प्रकृति का प्रकोप विभिन्न रूपों में होता है और वैज्ञानिक तरीके से देखें तो उसके अनेक कारण हैं l लेकिन आध्यात्मिक द्रष्टि से देखें तो यह एक प्रकार का सामूहिक दंड है l कहते हैं पापकर्म करने वाला , उस कार्य में सहयोग करने वाला , , उसे देखने वाला और देखकर चुप रहने वाला सभी दंड के भागी होते हैं l वर्तमान का समय लगभग सभी देशों में ऐसा है की लोग बड़े -बड़े अपराध करते हैं , और अपनी शक्ति और सामर्थ्य से दंड से बच जाते हैं l व्यवस्थाएं ही कुछ ऐसी हैं कि अपरा'नेक ऐसे भी हैं जो समाज से छिपकर अनैतिक और अमानवीय कार्य करते हैं l संसार के किसी भी धर्म में लोगों को अपराध करने की छूट नहीं है , नैतिकता और मानवता को ही श्रेष्ठ कहा गया है l जब मानव समाज का नैतिक पतन अति का हो जाता है तब प्रकृति स्वयं दंड देती है l संसार को सुधारना संभव नहीं है यदि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को सुधारे , सन्मार्ग पर चले , ईश्वर का नाम जप और निस्स्वार्थ सेवा के कोई कार्य करे तो ये सत्कर्मों को पूंजी ही उसकी इन आपदाओं से रक्षा करती है , अकाल मृत्यु नहीं होती l पं , श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- 'पिछले जन्मों में हमने क्या किया उस पर अब हमारा कोई वश नहीं है लेकिन वर्तमान समय हमारे हाथ में है l हम सत्कर्म कर के अपने प्रारब्ध के कर्मों की पीड़ा को कुछ कम कर सकते हैं और एक सुन्दर और सुनहरे भविष्य की तैयारी भी कर सकते हैं l