21 September 2020

WISDOM ----

   चाहे  कोई  भगवान  का  कितना  भी  बड़ा  भक्त  हो  ,  कर्म फल  से  कोई  नहीं  बचा  है  l   जब  धरती  पर  पाप  बहुत   बढ़    जाता  है   तब  भगवान  स्वयं  जन्म  लेते  हैं  पापियों  का  नाश  करने  के  लिए   l   जब  दसों   दिशाओं  में  रावण  का  आतंक  था  ,  तब  भगवान  राम    का  जन्म  हुआ  l   उस  समय  ऋषियों  के  चिंतन  में  यह  बात  थी   की  रावण  तो  सपरिवार  परम  शिव  भक्त  है  ,  तो  क्या   प्रभु  स्वयं  अवतार  लेकर   अपने  ही  भक्त  का  विनाश  करेंगे   ?        तब  भगवान  भोलेनाथ  ने   ऋषियों  से  कहा --- ' हे   ऋषिगण  !  पूजा  के  कर्मकांड  को  भक्ति  नहीं  कहा  जा  सकता  l   भक्ति  तो  पवित्र  भावनाओं   में वास  करती  है  l   जो  भक्त  है  , उसकी  संवेदना  का  विस्तार  तो  सृष्टिव्यापी  होता  है  ,  भला  वह  कैसे  किसी  का  उत्पीड़न   कर  सकेगा  l   रावण  भक्त  नहीं , तपस्वी  है  l   आज  उसे  अपने  तप  का  फल  मिल  रहा  है  ,  परन्तु  उसकी  संवेदना  को  उसके  अहंकार  ने  निगल  लिया  है  l   फिर  यदि  किन्ही  अर्थों  में  वह  मेरा  भक्त  भी  है   तो   अपने  भक्त  का  उद्धार  करना  मेरा  ही  दायित्व  है  l  '   युद्ध    से पूर्व  जब  रावण  ने  शक्ति  पूजा  की  तब  देवी  ने  उसे  वरदान  दिया  था  --- ' तुम्हारा  कल्याण  हो  l '    रावण  का  अंत  होने  में  ही  उसका  कल्याण  था  l 

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