9 October 2026

WISDOM -----

   वर्तमान  समय  कुछ  ऐसा  है  कि  लोगों  के  मन  बहुत  अशांत  हैं  l  इसका  एक  ही  कारण  समझ  में  आता  है  कि   व्यक्ति  धन  के  पीछे  भाग  रहा  है  , ईश्वर  से  दूर  हो  गया  है   इसलिए  जीवन  का  संतुलन  बिगाड़ गया  है  l  धन  जीवन  के  लिए  बहुत  जरुरी  है  ,  धन  के  बिना  तो  जीवन  संभव  ही  नहीं  है  लेकिन  जीवन  की  इस  भाग -दौड़  में  हम   प्रार्थना  के  माध्यम  से  ईश्वर  से  जुड़  जाएँ  तो   मन  की  यह  अशांति  दूर  हो  सकती  है  l  ईश्वर  सर्वशक्तिमान  हैं  , उनके  पास  कोई  कमी नहीं  हैं  l  फूल -माला   और  भोग  -प्रसाद  से  , कोरे  कर्मकांड  से  उन्हें  प्रसन्न  नहीं  किया  जा  सकता  l  जब  हम  सच्चे  ह्रदय  से  ईश्वर  को  पुकारते  हैं  , प्रार्थना  करते  हैं  तब  हमारे  मन  के  तार  ईश्वर  से  जुड़  जाते  हैं  ,  हमारी  प्रार्थना  ईश्वर  तक  पहुँच जाती  हैं   और  हमारी  समस्याओं  का  समाधान  हमें  हमारी  अंतरात्मा  में  ही  मिल  जाता  है  l  प्रार्थना  के  साथ  अपनत्व  का  भाव  जुड़  जाए  तो  प्रार्थना  को  बल  मिल  जाता  है  जैसे  हम  उन्हें  अपना  मित्र , सखा , माता , पिता , भाई  जैसे  किसी  भी  रिश्ते  से  जोड़कर  पुकारें  तो  उससे  मन  में  एक  विश्वास  पैदा  हो  जाता  है  कई  प्रार्थना  अवश्य  सुनी  जाएगी  l  भगवान  श्रीकृष्ण  के  एक  मित्र  थे  --- सुदामा '  बहुत  निर्धन  थे  l  जब  उनकी  पत्नी  को  पता  चला  कि  द्वारकाधीश  भगवान  श्रीकृष्ण  उनके   मित्र  हैं  तो  उन्होंने  सुदामा जी  को  विवश  किया  कि  वे  द्वारका जाएँ  , मित्र  से  कुछ  मदद  अवश्य  मिलेगी  l  पोटली  में  कुछ  चावल  लेकर  सुदामा जी  चल  दिए  l  रास्ते  भर  वे   मित्र  भाव  से   उनका  स्मरण  करते  रहे   l  द्वारका  पहुंचे  , द्वारपालों  को  तो विश्वास  ही  नहीं  हुआ  कि  ऐसा  फटेहाल  भगवान  का  मित्र  भी  हो  सकता  है  लेकिन  जैसे  ही  श्रीकृष्ण  को  पता  चला  कि  सुदामा  आए  हैं  तो  दौड़कर  उन्हें  गले  लगा  लिया  ,  उनकी  निर्धनता  देखकर  भगवान  की  आँखों  में  आँसू  आ  गए  l  सुदामा जी  की  पोटली  से  तीन  मुट्ठी  चावल  खाकर  उन्हें  तीन  लोकों  की  संपदा  दे  दी  ,  उनकी  निर्धनता  दूर  हो  गई  l  इस  कथा  का  सार  यही  है  कि  जब  हम  ईश्वर  से  किसी  भाव  से  जुड़  जाते  हैं  तभी  हमारा  कल्याण  होता  है  l  संपदा  मिलनेका  अभिप्राय  यही  है  कि  जब  हम  अपनी  किसी  भी  समस्या  के  समाधान  के  लिए  ईश्वर  से  प्रार्थना  करते  हैं  तो  किसी  न  किसी  माध्यम  से   या  अपने  अंत:करण  की  प्रेरणा  से  जीवन  को  सही  मार्गदर्शन  मिल जाता  है , कहीं  भटकते  नहीं  हैं  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ----- " अपना  अस्तित्व  और  भविष्य  ईश्वर  के  हाथों  सुरक्षित  मानने की  भावना  ऐसी  है  ,  जिसे  अपनाये  रहने  और  बढ़ते  चलने  से  हर  कोई  निश्चिंतता   प्राप्त  कर  सकता  है  l "

