहते  हैं  , कहीं  कोई  अपने  स्वार्थ  के  लिए  इनकी  ऊर्जा   का  उपयोग  करते  हैं  l  उनके  जीवन  को  सही  दिशा  देने  वाला  कोई  नहीं  है  l  प्रौढ़  और  वृद्ध  होते  लोगों  को  अपनी  सोच  को  बदलना  होगा  l  सही अर्थों  में  संवेदनशील   होंगे  , युवाओं   के  मन  को  समझेंगे   तभी  संसार  में  शान्ति  होगी  अन्यथा   धरती पर  संतुलन  लाने  के  लिए  कब   नृसिंह  भगवान  आ  जाएँ  हिरण्यकश्यप  का  अंत  करने  के  लिए   कोई   नहीं  जानता  l  

23 October 2026

WISDOM ----

 पं . श्रीराम  शर्मा आचार्य जी  कहते  हैं  ----' पतन  की  राह  बहुत  आसान  है  l  पानी  नीचे  की ओर तेजी  से  गिरता  है   लेकिन  ऊपर  चढ़ाने  के  लिए  विशेष  प्रयास  करना  पड़ता है  l  बुराई  में  एक  आकर्षण  है  , लाभ    तुरंत  मिलता  है  इसलिए  लोग   बुराई  की  ओर  बढ़  जाते  हैं  l  '  महाभारत    के  दुर्योधन  औए  दु:शासन  आज  असंख्य  मिल  जाएंगे   लेकिन  पांच पांडवों  जैसा   कोई  मिलना  लगभग  असंभव  ही  है  l  यहाँ  एक  महत्वपूर्ण  बात  यह  भी  है  l  कि  जब  दुर्योधन , दु:शासन  पैदा  हुए  थे  तब  ऐसे  नहीं  थे  l  वे  सुयोधन  और  सुशासन  थे  l  उन्हें  अनीति  और  अधर्म  के  मार्ग  पर  चलने  वाला   और  छल , कपट  , षड्यंत्र   रचने  वाला   दुर्योधन  और  दु:शासन  किसने बना  दिया   ?     इनके  मामा  ' शकुनि '  ने  ही    दुर्योधन  , दु: शासन  के  बाल्यकाल  से  ही  उनके  मन  में  पांडवों  के  विरुद्ध  जहर  भरना शुरू कर  दिया  था  l    आज संसार  में   ' मामा शकुनि '  जैसे  लोगों  की  भरमार  है   l   ऐसे  लोग  दूसरों  का  माइंड   वाश  करके  , उन्हें  मेनुप्लेट  कर  के  गलत  राह    पर  धकेल  देते  हैं  l   किसी  के  सुखी  परिवार  में  कलह  पैदा  करना  , पति -पत्नी  में  मनमुटाव  कर   उन्हें  अलग  करा  देने  में  ऐसे  शकुनि  बड़ी  भूमिका  अदा  करते  हैं  l  वैश्वीकरण  के  इस  युग  में  शकुनि  अंतर्राष्ट्रीय  स्तर  पर  छा  गए  हैं  l ईश्वरीय  विधान  में  भी  दखल  करने  लगे  हैं  l  ईश्वर  ने  किसी  को  लड़का  बनाया    तो  कोई न  कोई   शकुनि  उनके  दिमाग  में  भर  देगा  कि  उन्हें  तो  लड़की  होना चाहिए  l  शारीरिक  परिवर्तन  तो  हो  गया  लेकिन  मन  और  चेतना  तो  नहीं  बदली  , जीवन   का  संतुलन  बिगड़  गया  l  ऐसे  शकुनि  विभिन्न  क्षेत्रों  में  फैले  हैं  , संसार  में  होने वाली  विभिन्न  अपराधिक  गतिविधियों   में  उनकी  बहुत  बड़ी  भूमिका  है  l  दुर्योधन  को  अपने  अंतिम  समय  में  होश  आया  था  कि   हस्तिनापुर  का  युवराज  होते  हुए  भी  उसने  अपना सारा  जीवन   छल ,कपट  और  षड्यंत्र  करते  ही  बिता  दिया  , जीवन  व्यर्थ  हो  गया  l   महाभारत  के  विभिन्न   पात्रों   का   चरित्र  हमें  जागरूक  करने  के  लिए  है  , हम  होश  में  रहकर  जीवन  जियें  , जीवन  को सार्थक  करें  l 

