7 March 2026

WISDOM ------ आखिरी दांव

 लघु कथा ---- प्राचीन  काल  की  बात  है    एक नगर  सेठ  था  l  उसके  पास  अपार  धन  संपदा  थी  l  सुख -वैभव  की  कोई  कमी  नहीं  थी  l  लेकिन  उस  सेठ  को  संतोष  नहीं  था  l  जब  तक  वह  दूसरे  सेठों  का  कुछ  छीन  न  ले  ,  उसे  चैन  की  नींद  नहीं  आती  थी  l  वह  दूसरों  का  केवल  धन  ही    नहीं  ,  सब  कुछ   छीनना  चाहता  था ,  दूसरों  का  सुख -चैन   छीनकर  ही  उसे   आनंद  आता  था  l  वह  अपने  जासूसों  को  भेजकर  यह  जानकारी  लेता  था  कि  किसके  पास  क्या  सबसे  अच्छा  है  ?   किसी  के  पास  खुश  होने  के  लिए  और  गर्व  अनुभव  करने  के  लिए  क्या  है  ?  वही  उससे  छीन  लिया  जाये  l  उसके  जासूसों  ने  उसे  बताया  कि  उसके  नगर  से  कुछ   दूरी    पर  एक  नगर  है   , वहां  एक  बहुत  सुन्दर  बगीचा  है  ,  वहां के  सभी  लोग  उस  बगीचे  को  देवता  मानकर  पूजते  हैं  और  वहां  सैर  कर  के  इतने  प्रसन्न  होते  हैं  कि  उनकी  ख़ुशी  का  वर्णन  नहीं  किया  जा  सकता  l  यह  सुनकर  उस  लालची  सेठ  की  नींद  उड़  गई  l  वह  दिन -रात  यही  सोचने लगा  कि  कैसे  उस  बगीचे  पर  अपना   कब्जा    किया  जाए  l  साम , दाम , दंड , भेद  हर  तरीके  से  उसने  सेठ  को  अपने  वश  में  कर  लिया   और  उससे  कहा  कि  इस  सुन्दर  बगीचे  पर  वह  अपना  अधिकार  चाहता  है  l  बगीचे  के  मालिक  उस  सेठ  ने  कहा  ---यदि  बगीचे  का  अधिकार  मैं  तुम्हे  दे  दूंगा   तो  मेरी  प्रजा  मेरा  सम्मान  नहीं  करेगी  और  मेरा  जीवन  जीना  मुश्किल  हो  जाएगा  l  लालची  सेठ  ने  अगली  चाल  चली  , उसने  कहा  ---तुम  गुपचुप  रूप  से   मुझे  इस  बगीचे  का   अधिकार  सौंप  दो  ,  किसी  को  पता  न  चलेगा  ,  मेरे  मन  को  संतोष  हो  जायेगा  और  तुम्हारा  सम्मान  भी  बना  रहेगा  l  सेठ  आखिर  राजी  हो  गया  ,  उसने  बड़े  गोपनीय  तरीके  से  उस  सुन्दर  बगीचे  का  मालिकाना  हक  लालची  सेठ  को  सौंप  दिया  l  कुछ  ही  दिन  बाद   उस  लालची  सेठ  ने   उसको  मरवा  दिया  और   उस  बगीचे  पर  अपना  अधिकार   सबके  सामने  दिखा  दिया l   इस  कथा  से  हमें  क्या  शिक्षा  मिलती  है  ?   हमें  अपना  आखिरी  दांव  कभी  किसी  को  नहीं  बताना  चाहिए  l  जब  शेर  जंगल  का  राजा  बना  तब  बिल्ली  ने  उसे   सारे  गुर  सीखा  दिए  l  शेर  ने  बिल्ली  से  कहा  --कोई  और  हुनर  हो  तो  वह  भी   सिखा  दो  ताकि  मैं  एक  कुशल  प्रशासक  बन  सकूँ  l  बिल्ली  ने  कहा  -- मैंने  तुम्हे  वह   सब  कलाएं  सिखा  दीं   जो  मुझे  ज्ञात  हैं  l  शेर  के  मन  में  कुटिलता  आ  गई  ,  उसने  सोचा  क्यों  न  मैं  पहला  शिकार  इस  बिल्ली  का  ही  करूँ  ,  यह  सोचकर  वह  बिल्ली  पर  झपटा  l  बिल्ली  सतर्क  थी  वह और  तुरंत  पेड़  पर  चढ़  गई  l  शेर  को  पेड़  पर  चढ़ना  नहीं  आता  है  l  अब  उसने  बिल्ली  से  प्रार्थना  की  कि  वह  उसे  पेड़ पर  चढ़ना  भी  सिखा  दे  l  बिल्ली  होशियार  थी   , उसने  कहा  ,  नहीं  1  यह  मेरा  आखिरी  दांव  है   यदि  मैंने  इसे  तुम्हे  सिखा  दिया  तो  तुम  मुझे  ही  खा  जाओगे  l   

