7 August 2020

WISDOM ----- यज्ञ का मर्म

 युगों  से  संसार  में  सभी  धर्मों  के  लोग   अपने - अपने  तरीके  से   अपने  ईश्वर  को  पूजते  हैं  , उन्हें  प्रसन्न  करने  के  लिए   बहुत  कुछ  करते  हैं  ,  लेकिन  इन  सब  के  बाद  भी  धरती  पर  पाप , अत्याचार  बढ़ता  ही  जा  रहा  है  ,  लोगों   का जीवन  पहले  से  अधिक  तनावग्रस्त  हो  गया  है  l    कारण  यही  है  कि   लोगों  की  भावनाएं  पवित्र   नहीं हैं  ,    संवेदना , करुणा  नहीं   है  l  स्वार्थ , लालच  और  अहंकार  बढ़  गया   है l ----
 महाभारत   में   राजसूय  यज्ञ  की  कथा  आती  है  , इसमें  नेवले  का  प्रसंग  है  ---पांडवों  द्वारा   किया  गया  राजसूय  यज्ञ  श्रीकृष्ण  की  उपस्थिति  में  संपन्न  हुआ  l  अब  पांडवों  में  बहुत  अहंकार  आ  गया   कि   हमने  इतना  दान  किया , इतने  यज्ञ  किये , इतना  भोजन  कराया  ----   भगवान  श्रीकृष्ण   ने  देखा  कि   पांडवों  में  अहंकार  पल  रहा  है  , यह  यज्ञ  यज्ञीय   भाव  से  नहीं  हुआ   l   श्रीकृष्ण  सभी  को  यज्ञ स्थल   के  पास  ले  गए  ,  वहां  देखा  एक  नेवला   लोट  रहा  है   जिसका  आधा  शरीर  सोने  का  था  और  आधा  सामान्य  था  l   भगवान  श्रीकृष्ण  ने    जानना   चाहा  कि   उसका  यह  शरीर  कैसे  हुआ   ?  नेवले  ने  बताया  ---- ' मैंने  पहले  भी  एक  महायज्ञ  भाग  लिया  था  ,  उसमे  मेरा  आधा  शरीर  सोने  का  हो  गया  l  यहाँ  भी  मैं  इसी  आशा  से  आया  हूँ  कि  बचा   हुआ शरीर  भी  सोने  का  हो  जाये  ,  लेकिन   यहाँ ऐसा  नहीं  हुआ  l "
पांडवों  की  उपस्थिति  में  श्रीकृष्ण  ने   नेवले  से  पूछा   कि   बताओ  पिछले  यज्ञ  कैसा  था   ?    नेवले  ने  बताया  ---- " एक  ब्राह्मण  परिवार  अनुष्ठान  कर  रहा  था , भयंकर  अकाल  की  स्थिति  थी   l  ऐसे  में  उन्होंने  नौ  दिन  पश्चात्  बचा  हुआ   भोजन  लेने  का  विचार  किया  था  l   साधन - सुविधा  कुछ  नहीं  थी  अत:  नवें  दिन   भावनात्मक  पूर्णाहुति  कर   वह  परिवार  ज्यों  ही  भोजन   करने  बैठा   कि   एक  चांडाल  आ  गया  ,  उसने  कहा  कि   हमें  भूख  लगी  है   l   ब्राह्मण   ने अपना  भोजन  उसे  दे  दिया  l   भोजन  करने  के  बाद  उसने  कहा  कि   पेट  नहीं  भरा  , तब  ब्राह्मण  की  पत्नी  ने  भी  अपना  भोजन  उसे  दे  दिया  l  लेकिन  तब  भी  उसका  पेट  नहीं  भरा  l  तब  अंतिम  आस  के  रूप  में   दोनों  पुत्रों  के  पास  जो  भोजन  था  , वह  भी  उन्होंने  चांडाल  को  दे  दिया  l   चांडाल  ने   भोजन  किया  और  तृप्त   हो गया  ,  उसने  पूछा  कि  अब  आप  लोग  क्या  खाएंगे   ?  ब्राह्मण  ने  कहा -- ईश्वर  की  जैसी  इच्छा , हम  पानी  पीकर  पारायण  कर  लेंगे  l  "
    नेवले   ने पांडवों  और  श्रीकृष्ण  को  बताया  --- "  चांडाल  ने    भोजन  कर  के   तृप्त  होकर  जिस  स्थान  पर  कुल्ला  किया  , वहां  कुछ  भोजन  के  कण  भी  गिर  गए  ,  मैंने   उसी में  लोट  लगाईं  थी   तो  मैं  आधा  सोने  का  हो  गया  l   फिर  मैंने  देखा  कि   ब्राह्मण  सपरिवार   चांडाल  रूपी  अतिथि  को  प्रणाम  करने  झुके   तो वहां  स्वयं  नारायण हरि   प्रकट   हो गए  l   भगवान  स्वयं  चांडाल   का रूप  धरकर   ब्राह्मण  परिवार  की  यज्ञीय   वृत्ति  को  परखने  आये  थे   l  "  नेवले  ने  कहा  -- में  युगों  युगों   से प्रतीक्षा  कर  रहा  हूँ  कि   ऐसा  यज्ञ   पुन:  हो  ,  यहाँ  भी  मैं  इसी  आशा  से  आया  था   लेकिन   मेरा दुर्भाग्य  है  कि   अधूरी  आशा   और  आधा  सोने  का  शरीर  लिए  जा  रहा  हूँ  l '
  भगवान  श्रीकृष्ण    ने  पांडवों से  कहा --- ' प्रतिकूलताओं  में  जिसका  यज्ञीय   भाव  जिन्दा   हो  ,  जो  देने  की  आकांक्षा  रखता  हो  ,  जिसकी  भावनाएं  पुष्ट  व  पवित्र  हों  वही  देवता  है   और  इस  भाव  से  किया   गया   यज्ञ  ही  सार्थक  है  l   भगवान  के   ऐसा कहते  ही  घनघोर  घटायें  बरसीं  और  अकाल  दूर  हुआ  l   यह  सब  सुनकर  पांडवों   का अहंकार  दूर  हुआ  l   भगवान  ने  कहा  कि   पहले  यज्ञ   के मर्म  को  समझो  ,  यज्ञमय   जीवन   का मर्म  समझो  ,  तभी  हवं - पूजन ,  यज्ञ  सार्थक  है  l '
  

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