22 October 2026

WISDOM -----

   महाभारत  का  महायुद्ध  राजपरिवार  में  भाई -भाई  के   बीच  था  l  सामान्य  प्रजा  का   उसमें कोई  दखल  न  था  l  लेकिन  युद्ध  में  जो  कुछ  हुआ ,    उसका  प्रभाव   सामान्य  जन -जीवन  पर   वर्तमान  समय  में  भी  देखा  जा  सकता  है  l  इस  युद्ध  में  एक  पात्र  है  --- घटोत्कच  '  यह   महाबली  भीम  का  पुत्र  था   और  मायावी  विद्या  जानता  था  l  वह अद्रश्य होकर  कौरवों की  सेना  पर  आक्रमण  करता  था  l  उसने  अपनी  मायावी  विद्या  से  कौरव  सेना  को  इतना  त्रस्त  कर  दिया  कि  उसका  अंत  करने  के  लिए  कर्ण  को  देवराज  इंद्र  द्वारा  प्राप्त  दिव्य  शक्ति  का  प्रयोग  करना  पड़ा  l  घटोत्कच  का  अद्रश्य  होकर  युद्ध  करना  वर्तमान  युग  में  बड़ा  लोकप्रिय  है  l  अब वैसा  युद्ध  तो  नहीं  होता  लेकिन    संसार  में  जो  विभिन्न  दंगे , हत्याएं   आदि  विभिन्न  तरीके  के  जो बड़े व्  जघन्य  अपराध  होते  हैं  , उनके  पीछे   जो  मास्टर  माइंड  होता  है  , वह  अद्रश्य  ही  होता  है  l  कलियुग  में  कायरता  बहुत  बढ़  गई  है  l  लोग  अपने  अहंकार  के  कारण   परिवार  में  ,  विभिन्न    संस्थाओं  में  जिससे  ईर्ष्या  करते  हैं  , चिढ़ते  हैं  ,  उसकी  तरक्की  को  रोकना  चाहते  हैं  उस  पर  सामने  से  वार  नहीं  करते   l  वे  उसको  उत्पीड़ित  करने  के  लिए   किसी  को   लाभ  का  लालच  देकर   नियुक्त  करते  हैं  l  समाज  में  अपनी  प्रतिष्ठा  बनाए  रखने  के  लिए  भी   लोग  प्रत्यक्ष  रूप  में  बहुत  शरीफ , धार्मिक , समाज सेवी   बने  रहते  हैं   और  अपनी  अपराधिक  गतिविधियों  को  अंजाम  देने  के  लिए  अनेक  लोगों  की  मदद  लेते  हैं  l  इस  तरीके से  मदद  करने  वालों  का  एक  छुपा  हुआ  संगठन  बन  जाता  है   जो  उनके  रोजगार  का  साधन  भी  है l  आचार्य श्री  ने कहा  है  --- कायरता  इस  समाज  का  सबसे  बड़ा कलंक  है  l  संसार  में  समस्त  उत्पीड़न  का  दायित्व  कायरों  पर  है  l '

