एक कथा है ---- महाराज तुर्वस ने राजसूय यज्ञ किया , उसके समापन के अवसर पर सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया l इस समारोह में महर्षि जैमिनी भी सम्मलित हुए l देवपूजन के बाद राजकुमारी अर्णिका ने भावभरी नृत्य -नाटिका प्रस्तुत करनी आरम्भ की l पूरी सभा इस प्रस्तुति को मुग्ध होकर देख रही थी लेकिन महर्षि की आँखों से अविरल अश्रुधार बह निकली l राजकुमारी ने महर्षि से पूछा ---- "क्या मुझसे कोई भूल हुई महर्षि ? आपकी आँखों से गिरते हुए इन आंसुओं का कारण पूछ सकती हूँ ? " महर्षि बोले ---- " नहीं पुत्री ! तुम्हारी प्रस्तुति तो त्रुटिहीन है l ये अश्रु तो भविष्य की आशंका के हैं l मुझे दिखाई पड़ता है कि आज जो संगीत शास्त्रों पर आधारित है और मानवीय चेतना में संस्कार जाग्रत करने का माध्यम है , वही एक दिन कामुकता और अश्लीलता भड़काने का साधन बनेगा l कलियुग में ऐसा समय भी आएगा कि जब लोग संगीत को दैवी गुणों के लिए नहीं , दूषित भावनाओं के विस्तार के लिए उपयोग करेंगे l " राजकुमारी अर्निका ने प्रश्न किया ---- " क्या कोई उपाय है जिससे संगीत की परंपरा अक्षुण्ण रहे और इसकी मर्यादा को चोटिल न होना पड़े ? ' महर्षि ने उत्तर दिया ---- " उपाय एक ही है कि भारतीय चिन्तन में उस वैदिक संस्कृति के गुण बीज रूप में सुरक्षित रहें , जो आज इसे गौरवान्वित करने का आधार बने हैं l " महर्षि जैमिनी की आशंका आज स्पष्ट रूप से सत्य ही दिखाई पड़ रही है l न केवल संगीत बल्कि फिल्म , साहित्य , कला में कलाकार अश्लीलता के प्रदर्शन पर उतारू हैं , अपनी संस्कृति को भूल गए हैं l कामुक और भड़कीला प्रदर्शन समाज की मानसिकता को प्रदूषित करता है l कोई भी धर्म और संस्कृति चिरकाल तक अक्षुण्ण बनी रहे , इसके लिए अनिवार्य है ---श्रेष्ठ चरित्र निर्माण l सभी को जागने की जरुरत है कि कौन स्वेच्छा से अश्लीलता का प्रदर्शन कर रहा है और कौन अपनी दमित कामना , वासना की पूर्ति के लिए अश्लीलता को बढ़ावा दे रहा है , लोगों की कमजोरियों का फायदा उठाकर उन्हें संस्कृति का हनन करने वाले कार्यों को करने की लिए बाध्य कर रहा है l चारित्रिक पतन के कारण ही भगवान श्रीकृष्ण का यादव वंश आपस में ही लड़कर नष्ट हो गया , द्वारका समुद्र में डूब गई l भगवान श्रीकृष्ण का संसार को एक सन्देश है , उन्होंने संसार को चेताया है कि जब उनकी द्वारका डूब सकती है तो इन कमजोरियों , विकृतियों को लेकर कोई कैसे बच सकता है l
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