24 February 2026

WISDOM ----

 प्रसिद्ध  कवि  अब्दुर्रहीम  खानखाना  के  पास  एक  व्यक्ति  आया  और  उनसे  पूछने  लगा  कि  जीवन  में  सबसे  महत्वपूर्ण  कौन  सा  संयम  है  ?  उन्होंने  कविता  के  माध्यम  से  उत्तर  दिया  --- " रहिमन  जिह्वा  बावरी  , कही  गई  सरग  पताल  l  खुद  कह  भीतर  घुस  गई  , जूती  पड़े  कपाल  l l   अर्थात  सारे  संयमों  में  वाणी  का  संयम   अत्यंत  महत्वपूर्ण  है  l  जीभ  खुद  तो  बात  कहकर  मुँह  के  अन्दर  चली  जाती  है  , परन्तु  कहने वाले  को   उसका  परिणाम  भुगतना  पड़ता  है  l                                                                                                           वाणी  का  संयम  न  होने  से  महाभारत   का  महायुद्ध  हुआ  l  द्रोपदी  ने  कहा  था  ---' अंधे  का   बेटा  अँधा  होता  है  l '  दुर्योधन  को  पांडवों  से  ईर्ष्या  तो  पहले  से  ही  थी  ,  अब  बदले  की  आग  और   इतनी  तेज  हो  गई   कि   स्वयं  भगवान  श्रीकृष्ण  भी  दुर्योधन  को  समझा  न  सके  l  हर  युग  में  यही  सब  रहा  है  l  जिसके  पास  ताकत  है , शक्ति  है ,  धृतराष्ट्र  का  अँधा  मोह  और  पूरा  समर्थन  है  ,  वह  अपनी  शक्ति  का  दुरूपयोग  करता  है   और  उसका  परिणाम   निर्दोष  व  बेकसूरों  को  भी  भुगतना  पड़ता  है   l  पहले  तो  युद्ध  ऐसे  होते  थे  कि  महिलाएं  व  बच्चे  सुरक्षित  रहते  थे  जैसे  महाभारत  का  महायुद्ध  कुरुक्षेत्र  के  मैदान  में  हुआ  l  खेती  और  सामान्य  जनजीवन  सुरक्षित  रहा  लेकिन  अब  कोई  सीमित  क्षेत्र  नहीं  है  l  कलियुग  में  लोगों  का  नैतिक  पतन  हो  गया  है  ,  युद्ध  व  दंगे  आदि  के  माध्यम  से  वे  अपनी  दमित इच्छाओं  की  पूर्ति  करते  हैं , किसी  से  बदला  लेने  का  उन्हें  यह  सुनहरा  मौका  लगता  है ,  महिलाओं  , छोटे  बच्चों , गर्भस्थ  शिशु  की  जो  दुर्दशा  होती  है  , जैसे  भूत -पिशाच  धरती  पर  नाच  रहे  हों  l  सच्चा  इन्सान  कहाँ  छुपा   है  ?  

