18 October 2022

WISDOM ----

 हमारे  महाकाव्य  --रामायण  और  महाभारत  -- केवल  सुनने , सुनाने  के  लिए  नहीं  हैं  ,  उनकी  शिक्षाओं  पर  अमल  करें  ,  विभिन्न  प्रसंगों  से   अपना  विवेक  जाग्रत  करें  तो  सुख -शांति  के  द्वार  खुल  जाएँ  l   महाभारत  का  ये  प्रसंग  हमें  राष्ट्रीय  एकता  का  पाठ  पढ़ाता  है  लेकिन  महाभारत  हुए  युग  बीत  गए  ,  हमने  वह  पाठ  सीखा  ही  नहीं   और  आपसी  फूट  से  सदियों  की  गुलामी  और  विदेशी  आक्रमणों  को  झेला  l  कहते  हैं  जब  जागो  तब  सवेरा   !   बाहरी  शक्तियां  तो  लाभ  उठाने  की  तैयारी  में  रहती  हैं  l  प्रसंग  है  ----  जुए  में  हार  जाने  के  बाद  पांडव  वन  में  निष्कासित  जीवन  व्यतीत  कर  रहे  थे  l  उन्हों  दिनों  की  बात  है   एक  यक्ष  ने   हस्तिनापुर  पर  आक्रमण  कर  दिया  l  जब  तक  सेना  तैयार  हो   उसने  दुर्योधन  को  छलपूर्वक  पकड़  लिया   और  विमान  द्वारा  युवराज  दुर्योधन  को  बंदी  बनाकर  अपने  यक्षपुरी   ले  चला  l  विमान  वहां  से  निकला  जहाँ  पांचों  पांडव  और  द्रोपदी  विश्राम  कर  रहे  थे  l   विमान  में  द्वन्द युद्ध  करते  दुर्योधन  को  युधिष्ठिर  ने  पहचान  लिया  l  उन्होंने  अर्जुन  को  बुलाकर  तुरंत  आज्ञा  दी  कि  --- जाओ  और  इस  यक्ष  से  युद्ध  कर  भाई  दुर्योधन  को  छुड़ा  दो  l  इस  पर   भीम  ने  विरोध  किया   और   उन्हें  दुर्योधन  द्वारा  किए  गए  षड्यंत्रों  और  अत्याचारों  की  याद  दिलाई  l   तब  युधिष्ठिर  ने  कहा ---- नीति  कहती  है   जब  बाहरी  आक्रमण  हो  तो  आंतरिक  द्वेष  भूलकर  परस्पर  मदद  करनी  चाहिए   l  हम  भाई -भाई  का  आपस  में  चाहे  वैर  है ,  लेकिन  बाहरी  आक्रमण  के  समय  हम  एक  सौ  पांच  है  l  '  अर्जुन  को  भी  बात  समझ  में  आ  गई   और  उसने  यक्ष  से  युद्ध  कर  के  दुर्योधन  को   छुड़ा  लिया  l   दुर्योधन  ने  विनीत  भाव  से   युधिष्ठिर  से  कहा --- आप  इस  उपकार  के  बदले  क्या  चाहते  हैं  ? '  युधिष्ठिर  ने  युवराज  दुर्योधन  को  सम्मान  दिया  और  कहा  --अभी  आप  हस्तिनापुर  लौट  जाएँ  ,  वहां  आपके  बिना  सब  चिंतित  होंगे  l  '

WISDOM---

   यमदूत  और  देवदूत  मृतकों  की  जीवन गाथा  पूछकर  उन्हें  स्वर्ग  और  नरक  में  ले  जाते  थे  l  एक  साधु  के  पास  वे  पहुंचे   तो  वे  बोले  ---- " मैं  भरी  जवानी  में  संन्यासी  हो  गया  l  यहाँ  तक  कि  छोटे -छोटे  बच्चे , पत्नी  तथा  माता  के   रोने -बिलखने  की  परवाह  नहीं  की  l  ऐसी  है  मेरी  भक्ति  l "  उस  साधु  को  यमदूतों  ने  नरक  पहुंचा  दिया  l   साधु  बड़ा  परेशान  हुआ  , तब  धर्मराज  ने  उसके  कर्मों  की  समीक्षा  करते  हुए  कहा ---- " कर्तव्यों  का  परित्याग  कर  के  कोई  भक्ति  नहीं  हो  सकती  l  "  वस्तुतः  कर्तव्य  सर्वोपरि  है  l   आचार्य श्री  लिखते  हैं  --- कर्तव्य  ही  धर्म  है  l  भगवद भक्ति  उसी  का  एक  अंग  है  l