5 October 2026

WISDOM -----

 जो  लोग  अनीति  और   अधर्म  पर  होते  हैं   ,  और  जो  लोग  ऐसे  अन्यायी और   छल , कपट  , षड्यंत्र  करने  वालों  का  साथ  देते  हैं  ,  ऐसे  लोगों  की  जिन्दगी  में  जब  कोई  विकत  परिस्थिति  आती  है   तब  उनका  बुद्धि , विवेक  सब  शून्य  हो  जाता  है  l  वे  चाहे  कितने  भी  ज्ञानी  हों , शक्तिशाली  हों  , उनका  विवेक  उनका  साथ  नहीं  देता  , उन्हें  सही  सलाह  नहीं  मिल  पाती  l   वे  अपनी  ही गलतियों  से  अपने  जीवन  को  जोखिम  से  भर  लेते  हैं  l  महाभारत  का  ही  प्रसंग  है  ---- जब  युद्ध  में  गुरु  द्रोणाचार्य  सेनापति  थे  , उनकी वीरता  के  आगे  पांडव  सेना  का  टिकना  मुश्किल  था   l  उस  समय  महाबली  भीम  ने  यह  अफवाह  उड़ा  दी   कि  अश्वत्थामा  मारा  गया  l  द्रोणाचार्य  शस्त्र  और  शास्त्र  के  ज्ञाता  था  , उन्हें  मालूम  था  की  उनका    पुत्र  अश्वत्थामा   अमर  है   फिर  भी  उन्होंने  भीम  की  बात  पर  विश्वास  कर  लिया  l  उन्होंने  इस   बात  की  प्रमाणिकता  के  लिए   अश्वत्थामा  के  परम  मित्र    युवराज  दुर्योधन   से  नहीं  पूछा  l   राजसुख  भोगने  के  लिए   दुर्योधन  का   अन्न  खाने  से  उनकी  बुद्धि  भ्रमित  हो  गई   और  उन्होंने  शत्रु  पक्ष  के   युधिष्ठिर  से  पूछा  कि  --- तुम  सत्यवादी  हो  , बताओ  क्या  मेरा  पुत्र  अश्वत्थामा  मारा  गया  l  अब  युधिष्ठिर  तो  सत्यवादी  थे   पर  शेष  सब  उनकी  तरह  नहीं  थे  ,  फिर  उनके  पक्ष  में  भगवान  श्रीकृष्ण  थे  ,  शत्रु  को  पराजित  करने  की  रणनीति   उनसे  अच्छी  और  कौन   जान   सकता   है  l  इसी  तरह  महारथी  कर्ण  का  पहिया  भी  जब  युद्ध  में  कीचड़  में  फंस  गया   तब  वह  ब्रह्मास्त्र  विद्या  ही  भूल  गया  l  इसके  पीछे  उसे   परशुराम    जी  से  मिला  श्राप  तो  था  लेकिन  एक  वजह  यह  भी  थी  कि  उसने  दुर्योधन  की  कृपा  से  मिले   राजमुकुट  का  एहसान  चुकाने  के  लिए   निरंतर  षडयंत्र  करने  वाले , अनीति  के मार्ग  पर  चलने  वाले  दुर्योधन  का  साथ  दिया   तो  यह  होना  ही था  l  इसलिए  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  कहते  हैं  -----  अपना  एक  रिश्ता  ईश्वर  से   रखो  l  माता , पिता , भाई  , मित्र   किसी  भी  रूप  में  उन्हें   हर  पल  याद करो  l  धीरे -धीरे  यह  रिश्ता  पक्का  हो  जायेगा  l  ईश्वर  कभी  किसी  को  निराश  नहीं  करते  l  ऐन  वक्त  पर  वे  हमारे  विवेक  को  जगा  देते  हैं   और  बड़ी  से  बड़ी  मुसीबत  से  उबार  लेते  हैं  ,  हर  पल  रक्षा  करते  हैं  l  ईश्वर  विश्वास  में  बहुत  शक्ति  है  l  