20 February 2026

WISDOM ------

    बंगाल  के  विख्यात शिक्षाविद्  पंडित  मुखोपाध्याय   से  मिलने  संस्कृत  महाविद्यालय  के शिक्षक  पहुंचे  l  उन्होंने  पंडित जी  से  कहा  ---- "  आप  संस्कृत  के  प्रकांड  विद्वान हैं  ,  फिर  आप  अन्य  की  तरह  दुर्गापूजा  महोत्सव  धूम -धाम  से क्यों  नहीं  मनाते  ?  "  पंडित जी  ने  उस  समय  तो  उनके  प्रश्न  का  कोई  उत्तर  नहीं  दिया  ,  पर  इस  वार्तालाप  के  कुछ  दिन  बाद  उन्होंने  शिक्षा  तथा  संस्कृत  के  प्रचार -प्रसार  के  लिए  निर्मित  विश्वनाथ  संस्कृत  ट्रस्ट  को  डेढ़  लाख  रूपये  दान  में  दिए  l  वे  शिक्षक  इसी  ट्रस्ट  द्वारा  निर्मित  महाविद्यालय  में कार्यरत  थे  l  पंडित जी   उन्हें  संबोधित  कर  के  बोले  ---- " मैंने  दुर्गा  पूजा   महोत्सव  में  धूम -धाम  न   कर  के   जो  पैसे  बचाए  हैं  ,  ये  वही  धन  है  l  संस्कृत  देववाणी  है   और  माँ  दुर्गा के  महत्त्व  को  सामने  लाने  का   श्रेय    भी  संस्कृत  को  है  l  यदि इस  धन  से   संस्कृत  की  सेवा  हो  जाये  ,  तो  मेरे  लिए  वही  दुर्गा  पूजा  है  l  

