पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " संसार में वैभव रखना , धनवान होना कोई बुरी बात नहीं , बुराई तो धन के अभिमान में है l वैभव असीम मात्रा में कमाया तो जा सकता है , पर उसे एकाकी पचाया नहीं जा सकता l धन -संपत्ति और ज्ञान में वृद्धि के साथ -साथ यदि मनुष्य का ह्रदय विकसित हो , चिन्तन परिष्कृत हो , उसमें ईमानदारी , उदारता ` सेवा आदि सद्गुण हो तभी वह धन और ज्ञान सार्थक होगा l अन्यथा पैनी अक्ल और अमीरी विनाश के साधन होंगे l " आध्यात्मिक मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग की यह स्पष्ट मान्यता थी कि मनुष्य की धर्म , न्याय , नीति में अभिरुचि होनी चाहिए l यदि इस दिशा में प्रगति न हो पाई तो अंतत: मनुष्य टूट जाता है और उसका जीवन निस्सार हो जाता है l "