29 September 2026

WISDOM -----

   इस  संसार  में  अच्छाई  - बुराई  ,  अंधकार  और  प्रकाश  का  अस्तित्व  है  l  इस  अस्तित्व  का  व्यवहारिक  रूप   हमें  संसार  में   मनुष्यों  की  आदतें , उनके  कार्य  करने  के  तरीके , उनके  गुण -अवगुण  आदि  के  द्वारा  समझ  में  आता  है  l  यह  संसार  एक  रंगमंच  है   और   व्यक्ति  को  इस नाटक में  कौन  सा  पार्ट  अदा  करना  है  यह  उसके   पूर्व  में  किए  गए  कर्म  और  उस  दिशा  में  आगे  बढ़ने  की    संभावनाओं  पर  निर्भर  करता  है  l  महत्वपूर्ण  बात  यह  है कि   यदि  कोई  व्यक्ति  अध्यात्म  पथ  पर   आगे  बढ़ता  है  , सन्मार्ग  पर  चलकर  , सत्कर्म  कर  के  अपनी  चेतना  को  उच्च  स्तर  पर  ले  जाने  के  लिए  प्रत्यनशील  है   तो  उसके  मार्ग  में  अनेक  बाधाएं  आएँगी  l वास्तव  में  ये  बाधाएं  नहीं  हैं  , ये  ईश्वर  द्वारा  ली  जाने  वाली  परीक्षाएं  हैं   l  इन  परीक्षाओं  में  मुख्यतः चार  पेपर  ही होते  हैं ----  काम  , क्रोध , लोभ  और  मोह  l   ये  पेपर  पहले  से  ही  लीक  होते  हैं  l  यदि  मनुष्य  अपने  भीतर  की  कमियों  को  जानता  है   तो  वह  आसानी  से  समझ  सकता  है  कि  कौन  सा  पेपर  सबसे  कठिन  होगा  जैसे  कोई व्यक्ति  मंत्र जप , नाम स्मरण , नेक  कर्म  आदि  विभिन्न  सात्विक  तरीकों  से  अध्यात्म  पथ  पर  आगे  बढ़  रहा  है  लेकिन  उसमें  काम  वासना  बहुत  है , धन  का  लालच  बहुत  है   तो  उसके  मन  को  लुभाने  के  अनेक  प्रस्ताव  उसके  सामने  आएंगे   ताकि  उनकी  टांग  खींचकर  नीचे  धकेला  जा  सके  l  अब  ईश्वर  स्वयं  तो  परीक्षा  लेने  आते  नहीं  हैं  , इन  परीक्षाओं  का  कंट्रोल   रूम  बुरे  लोगों  के  पास  होता  है   जिनके  पास  लोगों  को  सताने   के   अनेक  तरीके  होते  हैं  , साम , दाम , दंड , भेद  , छल , कपट , षड्यंत्र , तंत्र , मंत्र , ब्लैक मैजिक   आदि  अनेक  तरीकों  से  वे   जी -तोड़  कोशिश  करते  हैं  कि   व्यक्ति  आगे  न  बढ़  पाए , नीचे  गिरकर  उनकी आसुरी  प्रवृत्ति   में  सहयोगी  हो जाए l  यही  परीक्षा  है  l  कर्मों  की  गति  को  यदि  हम  समझें  तो  यहाँ  ' एक पंथ , दो  काज  '  हैं  l  बुरे  लोगों  के  माध्यम  से  अध्यात्म  पथ  के  पथिक  की  परीक्षाएं  भी  हो  जाती  हैं  , और   अनेक  बुरे  कर्म  करते -करते  उनका  पाप  का  घड़ा  भी  भरता  जाता  है  l  जो  सन्मार्ग  पर  हैं   वे  पुण्य  कर्म  कर  के  अपना  पुण्य  का  घड़ा  भरते  जाते  हैं  ,   अध्यात्म  -पथ  पर  आगे  बढ़ते  जाते  हैं  l  यदि    कोई  भूल  हो  गई  , नीचे  लुढ़क  गए  तो  ईश्वर  उन्हें  पुन:  आगे   बढ़ने    का  - ऊपर  उठने  का  मौका  अवश्य  देते  हैं  l  अपनी चेतना  को  उच्च  स्तर  पर  ले  जाने  का  मौका  तो  भगवान  सभी  को  देते  हैं   लेकिन  जिनकी  बुद्धि  पापकर्म  में  लिप्त  है   वे  उसे  समझ  नहीं  पाते  , वे  स्वयं  को  ही  भगवान  समझते  हैं  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  कहते  हैं  --- सत्कर्म  करो , सन्मार्ग  पर  चलो  , गायत्री मंत्र  का  जप  करो    ताकि  हमारे  प्रारब्ध  के  जो  भी  बुरे  कर्म  हैं  , वे  कट  जाएँ  , समाप्त  हो  जाएँ     और  युग - परिवर्तन  जैसे  श्रेष्ठ  कार्यों  के  लिए  , ईश्वरीय  योजना  में  सहयोग  देने  के  लिए  हमारा  चयन  हो  सके  l  

