यह स्रष्टि कर्मफल विधान से ही संचालित है , यदि आम बोया है तो आम ही मिलेगा और यदि बबूल बो दिया तो कांटे ही मिलेंगे l स्वयं ईश्वर भी इस विधान से बंधे है l किसी को अपने अच्छे -बुरे कर्मों का फल इसी जन्म में मिल जाता है लेकिन कभी -कभी किसी को अपने कर्मों का फल कई जन्मों के बाद मिलता है l हमारे द्वारा किए गए अच्छे -बुरे कर्मों का फल हमें कब , कैसे और किस रूप में मिलेगा , इसे काल निश्चित करता है l इस विधान को समझना बहुत कठिन है l हम महाभारत में देखें तो धृतराष्ट्र और भीष्म पितामह को अपने पिछले किसी जन्म में किए पापकर्म का यह परिणाम यह मिला कि धृतराष्ट्र नेत्रहीन हुए और भीष्म पितामह को शर -शैया का कष्ट सहन करना पड़ा l महारानी द्रोपदी को भरी सभा में अपमानित करने वाले दु :शासन को कठोर दंड भोगते हुए देखने के लिए तेरह वर्ष तक अपने खुले केशों के साथ इंतजार करना पड़ा l व्यक्ति संसार के किसी भी कोने में छुप जाये , अपने किए गए कर्मों के परिणाम से वह बच नहीं सकता l जो पापकर्म व्यक्ति छिपकर , अँधेरे में करता है , योजनाबद्ध तरीके से लोगों को उत्पीड़ित करने के लिए करता है और सोचता है कि उसे किसी ने नहीं देखा , तो यह उसकी भूल है l यह सम्पूर्ण प्रकृति और कण -कण में ईश्वर है जो उसे देख रहे हैं l उनके पास प्रत्येक प्राणी के कर्मों का हिसाब है l कलयुगी संसार में तो न्याय पर बड़ा प्रश्न चिन्ह है लेकिन भगवान के दरबार में ' देर है , पर अंधेर नहीं l ' ऋषि कहते हैं -- ' जैसे हजारों गायों के मध्य बछड़ा अपनी माँ को स्वत: ढूंढ निकालता है , वैसे ही अपने किए गए कर्म आपको किसी भी योनि में सहजता से ढूंढ निकालते हैं l इसलिए सदा शुभ कर्म ही करना चाहिए l "