असुरता का अस्तित्व प्रत्येक युग में रहा है l आसुरी प्रवृति , छल , कपट , षडयंत्र , धोखा , भ्रष्टाचार , अनैतिकता , पाशविक स्तर के घोर अपराध -----यह सब पीढ़ी -दर -पीढ़ी चलते ही रहते हैं l संस्कार परिवर्तन सबसे कठिन कार्य है , कोई इस कठिन राह पर चलना भी नहीं चाहता है l संतान सब की होती हैं , इसलिए यह असुरता कभी समाप्त नहीं होती l संसार तो अपनी गति से चलता है l अँधेरा है , तभी उजाले का महत्त्व है l ईश्वर ने मनुष्य को चयन की स्वतंत्रता दी है , यह हमारी इच्छा है कि हम असुरता की राह चुनते हैं या देवत्व की l जब मनुष्य कोई गलत राह चुनता है , तब दैवी शक्तियां उसे विभिन्न तरीके से संकेत देती हैं कि इस गलत मार्ग पर नहीं जाओ , ऐसी गहरी खाई में गिरोगे कि संभलना मुश्किल होगा l लेकिन मनुष्य अपने अहंकार में इन संकेतों को अनदेखा कर देता है , कुछ पल मौन नहीं रहता कि प्रकृति के संकेतों को समझ सके l जैसे कर्म करता है उसका परिणाम उसे भोगना ही पड़ता है l मनुष्य को अपने अच्छे -बुरे कर्मों का फल कब और कैसे मिलेगा , यह काल तय करता है l काल की गति को कोई नहीं समझ सकता है l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते है ----'सत्कर्म का कोई भी मौका हाथ से न जाने दो l यह सत्कर्मों की पूंजी हमारी हर तरह से रक्षा करती है l ' आसुरी प्रवृति क्या है ? यह मन का विकार ही तो है l गीता में भगवान ने कहा है कि निष्काम कर्म से मन के विकार दूर होते हैं l जब मन का मैल साफ़ हो गया तो मनुष्य सही राह चुनेगा , देवत्व की ओर कदम बढ़ाएगा l