19 September 2026

WISDOM ------

 कहते  हैं  जो  कुछ  महाभारत  में  है  वही  इस  धरती  पर  भी  है   और  अहंकार  एक  ऐसा  रोग  है  जो  शक्ति  और  सम्पन्नता  के  साथ   रहने  वाला  असाध्य  रोग  है  l  इस  अहंकार  को  किसी  की  सलाह  पसंद  नहीं  है  , किसी  ने  भी  उनके  अहं    को  चुनौती  दी  तो  खैर  नहीं  !  यह  स्थिति   प्रत्येक  युग  में  रही  है  l  महाभारत  में  विदुर   नीति निपुण  , महाज्ञानी  थे  l  धृतराष्ट्र  को  राज-काज  संबंधी  सही  सलाह  देते  थे  , कभी  कुछ  ऐसी  सलाह  दी   जो  युवराज  दुर्योधन  को   सहन  न  हो  सकी  और  उसने  विदुर जी  को   राजमहल  से  , सभी  राज सुख  से  बाहर  कर  दिया   और  तब  विदुर जी  महल  से  बाहर  कुटिया  बनाकर  रहने  लगे  l  उस  समय  ऐसे  अपराध  का  यही  दंड  था  , जेल  या   किसी  प्रकार  का  उत्पीड़न  नहीं  था  l  ऐसी  परिस्थिति  में  रहने  पर  विदुर  जी  का  स्वाभिमान  से  जीवन  जीना  प्रेरणादायी  है  l  उनके  जीवन  की  श्रेष्ठता  ऐसी  थी  कि  उन्हें  ईश्वर  की  कृपा  मिल  गई  थी  और  जिसे  ईश्वर  की  कृपा  मिल  जाए  , उसके  लिए  सिंहासन , राजसुख  सब  मिटटी  के  समान  हैं  l  विदुर जी  के  सामने  दुर्योधन  की  सबसे  बड़ी  हार  यही  थी  कि  स्वयं  भगवान  कृष्ण   दुर्योधन  के  राजमहल  के  मेवा , पकवान  त्याग  कर  विदुर  जी  के  यहाँ  साग -रोटी  खाकर  तृप्त  हुए  l  सुख  कभी  स्थायी  नहीं  होता  , जिन्हें  राज सुख  का  लालच  था  , अत्याचार  और  अनीति  का  साथ  देने  के  कारण  दुर्योधन  के  साथ  उनका  भी  अंत  हुआ  l  