20 October 2026

WISDOM ------

 कहते हैं  व्यक्ति  की  मृत्यु  उसके  जीवन  के  सत्य  को  उजागर  करती  है  कि  उस व्यक्ति  ने  अपना  जीवन  कैसे  जिया  l  रावण  एक  असुर  था  l  अपनी  आसुरी  प्रवृतियों  के  बावजूद  उसने   शिवजी  की  घोर तपस्या  की  और  अनेक  वरदान  प्राप्त  किए  l  रावण   महापंडित , महाज्ञानी  था  l  उसमें  ऐसा  कुछ  विशेष  था  कि  उसका  अंत  करने  स्वयं  भगवान  को  आना  पड़ा  l  जिसकी  मृत्यु  के  समय  स्वयं  ईश्वर  सामने  हों   तो  उसकी  आत्मा  को  सम्मान  के  साथ  ले  जाने  के  लिए   वैकुण्ठ  से  भगवान  का  विमान  आता  है  ,  उसकी  मुक्ति  हो  जाती  है  l  यदि  हम  वर्तमान  के  असुरों  को  देखें   तो  इनके  और  भी  कई  नाम  हैं  , जो  इनके  पापकर्मों  के  कारण  इन्हें  दिए  गए  हैं  जैसे  पिशाच , एनर्जी  वैम्पायर , नार्सिस्ट ,  अपनी  शक्तियों  का  दुरूपयोग  करने  वाले  , भूत -प्रेत  आदि  एन्टिटी  के माध्यम  से  दूसरों  को  सताने  वाले  तांत्रिक   l  ऐसे  कई  नाम  इन्हें  दिए  जा  सकते  हैं  l  रावण  भी  महान  तांत्रिक  था  , मायावी  था  लेकिन  उसके  पास  जो  ऊर्जा  थी  वह  उसने  अपनी  तपस्या  से  प्राप्त  की  थी  l  उसने  एनर्जी  वैम्पायर  की  तरह  किसी  की  ऊर्जा  को  चुराया  नहीं  था  l  लेकिन  आज  के  जो  असुर  हैं  वे  दूसरों  की  ऊर्जा  को  चूसकर  ,  स्वयं  को  भगवान  मानकर  अपने  जीवन  में  एन्जॉय  करते  हैं  l  ऐसे  लोग  वास्तव  में  अमर  बेल  की  तरह  हैं  जो  दूसरों  के  बल  पर  जीते  हैं  l  इन  लोगों  का  अंत  बहुत  कष्टकर  होता  है   और  कहते  हैं  मृत्यु  के  बाद  इनकी  आत्मा  को  यमदूत   कोढ़े  मारते  हुए  , घसीटते  हुए  ले  जाते  हैं  l  ऐसे  लोग  मानव  समाज  के  लिए  हर  तरह  से  अभिशाप  हैं  ,  ऐसे  लोग  जब  तक  जीवित  रहते  हैं  , अपने  अहंकार  और  अपनी  अनेक  बुराइयों  के  कारण  लोगों  को  शारीरिक  और  मानसिक  रूप  से  उत्पीड़ित  करते  हैं  l  मरने  के  बाद  इनकी  मुक्ति  नहीं होती  ,  तब  ये  भूत -प्रेत , पिशाच , जिन्न  आदि  बनकर   लोगों  को  सताते  हैं  , अपनी  अतृप्त  इच्छाओं  को  पूरा  करते  हैं   और  सम्पूर्ण  वायुमंडल  को  नकारात्मक  कर  देते  हैं  l  उनकी  कभी  शांत  न  होने  वाली  भूख  के  कारण  ही   संसार  में  उत्पात , दुर्घटना , सामूहिक  मृत्यु  आदि  दिल  दहलाने  वाली  घटनाएँ  होती  है  l  इस  समस्या  का  एक  ही  समाधान  है   कि  सम्पूर्ण  संसार   सामूहिक  रूप  से  ' गायत्री मंत्र ' का  जप  करे  l  गायत्री  मंत्र  से  स्वयं  के  लिए  एक  सुरक्षा  कवच  बन  जाता  है  , स्वयं  ईश्वर  इन  पापियों  से  रक्षा  करते  हैं   और  गायत्री मंत्र  के  जप  से  प्रकृति  को  पोषण  मिलता  है   , मन्त्र  के  प्रभाव  से  ये  पापी   कम  से  कम  भूत -प्रेत  बनकर  संसार  को  कष्ट  न  दें  , किसी  अन्य  लोक  में  जाएँ  तभी  इस  संसार  में   मनुष्य  सुकून  की  जिन्दगी  जी  सकता  है  l  

