प्रकृति का प्रकोप विभिन्न रूपों में होता है और वैज्ञानिक तरीके से देखें तो उसके अनेक कारण हैं l लेकिन आध्यात्मिक द्रष्टि से देखें तो यह एक प्रकार का सामूहिक दंड है l कहते हैं पापकर्म करने वाला , उस कार्य में सहयोग करने वाला , , उसे देखने वाला और देखकर चुप रहने वाला सभी दंड के भागी होते हैं l वर्तमान का समय लगभग सभी देशों में ऐसा है की लोग बड़े -बड़े अपराध करते हैं , और अपनी शक्ति और सामर्थ्य से दंड से बच जाते हैं l व्यवस्थाएं ही कुछ ऐसी हैं कि अपरा'नेक ऐसे भी हैं जो समाज से छिपकर अनैतिक और अमानवीय कार्य करते हैं l संसार के किसी भी धर्म में लोगों को अपराध करने की छूट नहीं है , नैतिकता और मानवता को ही श्रेष्ठ कहा गया है l जब मानव समाज का नैतिक पतन अति का हो जाता है तब प्रकृति स्वयं दंड देती है l संसार को सुधारना संभव नहीं है यदि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को सुधारे , सन्मार्ग पर चले , ईश्वर का नाम जप और निस्स्वार्थ सेवा के कोई कार्य करे तो ये सत्कर्मों को पूंजी ही उसकी इन आपदाओं से रक्षा करती है , अकाल मृत्यु नहीं होती l पं , श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- 'पिछले जन्मों में हमने क्या किया उस पर अब हमारा कोई वश नहीं है लेकिन वर्तमान समय हमारे हाथ में है l हम सत्कर्म कर के अपने प्रारब्ध के कर्मों की पीड़ा को कुछ कम कर सकते हैं और एक सुन्दर और सुनहरे भविष्य की तैयारी भी कर सकते हैं l
Omkar....
20 May 2026
19 May 2026
WISDOM -----
कर्मफल का विधान सबके लिए एक समान है l चाहे हम राजा हों , धर्मात्मा हों या महात्मा , साधु हों या शैतान , कर्म किसी को नहीं छोड़ता l इस विश्व ब्रह्माण्ड में हम जहाँ कहीं भी हों , हमारा कर्म हमारा पीछा करता हुआ हम तक पहुँच ही जाता है l इस जन्म में नहीं तो अगले कई जन्मों तक ये कर्म हमारा पीछा करते ही रहते हैं और तब तक समाप्त नहीं होते , जब तक हम उन्हें भोग नहीं लेते l एक कथा है ----- देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने माँ सीता के पैर में कौवे के रूप में चोंच मार दी l उनके पैर से रक्त निकल आया l प्रभु श्रीराम ने यह देखकर समीप रखे कुषा के एक तिनके को उठाया और उसे अभिमंत्रित कर के जयंत की ओर फेंक दिया l कुषा के उस तिनके ने अभेद्य बाण का रूप धारण कर लिया l जयंत भाग निकला था , उसे लगा था कि वो बच गया l उसने पीछे मुड़कर देखा तो भगवान श्रीराम द्वारा छोड़ा गया बाण उसका पीछा कर रहा है l उस बाण से बचने के लिए जयंत ने सभी लोकों की परिक्रमा की लेकिन स्वयं उसके पिता देवराज और ब्रह्माजी तक ने उसकी सहायता करने से मना कर दिया l अंत में उसे भगवान श्रीराम की शरण में आना ही पड़ा l उन्होंने उसे क्षमा तो किया परन्तु कर्मफल के रूप में उसे अपनी एक आँख गंवानी ही पड़ी l
18 May 2026
WISDOM -----