17 September 2026

WISDOM ----

 प्रकृति  में  क्षमा  का  प्रावधान  नहीं  है  l  जैसे  कर्म  किए हैं  वैसा  ही  फल  अवश्य  मिलेगा  लेकिन  यह  कब  और  किस  रूप में  मिलेगा  , इसे  काल  निश्चित  करता  है  l   अब  वर्तमान  समय  में  लालच , स्वार्थ  , अहंकार  , महत्वाकांक्षा  ----- आदि  बुराइयाँ  इतनी  बढ़  गईं  हैं  कि   किसी को  अपराधी  घोषित  करने  और  दंड  देने  से  पहले  अपना  स्वार्थ  आड़े  आ  जाता  है  l  सामान्य  जन  भी   अपने  स्वार्थ  और  डर  की  वजह  से  भी  अपने  परिवार  और  समाज  के  अपराधियों  को  सहर्ष  स्वीकार  करते   है  l  यह  सब  कुछ  नया  नहीं  है  , महाभारत  में  भी  धृतराष्ट्र   पुत्र  मोह  में  अंधे  थे  l  दुर्योधन  बाल्यकाल  से  ही  पांडवों  के  विरुद्ध  षडयंत्र करता  रहा   लेकिन  धृतराष्ट्र  ने  , भीष्म  पितामह  ने  उस  पर  कोई  नियंत्रण  नहीं  रखा   l  उसे  उसकी  गलतियों  की  कभी  कोई  सजा  नहीं  दी , उसकी  उद्दंडता  बढ़ती  ही  गई  l    लेकिन  ईश्वरीय  विधान  ऐसा  नहीं  है   l  ईश्वर  को  संसार  के  प्रत्येक  व्यक्ति  के  हर  पल  की , उसकी  उठती -गिरती  सांसों  की  जानकारी  है  l  सबका  लेखा -जोखा  ईश्वर  के  पास  है  l  संसार  के  नियम -कानून  अपराधी  को  दंड  दें  या  न  दें  ,  ईश्वर  की  लाठी  से  कोई  बच  नहीं  सकता  l  पुण्य  किए  हैं  तो  उनका  फल  सुख -वैभव   के  रूप  में  अवश्य  मिलता  है  l  जिस  स्तर  का  पाप  व्यक्ति  करता  है  , वैसा  ही  दंड  उसे  मिलता  है  l  छल , कपट  षड्यंत्र  , धोखा , लोगों  को  योजना  बनाकर  शारीरिक  और  मानसिक  रूप  से  उत्पीड़ित  करना  --ऐसे  अपराध  हैं   जिनकी  क्षमा  नहीं  होती  , ईश्वरीय  दंड  इतना  कठोर  होता  है  कि  देखने  वालों  की  रूह  काँप  जाए  l  ईश्वरीय  विधान  में  एक  विशेष  बात  यह  है  कि  हमारे  लिए  हमारा  यह  एक  जन्म  है   लेकिन  ईश्वरीय  विधान  में  यह  मनुष्य  की  एक  यात्रा  है  ,  यात्रा  के  किस  पड़ाव  पर   पाप  और  पुण्य  के  फल  मिलेंगे  ,  यह  मालूम  करना  मनुष्य  के  वश  में  नहीं  है  l  ऋषि  कहते  हैं  --होश  में  रह  कर  जीवन  जिओ  , किसी  का  अच्छा  नहीं  कर  सकते  तो  कोई  बात  नहीं  , किसी  का  बुरा  मत  करो  l  और  इस  सत्य  को  स्वीकार  करो  कि  जब  हम  किसी  का  बुरा  नहीं  कर  रहे  तो  हमारा  भी  बुरा  नहीं  होगा  l 