15 February 2026

WISDOM -----

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ---- 'प्रत्येक  व्यक्ति  समाज  पर  अपना  भला -बुरा  प्रभाव  छोड़ता  है   l  किन्तु  सुगंध  की  अपेक्षा   दुर्गन्ध  का  विस्तार   अधिक  तेजी  से  होता  है  l  पानी  का  नीचे  गिरना  बहुत  आसान  है  किन्तु  ऊपर चढ़ाने  के  लिए  बहुत  अधिक  मेहनत  की  आवश्यकता  है  l '   आसुरी  प्रवृत्ति  के  लोग  इसी  वजह  से   आसुरी  तत्वों  को  संसार  में  फैलाने  में  सफल  हो  जाते  हैं  l  जो  असुर  हैं  जिन्हें  हम  राक्षस  , दैत्य  और  नर भक्षी  हों  तो  उन्हें  नर पिशाच  भी  कहते  हैं  ,  ये  सब  मनुष्य  शरीर  में  ही  हैं   लेकिन  इनमे  संवेदना , करुणा , दया , ममता  , प्रेम  , मानवीयता  नहीं  होती  l  इनमे  अहंकार  और  उससे  जुड़े  सभी  दुर्गुण  होते  हैं  l  आज  कलियुग  की  स्थिति  यह  है  कि  असुरता  सम्पूर्ण  धरती  पर अपना  साम्राज्य  स्थापित  करना  चाहती  है ,  सब  उसके  गुलाम  बने  और  देवत्व  का  नामोनिशान  मिट जाए  l  उनका उदेश्य  लोगों  को  मानसिक  गुलाम  बनाना  है  , भौगोलिक  नहीं  l   अपने उदेश्य  में  उसे  बहुत  सफलता  भी  मिली   लेकिन   ऐसे  देश  जहाँ  कि  संस्कृति  में  चरित्र  की  श्रेष्ठता  है  जैसा  कि  हमारा  देश  भारत  ,  ऐसे  किसी  भी  देश  में  देवत्व  को  पूरी  तरह  मिटाना  संभव  नहीं  है  l  इसलिए  आसुरी  तत्वों  ने  दूसरी  चाल  चली  --- डंडे  के  जोर  पर  तो   चारित्रिक  पतन  आसान  नहीं  होता   इसलिए   अब  उन्होंने  लोगों  के  मन  पर  प्रत्यक्ष  और  अप्रत्यक्ष  तरीके  से  आक्रमण  शुरू  किया  l  इसके  लिए  उन्होंने  विज्ञान  का  सहारा  लिया  और  संचार  तथा  प्रचार-प्रसार    के  साधनों  से    लोगों  के  मन  को  डांवाडोल  करने  , उनका  नैतिक  पतन  करने  और  अश्लीलता  को  परोसने  का  सारा  व्यापार  शुरू  कर  दिया  l  बुराई  में  बड़ा  आकर्षण  होता  है  l  सद्विचारों  को  तो  दो -चार  लोग  पढ़  लें यही  बहुत  बड़ी  बात  है  लेकिन   अश्लील  साहित्य  , ऐसी  ही  फ़िल्में , गंदे  विचार   इन्हें  पढने , सुनने  व  देखने  के  लिए  लाखों , करोड़ों  लोगों  की  भीड़  होती  है  l  संसार  में  जो  लोग  श्रेष्ठ  काम  कर  रहें  हैं  , उनके  कार्यों  को  बड़ी  मुश्किल  से  एक -दो   लाइन  में  समाचारों  में  दिखा  दिया  जाता  है  लेकिन   जो  बहुत  ही  निम्न  श्रेणी  के , निकृष्ट  कार्य  हैं  , उन्हें  समाचारों  में   और  विभिन्न  तरीकों  से    विस्तार   से  सचित्र  भी  दिखाया  जाता  है    ताकि  लोगों  का  मन  बहुत  कमजोर  हो  जाए  l  इसके  साथ  ही   ये  आसुरी  प्रवृति  के  लोग  अप्रत्यक्ष  तरीकों  से   नकारात्मक  शक्तियों  की  मदद  से , साइकिक  अटैक   आदि  विभिन्न  तरीकों  मानवजाति  पर  सामूहिक  रूप  से  आक्रमण  कर  उन्हें  विभिन्न  तरह  की  बीमारियाँ  देते  हैं   ताकि  व्यक्ति  इतना  कमजोर  हो  जाए  कि  उसमें  विरोध  करने  की  सामर्थ्य  ही  न  रहे   ,  फिर  वे  हमें  जैसी  शिक्षा  दे , चिकित्सा  दे ,   कृषि , साहित्य , कला ,  खाद्य पदार्थ , बीज  , खेती  आदि  सब  कुछ  उनकी  मरजी  का  हो  ,  हमारी  इच्छा , हमारा  स्वास्थ्य , हमारी  संस्कृति , हमारी  मिटटी  , इससे  किसी  को  कोई  मतलब  नहीं  l  यही  है  मानसिक  गुलामी  l  गुलाम  का  अपना  कोई  अस्तित्व  नही  होता  , वह  तो  एक  कठपुतली  होता  है  l  असुरता  की  कोई  जाति , कोई  धर्म  , कोई  विशेष  भौगोलिक  क्षेत्र  नहीं  होता  , ये  सब  एक  नाव  में  सवार  होते  हैं  l  इस  नाव  का  आकार  अब  बढ़ता  ही  जा  रहा  है  l  बुराई  में  तत्काल  लाभ  होता  है   इसलिए  सब  लोग  उसी  नाव  में  बैठने  को  आतुर  हैं  l  देवत्व  को  बचाने  का , देवत्व  की  रक्षा  का  एक  ही  उपाय  है  ---- ' गायत्री  मन्त्र  '  l  माँ  आदि शक्ति  को  पुकारो  और  शक्ति  के  साथ  शिव  की उपासना  करो  l  शिव  और  शक्ति  के  संतुलन  से  देवत्व  की  रक्षा  संभव  है l  प्रत्येक  व्यक्ति  यह  प्रयास  करे  तब  उसका  परिवार , समाज , राष्ट्र   आसुरी  आक्रमण  से  सुरक्षित  रहेंगे  l  

