श्रेणिक पुत्र मेघ ने भगवान बुद्ध से मन्त्रदीक्षा ली और उनके साथ रहकर तपस्या में लग गए l भगवान बुद्ध का कहना था कि आत्मोत्कर्ष के लिए केवल मन्त्र जप ही नहीं तप भी अनिवार्य है l अत: वे मेघ को बार -बार उस ओर धकेलने लगे l मेघ ने कभी रुखा भोजन नहीं किया था , अब उन्हें रुखा भोजन दिया जाने लगा l कोमल शैया के स्थान पर भूमि शयन , आकर्षक वेशभूषा के स्थान पर मोटे वल्कल वस्त्र और सुखद सामाजिक संपर्क के स्थान पर राजगृह आश्रम की स्वच्छता , सेवा -व्यवस्था एक -एक कर इन सब में जितना अधिक मेघ को लगाया जाता , उनका मन उतना ही उत्तेजित होता , महत्वाकांक्षा और अहंकार बार -बार सामने आकर खड़ा हो जाता और कहता ---- " ओ रे मूर्ख ! कहाँ गया वह रस ? जीवन के सुखोपभोग को छोड़कर कहाँ आ फँसा l " जब मन बहुत परेशान हो गया तो मेघ भगवान बुद्ध से कहने लगा --- " तात ! मुझे तो साधना कराइए, तप कराइए , जिससे मेरा अंत:करण पवित्र बने l " भगवान बुद्ध बोले ---- " तात ! यही तो तप है l विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक स्थिरता -- यह गुण है , जिसमें आ गया , वही सच्चा तपस्वी है , स्वर्ग विजेता है l उपासना तो उसका एक अंग मात्र है l " मेघ की आँखें खुल गईं और वे एक सच्चे योद्धा की भांति अपने मन से लड़ने , मन को जीतने चल पड़े l
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