9 September 2026

WISDOM -----

   मनुष्य  के  जीवन  में  सुख -दुःख  दिन  और  रात की  तरह  आते -जाते  रहते  हैं  l  सुख  का  समय  तो बहुत  जल्दी  बीत  जाता  है   लेकिन  दुःख  और  कष्ट  का  समय   , मन  को  शांत  रखते  हुए   व्यतीत  करना  बहुत  कठिन  होता  है  l  ऐसे  में  हमारे  ऋषियों  ने , संतों  ने  ईश्वर  विश्वास  और  ईश्वर  शरणागति  की  सलाह  दी  है  l   गीता  में  भी  भगवान  ने  अंत  में  यही  कहा  है  कि   ईश्वर  की  शरण  में  जाओ  l   ईश्वर  विश्वास  और  ईश्वर  शरणागति  कब  काम  करती  है  ,  इसे  स्वयं  ईश्वर  ने  ही  महाभारत  और  रामायण   और  अन्य  पुराणों  में  विभिन्न  प्रसंग  और   कथाओं  के  माध्यम  से  स्पष्ट  किया  है  l    ---- महाभारत  का  ही  प्रसंग  है  ---- जब  दु:शासन   महारानी  द्रोपदी  को  उनके  केश  खींचते  हुए    भरी  सभा  में   घसीटता  हुआ  लाया  l  उसकी  मंशा  उनके  चीर-हरण   की  थी  l  पांचाली  ने  सभा  में  बैठे  हुए   भीष्म पितामह , गुरु द्रोणाचार्य , धृतराष्ट्र  और  कुलगुरु  आदि  सभी  को  पुकारा  l  अपने  पांचों  पतियों  को  पुकारा   लेकिन  पासे  के  खेल  में  हार  जाने  के  कारण  वे  सभी  सिर  झुका  कर  चुप  थे , चारों  तरफ  सन्नाटा  था  l  कोई  भी  पांचाली  की  मदद  को  आगे  नहीं आया  l  सब  ओर  से  निराश  होने  पर  द्रोपदी  ने  श्रीकृष्ण  को  पुकारा  l   कहते  हैं  नारद  जी  भगवान  श्रीकृष्ण  के  पास  गए  और  कहा  --- हस्तिनापुर  की  राजसभा  में  यह  कैसा  अनर्थ  हो  रहा  है  , पांचाली  आपको  पुकार  रही  है  , आप   कृपा  कर  के   उसकी  रक्षा  के  लिए   जाएँ  ----- l  भगवान  श्रीकृष्ण  नारद जी  से  कहते  हैं  ---  देखो  नारद  , मैं  स्वयं   कर्मों  के  विधि -विधान  से  बंधा  हुआ  हूँ  ,  पांचाली  का  बहीखाता  देखो  ,  उसने  ऐसा  कोई  पुण्य   कर्म  किया  है   कि  मैं  उसकी  रक्षा  के  लिए  जाऊं  l  नारद जी  कहते  हैं  --- मैं  भूला  नहीं  हूँ  l  भगवान  !   जब  आपने  सुदर्शन  चक्र  से  शिशुपाल  का  वध  किया  था  , तब  आपकी  अंगुली  से  रक्त  बहने लगा  था  l  सब  रानी -महारानी  उस  सभा  में  थीं  , उन्हें  समझ  नहीं  आ  रहा  था  कि  क्या  करें   तब  महारानी  द्रोपदी  ने  अपनी  कीमती  साड़ी  फाड़कर  आपकी  अंगुली  में  पट्टी  बाँधी  थी  l '   उसी  एक  चीर   के  बदले  भगवान  ने  द्रोपदी  का  चीर  अनंत  कर  दिया  l  दु:शासन  का  दस  हजार   हाथियों  का  बल  भी  द्रोपदी  का  कुछ  नहीं  बिगाड़  सका  l  वह  थक -हारकर  जमीन  पर  गिर  गया  l  ----- पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  --- "  सत्कर्म  का  कोई  भी  मौका  हाथ  से  न  जाने  दो  l  सत्कर्मों  की  पूंजी   ही   विभिन्न  विपदाओं  से  हमारी  रक्षा  करती  l  आचार्य श्री  ने  बहुत  ही  सरल  ढंग  से  समझाया  है  कि  यदि   हम  ऐसी  जगह  पर  या  ऐसी  परिस्थिति  में  हैं  जहाँ  सत्कर्म  का  कोई  भी  अवसर  हमें  नहीं  मिलता   तो  हम  मन में  ही  गायत्री  मंत्र  और  महामृत्युंजय  मंत्र  का  जप  करें    , इससे  प्रकृति  को  पोषण  मिलता  है  , वातावरण  में  फैली  हुई  नकारात्मकता  दूर  होती  है  l  प्रकृति  ही  ईश्वर  है  ,  जब  ईश्वर  प्रसन्न  हों  , उनकी  कृपा  मिले   तब  तो  असंभव  भी  संभव  है  l  