10 February 2026

WISDOM ------

 विधाता ने  स्रष्टि  की  रचना  की   और  अनेक  प्राणियों , वनस्पति , पशु -पक्षी  आदि  सभी  बनाए  l  इन  सब  में  विधाता  ने  मनुष्य  को  ही  बुद्धि  दी  कि  वह  सन्मार्ग  पर  चलकर  ,  नैतिकता  के  नियमों  का  पालन  कर  अपनी  चेतना  को  विकसित  करे   और  बुद्धि  का  सदुपयोग  कर   सामान्य  मनुष्य  से  ऊपर  उठकर  इनसान .,  देवता  और  भगवान  बने   लेकिन  मनुष्य  ने  ऐसा  नहीं  किया  , मनुष्य  में अहंकार  है   उसने  ईश्वर  के  आदेश  को  भी  नहीं  माना  l  मनुष्य  के  अहंकार  ने  उसकी  बुद्धि  को  दुर्बुद्धि  में  बदल  दिया   ,  उसने  ईश्वर  के  बताए  क्रम  से  विपरीत  क्रम  को  चुना  l  बहुत  समय  तक  उसने  पशुओं  जैसा  जीवन  जिया   लेकिन  यह  जीवन  भी  उसे  बहुत  कठिन  लगा   क्योंकि  पशु  भी  प्रकृति के  नियमों  के  अनुसार  चलते  हैं  l  समय  से  उठाना , शाम  होते  ही  अपने  घोंसले  में  चले  जाना  l  संतान  उत्पत्ति  के  उनके  नियम  हैं  ,  समूह  के  छोटे  बच्चों  पर  उनकी  कुद्रष्टि  नहीं  होती  , जरुरत  भर  का  उनका  घोंसला  होता  है  ,  संपत्ति  , वैभव  नहीं  जोड़ते  l   मनुष्य  को  यह  पशुओं  जैसा  जीवन  बहुत  कठिन  लगा  l  मनुष्य  ने  अपनी  बुद्धि  को  बेलगाम  कर  दिया  l  मनुष्य  ने  सोचा  कि  ऐसा  कुछ  किया  जाए  कि  अपने  समूह  में   उसे  सबका  सम्मान  मिले   और  अपने  भीतर  की  कालिख  को  वह   सबसे  छुपा  ले  l  जैसी  चाहत  होती  है  वैसे  रास्ते  भी  निकल  आते  हैं  l  मायावी  शक्तियां  तो  शुरू  से  ही  संसार  में  हैं  l  रावण  मायावी  था  , हिरन्यकश्यप , बकासुर , भस्मासुर , अघासुर   जैसे  असंख्य  असुर  हैं   l  वे  जीवित  नहीं  तो  क्या ,  उनकी  वाइब्रेशन  तो  ब्रह्माण्ड  में  हैं  l जैसा  जो  चाहता  है ,  वैसी  ही  वाइब्रेशन  उसके  पास  आ   जातीं  हैं  l  अब  मनुष्य  को  भी  मायावी    बनने  का  रास्ता  मिल  गया  l  फिर  इन  असुरों  के  अनेक  सहयोगी  ---भूत , प्रेत , जिन्न ,पिशाच  आदि भी  होते  हैं  ,  उन  सबका  मनुष्य  को  भरपूर  सहयोग मिला  l  और  मनुष्य  को  अपनी  दुर्बुद्धि  से  उन्ही  का  जीवन  बहुत  पसंद  आया  , खाओ -पीओ  मौज  उड़ाओ , मारो -काटो  ,  कोई  नैतिकता  नहीं  , कोई  नियम  नहीं  l  मनुष्य  युगों  से  इन्ही  के  जैसा  जीवन  जी  रहा  है  , शरीर  मनुष्य  का  है  लेकिन  अपने  भीतर  से  वह  -----है  l    यह  कटु  सत्य  है  , इसका  प्रमाण  भी  है   l  संसार  का  इतिहास  युद्धों  का  इतिहास  है , बड़े  भीषण  युद्ध  हुए हैं  और  आज  भी  हो  रहें  हैं , खून  की  नदियाँ  बह  गईं , अणुबम  तो  ऐसे  गिरे  कि  सब  कुछ  राख  हो   गया  l  यदि  मनुष्य ' इनसान '  होता  तो  इतने  युद्ध  नहीं  होते  ,  ये  सारे  शौक  तो  भूत ,  पिशाचों  के  ही  हैं  l  आज  स्थिति  ये  है  कि  संसार  को  नहीं  सुधार  सकते  l  अब सब  व्यक्तिगत  है  , जो  अच्छा  व  श्रेष्ठ  जीवन  जीना  चाहे  ,  वह  इस  कीचड़  में  कमल  की  तरह  रह  सकता  है  l  अपनी  कम्युनिटी  में खींचने  के  लिए  भूत -पिशाच  उस  पर  बहुत आक्रमण  करेंगे  ,  लेकिन  यदि   एक सच्चा  और  श्रेष्ठ  इन्सान  बनने  का  संकल्प  लिया  है   तो  ब्रह्माण्ड  की  दिव्य  शक्तियां  उसकी  मदद  अवश्य  करेंगी  l  