श्रुतायुध ने भगवान शिव की तपस्या कर के उनसे ऐसी गदा प्राप्त की , जिसका प्रहार त्रिलोक में किसी के लिए सह पाना संभव नहीं था l गदा देते समय भगवान शिव ने श्रुतायुध को आगाह किया कि गदा का उपयोग मात्र सत्कार्यों में किया जा सकता है , यदि व्यक्तिगत राग -द्वेष की पूर्ति के लिए इसका उपयोग हुआ तो यही गदा उसकी मृत्यु का कारण बनेगी l महाभारत के युद्ध में श्रुतायुध को अर्जुन के सामने युद्ध के लिए आना पड़ा l भगवान श्रीकृष्ण को श्रुतायुध की गदा के विषय में ज्ञात था और वे जानते थे कि यदि वह गदा चली तो अर्जुन उस प्रहार को झेल न सकेगा l भगवान श्रीकृष्ण श्रुतायुध को देखकर हँस पड़े l श्रुतायुध को लगा कि भगवान कृष्ण उसे कुरूप समझकर उस पर हँस रहे हैं l क्रोध में वह अपना संयम खो बैठा और भगवान शिव की चेतावनी भूल गया l उसने वह गदा भगवान कृष्ण को लक्ष्य कर के फेंकी , परन्तु गदा ने लौटकर श्रुतायुध का ही वध कर दिया l शक्तियों का उपयोग विवेकसम्मत तरीके से ही किया जाना चाहिए , अन्यथा दंड का भागी बनना पड़ेगा l
17 May 2026
WISDOM ----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है कि --- ' शक्ति के साथ यदि विवेक न हो तो वह शक्ति उसी के लिए घातक हो सकती है l ' पुराण में इस संबंध में अनेक कथाएं हैं l रावण , भस्मासुर , हिरन्यकश्यप जैसे अनेक असुरों ने घोर तपस्या कर वरदान प्राप्त किए और बहुत शक्तिशाली हो गए लेकिन विवेक न होने से उन्होंने अपनी शक्ति का दुरूपयोग किया l अपनी शक्ति का अहंकार ही उनके अंत का कारण बना l असुरों की यह परंपरा समाप्त नहीं हुई l आज भी जिसके पास धन का , पद का बल है वह उसका दुरूपयोग कर रहा है l भस्मासुर तो जिसके सिर पर हाथ रख दे केवल वही भसम होता था लेकिन आज तो लाखों भस्मासुर की ताकत का मिलकर परमाणु बम है l जिस दिन क्रोध में बुद्धि भ्रष्ट हो गई और बटन दब गया तो परिणाम क्या होगा ? भस्मासुर अपने साथ लाखों , करोड़ों को ले डूबेगा l कलियुग की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि मनुष्य के पास सब कुछ है , हर तरह की सुख -सुविधाएँ , भोग -विलास के साधन सब कुछ है लेकिन सद्बुद्धि नहीं है , विवेक नहीं है l वह जाने -अनजाने स्वयं अपने और अपने परिवार के , इस सम्पूर्ण प्रकृति के विनाश की ओर बढ़ रहा है l अपनी कष्टदायक मृत्यु की तैयारी स्वयं ही कर रहा है l असुरों ने जो सबसे बड़ी चालाकी की वह यह कि धन -वैभव आदि हर तरह से स्वयं को शक्तिशाली बनाने तक ही ईश्वर को माना l जब उन्हें वरदान मिल गया तब वे स्वयं को ही भगवान समझने लगे l ईश्वर की सत्ता को चुनौती देना ही उनकी सबसे बड़ी भूल है l ईश्वर का न्याय कैसे होगा , यह तो वक्त ही बताएगा l
16 May 2026
WISDOM -------
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " इस दुनिया में इतना अधर्म है , उसका कारण यह नहीं कि नास्तिक दुनिया में ज्यादा हो गए हैं , बल्कि कारण यह है आस्तिकों ने एक दूसरे को गलत सिद्ध कर के ऐसी हालत पैदा कर दी है कि कोई भी सही नहीं रह गया l मंदिर मस्जिद को गलत कह देता है और मस्जिद मंदिर को गलत कह देती है l दोनों एक दूसरे को गलत इसलिए कहते हैं , ताकि वे अपने आप को सही साबित कर सकें l पूरी दुनिया में लगभग तीन सौ धर्म हैं और एक धर्म को दो सौ निन्यानवे गलत कह रहे हैं l हर एक के खिलाफ दो सौ निन्यानवे हैं l इन तीन सौ ने मिलकर तीन सौ को गलत सिद्ध कर दिया है और धरती की ऐसी बदतर हालत हो गई है l ये सभी एक दूसरे की लाशें बिछाने और गला काटने में लगे हैं l हिन्दू मुसलमानों को गलत कहते हैं और मुस्लमान हिन्दुओं को गलत कहते हैं l ऐसे लोगों के अनुसार ---बाइबिल कुरान के खिलाफ है , कुरान