16 October 2026

WISDOM -----

 हमारे  प्राचीन  ऋषि  मानव  मन  के  मर्मज्ञ  थे  l  उन्होंने  मानव  समाज  के  कल्याण  के  लिए  चार  आश्रम  की  व्यवस्था  की  थी  ---- ब्रह्मचर्य आश्रम , गृहस्थाश्रम , वानप्रस्थ  आश्रम  और  संन्यास आश्रम  l  इस  आश्रम  व्यवस्था  के  पालन  से  संसार  में  शांति  संभव  है  l  आज  सम्पूर्ण  संसार  में  बेहद  अशांति  है  ,  युवा  वर्ग  सबसे  ज्यादा  परेशान  है  l   युवाओं  का  परेशान  होना  स्वाभाविक  है  क्योंकि  उनकी  एनर्जी   का  उत्पादक  कार्यों  में  उपयोग  नहीं  हो  रहा   इसलिए  वे  भटक  रहे  हैं  ,  उन्हें  कोई  सही  रास्ता  , सही  दिशा  नहीं  मिल  रही  है  l  आश्रम  व्यवस्था  से  यह  समस्या  हल  हो  सकती  है   l  इसे  सरल  ढंग  से  इस  तरह  समझ  सकते  हैं    जैसे  ------  जब  कभी  सड़कों  पर  जाम  लग  जाता  है  , यदि  जो  लोग  और  वाहन  आदि  जो  सबसे  आगे  हैं  , यदि  वे  आगे  नहीं  बढ़ेंगे  तो  यह  जाम  बढ़ता  ही  जायेगा  l  यदि  उचित  व्यवस्था  नहीं  हुई  तो  जाम  इतना  अधिक  हो  जायेगा , निरंतर  बढ़ता  जायेगा  l  लोग  परेशान  होंगे  और  कोहराम  मच  जायेगा  l  आज  सारे  संसार  में  जाम  लग  गया  है  l  हमारे  ऋषियों  ने  वानप्रस्थ  और  संन्यास  आश्रम  की  इसीलिए  व्यवस्था  की  थी  कि   एक  निश्चित  आयु के  बाद  व्यक्ति   सांसारिक  आकर्षण  में उलझा  न  रहे  ,   अपने  जीवन  के  अनुभव  और  समाज  से  जो  मिला  है  , वह  निष्काम  भाव  से  समाज  को  दे   ,  जिस  से  युवा  पीढ़ी  के  लिए  रास्ता  खाली  हो  जाये   और  उन्हें  अपनी  ऊर्जा  का  सदुपयोग  करने  का  पर्याप्त  अवसर  मिले  l  लेकिन  वर्तमान  की  जो  स्थिति  है  उसमें  त्याग  का  भाव   कहीं  नहीं  है  l  हर  क्षेत्र  में  जाम  लगा  है   कहीं  लालच  का , कहीं  महत्वाकांक्षा  का   l   आयु  की  एक  सीमा  पार  कर  गए   लोगों  में   कामना , वासना  , अहंकार  , स्वार्थ  , भोग -विलास  की  लालसा  इतनी  अधिक  है    कि   इस  कारण  युवा  पीढ़ी   को  अपनी  एक  पहचान  बनाने  का  मौका  ही  नहीं  मिल  रहा  l  युवा  पीढ़ी  का  ज्ञान , उनकी  वैज्ञानिक  समझ , और  अथक  ऊर्जा  का  भण्डार  , उनकी  कुंठा  के  साथ  मिलकर   किस  रूप  में  संसार  के  सामने  आएगा   यह  तो  वक्त  ही  बताएगा  l  