7 February 2026

WISDOM ----

   कांची नरेश  की  राजकुमारी  प्रेत  बाधा  से  पीड़ित  थी  l  भूत  सामान्य  नहीं  था , वह  ब्रह्म राक्षस  था  l  राजा  ने  श्री  रामानुज  को  बुलाया  l   रामानुज  ने  वहां  जाकर   जब  राजकुमारी  को  देखा  तब  सब  समझ  गए  और   पूछा  ---- "  आपको  यह  योनि  क्यों  मिली  l "  ब्रह्मराक्षस  रो -रोकर  बोला  ---- "  मैं  विद्वान  था  ,  किन्तु  मैंने  अपनी  विद्या  छिपाकर   रखी  l  किसी  को  भी  मैंने  विद्यादान नहीं  किया  ,  इससे  मैं  ब्रह्मराक्षस  हुआ  l  आप  समर्थ  हैं  ,  मुझे  इस  प्रेतत्व  से  मुक्ति    दिलाइये  l "  श्री  रामानुज  ने  राजकुमारी के  मस्तक  पर  हाथ  रख  कर  जैसे  ही  भगवान  का  स्मरण  किया  ,  वैसे  ही  ब्रह्मराक्षस   ने  राजकुमारी  को  छोड़  दिया  ,  क्योंकि  वह  स्वयं  प्रेत योनि  से  मुक्त  हो  गया  l  उस  दिन  से  श्री  रामानुज  ने  प्रतिज्ञा  की   कि  वह  स्वाध्याय  का  लाभ   अपने  समाज   को  भी  देते  रहेंगे  l  

