' पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- ' भक्ति से जीवन रूपांतरित होता है l ईश्वर को फूल माला , मिष्ठान , धूप -दीप , बहुमूल्य धातुएं ये सब चढ़ाना भक्ति नहीं है l ईश्वर तो सर्व समर्थ हैं , वे इन सब आडम्बर से प्रसन्न नहीं होते l उन्हें तो चाहिए कि मनुष्य अपने विकारों को दूर करे , सद्गुणों को जीवन में अपनाएं और सन्मार्ग पर चले l ' आचार्य जी ने अपने साहित्य में इसे साधना , उपासना और आराधना से विस्तार से समझाया है l ' हमें भक्ति सीखनी है तो भक्त प्रह्लाद जैसे भक्त बने जिन्होंने निरंतर ईश्वर का नाम स्मरण करते हुए ईमानदारी और कुशलता से शासन किया l श्री हनुमान जी जैसे भक्त बनो l इस कलियुग में जहाँ देवता और आसुरी प्रवृति के लोग एक साथ समाज में घुलमिलकर रहते हैं , वहां हमें विभीषण से भक्ति सीखनी चाहिए l असुर परिवार में ही पैदा होते हैं , परिवार से ही समाज बनता है l विभीषण ने जब समझा कि रावण का आचरण मर्यादाहीन है , अनैतिक है तब उसने रावण को बहुत समझाया लेकिन रावण अहंकारी था , वह विभीषण पर ही दोष लगाने लगा कि उसकी नियत ख़राब है l तब विभीषण ने उससे बहस करना उचित नहीं समझा और उसने रावण को त्याग दिया और भगवान श्रीराम की शरण में चला गया l संसार विभीषण को चाहे जो कहे लेकिन विभीषण ने इस सत्य को समझाया कि एक साथ दो नाव की सवारी संभव नहीं है कि आप भगवान के भक्त होने का भी नाटक करें और पापी , अत्याचारी मर्यादाहीन आचरण करने वाले का भी साथ दें l कोई एक मार्ग चुनना होगा l यदि ईश्वर की शरण में जाते हैं तो लाभ ही लाभ है लेकिन यदि किसी पापी , आततायी का सहारा लेते हैं तो जीते जी स्वयं का और परिवार का शोषण है और सर्वनाश तो निश्चित है l विभीषण का चरित्र हमें यह भी सिखाता है कि मोह के धागे को तोड़ना जरुरी है l यदि आप रिश्ते -नातों के मोह में फंसे रहेंगे , अपने ही परिवार के पापियों का समर्थन करेंगे , उनकी गलतियों पर परदा डालेंगे तो असुरता का अंत कभी नहीं होगा l ऐसे लोगों को त्याग दो और ईश्वर की शरण में रहो भगवान कभी किसी को निराश नहीं करते l