20 May 2026

WISDOM -----

 प्रकृति  का  प्रकोप विभिन्न  रूपों  में  होता  है    और  वैज्ञानिक  तरीके  से  देखें  तो  उसके  अनेक  कारण  हैं  l  लेकिन  आध्यात्मिक  द्रष्टि  से  देखें  तो    यह  एक  प्रकार  का  सामूहिक  दंड  है  l  कहते  हैं  पापकर्म  करने  वाला , उस  कार्य  में  सहयोग  करने  वाला , ,  उसे  देखने  वाला  और  देखकर  चुप  रहने  वाला   सभी  दंड  के  भागी  होते  हैं  l  वर्तमान  का  समय  लगभग  सभी  देशों  में  ऐसा  है  की  लोग  बड़े -बड़े  अपराध  करते  हैं  ,  और  अपनी  शक्ति  और  सामर्थ्य  से  दंड  से  बच  जाते  हैं  l   व्यवस्थाएं   ही  कुछ  ऐसी  हैं  कि  अपरा'नेक  ऐसे  भी  हैं  जो  समाज  से  छिपकर   अनैतिक  और  अमानवीय  कार्य  करते  हैं  l  संसार  के  किसी  भी  धर्म  में  लोगों  को  अपराध  करने  की  छूट  नहीं  है ,  नैतिकता  और  मानवता  को  ही  श्रेष्ठ  कहा  गया  है  l  जब  मानव  समाज  का  नैतिक  पतन  अति  का  हो  जाता  है   तब  प्रकृति  स्वयं  दंड  देती  है  l  संसार  को  सुधारना  संभव  नहीं  है   यदि  प्रत्येक  व्यक्ति  स्वयं  को  सुधारे , सन्मार्ग  पर  चले  ,  ईश्वर  का  नाम जप  और  निस्स्वार्थ  सेवा  के  कोई  कार्य  करे   तो  ये  सत्कर्मों  को  पूंजी  ही  उसकी   इन  आपदाओं  से  रक्षा  करती  है  , अकाल  मृत्यु  नहीं  होती  l  पं , श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ---- 'पिछले  जन्मों  में  हमने  क्या  किया   उस  पर  अब  हमारा  कोई  वश  नहीं  है  लेकिन  वर्तमान  समय  हमारे  हाथ  में  है   l  हम  सत्कर्म  कर  के  अपने  प्रारब्ध  के  कर्मों  की  पीड़ा  को  कुछ  कम  कर  सकते  हैं   और  एक  सुन्दर  और  सुनहरे  भविष्य   की  तैयारी  भी  कर  सकते  हैं  l