4 February 2026

WISDOM

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते हैं  ---- 'किसी  को  भी  असफलता  मिलने पर  निराश  होकर  नहीं  बैठना  चाहिए  l  प्रयासरत  रहना  चाहिए  , किसी  न  किसी  क्षेत्र  में  सफलता  अवश्य  मिलेगी  l   जिस  तरह सीढ़ियाँ  चढ़ने  में सावधानी   बरती  जाती  है  ,  अतिशीघ्रता में  कभी-कभी  पाँव  फिसलने  व  गिरने  का  भी  डर   रहता  है  ,  उसी  तरह  मंजिल  तक  पहुँचने  के लिए   बढ़ाये  जाने  वाले  क़दमों  में  भी   सावधानी  का  ध्यान  रखना  जरुरी  है  l  मंजिल  तक  ले  जाने  वाला   हमारा हर  प्रयास  महत्वपूर्ण  होता  है  l  "  पंचतंत्र  की  एक  कहानी  है  ---------------- एक  जंगल  में  दो  पक्षी  रहते  थे  l  उस  जंगल  में   एक    छोर  पर  एक  वृक्ष  था  ,  जिसमें  वर्ष  में  एक  बार  स्वादिष्ट  फल  लगते  थे  l  जब  फलों  का  मौसम  आया  ,  तो  जंगल  के  दोनों  पक्षियों  ने  वहां  जाने  की  योजना  बनाई  l  पहले  पक्षी  ने  दूसरे  पक्षी  से  कहा  --- "  वह  वृक्ष  यहाँ  से  बहुत  दूर  है  ,  इसलिए  मैं  तो  आराम  से  वहां  पहुँच  जाऊँगा  l  अभी  फलों  का  मौसम  दो  माह  रहेगा  l "  इस  बात  पर  दूसरे  पक्षी  ने  कहा  ---- " नहीं  मित्र  !  मुझसे  तो  रहा  नहीं  जा  रहा  है  l  उन  स्वादिष्ट  फलों  के  बारे  में  सोचकर  ही  मेरे  मुँह  से  पानी  आ  रहा  है   l  इसलिए  मैं  तो  एक  ही  उड़ान  में  वहां  पहुंचकर   मीठे  फल  खा  लेना  चाहता  हूँ  l "  दूसरे  दिन  दोनों  पक्षी  अपने  घोंसले  से  निकलकर  उस  वृक्ष  की  ओर  उड़  चले  l  कुछ  दूर  जाने  पर  पहले पक्षी  को  थकान  होने  लगी  ,  तो  वह  विश्राम  करने  के  लिए  एक  वृक्ष  की  टहनी  पर  ठहर  गया  l  वहीँ  दूसरा  पक्षी  उसे  ठहरा  हुआ  देखकर  मुस्कराया  और  तेजी  से  फलों  की  ओर  उड़ने  लगा  l  थकान  तो  उसे  भी  थी   लेकिन  उसे  फल  खाने  की  जल्दी  थी  l  अब  उसे  दूर  से  ही  फलों  वाला  वृक्ष  दिखाई  देने  लगा  l  फलों  की  सुगंध  भी  उसे  आने  लगी  ,  लेकिन  तभी  उसके  पंख  लड़खड़ाए  क्योंकि  वह  बुरी  तरह  थक  चुका  था  l  वह  आसमान  से  जमीन  पर  जा  गिरा  l  उसके  पंख  बिखर  गए   और  वह  उन  फलों  तक  कभी  नहीं  पहुँच  सका  l  दूसरी  ओर  पहला  पक्षी  जो  रुक -रूककर  आ  रहा  था  ,  वह  फलों  तक  आराम  से  पहुँच  गया  l  और  उसने  जी  भरकर  स्वादिष्ट  फल  खाए  l  इस  कहानी  से  हमें  यही  शिक्षा  मिलती  है   कि  एक -एक  कदम  चलकर  ही  हम  अपने  लक्ष्य  को  प्राप्त  कर  सकते  हैं  l  साथ  ही  लक्ष्य  तक  पहुँचने  के  लिए   जितना  महत्त्व  श्रम  व  प्रयास  का  है  ,  उतना  ही महत्त्व  विश्राम  का  भी  है  l  विश्राम  करने  से  ही  हमें  आगे  बढ़ने  के  लिए  ऊर्जा  मिलती  है  l