8 September 2026

WISDOM -------

     पुराणों   की  कथाएं   मनुष्य  को  जीवन  जीना  सिखाती  हैं  l  मनुष्यों  के  विवेक  को  जाग्रत  करने  के  लिए  ये  कथाएं  हैं  l   एक  कथा  है  ---- समुद्र  मंथन  में  जब  हलाहल  विष  निकला   तो   देवता  और  दानव  सब  के  सामने  यह  बड़ी  समस्या  थी  कि  इस  विष  का  क्या  करें  तब  भगवान  शिव  ने  संसार  के  कल्याण  के  लिए  इस  हलाहल  विष  को  अपने  गले  में धारण  किया  ,  न  उगला  , न  पिया  l  यह  विष  उनके  गले  में  ही  रहा  और  वे  नीलकंठ   कहलाए  l  इस  कथा  का  शिक्षण  यही  है  कि   विषाक्तता  को   न  तो  आत्मसात  करें   और  न  ही  उसे  विक्षुब्ध   होकर  उछालें  l  इसे  हम  सरल  ढंग  से  इस  तरीके  से   समझा  सकते  हैं  कि  जो  कुछ  भी  नकारात्मक  है  उसकी  बार -बार  चर्चा  न  करें   क्योंकि  बुराई  में  आकर्षण  होता  है  इसे  लोग  बहुत  जल्दी  सीख  जाते  हैं  l  आज  संसार  में  इतनी  अशांति , अपराध  , क्रूरता   क्यों  है  ?   क्योंकि  हमने   प्रति  वर्ष  रावण  को  जीवित  किया   l  रावण  के  गुणों  की  , उसकी  विद्वता  की  चर्चा  नहीं  की  ,  उसके  नकारात्मक  पक्ष  की  बार -बार  चर्चा  कर  उसे  जलाने का  नाटक  किया   l  यही  कारण  है  कि  आज  रावण  सारे  संसार  में  लोगों  के  विचारों  में  जीवित  हो  गया  l  रावण  अपने  राक्षसों  को    धरती  के  कोने -कोने  में  आतंक  मचाने  भेजा  करता  था  ,   ये  राक्षस  आतंक  मचाते , लोगों  को  सताते , ऋषियों  के  यज्ञ   आदि  पवित्र  कार्यों  को  नष्ट  कर  देते  थे  l   वही स्थिति  आज  भी  है    , अंतर  केवल  इतना  है  कि  पहले  एक  रावण  था  , अब  बहुत  हैं  l  क्रूरता  भरी  , संवेदनहीन  जितनी  भी  घटनाएँ  संसार  में  घट रहीं  हैं  उनके  पीछे  कोई  न  कोई  रावण  अवश्य  है  l  नकारात्मक विचारों  को  सकारात्मक  विचारों  से  ही  समाप्त  किया  जा  सकता  है  l  जागरूकता  की  जरुरत  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  --- ' विचार  एक  संसाधन  है   जिसे  नियंत्रित  , संयमित  और  उपयोगी  बनाकर   अनेक  चमत्कार  और    आश्चर्यजनक  परिणाम   उत्पन्न  किए  जा  सकते  हैं  l '