श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --- दुराचारी से दुराचारी व्यक्ति भी यह ठान ले कि प्रभु मेरे हैं , मैं उनका हूँ , उनका अंश होने के नाते अब मुझसे कोई गलत कार्य नहीं होगा , तो फिर वे उसे भी तार देते हैं l भगवान कहते हैं --विवेक कभी साथ नहीं देता , संसार का आकर्षण लुभाता है , गलतियाँ हो जाती हैं तो एक ही मार्ग है --हम भगवान का पल्ला पकड़ लें l गन्दा नाला भी गंगा में मिलकर पवित्र हो जाता है लेकिन जो दुराचार किया है उसके लिए कष्टों से तो गुजरना ही होगा l कर्मफल तो भुगतना ही होगा , पीड़ा को तो सहना ही होगा l आचार्य श्री कहते हैं ---ईश्वर के दरबार में झूठ और धोखा नहीं चलता l यदि गलती न करने का संकल्प लिया है तो उस पर अडिग रहो , प्रकृति में क्षमा का प्रावधान नहीं है l ------ डाकू अंगुलिमाल अनेक नागरिकों की उँगलियाँ काटकर उनकी माला पहनकर घूमता था l राजा प्रसेनजित की सेना भी उससे हार मान गईं थीं l उसके पास चलकर गौतम बुद्ध आए l अंगुलिमाल ने उनसे कहा --- " भिक्षु ! मैं तुम्हे मार दूंगा l " वह उनसे बार -बार रुकने को कह रहा था l तब तथागत बोले ---- " रुकना तो तुझे है पुत्र ! मैं तो कभी का ठहरा हुआ हूँ l भाग तो तू रहा है --अपनी जिन्दगी से , अपने आप से , अपने भगवान से l तू रुक ! " इतना कहते -कहते वे उसके नजदीक आ गए और उसे गले से लगा लिया l अंगुलिमाल को पहली बार सच्चा प्यार मिला l बुद्ध ने उसे संघ में शामिल कर लिया l अब संघ में भगवान बुद्ध की बुराई होने लगी कि उन्होंने एक अपराधी , खतरनाक डाकू को संघ में शामिल कर लिया l भगवान बुद्ध ने अंगुलिमाल से धैर्य रखने और कोई प्रतिक्रिया न देने को कहा l सभी भिक्षुक सामूहिक रूप से भगवान बुद्ध के पास आए और कहा --- अंगुलिमाल के संघ में शामिल होने के कारण संघ की बुराई हो रही है l बुद्ध बोले --- " वह पूर्व में डाकू था , अब भिक्षु है , , पर तुम में से बहुत सारे डाकू बनने की दिशा में चल रहे हो l उसे मार डालने की सोच रहे हो l यह क्या कर रहे हो ? " भगवान बुद्ध ने सोचा कि इन लोगों को जवाब मिल जायेगा और अंगुलिमाल को भी निर्वाण मिल जायेगा , यह सोचकर उन्होंने अंगुलिमाल को उसी क्षेत्र में भिक्षा मांगने भेजा , जहाँ वह अपराधी बना था l लोगों में बहुत क्रोध था , उसे पत्थर खाने पड़े l चोट खाकर वह मूर्छित हो गया l उसके पास कोई नहीं आया , बुद्ध भगवान स्वयं आए , पत्थर हटाए , उसकी सेवा की l जब अंगुलिमाल को होश आया तो उससे कहा --- " तुम एक घुड़की दे देते , सब भाग जाते , क्यों मार खाते रहे ! " अंगुलिमाल बोला ---- " प्रभो ! कल तक मैं बेहोश था , आज ये बेहोश हैं l " गीता में भगवान कहते हैं ---- " यथार्थ निश्चय वाले , संकल्प शक्ति से मजबूत व्यक्ति का अनन्य भाव से समर्पण उसे न केवल शांति , वरन एक सुरक्षा कवच भी प्रदान करता है l ईश्वर सदा उसके साथ रहते हैं l कोई उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता l
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