9 October 2026

WISDOM -----

   वर्तमान  समय  कुछ  ऐसा  है  कि  लोगों  के  मन  बहुत  अशांत  हैं  l  इसका  एक  ही  कारण  समझ  में  आता  है  कि   व्यक्ति  धन  के  पीछे  भाग  रहा  है  , ईश्वर  से  दूर  हो  गया  है   इसलिए  जीवन  का  संतुलन  बिगाड़ गया  है  l  धन  जीवन  के  लिए  बहुत  जरुरी  है  ,  धन  के  बिना  तो  जीवन  संभव  ही  नहीं  है  लेकिन  जीवन  की  इस  भाग -दौड़  में  हम   प्रार्थना  के  माध्यम  से  ईश्वर  से  जुड़  जाएँ  तो   मन  की  यह  अशांति  दूर  हो  सकती  है  l  ईश्वर  सर्वशक्तिमान  हैं  , उनके  पास  कोई  कमी नहीं  हैं  l  फूल -माला   और  भोग  -प्रसाद  से  , कोरे  कर्मकांड  से  उन्हें  प्रसन्न  नहीं  किया  जा  सकता  l  जब  हम  सच्चे  ह्रदय  से  ईश्वर  को  पुकारते  हैं  , प्रार्थना  करते  हैं  तब  हमारे  मन  के  तार  ईश्वर  से  जुड़  जाते  हैं  ,  हमारी  प्रार्थना  ईश्वर  तक  पहुँच जाती  हैं   और  हमारी  समस्याओं  का  समाधान  हमें  हमारी  अंतरात्मा  में  ही  मिल  जाता  है  l  प्रार्थना  के  साथ  अपनत्व  का  भाव  जुड़  जाए  तो  प्रार्थना  को  बल  मिल  जाता  है  जैसे  हम  उन्हें  अपना  मित्र , सखा , माता , पिता , भाई  जैसे  किसी  भी  रिश्ते  से  जोड़कर  पुकारें  तो  उससे  मन  में  एक  विश्वास  पैदा  हो  जाता  है  कई  प्रार्थना  अवश्य  सुनी  जाएगी  l  भगवान  श्रीकृष्ण  के  एक  मित्र  थे  --- सुदामा '  बहुत  निर्धन  थे  l  जब  उनकी  पत्नी  को  पता  चला  कि  द्वारकाधीश  भगवान  श्रीकृष्ण  उनके   मित्र  हैं  तो  उन्होंने  सुदामा जी  को  विवश  किया  कि  वे  द्वारका जाएँ  , मित्र  से  कुछ  मदद  अवश्य  मिलेगी  l  पोटली  में  कुछ  चावल  लेकर  सुदामा जी  चल  दिए  l  रास्ते  भर  वे   मित्र  भाव  से   उनका  स्मरण  करते  रहे   l  द्वारका  पहुंचे  , द्वारपालों  को  तो विश्वास  ही  नहीं  हुआ  कि  ऐसा  फटेहाल  भगवान  का  मित्र  भी  हो  सकता  है  लेकिन  जैसे  ही  श्रीकृष्ण  को  पता  चला  कि  सुदामा  आए  हैं  तो  दौड़कर  उन्हें  गले  लगा  लिया  ,  उनकी  निर्धनता  देखकर  भगवान  की  आँखों  में  आँसू  आ  गए  l  सुदामा जी  की  पोटली  से  तीन  मुट्ठी  चावल  खाकर  उन्हें  तीन  लोकों  की  संपदा  दे  दी  ,  उनकी  निर्धनता  दूर  हो  गई  l  इस  कथा  का  सार  यही  है  कि  जब  हम  ईश्वर  से  किसी  भाव  से  जुड़  जाते  हैं  तभी  हमारा  कल्याण  होता  है  l  संपदा  मिलनेका  अभिप्राय  यही  है  कि  जब  हम  अपनी  किसी  भी  समस्या  के  समाधान  के  लिए  ईश्वर  से  प्रार्थना  करते  हैं  तो  किसी  न  किसी  माध्यम  से   या  अपने  अंत:करण  की  प्रेरणा  से  जीवन  को  सही  मार्गदर्शन  मिल जाता  है , कहीं  भटकते  नहीं  हैं  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ----- " अपना  अस्तित्व  और  भविष्य  ईश्वर  के  हाथों  सुरक्षित  मानने की  भावना  ऐसी  है  ,  जिसे  अपनाये  रहने  और  बढ़ते  चलने  से  हर  कोई  निश्चिंतता   प्राप्त  कर  सकता  है  l "

