16 October 2019

WISDOM ---- सकारात्मक द्रष्टिकोण से जीवन को नई दिशा मिलती है

  जीवन  की  अधिकांश  समस्याएं  हमारी  नकारात्मक  सोच  के  कारण  उत्पन्न  होती  हैं  l  पं.  श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  अपने  लेखों  व  प्रवचनों  से   हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाई  है  जिसकी  आज  के  संसार  में  सबसे  ज्यादा  जरुरत  है  l  स्वर्ग  और  नरक  हमारे  ही  द्रष्टिकोण  में  बसते हैं  l  आचार्य जी  की  अमृतवाणी  में  एक  घटना  का   उल्लेख  है ----
 '  आगरा  के  एक  सेठ  थे  , बहुत  संपन्न  थे  l  उन्हें  पंद्रह  दिनों  से  नींद  आनी  बंद  हो  गई  , भयंकर  सिरदर्द  और  आँखें  लाल  हो  गईं  थीं  l ऐसा  लगता  था  कि   दिमाग  की  नसें  फट  जाएँगी  l  किसी  ने  उन्हें  आचार्य जी  के  पास  जाने  की  सलाह  दी  l  आचार्यजी  ने  उनसे   कहा  कि  बताइए क्या  कारण  है  ?
  सेठजी  बोले ---- '   हुआ  यह  कि  इनकम  टैक्स   ऑफिसर  ने  छापा  मारा  l  हमारे  पास  दो  बहीखाते  थे  l  मुनीम  नाराज  हो  गया  था  ,  उसने  ऑफिसर  को  बता  दिया  कि  इनके  पास  दो  बहीखाते  हैं  और  यह भी  बता  दिया  कि  वे  कहाँ  रखे  हैं  l  इनकम  टैक्स  ऑफिसर  ने  दोनों  बहीखाते  जब्त  कर  लिए  l  हमारे  ऊपर  अपराधी  का  केस  चलाया  गया  l  अभी  जमानत  पर  छूटे  हैं   l  बहुत  भय  है ,  आगे  न  जाने  क्या  होगा  ?  "   आचार्य जी  ने  उनसे  कहा --- ' आप  मेरे  पास  बैठ  जाइए  l दवाई  मैं  आपको    कल   दूंगा  ,  मैं  चाहता  हूँ    कि  आपको  इस  मुकदमे  की जड़  से  ही  बचा  दूँ  l '
  सेठजी  पूछने  लगे  कि  आप  ऐसा  कैसे   कर  सकते  हैं  ?
  आचार्य जी  उन्हें  समझाने  के  लिए   उनसे  बात  करने  लगे    और  कहा  कि--- '  आप  यह  बताइए  कि  उस  असली  और  नकली  बहीखाते  में  कितने  रूपये  का  चक्कर  है  ?  यदि  आपको  इनकम टैक्स  देना  पड़े ,  पेनल्टी  देनी  पड़े    तो  आपको  कितने  रूपये  का   नुकसान  भुगतना  पड़ेगा  l '
 सेठ  ने  कहा  --- ' दस  लाख  रुपया  , जो  हमने  तीन - चार  वर्षों  से  चुरा  रखा  था  ,  एक  तो  वह  और   दुगुनी  पेनल्टी  लगाई जा  सकती  है  l  कुल  मिलकर  तीस  लाख  रुपया  देना  पड़  सकता  है  l  '
  आचार्य जी ने  सहानुभूति  प्रकट  की  -यह  तो  बड़ी  लम्बी  रकम  है  l  फिर  उससे पूछा   कि  तुम्हारी  चल - अचल  सम्पति    आदि  सब  मिलकर   कुल  कितनी  होगी  ? '
सेठ  ने  कहा  --- ' लगभग  पचास  लाख  l '
तब  आचार्यजी  ने  समझाया  कि--- '  पचास  लाख  में  से  तीस  लाख  चले  गए ,  तब  भी  बीस  लाख  तो  बचे  (  उस  समय  में  )  ,  मेरे  पास  तो  बीस  पैसे  भी  नहीं  हैं  l  फिर  कहा --- आपको  तीस लाख  जुरमाना  हो  जाये   और  आप   छूट   जाएँ ,  तब  मुझे  बुला  लेना  l  आपका  जो  बचा  हुआ  सामान  है  उसे  बिकवाकर    आपको  रकम  दिलव  दूंगा  l  बीस  लाख  का  ब्याज बहुत  होता  है   l आप  घर  बैठे  आराम  करें  l  किफ़ायत  से  इस  ब्याज  से महीने  का  खर्च  निकाल  कर  भी   पर्याप्त  राशी  बचेगी  l   गवर्नमेंट  को  जो  तीस  लाख  देना  पड़ेगा  ,  वह   घाटा    पंद्रह - सोलह वर्ष  में  पूरा  हो  जायेगा  l "
आचार्य जी  की  वाणी  में  जादू  था  ,  सेठ  को  बात  समझ  में  आ  गई  l  रात  भर  चैन  से  सोया  l  सुबह  गुरुदेव ने  पूछा  -- अब  कुछ  और  इलाज  कराना  है  क्या  ?  सेठ  बोला -- अब  तो  सब  हो  गया  l  आचार्य जी  ने  कहा --- अब  घर  जाओ  ,  ईश्वर  पर  विश्वास  रखो  ,  उनका  नाम  लो  l   '  उसके  बाद  घर  वालों  की  चिट्ठी  आई   कि  सेठ  जी  अब  बिलकुल  ठीक  हैं  ,  रात  भर  सोते  हैं  l
   

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