गीता के खिलाफ है , वेद तालमुद के खिलाफ हैं , तालमुद जिंदे अवेस्ता के खिलाफ है l बस ! इस तरह खिलाफत और झगड़ों का सिलसिला जारी है और पूरी दुनिया लाशों से पटी पड़ी है l सब ओर एक दूसरे का खून बहाया जा रहा है l ऐसी दशा में भगवान श्रीकृष्ण बहुत ही क्रांतिकारी सूत्र देते हैं l वे कहते हैं विपरीतताएँ कितनी ही क्यों न हों , झगड़े कितने ही खड़े कर लो , पर यदि तुम चलना शुरू करोगे तो पहुंचोगे एक ही मंजिल तक l ईश्वर तक पहुँचने के अनेक मार्ग हैं , हम किसी भी पथ से चलें , पहुंचेंगे भगवान तक ही l "
14 May 2026
WISDOM ------
इस धरती पर अनेक ऐसी आत्माओं ने जन्म लिया जिन्होंने अपने आचरण से संसार को शिक्षा दी l अपनी नीति -कुशलता से वे इतिहास में अमर हो गए l ---- दूसरे देश से आया शिष्टमंडल महामात्य चाणक्य से मिलने पहुंचा l उसे आया देख चाणक्य ने कक्ष में रखा दीपक बुझा कर दूसरा दीपक जला दिया l शिष्टमंडल के प्रमुख ने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो चाणक्य ने उत्तर दिया ---- ' जब आप लोगों ने प्रवेश किया तब मैं व्यक्तिगत कार्यों में संलग्न था और जो दीपक जल रहा था , वह मेरे निजी धन से लाए गए तेल से जल रहा था l अब जल रहा ये दीपक राजकोष के धन से जल रहा है , क्योंकि हमारा वार्तालाप शासकीय मुद्दों पर है l हमें राष्ट्रीय संपदा का व्यक्तिगत कार्यों पर खर्च करने का अधिकार नहीं है और न ही मैं ऐसा करूँगा l शिष्टमंडल चाणक्य की ईमानदारी से अभिभूत हो गया l आज परिवार में , समाज और राष्ट्र में इतनी समस्या और तनाव है उसका कारण यही है की व्यक्ति अपने कार्यों के प्रति , अपने कहे गए शब्दों के प्रति यहाँ तक की स्वयं अपने जीवन के प्रति और ईश्वर के प्रति भी ईमानदार नहीं है l
4 May 2026
WISDOM ------
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ----- " कौन कितने दिन जिया , इसका लेखा -जोखा जन्म दिन से लेकर मरणपर्यंत के दिन गिनकर नहीं , वरन इस आधार पर लगाया जाना चाहिए कि किसने अपने समय का उपयोग महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए किया l आदि शंकराचार्य मात्र बत्तीस वर्ष जिए l विवेकानंद ने छत्तीस वर्ष की अल्प आयु पाई l स्वामी रामतीर्थ तैंतीस वर्ष की आयु में ही चले गए l ऐसे अनेक व्यक्ति इस संसार में हुए हैं , जिन्हें लंबी अवधि तक जीने का अवसर नहीं मिला , पर उन्होंने अपने समय का श्रेष्ठतम प्रयोजनों के लिए उपयोग किया और इतनी उपलब्धियां अर्जित कर सके , जितनी सौ -दो सौ वर्ष जीकर भी नहीं पाई जातीं l कितने ही लोग लंबी आयु तक जीते हैं , पर उस अवधि का लेखा -जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि वह पेट भरने , प्रजनन के जंजाल में उलझे रहने तथा दुर्गुणों के कारण जलते -झुलसते मौत के मुँह में चले गए l प्राय; आधा समय कुचक्रों की उलझन में और लगभग उतना ही आलस्य -प्रमाद में लगाने वाले को लंबी आयु तक जीने का क्या संतोष -आनंद मिला l इसे वे उनींदी अवस्था में तो जान ही नहीं पाते , किन्तु जब विदाई के दिन आते हैं तो आँखें खुलती हैं और हाथ मलते हुए , रुधे कंठ और भरी आँखों से इतना ही कह पाते हैं कि उन्होंने बहुमूल्य अवसर निरर्थक कामों में गँवाया और जिससे काल का त्रास देने वाला अंधकार भरा भविष्य कमाया l "