5 October 2026

WISDOM -----

 जो  लोग  अनीति  और   अधर्म  पर  होते  हैं   ,  और  जो  लोग  ऐसे  अन्यायी और   छल , कपट  , षड्यंत्र  करने  वालों  का  साथ  देते  हैं  ,  ऐसे  लोगों  की  जिन्दगी  में  जब  कोई  विकत  परिस्थिति  आती  है   तब  उनका  बुद्धि , विवेक  सब  शून्य  हो  जाता  है  l  वे  चाहे  कितने  भी  ज्ञानी  हों , शक्तिशाली  हों  , उनका  विवेक  उनका  साथ  नहीं  देता  , उन्हें  सही  सलाह  नहीं  मिल  पाती  l   वे  अपनी  ही गलतियों  से  अपने  जीवन  को  जोखिम  से  भर  लेते  हैं  l  महाभारत  का  ही  प्रसंग  है  ---- जब  युद्ध  में  गुरु  द्रोणाचार्य  सेनापति  थे  , उनकी वीरता  के  आगे  पांडव  सेना  का  टिकना  मुश्किल  था   l  उस  समय  महाबली  भीम  ने  यह  अफवाह  उड़ा  दी   कि  अश्वत्थामा  मारा  गया  l  द्रोणाचार्य  शस्त्र  और  शास्त्र  के  ज्ञाता  था  , उन्हें  मालूम  था  की  उनका    पुत्र  अश्वत्थामा   अमर  है   फिर  भी  उन्होंने  भीम  की  बात  पर  विश्वास  कर  लिया  l  उन्होंने  इस   बात  की  प्रमाणिकता  के  लिए   अश्वत्थामा  के  परम  मित्र    युवराज  दुर्योधन   से  नहीं  पूछा  l   राजसुख  भोगने  के  लिए   दुर्योधन  का   अन्न  खाने  से  उनकी  बुद्धि  भ्रमित  हो  गई   और  उन्होंने  शत्रु  पक्ष  के   युधिष्ठिर  से  पूछा  कि  --- तुम  सत्यवादी  हो  , बताओ  क्या  मेरा  पुत्र  अश्वत्थामा  मारा  गया  l  अब  युधिष्ठिर  तो  सत्यवादी  थे   पर  शेष  सब  उनकी  तरह  नहीं  थे  ,  फिर  उनके  पक्ष  में  भगवान  श्रीकृष्ण  थे  ,  शत्रु  को  पराजित  करने  की  रणनीति   उनसे  अच्छी  और  कौन   जान   सकता   है  l  इसी  तरह  महारथी  कर्ण  का  पहिया  भी  जब  युद्ध  में  कीचड़  में  फंस  गया   तब  वह  ब्रह्मास्त्र  विद्या  ही  भूल  गया  l  इसके  पीछे  उसे   परशुराम    जी  से  मिला  श्राप  तो  था  लेकिन  एक  वजह  यह  भी  थी  कि  उसने  दुर्योधन  की  कृपा  से  मिले   राजमुकुट  का  एहसान  चुकाने  के  लिए   निरंतर  षडयंत्र  करने  वाले , अनीति  के मार्ग  पर  चलने  वाले  दुर्योधन  का  साथ  दिया   तो  यह  होना  ही था  l  इसलिए  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  कहते  हैं  -----  अपना  एक  रिश्ता  ईश्वर  से   रखो  l  माता , पिता , भाई  , मित्र   किसी  भी  रूप  में  उन्हें   हर  पल  याद करो  l  धीरे -धीरे  यह  रिश्ता  पक्का  हो  जायेगा  l  ईश्वर  कभी  किसी  को  निराश  नहीं  करते  l  ऐन  वक्त  पर  वे  हमारे  विवेक  को  जगा  देते  हैं   और  बड़ी  से  बड़ी  मुसीबत  से  उबार  लेते  हैं  ,  हर  पल  रक्षा  करते  हैं  l  ईश्वर  विश्वास  में  बहुत  शक्ति  है  l