इस संसार में जितनी भी समस्याएं हैं उनका मूल कारण ---' आर्थिक समस्या l ' हर प्राणी के भोजन -पानी का प्रबंध ईश्वर किसी न किसी माध्यम से करते हैं , कोई भूखा नहीं रहता है लेकिन संसार में रहकर प्रत्येक व्यक्ति अधिक -से अधिक सुख सुविधाएँ जुटाना और धन एकत्रित करना चाहता है l यह इच्छा बलवती इसलिए भी हो जाती है क्योंकि अमीर लोग हर समय अपनी अमीरी का और अमीरी से हासिल किए प्रभुत्व का , ख़रीदे हुए सम्मान का दिखावा करता है l इस कारण अब प्रत्येक व्यक्ति धन कमाने की अंधी दौड़ में सम्मिलित हो गया है l रोजगार की इतनी व्यवस्था नहीं है l रोजगार के साधन तो बहुत हैं लेकिन यदि सबको रोजगार मिल जायेगा तो धन , पद और शक्ति के अहंकारियों की सनक , अनुत्पादक शौक कैसे पूरे होंगे ? युग के साथ इस तरह के शौक या सनक का रूप भी बदल गया है l धर्म , जाति के आधार पर होने वाले दंगे , आन्दोलन , नारे बाजी , जय-जयकारा , भगदड़ , सामूहिक रूप से विरोध करना , कीचड़ उछालना , अपना शक्ति प्रदर्शन करना ---यह सब ऐसे शौक के कुछ रूप हैं l अमीरों के पास अपार धन हैं , उन्हें अपने ऐसे अनुत्पादक शौक को पूरा करने के लिए पर्याप्त मानव -संसाधन मिल जाते हैं l सबका काम चलता जाता है , उसका परिणाम समाज में चाहे जैसा हो ! अब लोगों ने कर्मफल से डरना छोड़ दिया है और अपने हर गलत कार्य को सही सिद्ध करते हैं l प्रत्यक्ष रूप से कोई स्वीकार नहीं करता कि यह सब ---- हैं लेकिन मन में तो यही बात रहती है कि हर कार्य का पैसा दिया जा रहा है l और जो लोग बेरोजगारी के कारण यह सब कार्य करते हैं वे तर्क देते हैं कि आखिर मेहनत तो कर रहे हैं l यह कलियुग की सबसे बड़ी समस्या है कि लोग नैतिक नियम , मर्यादा भूलते जा रहे हैं l सबसे बड़ा संकट मानवता पर है l धर्म का रूप चाहे जो हो , सबसे जरुरी है कि मनुष्य ' इनसान ' बने l
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